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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 573)

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षट्सप्ततितमोऽध्यायः

कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना

जनमेजय उवाच

ययातिः पूर्वजोऽस्माकं दशमो यः प्रजापतेः ।
कथं स शुक्रतनयां लेभे परमदुर्लभाम् ॥ १ ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन ।
आनुपूर्व्या च मे शंस राज्ञो वंशकरान् पृथक् ॥ २ ॥
**जनमेजयने पूछा—**तपोधन! हमारे पूर्वज महाराज ययातिने, जो प्रजापतिसे दसवीं पीढ़ीमें उत्पन्न हुए थे, शुक्राचार्यकी अत्यन्त दुर्लभ पुत्री देवयानीको पत्नीरूपमें कैसे प्राप्त किया? मैं इस वृत्तान्तको विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ। आप मुझसे सभी वंश-प्रवर्तक राजाओंका क्रमशः पृथक्-पृथक् वर्णन कीजिये ॥ १-२ ॥

वैशम्पायन उवाच

ययातिरासीन्नृपतिर्देवराजसमद्युतिः ।
तं शुक्रवृषपर्वाणौ वव्राते वै यथा पुरा ॥ ३ ॥
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि पृच्छते जनमेजय ।
देवयान्याश्च संयोगं ययातेर्नाहुषस्य च ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**जनमेजय! राजा ययाति देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी थे। पूर्वकालमें शुक्राचार्य और वृषपर्वाने ययातिका अपनी-अपनी कन्याके पतिके रूपमें जिस प्रकार वरण किया, वह सब प्रसंग तुम्हारे पूछनेपर मैं तुमसे कहूँगा। साथ ही यह भी बताऊँगा कि नहुषनन्दन ययाति तथा देवयानीका संयोग किस प्रकार हुआ ॥ ३-४ ॥

सुराणामसुराणां च समजायत वै मिथः ।
ऐश्वर्यं प्रति संघर्षस्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ ५ ॥
एक समय चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीके ऐश्वर्यके लिये देवताओं और असुरोंमें परस्पर बड़ा भारी संघर्ष हुआ ॥ ५ ॥

जिगीषया ततो देवा वव्रिरेऽऽङ्गिरसं मुनिम् ।
पौरोहित्येन याज्यार्थे काव्यं तूशनसं परे ॥ ६ ॥
ब्राह्मणौ तावुभौ नित्यमन्योन्यस्पर्धिनौ भृशम् ।
तत्र देवा निजघ्नुर्यान् दानवान् युधि संगतान् ॥ ७ ॥

तान् पुनर्जीवयामास काव्यो विद्याबलाश्रयात् ।
ततस्ते पुनरुत्थाय योधयांचक्रिरे सुरान् ॥ ८ ॥
उसमें विजय पानेकी इच्छासे देवताओंने अंगिरा मुनिके पुत्र बृहस्पतिका पुरोहितके पदपर वरण किया और दैत्योंने शुक्राचार्यको पुरोहित बनाया। वे दोनों ब्राह्मण सदा आपसमें बहुत लाग-डाट रखते थे। देवताओंने उस युद्धमें आये हुए जिन दानवोंको मारा था, उन्हें शुक्राचार्यने अपनी संजीवनी विद्याके बलसे पुनः जीवित कर दिया। अतः वे पुनः उठकर देवताओंसे युद्ध करने लगे ॥ ६-८ ॥
असुरास्तु निजघ्नुर्यान् सुरान् समरमूर्धनि ।
न तान् संजीवयामास बृहस्पतिरुदारधीः ॥ ९ ॥
परंतु असुरोंने युद्धके मुहानेपर जिन देवताओंको मारा था, उन्हें उदारबुद्धि बृहस्पति जीवित न कर सके ॥ ९ ॥
न हि वेद स तां विद्यां यां काव्यो वेत्ति वीर्यवान् ।
संजीविनीं ततो देवा विषादमगमन् परम् ॥ १० ॥
क्योंकि शक्तिशाली शुक्राचार्य जिस संजीविनी विद्याको जानते थे, उसका ज्ञान बृहस्पतिको नहीं था। इससे देवताओंको बड़ा विषाद हुआ ॥ १० ॥
ते तु देवा भयोद्विग्नाः काव्यादुशनसस्तदा ।
ऊचुः कचमुपागम्य ज्येष्ठं पुत्रं बृहस्पतेः ॥ ११ ॥
इससे देवता शुक्राचार्यके भयसे उद्विग्न हो उस समय बृहस्पतिके ज्येष्ठ पुत्र कचके पास जाकर बोले— ॥ ११ ॥
भजमानान् भजस्वास्मान् कुरु नः साह्यमुत्तमम् ।
या सा विद्या निवसति ब्राह्मणेऽमिततेजसि ॥ १२ ॥
शुक्रे तामाहर क्षिप्रं भागभाङ् नो भविष्यसि ।
वृषपर्वसमीपे हि शक्यो द्रष्टुं त्वया द्विजः ॥ १३ ॥
'ब्रह्मन्! हम आपके सेवक हैं। आप हमें अपनाइये और हमारी उत्तम सहायता कीजिये। अमिततेजस्वी ब्राह्मण शुक्राचार्यके पास जो मृतसंजीवनी विद्या है, उसे शीघ्र सीखकर यहाँ ले आइये। इससे आप हम देवताओंके साथ यज्ञमें भाग प्राप्त कर सकेंगे। राजा वृषपर्वाके समीप आपको विप्रवर शुक्राचार्यका दर्शन हो सकता है' ॥ १२-१३ ॥
रक्षते दानवांस्तत्र न स रक्षत्यदानवान् ।
तमाराधयितुं शक्तो भवान् पूर्ववयाः कविम् ॥ १४ ॥
'वहाँ रहकर वे दानवोंकी रक्षा करते हैं। जो दानव नहीं हैं, उनकी रक्षा नहीं करते। आपकी अभी नयी अवस्था है, अतः आप शुक्राचार्यकी आराधना (करके उन्हें प्रसन्न) करनेमें समर्थ हैं' ॥ १४ ॥
देवयानीं च दयितां सुतां तस्य महात्मनः ।

