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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

About this granth

The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.

This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.

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२४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) पुण्यस्थानोदकस्थानदेवगृहराजपरिग्रहेषु पणोत्तरा विष्ठादण्डाः । मूत्रेष्वर्धदण्डाः ।
(२) भैषज्यव्याधिभयनिमित्तमदण्ड्याः ।
(३) मार्जारश्वनकुलसर्पप्रेतानां नगरस्यान्तरुत्सर्गे त्रिपणो दण्डः । खरोष्ट्राश्वतरशवपशुप्रेतानां षट्पणः । मनुष्यप्रेतानां पञ्चाशतपणः ।
(४) मार्गविपर्यासे शवद्वारादन्यतः शवनिर्णयने पूर्वः साहसदण्डः । द्वाःस्थानां द्विशतम् । श्मशानादन्यत्र न्यासे दहने च द्वादशपणो दण्डः ।
(५) विषण्नालिकमुभयतोरात्रं यामतूर्यम् । तूर्यशब्दे राज्ञो गृहाभ्याशे सपादपणमक्षणताडनं प्रथमपश्चिमयामिकम् । मध्यमयामिकं द्विगुणम् । बहिश्चतुर्गुणम् ।

(१) राजमार्ग पर मल-त्याग करने वालों को एक पण, पवित्र तीर्थस्थानों पर मल-त्याग करने वालों को दो पण, जलाशयों पर मल-त्याग करने वालों पर तीन पण, देवालय में मल-त्याग करने वालों पर चार पण और खजाना, कोष्ठागार आदि स्थानों पर मलत्याग करनेवाले व्यक्तियों पर पाँच पण दण्ड किया जाना चाहिए । इन्हीं स्थानों में यदि कोई व्यक्ति पेशाब करे तो उस पर इसका आधा दण्ड किया जाना चाहिए ।

(२) यदि जुलाब लेने के कारण या अतिसार, प्रमेह आदि बीमारियों के कारण अथवा किसी डर से, उक्त स्थानों में कोई व्यक्ति मल-मूत्र-त्याग करे तो उसे दण्ड नहीं देना चाहिए ।

(३) मरे हुये बिल्ली, कुत्ता, नेवला और साँप को यदि कोई व्यक्ति नगर के पास या नगर के बीच में डाल आवे तो उस पर तीन पण दण्ड दिया जाना चाहिए । यदि गधा, ऊँट, खच्चर तथा घोड़ा आदि को इस प्रकार छोड़ दिया जाय तो छोड़ने वाले को छह पण दण्ड दिया जाय । मनुष्य की लाश इस प्रकार छोड़ी जाने पर पचास पण दण्ड दिया जाना चाहिए ।

(४) मुर्दों को ले जाने के लिए जो रास्ता नियत है उसको छोड़ कर और जो द्वार नियत है, उसको छोड़कर दूसरी ही ओर से मुर्दा ले जाने वालों को प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए । द्वार का रक्षक पुरुष यदि उन मुर्दा ले जाने वालों को न रोके तो उसे दो-सौ पण दण्ड दिया जाना चाहिए । श्मशान भूमि के अन्यत्र मुर्दा जलाने और गाड़ने वालों पर बारह पण दण्ड करना चाहिए ।

(५) रात की पहिली छह घड़ी बीत जाने पर और रात के अन्तिम छह घड़ी बाकी रह जाने पर, दोनों समय भोंपू देना चाहिये । उस रात्रि-घोष के बीच यदि कोई व्यक्ति राजमहल के पास गुजरता हुआ दिखाई दे तो उसे सवा पण दण्ड दिया जाना चाहिए । जो व्यक्ति रात्रिघोष के ठीक मध्यकाल में आता-जाता पकड़ा जाय, उसे ढाई पण दण्ड देना चाहिए । यदि कोई व्यक्ति नगर के बाहर इस प्रकार आता-जाता पकड़ा जाये तो उस पर पाँच दण्ड कर देना चाहिए ।

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प्र० ५५ : अ० ३६ ] नागरिक के कार्य २४९

(१) शङ्कनीये देशे लिङ्गे पूर्वापदाने च गृहीतमनुयुञ्जीत ।
(२) राजपरिग्रहोपगमने नगररक्षारोहणे च मध्यमः साहसदण्डः ।
(३) सूतिकाचिकित्सकप्रेतप्रदीपयानानागरिकतूर्यप्रेक्षाग्निनिमित्तं द्राभिश्चाग्राह्याः ।
(४) चाररात्रिषु प्रच्छन्नविपरीतवेषाः प्रव्रजिता दण्डशस्त्रहस्ताश्च मनुष्या दोषतो दण्ड्याः ।
(५) रक्षिणामवार्यं वारयतां वार्यं चावारयतामक्षणद्विगुणो दण्डः । स्त्रियं दासीमधिमेहयतां पूर्वः साहसदण्डः, अदासीं मध्यमः, कृतावरोधामुत्तमः, कुलस्त्रियं वधः ।
(६) चेतनाचेतनिकं रात्रिदोषमशंसतो नागरिकस्य दोषानुरूपो दण्डः, प्रमादस्थाने च ।


( १ ) उक्त रोक लगे समय में यदि कोई व्यक्ति बगीचों में छिपे हुये पाये जाँय, या जिनके पास ऐसा सामान पाया जाय कि उन पर चोर-डाकू होने का शक किया जा सके, अथवा जो पहिले से ही बदनाम हों और इस प्रकार घूमते हुए मिल जांय तो उनसे पूछा जाना चाहिए 'तुम कौन हो ? कहाँ से आये हो ? कहाँ जाओगे ? क्या कार्य करते हो ? यहाँ तुम क्यों आये हो ?' यदि वे सन्तोषजनक उत्तर दें तो उनके साथ उचित व्यवहार किया जाना चाहिए ।

( २ ) यदि इस प्रकार का कोई शंकित व्यक्ति सरकारी इमारतों या नगर-रक्षा के लिए बने सफ़ीलों अथवा दुर्गों के ऊपर चढ़ता हुआ पकड़ा जाय तो उसे मध्यम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए ।

( ३ ) यदि उक्त रोक लगे समय में प्रसूता स्त्री, वैद्य हकीम, मुर्दाफ़रोश, उजाला लिए, सूचनार्थ आवाज करते हुए, नाटक-सिनेमा देखने, आग बुझाने आदि के लिए और जिनके पास राजकीय अनुमतिपत्र हो, आते-जाते पकड़ लिये जायें तो उन्हें गिरफ्तार नहीं करना चाहिए ।

( ४ ) विशेष उत्सवों के समय रात्रि में रोक हटा दी जाने पर जो व्यक्ति मुँह ढँककर अथवा वेष बदलकर तथा संन्यासी के वेष में दण्ड या हथियार लिए पकड़े जाय, उन्हें अपराध के अनुसार दण्ड देना चाहिए ।

