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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

कृपाचार्य, द्रोण और अश्वत्थामाकी उत्पत्ति तथा द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र-शस्त्रकी प्राप्तिकी कथा

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एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

कृपाचार्य, द्रोण और अश्वत्थामाकी उत्पत्ति तथा द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र-शस्त्रकी प्राप्तिकी कथा

जनमेजय उवाच

कृपस्यापि मम ब्रह्मन् सम्भवं वक्तुमर्हसि ।
शरस्तम्बात् कथं जज्ञे कथं वास्त्राण्यवाप्तवान् ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! कृपाचार्यका जन्म किस प्रकार हुआ? यह मुझे बतानेकी कृपा करें। वे सरकंडेके समूहसे किस तरह उत्पन्न हुए एवं उन्होंने किस प्रकार अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त की? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

महर्षेर्गौतमस्यासीच्छरद्वान् नाम गौतमः ।
पुत्रः किल महाराज जातः सह शरैर्विभो ॥ २ ॥
न तस्य वेदाध्ययने तथा बुद्धिरजायत ।
यथास्य बुद्धिरभवद् धनुर्वेदे परंतप ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— महाराज! महर्षि गौतमके शरद्वान् गौतम* नामसे प्रसिद्ध एक पुत्र थे। प्रभो! कहते हैं, वे सरकंडोंके साथ उत्पन्न हुए थे। परंतप! उनकी बुद्धि धनुर्वेदमें जितनी लगती थी, उतनी वेदोंके अध्ययनमें नहीं ॥ २-३ ॥

अधिजग्मुर्यथा वेदांस्तपसा ब्रह्मचारिणः ।
तथा स तपसोपेतः सर्वाण्यस्त्राण्यवाप ह ॥ ४ ॥
जैसे अन्य ब्रह्मचारी तपस्यापूर्वक वेदोंका ज्ञान प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने तपस्यायुक्त होकर सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किये ॥ ४ ॥

धनुर्वेदपरत्वाच्च तपसा विपुलेन च ।
भृशं संतापयामास देवराजं स गौतमः ॥ ५ ॥
वे धनुर्वेदमें पारंगत तो थे ही, उनकी तपस्या भी बड़ी भारी थी; इससे गौतमने देवराज इन्द्रको अत्यन्त चिन्तामें डाल दिया था ॥ ५ ॥

ततो जानपदीं नाम देवकन्यां सुरेश्वरः ।
प्राहिणोत् तपसो विघ्नं कुरु तस्येति कौरव ॥ ६ ॥
कौरव! तब देवराजने जानपदी नामकी एक देवकन्याको उनके पास भेजा और यह आदेश दिया कि 'तुम शरद्वान्की तपस्यामें विघ्न डालो' ॥ ६ ॥

सा हि गत्वाऽऽश्रमं तस्य रमणीयं शरद्वतः ।
धनुर्बाणधरं बाला लोभयामास गौतमम् ॥ ७ ॥
वह जानपदी शरद्वान्‌के रमणीय आश्रमपर जाकर धनुष-बाण धारण करनेवाले गौतमको लुभाने लगी ॥ ७ ॥

तामेकवसनां दृष्ट्वा गौतमोऽप्सरसं वने ।
लोकेऽप्रतिमसंस्थानां प्रोत्फुल्लनयनोऽभवत् ॥ ८ ॥
गौतमने एक वस्त्र धारण करनेवाली उस अप्सराको वनमें देखा। संसारमें उसके सुन्दर शरीरकी कहीं तुलना नहीं थी। उसे देखकर शरद्वान्‌के नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे ॥ ८ ॥

धनुश्च हि शरास्तस्य कराभ्याम्पतन् भुवि ।
वेपथुश्चापि तां दृष्ट्वा शरीरे समजायत ॥ ९ ॥
उनके हाथोंसे धनुष और बाण छूटकर पृथ्वीपर गिर पड़े तथा उसकी ओर देखनेसे उनके शरीरमें कम्प हो आया ॥ ९ ॥

