महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2188)
त्रिसप्ततितमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरको सारा धन लौटाकर एवं समझा-बुझाकर इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश देना
युधिष्ठिर उवाच
राजन् किं करवामस्ते प्रशाध्यस्मांस्त्वमीश्वरः ।
नित्यं हि स्थातुमिच्छामस्तव भारत शासने ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले— राजन्! आप हमारे स्वामी हैं। आज्ञा दीजिये, हम क्या करें। भारत! हमलोग सदा आपकी आज्ञाके अधीन रहना चाहते हैं ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
अजातशत्रो भद्रं ते अरिष्टं स्वस्ति गच्छत ।
अनुज्ञाताः सहधनाः स्वराज्यमनुशासत ॥ २ ॥
धृतराष्ट्रने कहा— अजातशत्रो! तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरी आज्ञासे हारे हुए धनके साथ बिना किसी विघ्न-बाधाके कुशलपूर्वक अपनी राजधानीको जाओ और अपने राज्यका शासन करो ॥ २ ॥
इदं चैवावबोद्धव्यं वृद्धस्य मम शासनम् ।
मया निगदितं सर्वं पथ्यं निःश्रेयसं परम् ॥ ३ ॥
मुझ वृद्धकी यही आज्ञा है। एक बात और है, उसपर भी ध्यान देना। मेरी कही हुई सारी बातें तुम्हारे हित और परम मंगलके लिये होंगी ॥ ३ ॥
वेत्थ त्वं तात धर्माणां गतिं सूक्ष्मां युधिष्ठिर ।
विनीतोऽसि महाप्राज्ञ वृद्धानां पर्युपासिता ॥ ४ ॥
तात युधिष्ठिर! तुम धर्मकी सूक्ष्म गतिको जानते हो। महामते! तुममें विनय है। तुमने बड़े-बूढ़ोंकी उपासना की है ॥
यतो बुद्धिस्ततः शान्तिः प्रशमं गच्छ भारत ।
नादारुणि पतेच्छस्त्रं दारुण्येतन्निपात्यते ॥ ५ ॥
जहाँ बुद्धि है, वहीं शान्ति है। भारत! तुम शान्त हो जाओ। (जो कुछ हुआ है, उसे भूल जाओ।) पत्थर या लोहेपर कुल्हाड़ी नहीं पड़ती। लोग उसे लकड़ीपर ही चलाते हैं ॥ ५ ॥
न वैराण्यभिजानन्ति गुणान् पश्यन्ति नागुणान् ।
विरोधं नाधिगच्छन्ति ये त उत्तमपूरुषाः ॥ ६ ॥
स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि ।
सन्तः परार्थं कुर्वाणा नावेक्षन्ते प्रतिक्रियाम् ॥ ७ ॥
जो पुरुष वैरको याद नहीं रखते, गुणोंको ही देखते हैं, अवगुणोंको नहीं तथा किसीसे विरोध नहीं रखते, वे ही उत्तम पुरुष कहे गये हैं। साधु पुरुष दूसरोंके सत्कर्मों (उपकारादि)-को ही याद रखते हैं, उनके किये हुए वैरको नहीं। वे दूसरोंकी भलाई तो करते हैं; परंतु उनसे बदला लेनेकी भावना नहीं रखते ।। ६-७ ।।
संवादे परुषान्याहुर्युधिष्ठिर नराधमाः ।
प्रत्याहुर्मध्यमास्त्वेतेऽनुक्ताः परुषमुत्तरम् ।। ८ ।।
न चोक्ता नैव चानुक्तास्त्वहिताः परुषा गिरः ।
प्रतिजल्पन्ति वै धीराः सदा तूत्तमपूरुषाः ।। ९ ।।
युधिष्ठिर! नीच मनुष्य साधारण बातचीतमें भी कटुवचन बोलने लगते हैं। जो स्वयं पहले कटु वचन न कहकर प्रत्युत्तरमें कठोर बातें कहते हैं, वे मध्यम श्रेणीके पुरुष हैं। परंतु जो धीर एवं श्रेष्ठ पुरुष हैं, वे किसीके कटुवचन बोलने या न बोलनेपर भी अपने मुखसे कभी कठोर एवं अहितकर बात नहीं निकालते ।। ८-९ ।।
स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि ।
सन्तः प्रतिविजानन्तो लब्ध्वा प्रत्ययमात्मनः ।। १० ।।