( ५ ) जो पहरेदार रोके जाने योग्य व्यक्तियों को न रोक लें तो उन्हें, रोक लगे समय के अपराध से दुगुना अर्थात् ढाई पण दण्ड देना चाहिए । जो पुरुष दूसरे की स्त्री तथा दासी के साथ बलात्कार करे, उसे प्रथम साहस दण्ड देना चाहिए । दासी आदि के अलावा किसी वेश्या के साथ बलात्कार करने पर मध्यम साहस दण्ड देना चाहिए । यदि कोई दासी या वेश्या किसी की पत्नी बन चुकी हो और तब उसके साथ कोई बलात्कार करे तो उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए । जो पुरुष कुलीन स्त्रियों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करे उसको प्राणदण्ड की सजा देनी चाहिए ।

( ६ ) जान-बूझकर या अनजाने में, रात को किये गये अपराधों की सूचना

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२५०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) नित्यमुदकस्थानमार्गभूमिच्छन्नपथवप्रप्राकाररक्षावेक्षणं नष्टप्रस्मृतापसृतानां च रक्षणम् ।
(२) बन्धनागारे च बालवृद्धव्याधितानाथानां जातनक्षत्रपौर्णमासीषु विसर्गः । पुण्यशीलाः समयानुबद्धा वा दोषनिष्क्रयं दद्युः ।
(३) दिवसे पञ्चरात्रे वा बन्धनस्थान् विशोधयेत् ।
कर्मणा कायदण्डेन हिरण्यानुग्रहेण वा ॥
(४) अपूर्वदेशाधिगमे युवराजाभिषेचने ।
पुत्रजन्मनि वा मोक्षो बन्धनस्य विधीयते ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे नागरिकप्रणिधिर्नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः,
आदितः षट्पञ्चाशः ।

समाप्तमिदमध्यक्षप्रचारो नाम द्वितीयमधिकरणम् ।

— : ० : —


यदि कोई नगरवासी अध्यक्ष को न पहुँचावे तो अपराध के अनुसार उसके लिए दण्ड नियत होना चाहिए । उन पहरेदारों को भी उनके अपराध के अनुसार यथोचित दण्ड दिया जाना चाहिए, जिन्होंने पहरा देने में किसी प्रकार का प्रमाद किया हो ।

(१) नगर-अधिकारी ( नागरिक ) को चाहिए कि वह जल-स्थल मार्ग, सुरंग मार्ग, सफील, परकोटा, खाई तथा बुर्ज आदि की अच्छी तरह देख-भाल करें, और उन सभी खोये हुए, भूले हुए, छूटे हुए, आभूषण, सामान या प्राणियों को तब तक अपने संरक्षण के रखे, जब तक कि उनके असली मालिक का पता न लग जाय ।

(२) जेल में बन्द हुए बूढे, बच्चे बीमार और अनाथ कैदियों को राजा की वर्ष गांठ आदि अच्छे उत्सवों या पूर्णिमा आदि पर्वों पर छोड़ देना चाहिए । धोखे में यदि कोई धर्मात्मा पुरुष अपराधी बनाकर कैद में डाला गया हो तथा ऐसे व्यक्ति, जो भविष्य में अपराध न करने की प्रतिज्ञा करते हों, उन्हें अपराध के बदले में धन लेकर छोड़ देना चाहिए, उन्हें फिर जेल में न रखा जाना चाहिए ।

(३) प्रतिदिन या प्रति पाँचवें दिन, ऐसा नियम बना दिया जाय कि उस दिन धन लेकर, शारीरिक दण्ड देकर या कार्य कराकर ( निष्क्रय ) कुछ कैदी छोड़ दिये जांय । धनदण्ड, शारीरिक दण्ड या कार्यदण्ड, इन तीनों में से जो कैदी आसानी से जिस दण्ड को भुगत सके वही दण्ड उसको दिया जाय ।

(४) किसी नये देश की जीतने पर, युवराज का राज्याभिषेक होने पर और राजपुत्र के जन्मोत्सव पर कैदियों को छोड़ देना चाहिए ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में नागरिकप्रणिधि नामक छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ।

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दूसरा खण्ड

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खण्ड १५३५

तीसरा अधिकरण

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तीसरा अधिकरण

धर्मस्थीय

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प्रकाशकीय विज्ञप्ति

परिशिष्ट ३.

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प्रकरण ५६-५७
अध्याय १

व्यवहारस्थापना विवाहपदनिबन्धाश्चः

(१) धर्मस्थास्त्रयस्त्रयोऽमात्या जनपदसन्धिसंग्रहणद्रोणमुखस्थानीयेषु व्यावहारिकानर्थान् कुर्युः ।
(२) तिरोहितान्तरगारनक्तारण्योपध्युपह्वरकृतांश्च व्यवहारान् प्रतिषेधयेयुः । कर्तुः कारयितुश्च पूर्वः साहसदण्डः । श्रोतॄणामेकैकं प्रत्यर्धदण्डाः । श्रद्धेयानां तु द्रव्यव्यपनयः ।
(३) परोक्षेणाधिकरणग्रहणमवक्तव्यकरा वा तिरोहिताः सिद्धयेयुः ।
(४) दायनिक्षेपोपनिधिविवाहसंयुक्ताः स्त्रीणामनिष्कासिनीनां व्याधितानां चामूढसंज्ञानामन्तरगारकृताः सिद्धयेयुः ।
(५) साहसानुप्रवेशकलहविवाहराजनियोगयुक्ताः पूर्वरात्रव्यवहारिणां च रात्रिकृताः सिद्धयेयुः ।


शर्तनामों का लेखन प्रकार और तत्संबंधी विवादों का निर्णय

( १ ) दो राज्यों या गाँवों की सीमा ( जनपद-संधि ) पर, दस गाँवों के केन्द्र ( संग्रहण ) में, चार सौ गाँवों के केन्द्र ( द्रोणमुख ) में और आठ सौ गाँवों के केन्द्र ( स्थानीय ) में तीन-तीन न्यायाधीश ( धर्मस्थ ) एक साथ रह कर इकरारनामा, शर्तनामा आदि व्यवहार-संबंधी कार्यों का प्रबंध करें ।

( २ ) नियम-विरुद्ध शर्तनामे : उन शर्तनामों को न्याय-विरुद्ध घोषित किया जाय, जो छिप कर, घर के अंदर, रात में, जंगल में, छल-कपट से और एकांत में किए गए हैं । ऐसा नियम विरुद्ध कार्य करने वालों और कराने वालों, दोनों को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । इस प्रकार के व्यवहारों में सुनकर गवाही देने वालों को आधा साहस दण्ड, और श्रद्धा-सहानुभूति रखने वालों को अर्थदण्ड दिया जाय ।