त्वमाराधयितुं शक्तो नान्यः कश्चन विद्यते ॥ १५ ॥
'उन महात्माकी प्यारी पुत्रीका नाम देवयानी है, उसे अपनी सेवाओंद्वारा आप ही प्रसन्न कर सकते हैं। दूसरा कोई इसमें समर्थ नहीं है' ॥ १५ ॥

शीलदाक्षिण्यमाधुर्यैराचारेण दमेन च ।
देवयान्यां हि तुष्टायां विद्यां तां प्राप्स्यसि ध्रुवम् ॥ १६ ॥
'अपने शील-स्वभाव, उदारता, मधुर व्यवहार, सदाचार तथा इन्द्रियसंयमद्वारा देवयानीको संतुष्ट कर लेनेपर आप निश्चय ही उस विद्याको प्राप्त कर लेंगे' ॥ १६ ॥

तथेत्युक्त्वा ततः प्रायाद् बृहस्पतिसुतः कचः ।
तदाभिपूजितो देवैः समीपे वृषपर्वणः ॥ १७ ॥
तब 'बहुत अच्छा' कहकर बृहस्पतिपुत्र कच देवताओंसे सम्मानित हो वहाँसे वृषपर्वाके समीप गये ॥ १७ ॥

स गत्वा त्वरितो राजन् देवैः सम्प्रेषितः कचः ।
असुरेन्द्रपुरे शुक्रं दृष्ट्वा वाक्यमुवाच ह ॥ १८ ॥
राजन्! देवताओंके भेजे हुए कच तुरंत दानवराज वृषपर्वाके नगरमें जाकर शुक्राचार्यसे मिले और इस प्रकार बोले— ॥ १८ ॥

ऋषेरङ्गिरसः पौत्रं पुत्रं साक्षाद् बृहस्पतेः ।
नाम्ना कचमिति ख्यातं शिष्यं गृह्णातु मां भवान् ॥ १९ ॥
'भगवन्! मैं अंगिरा ऋषिका पौत्र तथा साक्षात् बृहस्पतिका पुत्र हूँ। मेरा नाम कच है। आप मुझे अपने शिष्यके रूपमें ग्रहण करें' ॥ १९ ॥

ब्रह्मचर्यं चरिष्यामि त्वय्यहं परमं गुरौ ।
अनुमन्यस्व मां ब्रह्मन् सहस्रं परिवत्सरान् ॥ २० ॥
'ब्रह्मन्! आप मेरे गुरु हैं। मैं आपके समीप रहकर एक हजार वर्षोंतक उत्तम ब्रह्मचर्यका पालन करूँगा। इसके लिये आप मुझे अनुमति दें' ॥ २० ॥

शुक्र उवाच

कच सुस्वागतं तेऽस्तु प्रतिगृह्णामि ते वचः ।
अर्चयिष्येऽहमर्च्यं त्वामर्चितोऽस्तु बृहस्पतिः ॥ २१ ॥
शुक्राचार्यने कहा—कच! तुम्हारा भलीभाँति स्वागत है; मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ। तुम मेरे लिये आदरके पात्र हो, अतः मैं तुम्हारा सम्मान एवं सत्कार करूँगा। तुम्हारे आदर-सत्कारसे मेरे द्वारा बृहस्पतिका आदर-सत्कार होगा ॥ २१ ॥

