महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1244)
विश्वामित्रकी सेनापर नन्दिनीका कोप
तैर्विसृष्टैर्महासैन्यैर्नानाम्लेच्छगणैस्तदा ।
नानावरणसंचन्नैर्नानायुधधरैस्तथा ॥ ३९ ॥
अवाकीर्यत संरब्धैर्विश्वामित्रस्य पश्यतः ।
एकैकश्च तदा योधः पञ्चभिः सप्तभिर्वृतः ॥ ४० ॥
उसके द्वारा रचे गये नाना प्रकारके म्लेच्छगणोंकी वे विशाल सेनाएँ जो अनेक प्रकारके कवच आदिसे आच्छादित थीं। सबने भाँति-भाँतिके आयुध धारण कर रखे थे और सभी सैनिक क्रोधमें भरे हुए थे। उन्होंने विश्वामित्रके देखते-देखते उनकी सेनाको तितर-बितर कर दिया। विश्वामित्रके एक-एक सैनिकको म्लेच्छ-सेनाके पाँच-पाँच, सात-सात योद्धाओंने घेर रखा था ॥ ३९-४० ॥
अस्त्रवर्षेण महता वध्यमानं बलं तदा ।
प्रभग्नं सर्वतस्त्रस्तं विश्वामित्रस्य पश्यतः ॥ ४१ ॥
उस समय अस्त्र-शस्त्रोंकी भारी वर्षासे घायल होकर विश्वामित्रकी सेनाके पाँव उखड़ गये और उनके सामने ही वे सभी योद्धा भयभीत हो सब ओर भाग चले ॥ ४१ ॥
न च प्राणैर्वियुज्यन्ते केचित् तत्रास्य सैनिकाः ।
विश्वामित्रस्य संक्रुद्धैर्वासिष्ठैर्भरतर्षभ ॥ ४२ ॥
भरतश्रेष्ठ! क्रोधमें भरे हुए होनेपर भी वसिष्ठसेनाके सैनिक विश्वामित्रके किसी भी योद्धाका प्राण नहीं लेते थे ॥ ४२ ॥
सा गौस्तत् सकलं सैन्यं कालयामास दूरतः ।
विश्वामित्रस्य तत् सैन्यं काल्यमानं त्रियोजनम् ॥ ४३ ॥
क्रोशमानं भयोद्विग्नं त्रातारं नाध्यगच्छत ।
इस प्रकार नन्दिनी गायने उनकी सारी सेनाको दूर भगा दिया। विश्वामित्रकी वह सेना तीन योजनतक खदेड़ी गयी। वह सेना भयसे व्याकुल होकर चीखती-चिल्लाती रही; किंतु कोई भी संरक्षक उसे नहीं मिला ॥ ४३ १/२ ॥
(विश्वामित्रस्ततो दृष्ट्वा क्रोधाविष्टः स रोदसी ।
ववर्ष शरवर्षाणि वसिष्ठे मुनिसत्तमे ॥
घोररूपांश्च नाराचान् क्षुरान् भल्लान् महामुनिः ।
विश्वामित्रप्रयुक्तांस्तान् वैष्णवेन व्यमोचयत् ॥
वसिष्ठस्य तदा दृष्ट्वा कर्मकौशलमाहवे ॥
विश्वामित्रोऽपि कोपेन भूयः शत्रुनिपातनः ।
दिव्यास्त्रवर्षं तस्मै तु प्राहिणोन्मुनये रुषा ॥
आग्नेयं वारुणं चैन्द्रं याम्यं वायव्यमेव च ।
विससर्ज महाभागे वसिष्ठे ब्रह्मणः सुते ॥
अस्त्राणि सर्वतो ज्वालां विसृजन्ति प्रपेदिरे ।
युगान्तसमये घोराः पतङ्गस्येव रश्मयः ॥
वसिष्ठोऽपि महातेजा ब्रह्मशक्तिप्रयुक्तया ।
यष्ट्या निवारयामास सर्वाण्यस्त्राणि स स्मयन् ॥
ततस्ते भस्मसाद्भूताः पतन्ति स्म महीतले ।
अपोह्य दिव्यान्यस्त्राणि वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ॥
यह देखकर विश्वामित्र क्रोधसे व्याप्त हो मुनि-श्रेष्ठ वसिष्ठको लक्षित करके पृथिवी और आकाशमें बाणोंकी वर्षा करने लगे; परंतु महामुनि वसिष्ठने विश्वामित्रके चलाये हुए भयंकर नाराच, क्षुर और भल्ल नामक बाणोंका केवल बाँसकी छड़ीसे निवारण कर दिया। युद्धमें वसिष्ठ मुनिका वह कार्य-कौशल देखकर शत्रुओंको मार गिरानेवाले विश्वामित्र भी पुनः कुपित हो महर्षि वसिष्ठपर रोषपूर्वक दिव्यास्त्रोंकी वर्षा करने लगे। उन्होंने ब्रह्माजीके पुत्र महाभाग वसिष्ठपर आग्नेयास्त्र, वारुणास्त्र, ऐन्द्रास्त्र, याम्यास्त्र और वायव्यास्त्रका प्रयोग किया। वे सब अस्त्र प्रलयकालके सूर्यकी प्रचण्ड किरणोंके समान सब ओरसे आगकी लपटें छोड़ते हुए महर्षिपर टूट पड़े; परंतु महातेजस्वी वसिष्ठने मुसकराते हुए ब्राह्मबलसे प्रेरित हुई छड़ीके द्वारा इन सब अस्त्रोंको पीछे लौटा दिया। फिर तो वे सभी अस्त्र भस्मीभूत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। इस प्रकार उन दिव्यास्त्रोंका निवारण करके वसिष्ठजीने विश्वामित्रसे यह बात कही।