( ३ ) जिस व्यवहार को गुप्त रूप से किसी दूसरे ने सुन लिया हो तथा जिसको नियम विरुद्ध-साबित न किया जा सके, ऐसा व्यवहार यदि छिपा कर भी किया गया हो तो उसे गैर कानूनी करार न दिया जाय ।

( ४ ) पर्दानशीन महिलाओं तथा चैतन्य रोगियों के द्वारा दायभाग, अमानत, धरोहर और विवाहसंबंधी घर के अंदर किए हुए व्यवहार भी नियमविरुद्ध न समझे जांय ।

( ५ ) डाका ( साहस ), चोरी ( अनुप्रवेश ), झगड़ा, विवाह तथा सरकारी

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२५६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

( १ ) सार्थव्रजाश्रमव्याधचारणमध्येष्वरण्यचरणामारण्यकृताः सिद्धयेयुः ।
( २ ) गूढाजीविषु चोपधिकृताः सिद्धयेयुः ।
( ३ ) मिथःसमवाये चोपह्वरकृताः सिद्धयेयुः ।
( ४ ) अतोऽन्यथा न सिद्धयेयुः । अपाश्रयवद्भिर्वा कृताः, पितृमता पुत्रेण, पित्रा पुत्रवता, निष्कुलेन भ्रात्रा, कनिष्ठेनाविभक्तांशेन, पतिमत्या पुत्रवत्या च स्त्रिया, दासाहितकाभ्याम्, अप्राप्तातीतव्यवहाराभ्याम्, अभिशस्तप्रव्रजितव्यङ्गव्यसनिभिश्चान्यत्र निसृष्टव्यवहारेभ्यः ।
( ५ ) तत्रापि क्रुद्धेनार्तेन मत्तेनोन्मत्तेनावगृहीतेन वा कृता व्यवहारा न सिद्धयेयुः कर्तृकारयितृश्रोतॄणां पृथग् यथोक्ता दण्डाः ।
( ६ ) स्वे स्वे तु वर्गे देशे काले च स्वकरणकृताः सम्पूर्णचाराः शुद्धदेशा दृष्टरूपलक्षणप्रमाणगुणाः सर्वव्यवहाराः सिद्धयेयुः ।


हुक्म और रात के प्रथम पहर में वेश्यासंबंधी व्यवहार यदि रात के समय में भी किए जांय तो उन्हें गैरकानूनी नहीं माना जाय ।

( १ ) व्यापारी, ग्वाले, आश्रमवासी, शिकारी और गुप्तचर आदि जंगलों में रहने वालों तथा घूमने वालों के द्वारा जंगल में किए गए व्यवहार भी वैध समझे जांय ।

( २ ) गुप्तरूप से जीविका चलाने वालों द्वारा किए गए छल-कपट संबंधी व्यवहार भी नियमानुकूल समझे जांय ।

( ३ ) आपसी समझौते से एकांत में किए गए व्यवहार भी नियमसंगत हैं ।

( ४ ) इस प्रकार की विशेष परिस्थितियों के अतिरिक्त स्वीकार किए गए सभी व्यवहार गैरकानूनी समझे जांय । निराश्रित व्यक्ति, जिसका पिता जीवित हो, जिसका पुत्र जीवित हो, बिरादरी से बहिष्कृत भाई, जिसकी संपत्ति का बँटवारा न हुआ हो, जिस स्त्री का पति या पुत्र जीवित हो, दास, नाबालिग, बहुत बूढ़ा, समाज में निंदित, संन्यासी, लूले-लंगड़े और बीमार आदि व्यक्तियों द्वारा किए गए व्यवहार भी जायज न समझे जांय; किन्तु उन व्यवहारों को वैध समझा जाय जो कि उन्हें राजा की ओर से प्राप्त हो चुके हों ।

( ५ ) क्रोधी, दुःखी, मत्त, उन्मत्त, पागल आदि व्यक्तियों के द्वारा किये गये व्यवहार भी वैधानिक न समझे जांय । जो भी व्यक्ति इस प्रकार के व्यवहार करें या करायें तथा सुनें उन्हें पूर्वोक्त दण्ड देने चाहिएँ ।

( ६ ) परीक्षा : अपनी-अपनी जाति में उचित देश-काल और प्रकृति के अनुसार किए गए दोषरहित सभी व्यवहार वैध समझे जांय; बशर्ते कि उनकी सूचना

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प्र० ५६-५७ : अ० १ ] विवादों का निर्णय २५७

(१) पश्चिमं चैषां करणमादेशाधिवर्जं श्रद्धेयम् । इति व्यवहार-स्थापना ।

(२) संवत्सरमृतुं मासं पक्षं दिवसं करणमधिकरणमृणं वेदकावेदकयोः कृतसमर्थावस्थयोर्देशग्रामजातिगोत्रनामकर्माणि चाभिलिख्य वादिप्रतिवादि-प्रश्नानर्थानुपूर्व्या निवेशयेत् । निविष्टांश्चावेक्षेत ।

(३) निबद्धं पादमुत्सृज्यान्यं पादं सङ्क्रामति । पूर्वोक्तं पश्चिमेनार्थेन नाभिसन्धत्ते । परवाक्यमनभिग्राह्यमभिग्राह्यावतिष्ठते । प्रतिज्ञाय देशं 'निर्दिश' इत्युक्ते न निर्दिशति । निर्दिष्टाद् देशादन्यं देशमुपस्थापयति । उपस्थिते देशेऽर्थवचनं 'नैवम्' इत्यपव्ययते । साक्षिभिरवधृतं नेच्छति । असम्भाष्ये देशे साक्षिभिर्मिथः सम्भाषत । इति परोक्तहेतवः ।

(४) परोक्तदण्डः पञ्चबन्धः । स्वयंवादिदण्डो दशबन्धः । पुरुषभृति-रष्टांशः । पथिभक्तमर्घविशेषतः । तदुभयं नियम्यो दद्यात् ।


दी गई हो और उनके रूप, लक्षण, प्रमाण तथा गुण की अच्छी तरह परीक्षा की गई हो ।

( १ ) बलात्कार जैसे व्यवहारों को छोड़ कर उनके सभी व्यवहार न्याय-सम्मत माने जाँय । यहाँ तक व्यवहार की स्थापना बताई गई ।

( २ ) अपने-अपने पक्ष की सहादत के लिए उपस्थित हुए मुद्दाला ( वेदक ) और मुद्दई ( आवेदक ) के देश, गाँव, जाति, गोत्र, नाम और व्यवसाय आदि को पहिले लिखा जाय; फिर कर्जा लेने या चुकाने का वर्ष, ऋतु, पक्ष, महीना, दिन, स्थान और गवाही आदि को लिखा जाय; अन्त में मुद्दई तथा मुद्दाला के बयान क्रमपूर्वक लिखे जाँय । तब जाकर उन पर विचार किया जाय ।