स तु ज्ञानगरीयस्त्वात् तपसश्च समर्थनात् ।
अवतस्थे महाप्राज्ञो धैर्येण परमेण ह ॥ १० ॥
शरद्वान् ज्ञानमें बहुत बढ़े-चढ़े थे और उनमें तपस्याकी भी प्रबल शक्ति थी। अतः वे महाप्राज्ञ मुनि अत्यन्त धीरतापूर्वक अपनी मर्यादामें स्थित रहे ॥ १० ॥

यस्तस्य सहसा राजन् विकारः समदृश्यत ।
तेन सुस्राव रेतोऽस्य स च तन्नान्वबुध्यत ॥ ११ ॥
राजन्! किंतु उनके मनमें सहसा जो विकार देखा गया, इससे उनका वीर्य स्खलित हो गया; परंतु इस बातका उन्हें भान नहीं हुआ ॥ ११ ॥

धनुश्च सशरं त्यक्त्वा तथा कृष्णाजिनानि च ।
स विहायाश्रमं तं च तां चैवाप्सरसं मुनिः ॥ १२ ॥
जगाम रेतस्तत् तस्य शरस्तम्बे पपात च ।
शरस्तम्बे च पतितं द्विधा तदभवन्नृप ॥ १३ ॥
वे मुनि बाणसहित धनुष, काला मृगचर्म, वह आश्रम और वह अप्सरा—सबको वहीं छोड़कर वहाँसे चल दिये। उनका वह वीर्य सरकंडेके समुदाय-पर गिर पड़ा। राजन्! वहाँ गिरनेपर उनका वीर्य दो भागोंमें बँट गया ॥ १२-१३ ॥

तस्याथ मिथुनं जज्ञे गौतमस्य शरद्वतः ।
मृगयां चरतो राज्ञः शन्तनोस्तु यदृच्छया ॥ १४ ॥
कश्चित् सेनाचरोऽरण्ये मिथुनं तदपश्यत ।
धनुश्च सशरं दृष्ट्वा तथा कृष्णाजिनानि च ॥ १५ ॥
ज्ञात्वा द्विजस्य चापत्ये धनुर्वेदान्तगस्य ह ।
स राज्ञे दर्शयामास मिथुनं सशरं धनुः ॥ १६ ॥

स तदादाय मिथुनं राजा च कृपयान्वितः ।
आजगाम गृहानेव मम पुत्राविति ब्रुवन् ॥ १७ ॥
तदनन्तर गौतमनन्दन शरद्वान्‌के उसी वीर्यसे एक पुत्र और एक कन्याकी उत्पत्ति हुई। उस दिन दैवेच्छासे राजा शन्तनु वनमें शिकार खेलने आये थे। उनके किसी सैनिकने वनमें उन युगल संतानोंको देखा। वहाँ बाणसहित धनुष और काला मृगचर्म देखकर उसने यह जान लिया कि 'ये दोनों किसी धनुर्वेदके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणकी संतानें हैं' ऐसा निश्चय होनेपर उसने राजाको वे दोनों बालक और बाणसहित धनुष दिखाया। राजा उन्हें देखते ही कृपाके वशीभूत हो गये और उन दोनोंको साथ ले अपने घर आ गये। वे किसीके पूछनेपर यही परिचय देते थे कि 'ये दोनों मेरी ही संतानें हैं' ॥ १४—१७ ॥

ततः संवर्धयामास संस्कारैश्चाप्ययोजयत् ।
प्रातीपेयो नरश्रेष्ठो मिथुनं गौतमस्य तत् ॥ १८ ॥
तदनन्तर नरश्रेष्ठ प्रतीपनन्दन शन्तनुने शरद्वान्‌के उन दोनों बालकोंका पालन-पोषण किया और यथासमय उन्हें सब संस्कारोंसे सम्पन्न किया ॥ १८ ॥

