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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

अर्जुनका प्रभासतीर्थमें श्रीकृष्णसे मिलना और उन्हींके साथ उनका रैवतक पर्वत एवं द्वारकापुरीमें आना

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सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

अर्जुनका प्रभासतीर्थमें श्रीकृष्णसे मिलना और उन्हींके साथ उनका रैवतक पर्वत एवं द्वारकापुरीमें आना

वैशम्पायन उवाच

सोऽपरान्तेषु तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च।
सर्वाण्येवानुपूर्व्येण जगामामितविक्रमः॥ १॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर अमित-पराक्रमी अर्जुन क्रमशः अपरान्त (पश्चिम समुद्रतटवर्ती)-देशके समस्त पुण्य तीर्थों और मन्दिरोंमें गये॥ १॥

समुद्रे पश्चिमे यानि तीर्थान्यायतननि च।
तानि सर्वाणि गत्वा स प्रभासमुपजग्मिवान्॥ २॥

पश्चिम समुद्रके तटपर जितने तीर्थ और देवालय थे, उन सबकी यात्रा करके वे प्रभासक्षेत्रमें जा पहुँचे॥ २॥

प्रभासदेशं सम्प्राप्तं बीभत्सुमपराजितम्।
सुपुण्यं रमणीयं च शुश्राव मधुसूदनः॥ ३॥
ततोऽभ्यगच्छत् कौन्तेयं सखायं तत्र माधवः।
ददृशाते तदान्योन्यं प्रभासे कृष्णपाण्डवौ॥ ४॥

भगवान् श्रीकृष्णने गुप्तचरोंद्वारा यह सुना कि किसीसे भी परास्त न होनेवाले अर्जुन परम पवित्र एवं रमणीय प्रभासक्षेत्रमें आ गये हैं, तब वे अपने सखा कुन्तीनन्दनसे मिलनेके लिये वहाँ गये। उस समय प्रभासमें श्रीकृष्ण और अर्जुनने एक-दूसरेको देखा॥ ३-४॥

तावन्योन्यं समाश्लिष्य पृष्ट्वा च कुशलं वने।
आस्तां प्रियसखायौ तौ नरनारायणावृषी॥ ५॥

दोनों ही दोनोंको हृदयसे लगाकर कुशल-प्रश्न पूछनेके पश्चात् वे परस्पर प्रिय मित्र साक्षात् नर-नारायण ऋषि वनमें एक स्थानपर बैठ गये॥ ५॥

ततोऽर्जुनं वासुदेवस्तां चर्यां पर्यपृच्छत ।
किमर्थं पाण्डवैतानि तीर्थान्यनुचरस्युत ।। ६ ।।
तब भगवान् वासुदेवने अर्जुनसे उनकी जीवनचर्याके सम्बन्धमें पूछा—‘पाण्डव! तुम किसलिये तीर्थोंमें विचर रहे हो?’ ।। ६ ।।

ततोऽर्जुनो यथावृत्तं सर्वमाख्यातवांस्तदा ।
श्रुत्वोवाच च वार्ष्णेय एवमेतदिति प्रभुः ।। ७ ।।
यह सुनकर अर्जुनने उन्हें सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों सुना दिया। सब कुछ सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण बोले—‘यह बात ऐसी ही है’ ।। ७ ।।

तौ विहृत्य यथाकामं प्रभासे कृष्णपाण्डवौ ।
महीधरं रैवतकं वासायैवाभिजग्मतुः ।। ८ ।।
तदनन्तर श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों प्रभासक्षेत्रमें इच्छानुसार घूम-फिरकर रैवतक पर्वतपर चले गये। उन्हें रातको वहीं ठहरना था ।। ८ ।।

पूर्वमेव तु कृष्णस्य वचनात् तं महीधरम् ।
पुरुषा मण्डयाञ्चक्रुरुपजह्रुश्च भोजनम् ।। ९ ।।
भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे उनके सेवकोंने पहलेसे ही आकर उस पर्वतको सजा रखा था और वहाँ भोजन भी तैयार करके रख लिया था ।। ९ ।।

प्रतिगृह्यार्जुनः सर्वमुपभुज्य च पाण्डवः ।

सहैव वासुदेवेन दृष्टवान् नटनर्तकान् ॥ १० ॥
अभ्यनुज्ञाय तान् सर्वानर्चयित्वा च पाण्डवः ।
सत्कृतं शयनं दिव्यमभ्यगच्छन्महामतिः ॥ ११ ॥
पाण्डुकुमार अर्जुनने भगवान् वासुदेवके साथ प्रस्तुत किये हुए सम्पूर्ण भोज्य पदार्थोंको यथारुचि खाकर नटों और नर्तकोंके नृत्य देखे। तत्पश्चात् उन सबको उपहार आदिसे सम्मानित करके जानेकी आज्ञा दे महाबुद्धिमान् पाण्डुकुमार अर्जुन सत्कारपूर्वक बिछी हुई दिव्य शय्यापर सोनेके लिये गये ॥ १०-११ ॥