वसिष्ठ उवाच
निर्जितोऽसि महाराज दुरात्मन् गाधिनन्दन ।
यदि तेऽस्ति परं शौर्यं तद् दर्शय मयि स्थिते ॥
**वसिष्ठजी बोले—**महाराज दुरात्मा गाधिनन्दन! अब तू परास्त हो चुका है। यदि तुझमें और भी उत्तम पराक्रम है तो मेरे ऊपर दिखा। मैं तेरे सामने डटकर खड़ा हूँ।
गन्धर्व उवाच
विश्वामित्रस्तथा चोक्तो वसिष्ठेन नराधिप ।
नोवाच किंचिद् व्रीडाढ्यो विद्रावितमहाबलः ॥
**गन्धर्व कहता है—**राजन्! विश्वामित्रकी वह विशाल सेना खदेड़ी जा चुकी थी। वसिष्ठके द्वारा पूर्वोक्तरूपसे ललकारे जानेपर वे लज्जित होकर कुछ भी उत्तर न दे सके।
दृष्ट्वा तन्महदाश्चर्यं ब्रह्मतेजोभवे तदा ॥ ४४ ॥
विश्वामित्रः क्षत्रभावान्निर्विण्णो वाक्यमब्रवीत् ।
धिक् बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजोबलं बलम् ।। ४५ ।।
ब्रह्मतेजका यह अत्यन्त आश्चर्यजनक चमत्कार देखकर विश्वामित्र क्षत्रियत्वसे खिन्न एवं उदासीन हो यह बात बोले—'क्षत्रिय-बल तो नाममात्रका ही बल है, उसे धिक्कार है। ब्रह्मतेजजनित बल ही वास्तविक बल है' ।। ४४-४५ ।।
बलाबलं विनिश्चित्य तप एव परं बलम् ।
स राज्यं स्फीतमुत्सृज्य तां च दीप्तां नृपश्रियम् ।। ४६ ।।
भोगांश्च पृष्ठतः कृत्वा तपस्येव मनो दधे ।
स गत्वा तपसा सिद्धिं लोकान् विष्टभ्य तेजसा ।। ४७ ।।
तताप सर्वान् दीप्तौजा ब्राह्मणत्वमवाप्तवान् ।
अपिबच्च ततः सोममिन्द्रेण सह कौशिकः ।। ४८ ।।
इस प्रकार बलाबलका विचार करके उन्होंने तपस्याको ही सर्वोत्तम बल निश्चित किया और अपने समृद्धिशाली राज्य तथा देदीप्यमान राज्यलक्ष्मीको छोड़कर, भोगोंको पीछे करके तपस्यामें ही मन लगाया। इस तपस्यासे सिद्धिको प्राप्त हो उद्दीप्त तेजवाले विश्वामित्रजीने अपने प्रभावसे सम्पूर्ण लोकोंको स्तब्ध एवं संतप्त कर दिया और (अन्ततोगत्वा) ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया; फिर वे इन्द्रके साथ सोमपान करने लगे ।। ४६—४८ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि वासिष्ठे विश्वामित्रपराभवे चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १७४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें वसिष्ठजीके चरित्रके प्रसंगमें विश्वामित्र-पराभवविषयक एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७४ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १० १/३ श्लोक मिलाकर कुल ५८ १/३ श्लोक हैं)
१. गौओंके मस्तक आदि छः अंगोंका बड़ा एवं विस्तृत होना शुभ माना गया है। जैसा कि शास्त्रका वचन है—
शिरो ग्रीवा सक्थिनी च सास्ना पुच्छमथ स्तनाः । शुभान्येतानि धेनूनामायतानि प्रचक्षते ।।
२. गौओंका ललाट, दोनों नेत्र और दोनों कान—ये पाँचों अंग पृथु (पुष्ट एवं विस्तृत) हों तो विद्वानोंद्वारा अच्छे माने जाते हैं। जैसा कि शास्त्रका वचन है—
ललाटं श्रवणौ चैव नयनद्वितयं तथा । पृथून्यैतानि शस्यन्ते धेनूनां पञ्च सूरिभिः ।। [नीलकण्ठी टीकासे]