वैशम्पायन उवाच

कचस्तु तं तथेत्युक्त्वा प्रतिजग्राह तद् व्रतम् ।
आदिष्टं कविपुत्रेण शुक्रेणोशनसा स्वयम् ॥ २२ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**तब कचने 'बहुत अच्छा' कहकर महाकान्तिमान् कविपुत्र शुक्राचार्यके आदेशके अनुसार स्वयं ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया ॥ २२ ॥
व्रतस्य प्राप्तकालं स यथोक्तं प्रत्यगृह्णत ।
आराधयन्नुपाध्यायं देवयानीं च भारत ॥ २३ ॥
नित्यमाराधयिष्यंस्तौ युवा यौवनगोचरे ।
गायन् नृत्यन् वादयंश्च देवयानीमतोषयत् ॥ २४ ॥
जनमेजय! नियत समयतकके लिये व्रतकी दीक्षा लेनेवाले कचको शुक्राचार्यने भलीभाँति अपना लिया। कच आचार्य शुक्र तथा उनकी पुत्री देवयानी दोनोंकी नित्य आराधना करने लगे। वे नवयुवक थे और जवानीमें प्रिय लगनेवाले कार्य—गायन और नृत्य करके तथा भाँति-भाँतिके बाजे बजाकर देवयानीको संतुष्ट रखते थे ॥ २३-२४ ॥
स शीलयन् देवयानीं कन्यां सम्प्राप्तयौवनाम् ।
पुष्पैः फलैः प्रेषणैश्च तोषयामास भारत ॥ २५ ॥
भारत! आचार्यकन्या देवयानी भी युवावस्थामें पदार्पण कर चुकी थी। कच उसके लिये फूल और फल ले आते तथा उसकी आज्ञाके अनुसार कार्य करते थे। इस प्रकार उसकी सेवामें संलग्न रहकर वे सदा उसे प्रसन्न रखते थे ॥ २५ ॥
देवयान्यपि तं विप्रं नियमव्रतधारणम् ।
गायन्ती च ललन्ती च रहः पर्यचरत् तथा ॥ २६ ॥
देवयानी भी नियमपूर्वक ब्रह्मचर्य धारण करनेवाले कचके ही समीप रहकर गाती और आमोद-प्रमोद करती हुई एकान्तमें उनकी सेवा करती थी ॥ २६ ॥
पञ्चवर्षशतान्येवं कचस्य चरतो व्रतम् ।
तत्रातीयुरथो बुद्ध्वा दानवास्तं ततः कचम् ॥ २७ ॥
गा रक्षन्तं वने दृष्ट्वा रहस्येकममर्षिताः ।
जघ्नुर्बृहस्पतेर्द्वेषाद् विद्यारक्षार्थमेव च ॥ २८ ॥
इस प्रकार वहाँ रहकर ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करते हुए कचके पाँच सौ वर्ष व्यतीत हो गये। तब दानवोंको यह बात मालूम हुई। तदनन्तर कचको वनके एकान्त प्रदेशमें अकेले गौएँ चराते देख बृहस्पतिके द्वेषसे और संजीवनी विद्याकी रक्षाके लिये क्रोधमें भरे हुए दानवोंने कचको मार डाला ॥ २७-२८ ॥
हत्वा शालावृकेभ्यश्च प्रायच्छँल्लवशः कृतम् ।
ततो गावो निवृत्तास्ता अगोपाः स्वं निवेशनम् ॥ २९ ॥
उन्होंने मारनेके बाद उनके शरीरको टुकड़े-टुकड़े कर कुत्तों और सियारोंको बाँट दिया। उस दिन गौएँ बिना रक्षकके ही अपने स्थानपर लौटीं ॥ २९ ॥
सा दृष्ट्वा रहिता गाश्च कचेनाभ्यागता वनात् ।
उवाच वचनं काले देवयान्यथ भारत ॥ ३० ॥

जनमेजय! जब देवयानीने देखा, गौएँ तो वनसे लौट आयीं पर उनके साथ कच नहीं हैं, तब उसने उस समय अपने पितासे इस प्रकार कहा ।। ३० ।।

देवयान्युवाच
आहुतं चाग्निहोत्रं ते सूर्यश्चास्तं गतः प्रभो ।
अगोपाश्चागता गावः कचस्तात न दृश्यते ।। ३१ ।।