महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2048)
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
दुर्योधनका धृतराष्ट्रको अपने दुःख और चिन्ताका कारण बताना
जनमेजय उवाच
कथं समभवद् द्यूतं भ्रातॄणां तन्महात्ययम् ।
यत्र तद् व्यसनं प्राप्तं पाण्डवैर्मे पितामहैः ॥ १ ॥
जनमेजयेने पूछा— मुने! भाइयोंमें वह महाविनाशकारी द्यूत किस प्रकार आरम्भ हुआ; जिसमें मेरे पितामह पाण्डवोंको उस महान् संकटका सामना करना पड़ा? ॥ १ ॥
के च तत्र सभास्तारा राजानो ब्रह्मवित्तम ।
के चैनमन्वमोदन्त के चैनं प्रत्यषेधयन् ॥ २ ॥
ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! वहाँ कौन-कौन-से राजा सभासद् थे? किसने द्यूतक्रीड़ाका अनुमोदन किया और किसने निषेध? ॥ २ ॥
विस्तरेणैतदिच्छामि कथ्यमानं त्वया द्विज ।
मूलं ह्येतद् विनाशस्य पृथिव्या द्विजसत्तम ॥ ३ ॥
ब्रह्मन्! मैं इस प्रसंगको आपके मुखसे विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। विप्रवर! यह द्यूत ही समस्त भूमण्डलके विनाशका मुख्य कारण है ॥ ३ ॥
सौतिरुवाच
एवमुक्तस्ततो राज्ञा व्यासशिष्यः प्रतापवान् ।
आचचक्षेऽथ यद् वृत्तं तत् सर्वं वेदतत्त्ववित् ॥ ४ ॥
सौति कहते हैं— राजाके इस प्रकार पूछनेपर व्यासजीके प्रतापी शिष्य वेदतत्त्वज्ञ वैशम्पायनजी वह सब प्रसंग सुनाने लगे ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु मे विस्तरेणेमां कथां भारतसत्तम ।
भूय एव महाराज यदि ते श्रवणे मतिः ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— भरतवंशशिरोमणे! महाराज जनमेजय! यदि तुम्हारा मन यह सब सुननेमें लगता है तो पुनः विस्तारके साथ इस कथाको सुनो ॥ ५ ॥
विदुरस्य मतिं ज्ञात्वा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
दुर्योधनमिदं वाक्यमुवाच विजने पुनः ॥ ६ ॥
विदुरका विचार जानकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने एकान्तमें दुर्योधनसे पुनः इस प्रकार कहा— ॥ ६ ॥
अलं द्यूतेन गान्धारे विदुरो न प्रशंसति ।
न ह्यसौ सुमहाबुद्धिरहितं नो वदिष्यति ॥ ७ ॥
‘गान्धारीनन्दन! जूएका खेल नहीं होना चाहिये, विदुर इसे अच्छा नहीं बताते हैं। महाबुद्धिमान् विदुर हमें कोई ऐसी सलाह नहीं देंगे, जिससे हमलोगोंका अहित होनेवाला हो ॥ ७ ॥
हितं हि परमं मन्ये विदुरो यत् प्रभाषते ।
क्रियतां पुत्र तत् सर्वमेतन्मन्ये हितं तव ॥ ८ ॥
‘विदुर जो कहते हैं, उसीको मैं अपना सर्वोत्तम हित मानता हूँ। बेटा! तुम भी वही सब करो। मेरी समझमें तुम्हारे लिये यही हितकर है ॥ ८ ॥
देवर्षिर्वासवगुरुर्देवराजाय धीमते ।
यत् प्राह शास्त्रं भगवान् बृहस्पतिरुदारधीः ।
तद् वेद विदुरः सर्वं सरहस्यं महाकविः ॥ ९ ॥