गौतमोऽपि ततोऽभ्येत्य धनुर्वेदपरोऽभवत् ।
कृपया यन्मया बालाविमौ संवर्धिताविति ॥ १९ ॥
तस्मात् तयोर्नाम चक्रे तदेव स महीपतिः ।
गोपितौ गौतमस्तत्र तपसा समविन्दत ॥ २० ॥
गौतम (शरद्वान्) भी उस आश्रमसे अन्यत्र जाकर धनुर्वेदके अभ्यासमें तत्पर रहने लगे। राजा शन्तनुने यह सोचकर कि मैंने इन बालकोंको कृपापूर्वक पाला-पोसा है, उन दोनोंके वे ही नाम रख दिये—कृप और कृपी। राजाके द्वारा पालित हुई अपनी दोनों संतानोंका हाल गौतमने तपोबलसे जान लिया ॥ १९-२० ॥

आगत्य तस्मै गोत्रादि सर्वमाख्यातवांस्तदा ।
चतुर्विधं धनुर्वेदं शास्त्राणि विविधानि च ॥ २१ ॥
निखिलेनास्य तत् सर्वं गुह्यमाख्यातवांस्तदा ।
सोऽचिरेणैव कालेन परमाचार्यतां गतः ॥ २२ ॥
और वहाँ गुप्तरूपसे आकर अपने पुत्रको गोत्र आदि सब बातोंका पूरा परिचय दे दिया। चार प्रकारके* धनुर्वेद, नाना प्रकारके शास्त्र तथा उन सबके गूढ़ रहस्यका भी पूर्णरूपसे उसको उपदेश दिया। इससे कृप थोड़े ही समयमें धनुर्वेदके उत्कृष्ट आचार्य हो गये ॥ २१-२२ ॥

ततोऽधिजग्मुः सर्वे ते धनुर्वेदं महारथाः ।
धृतराष्ट्रात्मजाश्चैव पाण्डवाः सह यादवैः ॥ २३ ॥
धृतराष्ट्रके महारथी पुत्र, पाण्डव तथा यादव—सबने उन्हीं कृपाचार्यसे धनुर्वेदका अध्ययन किया ॥ २३ ॥

वृष्णयश्च नृपाश्चान्ये नानादेशसमागताः ।
वृष्णिवंशी तथा भिन्न-भिन्न देशोंसे आये हुए अन्य नरेश भी उनसे धनुर्वेदकी शिक्षा लेते थे ॥ २३ ½ ॥

वैशम्पायन उवाच

विशेषार्थी ततो भीष्मः पौत्राणां विनयेप्सया ॥ २४ ॥
इष्वस्त्रज्ञान् पर्यपृच्छदाचार्यान् वीर्यसम्मतान् ।
नाल्पधीर्ना महाभागस्तथा नानास्त्रकोविदः ॥ २५ ॥
नादेवसत्त्वो विनयेत् कुरूनस्त्रे महाबलान् ।
इति संचिन्त्य गाङ्गेयस्तदा भरतसत्तमः ॥ २६ ॥
द्रोणाय वेदविदुषे भारद्वाजाय धीमते ।
पाण्डवान् कौरवांश्चैव ददौ शिष्यान् नरर्षभ ॥ २७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! कृपाचार्यके द्वारा पूर्णतः शिक्षा मिल जानेपर पितामह भीष्मने अपने पौत्रोंमें विशिष्ट योग्यता लानेके लिये उन्हें और अधिक शिक्षा देनेकी इच्छासे ऐसे आचार्योंकी खोज प्रारम्भ की, जो बाण-संचालनकी कलामें निपुण और अपने पराक्रमके लिये सम्मानित हों। उन्होंने सोचा—'जिसकी बुद्धि थोड़ी है, जो महान् भाग्यशाली नहीं है, जिसने नाना प्रकारकी अस्त्र-विद्यामें निपुणता नहीं प्राप्त की है तथा जो देवताओंके समान शक्तिशाली नहीं है, वह इन महाबली कौरवोंको अस्त्र-विद्याकी शिक्षा नहीं दे सकता।' नरश्रेष्ठ! यों विचारकर भरतश्रेष्ठ गंगानन्दन भीष्मने भरद्वाजवंशी, वेदवेत्ता तथा बुद्धिमान् द्रोणको आचार्यके पदपर प्रतिष्ठित करके उनको शिष्यरूपमें पाण्डवों तथा कौरवोंको समर्पित कर दिया ॥ २४—२७ ॥