( ३ ) पराजय के लक्षण : बयान देते समय जो व्यक्ति प्रसङ्ग की बात न कहकर इधर-उधर की हाँकने लगता है; जिसके बयानों में कोई सिलसिला न हो, दूसरे की अमान्य बात को पकड़ कर उस पर डट जाता है, कर्जा लेने के स्थान पर हलफ देकर भी पूछने पर नहीं बतलाता या उसकी जगह किसी दूसरे ही स्थान को बतलाता है स्थान ठीक बताने पर ऋण लेने से मुकर जाता है; गवाहों की बात को स्वीकार नहीं करता; और निषिद्ध स्थान में गवाहों से मिल कर बात करता है; उसको हारा हुआ समझना चाहिए ।

( ४ ) पराजय का दण्ड : ऐसे हारे हुए व्यक्ति को ऋण की रकम का पाँचवाँ हिस्सा दण्ड दिया जाय । बिना गवाह के अपनी ही बात को जो बार-बार ठीक कहता जाय उसको ( देय रकम ) का दसवाँ हिस्सा दण्ड दिया जाय । इसके अतिरिक्त हर्जने के रूप में हारे हुए अपराधी से नौकरों के वेतन का आठवाँ हिस्सा और रास्ते का भोजन-भत्ता भी अदा कर लिया जाय ।

१७ कौ०

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२५८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) अभियुक्तो न प्रत्यभियुञ्जीत, अन्यत्र कलहसाहससार्थसमवायेभ्यः । न चाभियुक्तेऽभियोगोऽस्ति ।
(२) अभियोक्ता चेत् प्रत्युक्तस्तदहरेव न प्रतिब्रूयात्, परोक्तः स्यात् । कृतकार्यविनिश्चयो ह्यभियोक्ता, नाभियुक्तः ।
(३) तस्याप्रतिब्रुवतस्त्रिरात्रं सप्तरात्रमिति । अत ऊर्ध्वं त्रिपणावरार्ध्यं द्वादशपणपरं दण्डं कुर्यात् । त्रिपक्षादूर्ध्वमप्रतिब्रुवतः परोक्तदण्डं कृत्वा यान्यस्य द्रव्याणि स्युस्ततोऽभियोक्तारं प्रतिपादयेदन्यत्र प्रत्युपकरणेभ्यः । तदेव निष्पततोऽभियुक्तस्य कुर्यात् । अभियोक्तुर्निष्पातसमकालः परोक्तभावः । प्रेतस्य व्यसनिनो वा साक्षिवचनाः सारम् । अभियोक्ता दण्डं दत्त्वा कर्म कारयेत् । आधिं वा स कामं प्रवेशयेत् । रक्षोधनरक्षितं वा कर्मणा प्रतिपादयेदन्यत्र ब्राह्मणादिति ।


( १ ) फौजदारी, डाका, व्यापारियों और लिमिटेड कम्पनियों के झगड़ों को छोड़कर अभियुक्त, अभियोक्ता पर उलटा मुकदमा नहीं चला सकता है। अभियुक्त भी पहिली बात को लेकर अभियोक्ता पर पुनः मुकदमा नहीं चला सकता है।

( २ ) जवाबतलबी : जवाबतलब किये जाने पर तत्काल ही वादी यदि उत्तर नहीं देता तो उसको पराजित समझा जाय । क्योंकि पूरे सोच-विचार के बाद ही अभियोक्ता दावा दायर करता है, जब कि अभियुक्त ऐसी स्थिति में नहीं रहता है ।

( ३ ) मुहलत : इसलिए, अभियुक्त यदि फौरन ही जवाब न दे सके तो उसे तीन से सात रात तक की मुहलत दी जाय । इतनी मुहलत मिलने पर भी यदि वह उत्तर नहीं दे पाता तो उस पर तीन से बारह पण तक का दण्ड किया जाय । यदि डेढ़ महीने की मुहलत के बाद भी वह अपने अभियोग की सफाई पेश नहीं कर पाता तो उसको देय धन का पाँचवाँ हिस्सा दण्ड दिया जाय और उसकी सम्पत्ति में से जितना भी न्यायसंगत हो उतना हिस्सा अभियोक्ता को दिलाया जाय; सारी सम्पत्ति को दिये जाने के बाद भी यदि कुछ कर्जा बाकी रह जाय तो अभियुक्त के जीवन-निर्वाह योग्य अन्न, वस्त्र, बर्तन, बिस्तर आदि सामान अभियोक्ता को नहीं दिलाया जाय । यदि अभियोक्ता अपराधी सिद्ध हो जाय तब उपर्युक्त सारे अधिकार अभियुक्त को दिये जायें; किन्तु अभियुक्त ही यदि अपराधी साबित हो जाय तो उसको सफाई पेश करने की मुहलत न दी जाय; बल्कि तत्काल ही पूर्वोक्त दण्ड दिया जाय । यदि बीच ही में अभियुक्त मर जाय या किसी भारी विपदा में फँस जाय तो उसके गवाहों की सहादत के अनुसार अदालत अपराधी अभियोक्ता को यथोचित दण्ड देकर उससे काम ले । नियत समय तक न्यायालय उसको अपने अधिकार में रखे अथवा उससे जन-कल्याण सम्बन्धी कार्यों को कराये । यदि अभियोक्ता ब्राह्मण हो तो उससे ऐसे कार्य न करवाये जायँ ।

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प्र० ५६-५७ : अ० १ ] विवादों का निर्णय २५९

(१) चतुर्वर्णाश्रमस्यायं लोकस्याचाररक्षणात् ।
नश्यतां सर्वधर्माणां राजधर्मः प्रवर्तकः ॥
(२) धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम् ।
विवादार्थश्चतुष्पादः पश्चिमः पूर्वबाधकः ।
(३) अत्र सत्ये स्थितो धर्मो व्यवहारस्तु साक्षिषु ।
चरित्रं सङ्ग्रहे पुंसां राज्ञामाज्ञा तु शासनम् ॥
(४) राज्ञः स्वधर्मः स्वर्गाय प्रजा धर्मेण रक्षितुः ।
अरक्षितुर्वा क्षेप्तुर्वा मिथ्यादण्डमतोऽन्यथा ॥
(५) दण्डो हि केवलो लोकं परं चेमं च रक्षति ।
राज्ञा पुत्रे च शत्रौ च यथादोषं समं धृतः ॥
(६) अनुशासद्धि धर्मेण व्यवहारेण संस्थया ।
न्यायेन च चतुर्थेन चतुरन्तां महीं जयेत् ॥
(७) संस्थया धर्मशास्त्रेण शास्त्रं वा व्यावहारिकम् ।
यस्मिन्नर्थे विरुद्ध्येत धर्मेणार्थं विनिर्णयेत् ॥
(८) शास्त्रं विप्रतिपद्येत धर्मन्यायेन केनचित् ।
न्यायस्तत्र प्रमाणं स्यात्तत्र पाठो हि नश्यति ॥