स्थितस्तु वचने तस्य सदाहमपि पुत्रक ।
विदुरो वापि मेधावी कुरूणां प्रवरो मतः ॥ १० ॥
उद्धवो वा महाबुद्धिर्वृष्णीनामर्चितो नृप ।
तदलं पुत्र द्यूतेन द्यूते भेदो हि दृश्यते ॥ ११ ॥
‘उदार बुद्धिवाले इन्द्रगुरु देवर्षि भगवान् बृहस्पतिने परम बुद्धिमान् देवराज इन्द्रको जिस शास्त्रका उपदेश दिया था, वह सब उसके रहस्यसहित महाज्ञानी विदुर जानते हैं। बेटा! मैं भी सदा विदुरकी बात मानता हूँ। कुरुकुलमें सबसे श्रेष्ठ और मेधावी विदुर माने गये हैं तथा वृष्णिवंशमें पूजित उद्धवको परम बुद्धिमान् बताया गया है। अतः बेटा! जूआ खेलनेसे कोई लाभ नहीं है। जूएमें वैर-विरोधकी सम्भावना दिखायी देती है ॥ ९—११ ॥
भेदे विनाशो राज्यस्य तत् पुत्र परिवर्ज्य ।
पित्रा मात्रा च पुत्रस्य यद् वै कार्यं परं स्मृतम् ॥ १२ ॥
‘वैर-विरोध होनेसे राज्यका नाश हो जाता है, अतः पुत्र! जूएका आग्रह छोड़ दो। पिता-माताको चाहिये कि वे पुत्रको उत्तम कर्तव्यकी शिक्षा दें; इसीलिये मैंने ऐसा कहा है ॥ १२ ॥
प्राप्तस्त्वमसि तन्नाम पितृपैतामहं पदम् ।
अधीतवान् कृती शास्त्रे लालितः सततं गृहे ॥ १३ ॥
‘बेटा! तुम अपने बाप-दादोंके पदपर प्रतिष्ठित हो, तुमने वेदोंका स्वाध्याय किया है, शास्त्रोंकी विद्वत्ता प्राप्त की है और घरमें सदा तुम्हारा लालन-पालन हुआ है ॥ १३ ॥
भ्रातृज्येष्ठः स्थितो राज्ये विन्दसे किं न शोभनम् ।
पृथग्जनैरलभ्यं यद् भोजनाच्छादनं परम् ॥ १४ ॥
तत् प्राप्तोऽसि महाबाहो कस्माच्छोचसि पुत्रक ।
स्फीतं राष्ट्रं महाबाहो पितृपैतामहं महत् ॥ १५ ॥
'महाबाहो! तुम अपने भाइयोंमें बड़े हो, अतः राजाके पदपर स्थित हो, तुम्हें किस कल्याणमय वस्तुकी प्राप्ति नहीं होती है? दूसरे लोगोंके लिये जो अलभ्य है, वह उत्तम भोजन और वस्त्र तुम्हें प्राप्त हैं। फिर तुम क्यों शोक करते हो? महाबाहो! तुम्हारे बाप-दादोंका यह महान् राष्ट्र धन-धान्यसे सम्पन्न है ॥ १४-१५ ॥
नित्यमाज्ञापयन् भासि दिवि देवेश्वरो यथा ।
तस्य ते विदितप्रज्ञ शोकमूलमिदं कथम् ।
समुत्थितं दुःखकरं यन्मे शंसितुमर्हसि ॥ १६ ॥
'स्वर्गमें देवराज इन्द्रकी भाँति तुम इस लोकमें सदा सबपर शासन करते हुए शोभा पाते हो। तुम्हारी उत्तम बुद्धि प्रसिद्ध है। फिर तुम्हें शोककी कारणभूत यह दुःखदायिनी चिन्ता कैसे प्राप्त हुई है? यह मुझसे बताओ' ॥ १६ ॥
दुर्योधन उवाच
अश्नाम्याच्छादयामीति प्रपश्यन् पापपूरुषः ।
नामर्षं कुरुते यस्तु पुरुषः सोऽधमः स्मृतः ॥ १७ ॥
दुर्योधन बोला—मैं अच्छा खाता हूँ और अच्छा पहिनता हूँ, इतना ही देखते हुए जो पापी पुरुष शत्रुओंके प्रति ईर्ष्या नहीं करता, वह अधम बताया गया है ॥ १७ ॥
न मां प्रीणाति राजेन्द्र लक्ष्मीः साधारणी विभो ।
ज्वलितामेव कौन्तेये श्रियं दृष्ट्वा च व्यथ्ये ॥ १८ ॥