शास्त्रतः पूजितश्चैव सम्यक् तेन महात्मना ।
स भीष्मेण महाभागस्तुष्टोऽस्त्रविदुषां वरः ॥ २८ ॥
अस्त्र-विद्याके विद्वानोंमें श्रेष्ठ महाभाग द्रोण महात्मा भीष्मके द्वारा शास्त्रविधिसे भलीभाँति पूजित होनेपर बहुत संतुष्ट हुए ॥ २८ ॥

प्रतिजग्राह तान् सर्वान् शिष्यत्वेन महायशाः ।
शिक्षयामास च द्रोणो धनुर्वेदमशेषतः ॥ २९ ॥
फिर उन महायशस्वी आचार्य द्रोणने उन सबको शिष्यरूपमें स्वीकार किया और सम्पूर्ण धनुर्वेदकी शिक्षा दी ॥ २९ ॥

तेऽचिरेणैव कालेन सर्वशस्त्रविशारदाः ।
बभूवुः कौरवा राजन् पाण्डवाश्चामितौजसः ॥ ३० ॥
राजन्! अमिततेजस्वी पाण्डव तथा कौरव—सभी थोड़े ही समयमें सम्पूर्ण शस्त्र-विद्यामें परम प्रवीण हो गये ॥ ३० ॥

जनमेजय उवाच

कथं समभवद् द्रोणः कथं चास्त्राण्यवाप्तवान् ।
कथं चागात् कुरून् ब्रह्मन् कस्य पुत्रः स वीर्यवान् ॥ ३१ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! द्रोणाचार्यकी उत्पत्ति कैसे हुई? उन्होंने किस प्रकार अस्त्र-विद्या प्राप्त की? वे कुरुदेशमें कैसे आये? तथा वे महापराक्रमी द्रोण किसके पुत्र थे? ॥ ३१ ॥

कथं चास्य सुतो जातः सोऽश्वत्थामास्त्रवित्तमः ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण प्रकीर्तय ॥ ३२ ॥
साथ ही अस्त्र-शस्त्रके विद्वानोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामा, जो द्रोणका पुत्र था, कैसे उत्पन्न हुआ? यह सब मैं सुनना चाहता हूँ। आप विस्तारपूर्वक कहिये ॥ ३२ ॥

वैशम्पायन उवाच

गङ्गाद्वारं प्रति महान् बभूव भगवानृषिः ।
भरद्वाज इति ख्यातः सततं संशितव्रतः ॥ ३३ ॥
सोऽभिषेक्तुं ततो गङ्गां पूर्वमेवागमन्नदीम् ।
महर्षिभिर्भरद्वाजो हविर्धाने चरन् पुरा ॥ ३४ ॥
ददर्शाप्सरसं साक्षाद् घृताचीमाप्लुतामृषिः ।
रूपयौवनसम्पन्नां मददृप्तां मदालसाम् ॥ ३५ ॥
तस्याः पुनर्नदीतीरे वसनं पर्यवर्तत ।
व्यपकृष्टाम्बरां दृष्ट्वा तामृषिश्चकमे ततः ॥ ३६ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— जनमेजय! गंगाद्वारमें भगवान् भरद्वाज नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि रहते थे। वे सदा अत्यन्त कठोर व्रतोंका पालन करते थे। एक दिन उन्हें एक विशेष प्रकारके यज्ञका अनुष्ठान करना था। इसलिये वे भरद्वाज मुनि महर्षियोंको साथ लेकर गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये। वहाँ पहुँचकर महर्षिने प्रत्यक्ष देखा, घृताची अप्सरा पहलेसे ही स्नान करके नदीके तटपर खड़ी हो वस्त्र बदल रही है। वह रूप और यौवनसे सम्पन्न थी। जवानीके नशेमें मदसे उन्मत्त हुई जान पड़ती थी। उसका वस्त्र खिसक गया और उसे उस अवस्थामें देखकर ऋषिके मनमें कामवासना जाग उठी ॥ ३३—३६ ॥