( १ ) राजाज्ञा : चारों वर्ण, चारों आश्रम, सम्पूर्ण लोकाचार और नष्ट होते हुए सभी धर्मों का रक्षक राजा है; इसीलिये उसे धर्म का प्रवर्त्तक माना जाता है।

( २ ) धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजाज्ञा, ये विवाद के निर्णायक साधन होने के कारण राष्ट्र के चार पैर माने जाते हैं; इन्हीं पर सारा राज्य टिका है। इनमें भी धर्म से व्यवहार, व्यवहार से चरित्र और चरित्र की अपेक्षा राजाज्ञा श्रेष्ठ है।

( ३ ) उनमें धर्म सच्चाई में, व्यवहार साक्षियों में चरित्र समाज के जीवन में और राजाज्ञा राजकीय शासन में स्थित रहती है।

( ४ ) धर्मपूर्वक प्रजा पर शासन करना ही राजा का निजी धर्म है; वही उसको स्वर्ग तक ले जाता है। इसके विपरीत प्रजा की रक्षा न कर उसको पीड़ा पहुँचाने वाला राजा कभी भी सुखी नहीं रहता है।

( ५ ) पुत्र और शत्रु को उनके अपराध के अनुसार समानरूप से राजा द्वारा दिया हुआ दण्ड ही लोक और परलोक की रक्षा करता है।

( ६ ) धर्म, व्यवहार, चरित्र और न्यायपूर्वक शासन करता हुआ राजा सारी पृथ्वी का स्वामित्व प्राप्त करे।

( ७ ) जहाँ भी चरित्र तथा लोकाचार का धर्मशास्त्र के साथ विरोध की बात उपस्थित हो, वहाँ धर्मशास्त्र को ही प्रमाण मानना चाहिए।

( ८ ) किन्तु, किसी बात पर यदि राजा के धर्मानुकूल शासन का धर्मशास्त्र के

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२६० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) दृष्टदोषः स्वयंवादः स्वपक्षपरपक्षयोः ।
अनुयोगार्जवं हेतुः शपथश्चार्थसाधकः ॥
(२) पूर्वोत्तरार्थव्याघाते साक्षिवक्तव्यकारणे ।
चारहस्ताच्च निष्पाते प्रदेष्टव्यः पराजयः ॥

इति धर्मस्थीये तृतीयाऽधिकरणे विवादपदनिबन्धो नाम प्रथमोऽध्यायः, आदितोः सप्तपञ्चाशः ।

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साथ विरोध पैदा हो जाय, तो वहाँ राज-शासन को ही प्रमाण मानना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से धर्मशास्त्र का पाठ मात्र ही नष्ट होता है।

(१ निर्णय के हेतु : मुकदमे का फैसला देने से पूर्व कुछ बातें आवश्यक हैं; जैसे १. जिसका अपराध देख लिया गया हो, २. जिसने अपने अपराध को स्वीकार कर लिया हो; ३. सरलता से जिरह; ४. सरलता से कारणों का पता लग जाना और २. कसम दिलाना, ये पाँचों बातें सच्चाई को सिद्ध करने में सहायक होती हैं ।

(२) यदि उक्त पांच हेतुओं के माध्यम से भी वादी-प्रतिवादी की पारस्परिक विरुद्ध दलीलों का उचित समाधान न हो सके तो साक्षियों और गुप्तचरों के द्वारा मामले की छान-बीन कराकर अपराध का फैसला देना चाहिए ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में विवादपदनिबन्ध नामक पहला अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ५८विवाहसंयुक्तं; विवाहधर्मः;
अध्याय २स्त्रीधनकल्प; आधिवेदनिकम्;

(१) विवाहपूर्वो व्यवहारः ।
(२) कन्यादानं कन्यामलङ्कृत्य ब्राह्मो विवाहः ।
(३) सहधर्मचर्या प्राजापत्यः ।
(४) गोमिथुनादानादार्षः ।
(५) अन्तर्वेद्यामृत्विजे दानाद् दैवः ।
(६) मिथस्समवायाद् गान्धर्वः ।
(७) शुल्कादानादासुरः ।
(८) प्रसह्यादानाद् राक्षसः ।


विवाह सम्बन्ध

धर्मविवाह : स्त्री का धन : स्त्री को पुनर्विवाह का अधिकार : पुरुष को पुनर्विवाह का अधिकार

( १ ) धर्मविवाह : विवाह के बाद ही सारे सांसारिक व्यवहार आरम्भ होते हैं ।

( २ ) वस्त्र-आभूषण आदि से सजाकर विधिपूर्वक-कन्यादान करना ब्राह्म विवाह कहलाता है ।

( ३ ) कन्या और वर, दोनों सहधर्म पालन करने की प्रतिज्ञा कर जिस विवाह बन्धन को स्वीकार करते हैं, उसे प्राजापत्य विवाह कहते हैं ।

( ४ ) वर से गऊ का जोड़ा लेकर जो विवाह किया जाता है उसे आर्ष विवाह कहते हैं ।

( ५ ) विवाह वेदी में बैठकर ऋत्विक् को जो कन्यादान दिया जाता है उसे दैव विवाह कहते हैं ।

( ६ ) कन्या और वर का आपसी सलाह से किया गया विवाह गान्धर्व विवाह ( Love marriage ) कहलाता है ।

( ७ ) कन्या के पिता को धन देकर जो विवाह किया जाता है उसे आसुर विवाह कहते हैं ।

( ८ ) किसी कन्या से बलात्कार करके विवाह करना राक्षस विवाह कहलाता है ।

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२६२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) सुप्तादानात् पैशाचः ।
(२) पितृप्रमाणाश्चत्वारः पूर्वे धर्म्याः । मातापितृप्रमाणाः शेषाः । तौ हि शुल्कहरौ दुहितुः । अन्यतराभावेऽन्यतरो वा ।
(३) द्वितीयं शुल्कं स्त्री हरेत् । सर्वेषां प्रीत्यारोपणमप्रतिषिद्धम् ।
(४) वृत्तिराबन्ध्यं वा स्त्रीधनम् । परद्विसाहस्रा स्थाप्या वृत्तिः । आबन्ध्या नियमः ।
(५) तदात्मपुत्रस्नुषाभर्मणि प्रवासाप्रतिविधाने च भार्याया भोक्तु-मदोषः । प्रतिरोधकव्याधिदुर्भिक्षभयप्रतीकारे धर्मकार्ये च पत्युः । सम्भूय वा दम्पत्योर्मिथुनं प्रजातयोस्त्रिवर्षोपभुक्तं च धर्मिष्ठेषु विवाहेषु नानुयु-ञ्जीत । गान्धर्वासुरोपभुक्तं सवृद्धिकमुभयं दाप्येत । राक्षसैपैशाचोपभुक्तं स्तेयं दद्यात् । इति विवाहधर्मः ।