राजेन्द्र! यह साधारण लक्ष्मी मुझे प्रसन्न नहीं कर पाती। मैं तो कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी उस जगमगाती हुई लक्ष्मीको देखकर व्यथित हो रहा हूँ ॥ १८ ॥
सर्वां च पृथिवीं चैव युधिष्ठिरवशानुगाम् ।
स्थिरोऽस्मि योऽहं जीवामि दुःखादेतद् ब्रवीमि ते ॥ १९ ॥
सारी पृथ्वी युधिष्ठिरके अधीन हो गयी है; फिर भी मैं पाषाणतुल्य हूँ, जो कि ऐसा दुःख प्राप्त होनेपर भी जीवित हूँ और आपसे बातें करता हूँ ॥ १९ ॥
आवर्जिता इवाभान्ति नीपाश्चित्रककौकुराः ।
कारस्करा लोहजङ्घा युधिष्ठिरनिवेशने ॥ २० ॥
नीप, चित्रक, कुकुर, कारस्कर तथा लोहजंघ आदि क्षत्रियनरेश युधिष्ठिरके घरमें सेवकोंकी भाँति सेवा करते हुए शोभा पा रहे थे ॥ २० ॥
हिमवत्सागरानूपाः सर्वे रत्नाकरास्तथा ।
अन्त्याः सर्वे पर्युदस्ता युधिष्ठिरनिवेशने ॥ २१ ॥
हिमालय प्रदेश तथा समुद्री द्वीपोंके रहनेवाले और रत्नोंकी खानोंके सभी अधिपति म्लेच्छजातीय नरेश युधिष्ठिरके घरमें प्रवेश करने नहीं पाते थे, उन्हें महलसे दूर ही ठहराया
गया था ।। २१ ।।
ज्येष्ठोऽयमिति मां मत्वा श्रेष्ठश्चेति विशाम्पते ।
युधिष्ठिरेण सत्कृत्य युक्तो रत्नपरिग्रहे ।। २२ ।।
महाराज! मुझे अन्य सब भाइयोंसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ मानकर युधिष्ठिरने सत्कारपूर्वक रत्नोंकी भेंट लेनेके कामपर नियुक्त कर दिया था ।। २२ ।।
उपस्थितानां रत्नानां श्रेष्ठानामर्घहारिणाम् ।
नादृश्यत परः पारो नापरस्तत्र भारत ।। २३ ।।
भारत! वहाँ भेंट लाये हुए नरेशोंके द्वारा उपस्थित श्रेष्ठ और बहुमूल्य रत्नोंकी जो राशि एकत्र हुई थी, उसका आरपार दिखायी नहीं देता था ।। २३ ।।
न मे हस्तः समभवद् वसु तत् प्रतिगृह्णतः ।
अतिष्ठन्त मयि श्रान्ते गृह्य दूराहृतं वसु ।। २४ ।।
उस रत्नराशिको ग्रहण करते-करते जब मेरा हाथ थक गया, तब मेरे थक जानेपर राजालोग रत्नराशि लिये बहुत दूरतक खड़े दिखायी देने लगते थे ।। २४ ।।
कृतां विन्दुसरोरत्नैर्मयेन स्फाटिकच्छदाम् ।
अपश्यं नलिनीं पूर्णामुदकस्येव भारत ।। २५ ।।
वस्त्रमुत्कर्षति मयि प्राहसत् स वृकोदरः ।
शत्रोर्ऋद्धिविशेषेण विमूढं रत्नवर्जितम् ।। २६ ।।
भारत! बिन्दु-सरोवरसे लाये हुए रत्नोंद्वारा मयासुरने एक कृत्रिम पुष्करिणीका निर्माण किया था, जो स्फटिकमणिकी शिलाओंसे आच्छादित है। वह मुझे जलसे भरी हुई-सी दिखायी दी। भारत! जब मैं उसमें उतरनेके लिये वस्त्र उठाने लगा, तब भीमसेन ठहाकर हँस पड़े। शत्रु की विशिष्ट समृद्धिसे मैं मूढ़-सा हो रहा था और रत्नोंसे रहित तो था ही ।। २५-२६ ।।
तत्र स्म यदि शक्तः स्यां पातयेऽहं वृकोदरम् ।
यदि कुर्यां समारम्भं भीमं हन्तुं नराधिप ।। २७ ।।
शिशुपाल इवास्माकं गतिः स्यान्नात्र संशयः ।