तत्र संसक्तमनसो भरद्वाजस्य धीमतः ।
ततोऽस्य रेतश्चस्कन्द तदृषिर्द्रोण आदधे ॥ ३७ ॥
परम बुद्धिमान् भरद्वाजजीका मन उस अप्सरामें आसक्त हुआ; इससे उनका वीर्य स्खलित हो गया। ऋषिने उस वीर्यको द्रोण (यज्ञकलश)-में रख दिया ॥ ३७ ॥

ततः समभवद् द्रोणः कलशे तस्य धीमतः ।
अध्यगीष्ट स वेदांश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः ॥ ३८ ॥

तब उन बुद्धिमान् महर्षिको उस कलशसे जो पुत्र उत्पन्न हुआ, वह द्रोणसे जन्म लेनेके कारण द्रोण नामसे ही विख्यात हुआ। उसने सम्पूर्ण वेदों और वेदांगोंका अध्ययन किया ॥ ३८ ॥

अग्निवेशं महाभागं भरद्वाजः प्रतापवान् ।
प्रत्यपादयदाग्नेयमस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥ ३९ ॥
प्रतापी महर्षि भरद्वाज अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे। उन्होंने महाभाग अग्निवेशको आग्नेय अस्त्रकी शिक्षा दी थी ॥ ३९ ॥

अग्नेस्तु जातः स मुनिस्ततो भरतसत्तम ।
भारद्वाजं तदाग्नेयं महास्त्रं प्रत्यपादयत् ॥ ४० ॥
जनमेजय! अग्निवेश मुनि साक्षात् अग्निके पुत्र थे। उन्होंने अपने गुरुपुत्र भरद्वाजनन्दन द्रोणको उस आग्नेय नामक महान् अस्त्रकी शिक्षा दी ॥ ४० ॥

भरद्वाजसखा चासीत् पृषतो नाम पार्थिवः ।
तस्यापि द्रुपदो नाम तदा समभवत् सुतः ॥ ४१ ॥
उन दिनों पृषत नामसे प्रसिद्ध एक भूपाल महर्षि भरद्वाजके मित्र थे। उन्हें भी उसी समय एक पुत्र हुआ, जिसका नाम द्रुपद था ॥ ४१ ॥

स नित्यमाश्रमं गत्वा द्रोणेन सह पार्थिवः ।
चिक्रीडाध्ययनं चैव चकार क्षत्रियर्षभः ॥ ४२ ॥
वह राजकुमार क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ था। वह प्रतिदिन भरद्वाज मुनिके आश्रममें जाकर द्रोणके साथ खेलता और अध्ययन करता था ॥ ४२ ॥

ततो व्यतीते पृषते स राजा द्रुपदोऽभवत् ।
पञ्चालेषु महाबाहुरुत्तरेषु नरेश्वर ॥ ४३ ॥
नरेश्वर जनमेजय! पृषतकी मृत्यु हो जानेपर महाबाहु द्रुपद उत्तर-पांचाल देशके राजा हुए ॥ ४३ ॥

भरद्वाजोऽपि भगवानारुरोह दिवं तदा ।
तत्रैव च वसन् द्रोणस्तपस्तेपे महातपाः ॥ ४४ ॥
कुछ दिनों बाद भगवान् भरद्वाज भी स्वर्गवासी हो गये और महातपस्वी द्रोण उसी आश्रममें रहकर तपस्या करने लगे ॥ ४४ ॥