महात्मा पुरुष अपने अनुभवको सामने रखकर दूसरोंके सुख-दुःखको भी अपने समान जानते हुए उनके अच्छे बर्तावोंको ही याद रखते हैं, उनके द्वारा किये हुए वैर-विरोधको नहीं ।। १० ।।
असम्भिन्नार्थमर्यादाः साधवः प्रियदर्शनाः ।
तथा चरितमार्येण त्वयास्मिन् सत्समागमे ।। ११ ।।
सत्पुरुष आर्यमर्यादाको कभी भंग नहीं करते। उनके दर्शनसे सभी लोग प्रसन्न हो जाते हैं। युधिष्ठिर! कौरव-पाण्डवोंके समागममें तुमने श्रेष्ठ पुरुषोंके समान ही आचरण किया है ।। ११ ।।
दुर्योधनस्य पारुष्यं तत् तात हृदि मा कृथाः ।
मातरं चैव गान्धारीं मां च त्वं गुणकाङ्क्षया ।। १२ ।।
उपस्थितं वृद्धमन्धं पितरं पश्य भारत ।
तात! दुर्योधनने जो कठोर बर्ताव किया है, उसे तुम अपने हृदयमें मत लाना। भारत! तुम तो उत्तम गुण ग्रहण करनेकी इच्छासे अपनी माता गान्धारी तथा यहाँ बैठे हुए मुझ अंधे बूढ़े ताऊकी ओर देखो ।। १२ १/२ ।।
प्रेक्षापूर्वं मया द्यूतमिदमासीदुपेक्षितम् ।। १३ ।।
मित्राणि द्रष्टुकामेन पुत्राणां च बलाबलम् ।
अशोच्याः कुरवो राजन् येषां त्वमनुशासिता ।। १४ ।।
मन्त्री च विदुरो धीमान् सर्वशास्त्रविशारदः ।
मैंने सोच-समझकर भी इस जूएकी इसलिये उपेक्षा कर दी—उसे रोकनेकी चेष्टा नहीं की कि मैं मित्रों और सुहृदोंसे मिलना चाहता था और अपने पुत्रोंके बलाबलको देखना चाहता था। राजन्! जिनके तुम शासक हो और सब शास्त्रोंमें निपुण परम बुद्धिमान् विदुर जिनके मन्त्री हैं, वे कुरुवंशी कदापि शोकके योग्य नहीं हैं ।।
त्वयि धर्मोऽर्जुने धैर्यं भीमसेने पराक्रमः ।। १५ ।।
श्रद्धा च गुरुशुश्रूषा यमयोः पुरुषाग्रययोः ।
अजातशत्रो भद्रं ते खाण्डवप्रस्थमाविश ।
भ्रातृभिस्तेऽस्तु सौभ्रात्रं धर्मे ते धीयतां मनः ।। १६ ।।
तुममें धर्म है, अर्जुनमें धैर्य है, भीमसेनमें पराक्रम है और नरश्रेष्ठ नकुल-सहदेवमें श्रद्धा एवं विशुद्ध गुरुसेवाका भाव है। अजातशत्रो! तुम्हारा भला हो। अब तुम खाण्डवप्रस्थको जाओ। दुर्योधन आदि बन्धुओंके प्रति तुम्हें अच्छे भाईका-सा स्नेहभाव रहे और तुम्हारा मन सदा धर्ममें लगा रहे ।। १५-१६ ।।
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तो भरतश्रेष्ठ धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
कृत्वाऽऽर्यसमयं सर्वं प्रतस्थे भ्रातृभिः सह ।। १७ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! राजा धृतराष्ट्रके इस प्रकार कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिर पूज्यवर धृतराष्ट्रके आदेशको स्वीकार करके भाइयोंके सहित वहाँसे विदा हो गये ।। १७ ।।
ते रथान् मेघसंकाशानास्थाय सह कृष्णया ।
प्रययुर्हृष्टमनस इन्द्रप्रस्थं पुरोत्तमम् ।। १८ ।।
वे मेघके समान शब्द करनेवाले रथोंपर द्रौपदीके साथ बैठकर प्रसन्नमनसे नगरोंमें उत्तम इन्द्रप्रस्थको चल दिये ।।
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि धृतराष्ट्रवरप्रदानपूर्वकमिन्द्रप्रस्थं प्रति युधिष्ठिरगमने त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें धृतराष्ट्रवरदानपूर्वक युधिष्ठिरका इन्द्रप्रस्थगमनविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७३ ।।