(१) सोई हुई कन्या को हरण करके विवाह करना पैशाच विवाह कहलाता है।

(२) उक्त आठ प्रकार के विवाहों में पहिले चार प्रकार के विवाह पिता की सलाह से होने के कारण धर्मानुकूल विवाह हैं । बाकी चार विवाह माता-पिता दोनों की सलाह से होते हैं; क्योंकि वे दोनों लड़की को देकर उसके बदले में धन लेते हैं । उस धन को यदि पिता न हो तो माता ले सकती है और माता न हो पिता ले सकता है।

(३) इसके अतिरिक्त प्रीतिवश दिया हुआ दूसरे प्रकार का धन उस कन्या का है जिसके साथ विवाह किया गया हो । सभी प्रकार के विवाहों में स्त्री-पुरुष में परस्पर प्रीति का होना आवश्यक है ।

(४) स्त्री का धन : स्त्री का धन दो प्रकार का होता है : १. वृत्ति और २. आबध्य । स्त्री का वृत्ति धन वह है जो स्त्री के नाम से बैंक आदि में जमा किया गया हो । उसकी रकम कम-से-कम दो हजार तक होनी चाहिए । गहना या जेवर आदि आबध्य धन कहलाते हैं, जिनकी तादाद का कोई नियम नहीं है ।

(५) किसी स्त्री का पति परदेश चला जाय और उसकी (स्त्री की) जीविका निर्वाह के लिए कोई जरिया न हो तो वह स्त्री अपने पुत्र और अपनी पतोहू के जीवन-निर्वाह के लिए अपने निजी धन को खर्च कर सकती है । किसी विपत्ति, बीमारी, दुर्भिक्ष या इसी तरह के आकस्मिक संकट से बचने के लिए और किसी धर्म-कार्य में पति भी यदि स्त्री के निजी धन को खर्च करता है तो उसमें कोई बुराई नहीं । इसी प्रकार दो सन्तान पैदा होने पर स्त्री-पुरुष दोनों मिलकर यदि उस धन को खर्च करें तब भी कोई दोष नहीं; और ऐसे पति-पत्नी जिनका विवाह धर्मानुकूल हुआ हो, कोई सन्तान पैदा न होने पर तीन वर्ष तक उस धन को खर्च कर सकते हैं । जिन्होंने गान्धर्व या आसुर विवाह किया हो और आपसी सलाह से वे स्त्री-धन को खर्च कर डालें तो उनसे ब्याजसहित मूलधन जमा कर लिया जाय । जिन्होंने

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प्र० ५८ : अ० २ ] विवाह सम्बन्ध ( १ ) २६३

(१) मृते भर्तरि धर्मकामा तदानीमेवास्थाप्याभरणं शुल्कशेषं च लभेत । लब्ध्वा वा विन्दमाना सवृद्धिकमुभयं दाप्येत । कुटुम्बकामा तु श्वशुरपतिदत्तं निवेशकाले लभेत । निवेशकालं हि दीर्घप्रवासे व्याख्यास्यामः ।
(२) श्वशुरप्रातिलोम्येन वा निविष्टा श्वशुरपतिदत्तं जीयेत । ज्ञातिहस्तादभिमृष्टाया ज्ञातयो यथागृहीतं दद्युः ।
(३) न्यायोपगतायाः प्रतिपत्ता स्त्रीधनं गोपायेत् ।
(४) पतिदायं विन्दमाना जीयेत । धर्मकामा भुञ्जीत ।
(५) पुत्रवती विन्दमाना स्त्रीधनं जीयेत । तत्तु स्त्रीधनं पुत्रा हरेयुः ।
(६) पुत्रभरणार्थं वा विन्दमाना पुत्रार्थं स्फातीकुर्यात् ।


राक्षस तथा पैशाच विधि से विवाह किया हो ऐसे पति-पत्नी यदि स्त्री धन को खर्च कर डालें तो उन्हें चोरी का दण्ड दिया जाय । यहाँ तक विवाह धर्म का निरूपण किया गया है ।

( १ ) स्त्री को पुनर्विवाह का अधिकार : पति के मर जाने पर स्त्री यदि अपने धर्म-कर्म पर रहना चाहती हो तो उसे अपने दोनों प्रकार के निजी धन तथा प्रीति धन ले लेना चाहिए । उस धन को ले लेने के बाद यदि वह दूसरा पति कर ले तो ब्याज सहित सारे मूलधन को वह वापिस कर दे । यदि वह परिवार की इच्छा से दूसरा विवाह करना चाहती हो तो अपने मृत पति और श्वसुर के दिए हुए धन को विवाह के समय में ही पा सकती है, उसके पहिले नहीं । इस प्रकार के पुनर्विवाह का विस्तृत विवेचन आगे दीर्घप्रवास प्रकरण में किया जाएगा ।

( २ ) यदि विधवा स्त्री अपने ससुर की इच्छा के विरुद्ध पुनर्विवाह करना चाहे तो ससुर और मृत-पति का धन उसे नहीं मिलेगा । यदि विरादरी वालों के हाथ से उसके पुनर्विवाह का प्रबन्ध हो तो विरादरी वाले ही उसके लिये हुए धन को वापिस करें ।

( ३ ) न्यायपूर्वक प्राप्त हुई स्त्री की रक्षा करने वाला पुरुष ही उसके धन की भी रक्षा करे । पुनर्विवाह की इच्छा करने वाली स्त्री अपने मृत पति के उत्तराधिकार को नहीं पा सकती है ।

( ४ ) यदि वह धर्मपूर्वक जीवन-निर्वाह करने की इच्छा करे तो वह अपने मृत पति के उत्तराधिकार को भोग सकती है ।

( ५ ) यदि पुत्रवती स्त्री पुनर्विवाह करना चाहे तो वह निजी स्त्रीधन की अधिकारिणी नहीं हो सकती । उस स्त्री के निजी धन के उत्तराधिकारी उसके पुत्र ही होंगे ।

( ६ ) यदि कोई विधवा स्त्री अपने पुत्रों के भरण-पोषण के लिए पुनर्विवाह करना चाहे तो उसे अपनी निजी सम्पत्ति अपने लड़कों के नामजद कर देनी पड़ेगी ।

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२६४कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ तीसरा अधिकरण