वेदवेदाङ्गविद्वान् स तपसा दग्धकिल्बिषः ।
ततः पितृनियुक्तात्मा पुत्रलोभान्महायशाः ॥ ४५ ॥
शारद्वतीं ततो भार्यां कृपीं द्रोणोऽन्वविन्दत ।
अग्निहोत्रे च धर्मे च दमे च सततं रताम् ॥ ४६ ॥
वे वेदों और वेदांगोंके विद्वान् तो थे ही, तपस्याद्वारा अपनी सम्पूर्ण पापराशिको दग्ध कर चुके थे। उनका महान् यश सब ओर फैल चुका था। एक समय पितरोंने उनके मनमें

पुत्र उत्पन्न करनेकी प्रेरणा दी; अतः द्रोणाचार्यने पुत्रके लोभसे शरद्वान्‌की पुत्री कृपीको धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण किया। कृपी सदा अग्निहोत्र, धर्मानुष्ठान तथा इन्द्रियसंयममें उनका साथ देती थी ॥ ४५-४६ ॥
अलभद् गौतमी पुत्रमश्वत्थामानमेव च ।
स जातमात्रो व्यनदद् यथैवोच्चैःश्रवा हयः ॥ ४७ ॥
गौतमी कृपीने द्रोणसे अश्वत्थामा नामक पुत्र प्राप्त किया। उस बालकने जन्म लेते ही उच्चैःश्रवा घोड़ेके समान शब्द किया ॥ ४७ ॥
तच्छ्रुत्वान्तर्हितं भूतमन्तरिक्षस्थमब्रवीत् ।
अश्वस्येवास्य यत् स्थाम नदतः प्रदिशो गतम् ॥ ४८ ॥
अश्वत्थामैव बालोऽयं तस्मान्नाम्ना भविष्यति ।
सुतेन तेन सुप्रीतो भारद्वाजस्ततोऽभवत् ॥ ४९ ॥
उसे सुनकर अन्तरिक्षमें स्थित किसी अदृश्य चेतनने कहा—'इस बालकके चिल्लाते समय अश्वके समान शब्द सम्पूर्ण दिशाओंमें गूँज उठा है; अतः यह अश्वत्थामा नामसे ही प्रसिद्ध होगा।' उस पुत्रसे भरद्वाजनन्दन द्रोणको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४८-४९ ॥
तत्रैव च वसन् धीमान् धनुर्वेदपरोऽभवत् ।
स शुश्राव महात्मानं जामदग्न्यं परंतपम् ॥ ५० ॥
सर्वज्ञानविदं विप्रं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ।
ब्राह्मणेभ्यस्तदा राजन् दित्सन्तं वसु सर्वशः ॥ ५१ ॥
बुद्धिमान् द्रोण उसी आश्रममें रहकर धनुर्वेदका अभ्यास करने लगे। राजन्! किसी समय उन्होंने सुना कि 'महात्मा जमदग्निनन्दन परशुरामजी इस समय सर्वज्ञ एवं सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं तथा शत्रुओंको संताप देनेवाले वे विप्रवर ब्राह्मणोंको अपना सर्वस्व दान करना चाहते हैं ॥ ५०-५१ ॥
स रामस्य धनुर्वेदं दिव्यान्यस्त्राणि चैव ह ।
श्रुत्वा तेषु मनश्चक्रे नीतिशास्त्रे तथैव च ॥ ५२ ॥
द्रोणने यह सुनकर कि परशुरामजीके पास सम्पूर्ण धनुर्वेद तथा दिव्यास्त्रोंका ज्ञान है, उन्हें प्राप्त करनेकी इच्छा की। इसी प्रकार उन्होंने उनसे नीति-शास्त्रकी शिक्षा लेनेका भी विचार किया ॥ ५२ ॥
ततः स व्रतिभिः शिष्यैस्तपोयुक्तैर्महातपाः ।
वृतः प्रायान्महाबाहुर्महेन्द्रं पर्वतोत्तमम् ॥ ५३ ॥
फिर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले तपस्वी शिष्योंसे घिरे हुए महातपस्वी महाबाहु द्रोण परम उत्तम महेन्द्र पर्वतपर गये ॥ ५३ ॥
ततो महेन्द्रमासाद्य भारद्वाजो महातपाः ।
क्षान्तं दान्तममित्रघ्नमपश्यद् भृगुनन्दनम् ॥ ५४ ॥