ततस्तत्र महाबाहुः शयानः शयने शुभे ।
तीर्थानां पल्वलानां च पर्वतानां च दर्शनम् ।
आपगानां वनानां च कथयामास सात्वते ॥ १२ ॥
वहाँ सुन्दर शय्यापर सोये हुए महाबाहु धनंजयने भगवान् श्रीकृष्णसे अनेक तीर्थों, कुण्डों, पर्वतों, नदियों तथा वनोंके दर्शनसम्बन्धी अनुभवकी विचित्र बातें कहीं ॥ १२ ॥

एवं स कथयन्नेव निद्रया जनमेजय ।
कौन्तेयोऽपि हृतस्तस्मिन् शयने स्वर्गसंनिभे ॥ १३ ॥
जनमेजय! इस प्रकार बात करते-करते अर्जुन उस स्वर्गसदृश सुखदायिनी शय्यापर सो गये ॥ १३ ॥

मधुरेणैव गीतेन वीणाशब्देन चैव ह ।
प्रबोध्यमानो बुबुधे स्तुतिभिर्मङ्गलैस्तथा ॥ १४ ॥
तदनन्तर प्रातःकाल मधुर गीत, वीणाकी मीठी ध्वनि, स्तुति और मंगलपाठके शब्दोंद्वारा जगाये जानेपर उनकी नींद खुली ॥ १४ ॥

स कृत्वावश्यककार्याणि वार्ष्णेयेनाभिनन्दितः ।
रथेन काञ्चनाङ्गेन द्वारकामभिजग्मिवान् ॥ १५ ॥
तत्पश्चात् आवश्यक कार्य करके श्रीकृष्णके द्वारा अभिनन्दित हो उनके साथ सुवर्णमय रथपर बैठकर वे द्वारकापुरीको गये ॥ १५ ॥

अलंकृता द्वारका तु बभूव जनमेजय ।
कुन्तीपुत्रस्य पूजार्थमपि निष्कुटकेष्वपि ॥ १६ ॥
जनमेजय! उस समय कुन्तीकुमारके स्वागतके लिये समूची द्वारकापुरी सजायी गयी थी तथा वहाँके घरोंके बगीचेतक सजाये गये थे ॥ १६ ॥

दिदृक्षन्तश्च कौन्तेयं द्वारकावासिनो जनाः ।
नरेन्द्रमार्गमाजग्मुस्तूर्णं शतसहस्रशः ॥ १७ ॥
कुन्तीनन्दन अर्जुनको देखनेके लिये द्वारका-वासी मनुष्य लाखोंकी संख्यामें मुख्य सड़कपर चले आये थे ॥ १७ ॥

अवलोकेषु नारीणां सहस्राणि शतानि च ।

भोजवृष्ण्यन्धकानां च समवायो महानभूत् ॥ १८ ॥
जहाँसे अर्जुनका दर्शन हो सके, ऐसे स्थानोंपर सैकड़ों-हजारों स्त्रियाँ आँख लगाये खड़ी थीं तथा भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके पुरुषोंकी बहुत बड़ी भीड़ एकत्र हो गयी थी ॥ १८ ॥
स तथा सत्कृतः सर्वैर्भोजवृष्ण्यन्धकात्मजैः ।
अभिवाद्याभिवाद्यांश्च सर्वैश्च प्रतिनन्दितः ॥ १९ ॥
भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके सब लोगोंद्वारा इस प्रकार आदर-सत्कार पाकर अर्जुनने वन्दनीय पुरुषोंको प्रणाम किया और उन सबने उनका स्वागत किया ॥ १९ ॥
कुमारैः सर्वशो वीरः सत्कारेणाभिचोदितः ।
समानवयसः सर्वानाश्लिष्य स पुनः पुनः ॥ २० ॥
यदुकुलके समस्त कुमारोंने भी वीरवर अर्जुनका बड़ा सत्कार किया। अर्जुन अपने समान अवस्थावाले सब लोगोंसे उन्हें बारंबार हृदयसे लगाकर मिले ॥ २० ॥
कृष्णस्य भवने रम्ये रत्नभोज्यसमावृते ।
उवास सह कृष्णेन बहुलास्तत्र शर्वरीः ॥ २१ ॥
इसके बाद नाना प्रकारके रत्न तथा भाँति-भाँतिके भोज्यपदार्थोंसे भरपूर श्रीकृष्णके रमणीय भवनमें उन्होंने श्रीकृष्णके साथ ही अनेक रात्रियोंतक निवास किया ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वणि अर्जुनद्वारकागमने
सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें अर्जुनका द्वारकागमनविषयक दो सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१७ ॥