(१) बहुपुरुषप्रजानां पुत्राणां यथापितृदत्तं स्त्रीधनमवस्थापयेत् ।
(२) कामकारणीयमपि स्त्रीधनं विन्दमाना पुत्रसंस्थं कुर्यात् ।
(३) अपुत्रा पतिशयनं पालयन्ती गुरुसमीपे स्त्रीधनम् आ आयुःक्षयाद् भुञ्जीत, आपदर्थं हि स्त्रीधनम् । ऊर्ध्वं दायादं गच्छेत् ।
(४) जीवति भर्तरि मृतायाः पुत्रा दुहितरश्च स्त्रीधनं विभजेरन् । अपुत्राया दुहितरः । तदभावे भर्ता ।
(५) शुल्कमन्वाधेयमन्यद् वा बन्धुभिर्दत्तं बान्धवा हरेयुः । इति स्त्रीधनकल्पः ।
(६) वर्षाण्यष्टावप्रजायमानामपुत्रां बन्ध्यां चाकाङ्क्षेत; दश विन्दूं, द्वादश कन्याप्रसविनीम् ।
(७) ततः पुत्रार्थी द्वितीयां विन्देत । तस्यातिक्रमे शुल्कं स्त्रीधनमर्धं चाधिवेदनिकं दद्यात् । चतुर्विंशतिपणपरं च दण्डम् ।


( १ ) यदि किसी स्त्री के कई पुत्र कई पतियों के द्वारा पैदा हुए हों तो उसे चाहिए कि जिस पिता का जो पुत्र हो उसी के नाम उसके पिता की सम्पत्ति नाम-जद करे ।

( २ ) अपनी इच्छा से खर्च करने के लिए प्राप्त हुए धन को भी वह पुनर्विवाह करने से पूर्व अपने पुत्रों के नाम लिख दे ।

( ३ ) पुत्रहीन विधवा अपने पतिव्रत धर्म का पालन करती हुई गुरु के संरक्षण में रहकर जीवन पर्यन्त अपने स्त्रीधन का उपभोग कर सकती है । स्त्रीधन आपत्तिकाल के लिए ही होता है । उसके मरने के बाद उसका बचा हुआ धन उसके उचित उत्तराधिकारियों को मिलना चाहिए ।

( ४ ) पति के रहते हुए यदि स्त्री मर जाय तो उसके निजी धन को उसकी सन्तानें आपस में बाँट लें । यदि लड़के न हों तो धन को लड़कियाँ ही बाँट लें । यदि लड़कियाँ भी न हों तो उसका पति उस धन को ले ले ।

( ५ ) बन्धु-बान्धवों ने जो धन विवाह के समय दहेज के रूप में या दूसरे रूप में उस स्त्री को दिया है उसे वे वापस ले सकते हैं । यहाँ तक स्त्री-धन विषयक नियमों पर विचार किया गया ।

( ६ ) पुरुष को पुनर्विवाह का अधिकार : यदि किसी स्त्री की संतान न होती हो या उसके अन्दर सन्तान पैदा करने की शक्ति न हो, तो पति को चाहिए कि वह आठ वर्ष तक सन्तान होने की प्रतीक्षा करे । यदि स्त्री मरे हुए बच्चे ही जने तो दश वर्ष तक और यदि उसको कन्याएँ ही पैदा होती हों तो पति को बारह वर्ष तक इन्तजार करना चाहिए ।

( ७ ) उसके बाद पुत्र की इच्छा करने वाला पुरुष पुनर्विवाह कर सकता है । जो भी पुरुष इस नियम का उल्लंघन करे उसे दहेज में मिला हुआ धन, स्त्रीधन,

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प्र० ५८ : अ० २ ] विवाह सम्बन्ध ( १ ) २६५

(१) शुल्कं स्त्रीधनमशुल्कस्त्रीधनायास्तत्प्रमाणमाधिवेदनिकमनुरूपां च वृत्तिं दत्त्वा बह्वीरपि विन्देत । पुत्रार्था हि स्त्रियः । तीर्थसमवाये चासां यथाविवाहं पूर्वोढां जीवत्पुत्रां वा पूर्वं गच्छेत् ।

(२) तीर्थगूहनागमने षण्णवतिर्दण्डः । पुत्रवतीं धर्मकामां वन्ध्यां बिन्दुं नीरजस्कां वा नाकामामुपेयात्, न चाकामः पुरुषः । कुष्ठिनीमुन्मत्तां वा गच्छेत् । स्त्री तु पुत्रार्थमेवंभूतं वोपगच्छेत् ।

(३) नीचत्वं परदेशं वा प्रस्थितो राजकिल्बिषी ।
प्राणाभिहन्ता पतितस्त्याज्यः क्लीबोऽपि वा पतिः ॥

इति धर्मस्थीये तृतीयोऽधिकरणे विवाहसंयुक्तं नाम द्वितीयोऽध्यायः; आदितोऽष्टपञ्चाशः ।

—: ० :—


अतिरिक्त धन अपनी पहली स्त्री के गुजारे के लिए देना चाहिए। इसके अतिरिक्त वह चौबीस पण तक का जुर्माना सरकार को अदा करे।

(१) जिस स्त्री के विवाह में न तो दहेज मिला है और न उसके पास अपना निजी धन है, उसको दहेज तथा स्त्री धन के बराबर धन देकर और उसके जीवन-निर्वाह के पर्याप्त सम्पत्ति देकर कोई भी पुरुष कितनी ही स्त्रियों के साथ विवाह कर सकता है। क्योंकि स्त्रियाँ पुत्र पैदा करने के लिए ही होती हैं। यदि एक पुरुष की अनेक पत्नियाँ एक ही साथ रजस्वला हों तो पति को चाहिए कि वह सबसे पहिले विवाहिता पत्नी के पास समागम के लिए जाय अथवा उस पत्नी के पास जाय जिसका कोई पुत्र जीवित हो।

(२) यदि कोई पुरुष ऋतु-काल को छिपाकर अपनी स्त्री से संसर्ग नहीं करता तो उसको सरकार की ओर से छियानवे पण दंड दिया जाय। किसी भी पुरुष को चाहिए कि वह पुत्रवती, पवित्र जीवन वाली, बन्ध्या, मृतपुत्रा और मासिकधर्मरहित स्त्री के साथ तब तक संभोग न करे जब तक संभोग के लिए वह स्वयं राजी न हो। संभोग की इच्छा होते हुए भी कोढ़िन या पागल स्त्री से संभोग नहीं करना चाहिए, किन्तु; पुत्र की इच्छा रखने वाली स्त्री किसी भी कोढ़ी या उन्मत्त पुरुष के साथ संसर्ग कर सकती है।

(३) किसी भी नीच, प्रवासी, राजद्रोही, घातक, जाति तथा धर्म से गिरे हुए और नपुंसक पति से स्त्री विवाह विच्छेद कर सकती है।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में विवाहसंयुक्त नामक दूसरा अध्याय समाप्त।