महेन्द्र पर्वतपर पहुँचकर महान् तपस्वी द्रोणने क्षमा एवं शम-दम आदि गुणोंसे युक्त

शत्रुनाशक भृगुनन्दन परशुरामजीका दर्शन किया ।। ५४ ।।

ततो द्रोणो वृतः शिष्यैरुपगम्य भृगूद्वहम् ।

आचख्यावात्मनो नाम जन्म चाङ्गिरसः कुले ।। ५५ ।।

तत्पश्चात् शिष्योंसहित द्रोणने भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीके समीप जाकर अपना नाम बताया

और यह भी कहा कि 'मेरा जन्म आंगिरस कुलमें हुआ है' ।। ५५ ।।

निवेद्य शिरसा भूमौ पादौ चैवाभ्यवादयत् ।

ततस्तं सर्वमुत्सृज्य वनं जिगमिषुं तदा ।। ५६ ।।

जामदग्न्यं महात्मानं भारद्वाजोऽब्रवीदिदम् ।

भरद्वाजात् समुत्पन्नं तथा त्वं मामयोनिजम् ।। ५७ ।।

आगतं वित्तकामं मां विद्धि द्रोणं द्विजर्षभ ।

इस प्रकार नाम और गोत्र बताकर उन्होंने पृथ्वीपर मस्तक टेक दिया और

परशुरामजीके चरणोंमें प्रणाम किया। तदनन्तर सर्वस्व त्यागकर वनमें जानेकी इच्छा

रखनेवाले महात्मा जमदग्निकुमारसे द्रोणने इस प्रकार कहा- 'द्विजश्रेष्ठ! मैं महर्षि

भरद्वाजसे उत्पन्न उनका अयोनिज पुत्र हूँ। आपको यह ज्ञात हो कि मैं धनकी इच्छासे

आया हूँ। मेरा नाम द्रोण है' ।। ५६-५७ ½ ।।

तमब्रवीन्महात्मा स सर्वक्षत्रियमर्दनः ।। ५८ ।।

यह सुनकर समस्त क्षत्रियोंका संहार करनेवाले महात्मा परशुराम उनसे यों बोले

— ।। ५८ ।।

स्वागतं ते द्विजश्रेष्ठ यदिच्छसि वदस्व मे ।

एवमुक्तस्तु रामेण भारद्वाजोऽब्रवीद् वचः ।। ५९ ।।

रामं प्रहरतां श्रेष्ठं दित्सन्तं विविधं वसु ।

अहं धनमनन्तं हि प्रार्थये विपुलव्रत ।। ६० ।।

‘द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारा स्वागत है। तुम जो कुछ भी चाहते हो, मुझसे कहो।' उनके इस

प्रकार पूछनेपर भरद्वाजकुमार द्रोणने नाना प्रकारके धन-रत्नोंका दान करनेकी इच्छावाले,

योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामसे कहा- 'महान् व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! मैं आपसे ऐसे