सपत्नेनावहासो मे स मां दहति भारत ।। २८ ।।
उस समय वहाँ यदि मैं समर्थ होता तो भीमसेनको वहीं मार गिराता। राजन्! यदि मैं भीमसेनको मारनेका उद्योग करता तो मेरी भी शिशुपालकी-सी ही दशा हो जाती; इसमें संशय नहीं है। भारत! शत्रुके द्वारा किया हुआ उपहास मुझे दग्ध किये देता है ।। २७-२८ ।।
पुनश्च तादृशीमेव वापीं जलजशालिनीम् ।
मत्वा शिलासमां तोये पतितोऽस्मि नराधिप ।। २९ ।।
नरेश्वर! मैंने पुनः एक वैसी ही बावलीको देखकर, जो कमलोंसे सुशोभित हो रही थी, समझा कि यह भी पहली पुष्करिणीकी भाँति स्फटिकशिलासे पाटकर बराबर कर दी गयी
होगी; परंतु वह वास्तवमें जलसे परिपूर्ण थी, इसीलिये मैं भ्रमसे उसमें गिर पड़ा ॥ २९ ॥
तत्र मां प्राहसत् कृष्णः पार्थेन सह सुस्वरम् ।
द्रौपदी च सह स्त्रीभिर्व्यथयन्ती मनो मम ॥ ३० ॥
वहाँ श्रीकृष्ण अर्जुनके साथ मेरी ओर देखकर जोर-जोरसे हँसने लगे। स्त्रियोंसहित द्रौपदी भी मेरे हृदयमें चोट पहुँचाती हुई हँस रही थी ॥ ३० ॥
क्लिन्नवस्त्रस्य तु जले किंकरा राजनोदिताः ।
ददुर्वासांसि मेऽन्यानि तच्च दुःखं परं मम ॥ ३१ ॥
मेरे सब कपड़े जलमें भीग गये थे; अतः राजाकी आज्ञासे सेवकोंने मुझे दूसरे वस्त्र दिये। यह मेरे लिये बड़े दुःखकी बात हुई ॥ ३१ ॥
प्रलम्भं च शृणुष्वान्यद् वदतो मे नराधिप ।
अद्वारेण विनिर्गच्छन् द्वारसंस्थानरूपिणा ।
अभिहत्य शिलां भूयो ललाटेनास्मि विक्षतः ॥ ३२ ॥
महाराज! एक और वंचना मुझे सहनी पड़ी, जिसे बताता हूँ, सुनिये। एक जगह बिना द्वारके ही द्वारकी आकृति बनी हुई थी, मैं उसीसे निकलने लगा; अतः शिलासे टकरा गया। जिससे मेरे ललाटमें बड़े जोरकी चोट लगी ॥ ३२ ॥
तत्र मां यमजौ दूरादालोक्याभिहतं तदा ।
बाहुभिः परिगृह्लीतां शोचन्तौ सहितावुभौ ॥ ३३ ॥
उस समय नकुल और सहदेवने दूरसे मुझे टकराते देख निकट आकर अपने हाथोंसे मुझे पकड़ लिया और दोनों भाई साथ रहकर मेरे लिये शोक करने लगे ॥ ३३ ॥
उवाच सहदेवस्तु तत्र मां विस्मयन्निव ।
इदं द्वारमितो गच्छ राजन्निति पुनः पुनः ॥ ३४ ॥
वहाँ सहदेवने मुझे आश्चर्यमें डालते हुए बार-बार यह कहा—'राजन्! यह दरवाजा है, इधर चलिये' ॥ ३४ ॥
भीमसेनेन तत्रोक्तो धृतराष्ट्रात्मजेति च ।
सम्बोध्या प्रहसित्वा च इतो द्वारं नराधिप ॥ ३५ ॥
महाराज! वहाँ भीमसेनने मुझे 'धृतराष्ट्रपुत्र' कहकर सम्बोधित किया और हँसते हुए कहा—'राजन्! इधर दरवाजा है' ॥ ३५ ॥
नामधेयानि रत्नानां पुरस्तान्न श्रुतानि मे ।
यानि दृष्टानि मे तस्यां मनस्तपति तच्च मे ॥ ३६ ॥
मैंने उस सभामें जो-जो रत्न देखे हैं, उनके पहले कभी नाम नहीं सुने थे; अतः इन सब बातोंके लिये मेरे मनमें बड़ा संताप हो रहा है ॥ ३६ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