—: ० :—

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प्रकरण ५९विवाहसंयुक्तं; शुश्रूषाभर्मपारुष्य-
अध्याय ३द्वेषातिचारोपकारव्यवहारप्रतिषेधाश्च;

(१) द्वादशवर्षा स्त्री प्राप्तव्यवहारा भवति, षोडशवर्षः पुमान् । अत ऊर्ध्वमशुश्रूषायां द्वादशपणः स्त्रिया दण्डः, पुंसो द्विगुणः ।

(२) भर्मण्यायामनिर्दिष्टकालायां ग्रासाच्छादनं वाधिकं यथापुरुष-परिवापं सविशेषं दद्यात् । निर्दिष्टकालायां तदेव सङ्ख्याय । बन्धं च दद्यात् । शुल्कस्त्रीधनाधिवेदनिकानामनादाने च ।

(३) श्वशुरकुलप्रविष्टायां विभक्तायां वा नाभियोज्यः पतिः । इति भर्म ।

(४) नग्ने, विनग्ने, न्यङ्गे, अपितृके, अमातृके, इत्यनिर्देशेन विनय-ग्रहणम् । वेणुदलरज्जुहस्तानामन्यतमेन वा पृष्ठे त्रिराघातः । तस्यातिक्रमे वाग्दण्डपारुष्यदण्डाभ्यामर्धदण्डाः ।


विवाह सम्बन्ध

स्त्री की परवरिश : कठोर स्त्री के साथ व्यवहार : पति-पत्नी का द्वेष : पति पत्नी का अतिचार : और अतिचार पर प्रतिषेध

( १ ) बारह वर्ष की लड़की और सोलह वर्ष का लड़का कानूनन बालिग माने जाते हैं । इस उम्र के बाद यदि वे राज-नियम का उल्लंघन ( अशुश्रूषा ) करें तो लड़की को बारह पण और लड़के को चौबीस पण का दण्ड दिया जाय ।

( २ ) स्त्री की परवरिश : यदि किसी स्त्री के भरण-पोषण ( भर्म ) की अवधि नियत न हो तो पुरुष को चाहिए कि वह उस स्त्री के वस्त्र, भोजन और व्यय का यथोचित प्रबन्ध करे; अथवा अपनी आमदनी के अनुसार उसको अतिरिक्त सुख-सुविधा भी दे; किन्तु जिस स्त्री के भरण-पोषण का समय नियत हो और जिस स्त्री ने दहेज, स्त्री धन तथा अतिरिक्त धन लेना स्वीकार न किया हो, पति को चाहिए कि अपनी आमदनी के अनुसार उसको बँधी हुई रकम देता जाय ।

( ३ ) यदि स्त्री अपने मायके में रहती हो या स्वतन्त्र रह कर गुजारा करती हो, तो उसके भरण-पोषण के लिए पति को बाध्य नहीं किया जा सकता है । यहाँ तक स्त्री की परवरिश पर विचार किया गया ।

( ४ ) कठोर स्त्री के साथ व्यवहार : दाम्पत्य-नियमों का उल्लंघन करने

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प्र० ५६ : अ० ३ ] विवाह सम्बन्ध ( २ ) २६७

(१) तदेव स्त्रिया भर्तरि प्रसिद्धमदोषाया ईर्ष्याया बाह्यविहारेषु द्वारेषु अत्ययो यथानिर्दिष्टः । इति पारुष्यम् ।
(२) भर्तारं द्विषती स्त्री सप्तार्तवान्यमण्डयमाना तदानीमेव स्थाप्या- भरणं निधाय भर्तारम् अन्यया सह शयानमनुशयीत ।
(३) भिक्षुक्यन्वाधिज्ञातिकुलानामन्यतमे वा भर्ता द्विषन् स्त्रियमे कामनुशयीत ।
(४) दृष्टलिङ्गे मैथुनापहारे सवर्णापसर्पोपगमे वा मिथ्यावादी द्वादश-पणं दद्यात् ।
(५) अमोक्ष्या भर्तुरकामस्य द्विषती भार्या, भार्यायाश्च भर्ता । परस्परं द्वेषान्मोक्षः ।
(६) स्त्रीविप्रकाराद् वा पुरुषश्चेन्मोक्षमिच्छेद्, यथागृहीतमस्यै दद्यात् ।


वाली स्त्री को पहिले 'नंगी, अधनंगी, लूली-लँगड़ी, बाप-मरी, मां-मरी' आदि गालियाँ न देकर उसको भले ढंग से नम्रता तथा सभ्यता सिखानी चाहिए । यदि इससे कार्य न सधे तो उसकी पीठ पर बाँस की खपाची, रस्सी या डप्पण से तीन बार चोट करे । फिर भी वह सीधी राह पर न आवे तो उसे वाक्पारुष्य तथा दण्डपारुष्य का आधा दण्ड दिया जाय ।

( १ ) यही दण्ड उस स्त्री को भी दिया जाय जो अकारण ही निर्दोष पति से बुरा व्यवहार करती हो और पति के दरवाजे पर या बाहर किसी प्रकार की इशारे-बाजी या ऐयाशी करे । इस प्रकार के नियम-विरुद्ध आचरण करने वाली स्त्री के लिए इसी प्रकरण में दण्ड का निर्देश किया गया है । यहाँ तक कटु-भाषिणी स्त्री के व्यवहार पर विचार किया गया ।

( २ ) पति-पत्नी का द्वेष : अपने पति के साथ द्वेष रखने वाली स्त्री यदि सात ऋतुकाल तक दूसरे पुरुष के साथ समागम करती रहे तो उसे चाहिए कि वह अपने दोनों प्रकार के स्त्री-धन पति को सौंपकर पति को भी दूसरी स्त्री के साथ समागम करने की अनुमति दे दे ।

( ३ ) यदि पति, स्त्री से द्वेष करता हो तो उसको चाहिए कि वह अपनी स्त्री को संन्यासिनी तथा भाई-बन्धुओं साथ अकेली रहने से न रोके ।

( ४ ) पराई स्त्री के साथ संभोग करने के चिह्न स्पष्ट दिखाई देने पर भी यदि कोई पुरुष इनकार कर दे या किसी प्रेमिका के साथ संभोग करके साफ मुकर जाय तो उसको बारह पण का दण्ड दिया जाय ।

( ५ ) पति से द्वेष-वैमनस्य रखनेवाली स्त्री, पति की इच्छा के विरुद्ध तलाक नहीं दे सकती है । इसी प्रकार पति भी अपनी पत्नी को तलाक नहीं दे सकता है । दोनों में परस्पर समान दोष होने पर ही तलाक संभव है ।

( ६ ) पत्नी में कुछ बुराइयाँ आ जाने के कारण यदि पति उसका परित्याग