धनकी याचना करता हूँ, जिसका कभी अन्त न हो' ।। ५९-६० ।।

राम उवाच

हिरण्यं मम यच्चान्यद् वसु किंचिदिह स्थितम् ।

ब्राह्मणेभ्यो मया दत्तं सर्वमेतत् तपोधन ।। ६१ ।।

तथैवेयं धरा देवी सागरान्ता सपत्तना ।

कश्यपाय मया दत्ता कृत्स्ना नगरमालिनी ।। ६२ ।।

**परशुरामजी बोले—**तपोधन! मेरे पास यहाँ जो कुछ सुवर्ण तथा अन्य प्रकारका धन था, वह सब मैंने ब्राह्मणोंको दे दिया। इसी प्रकार ग्राम और नगरोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित होनेवाली समुद्रपर्यन्त यह सारी पृथ्वी महर्षि कश्यपको दे दी है ।। ६१-६२ ।।
शरीरमात्रमेवाद्य ममेदमनवशेषितम् ।
अस्त्राणि च महार्हाणि शस्त्राणि विविधानि च ।। ६३ ।।
अब मेरा यह शरीरमात्र बचा है। साथ ही नाना प्रकारके बहुमूल्य अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान अवशिष्ट है ।। ६३ ।।
अस्त्राणि वा शरीरं वा वरयैतन्मयोद्यतम् ।
वृणीष्व किं प्रयच्छामि तुभ्यं द्रोण वदाशु तत् ।। ६४ ।।
अतः तुम अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान अथवा यह शरीर माँग लो। इसे देनेके लिये मैं सदा प्रस्तुत हूँ। द्रोण! बोलो, मैं तुम्हें क्या दूँ? शीघ्र उसे कहो ।। ६४ ।।

द्रोण उवाच
अस्त्राणि मे समग्राणि ससंहाराणि भार्गव ।
सप्रयोगरहस्यानि दातुमर्हस्यशेषतः ।। ६५ ।।
**द्रोणने कहा—**भृगुनन्दन! आप मुझे प्रयोग, रहस्य तथा संहारविधिसहित सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान प्रदान करें ।। ६५ ।।
तथेत्युक्त्वा ततस्तस्मै प्रादादस्त्राणि भार्गवः ।
सरहस्यव्रतं चैव धनुर्वेदमशेषतः ।। ६६ ।।
तब 'तथास्तु' कहकर भृगुवंशी परशुरामजीने द्रोणको सम्पूर्ण अस्त्र प्रदान किये तथा रहस्य और व्रतसहित सम्पूर्ण धनुर्वेदका भी उपदेश किया ।। ६६ ।।
प्रतिगृह्य तु तत्सर्वं कृतास्त्रो द्विजसत्तमः ।
प्रियं सखायं सुप्रीतो जगाम द्रुपदं प्रति ।। ६७ ।।
वह सब ग्रहण करके द्विजश्रेष्ठ द्रोण अस्त्र-विद्याके पूरे पण्डित हो गये और अत्यन्त प्रसन्न हो अपने प्रिय सखा द्रुपदके पास गये ।। ६७ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रोणस्य भार्गवादस्त्रप्राप्तौ
ऊनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १२९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र-विद्याकी प्राप्तिविषयक एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२९ ।।


* गौतमगोत्रीय होनेके कारण शरद्वान्‌को भी गौतम कहा जाता था।

* धनुर्वेदके चार भेद इस प्रकार हैं—मुक्त, अमुक्त, मुक्तामुक्त तथा मन्त्रमुक्त। छोड़े जानेवाले बाण आदिको ‘मुक्त’ कहते हैं। जिन्हें हाथमें लेकर प्रहार किया जाय, उन खड्ग आदिको ‘अमुक्त’ कहते हैं। जिस अस्त्रको चलाने और समेटनेकी कला मालूम हो, वह अस्त्र ‘मुक्तामुक्त’ कहलाता है। जिसे मन्त्र पढ़कर चला तो दिया जाय किंतु उसके उपसंहारकी विधि मालूम न हो, वह अस्त्र ‘मन्त्रमुक्त’ कहा गया है, शस्त्र, अस्त्र, प्रत्यस्त्र और परमास्त्र—ये भी धनुर्वेदके चार भेद हैं। इसी प्रकार आदान, संधान, विमोक्ष और संहार—इन चार क्रियाओंके भेदसे भी धनुर्वेदके चार भेद होते हैं।