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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 349 of 918

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Page 349

प्र० ५८ : अ० २ ] विवाह सम्बन्ध ( १ ) २६५

(१) शुल्कं स्त्रीधनमशुल्कस्त्रीधनायास्तत्प्रमाणमाधिवेदनिकमनुरूपां च वृत्तिं दत्त्वा बह्वीरपि विन्देत । पुत्रार्था हि स्त्रियः । तीर्थसमवाये चासां यथाविवाहं पूर्वोढां जीवत्पुत्रां वा पूर्वं गच्छेत् ।

(२) तीर्थगूहनागमने षण्णवतिर्दण्डः । पुत्रवतीं धर्मकामां वन्ध्यां बिन्दुं नीरजस्कां वा नाकामामुपेयात्, न चाकामः पुरुषः । कुष्ठिनीमुन्मत्तां वा गच्छेत् । स्त्री तु पुत्रार्थमेवंभूतं वोपगच्छेत् ।

(३) नीचत्वं परदेशं वा प्रस्थितो राजकिल्बिषी ।
प्राणाभिहन्ता पतितस्त्याज्यः क्लीबोऽपि वा पतिः ॥

इति धर्मस्थीये तृतीयोऽधिकरणे विवाहसंयुक्तं नाम द्वितीयोऽध्यायः; आदितोऽष्टपञ्चाशः ।

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अतिरिक्त धन अपनी पहली स्त्री के गुजारे के लिए देना चाहिए। इसके अतिरिक्त वह चौबीस पण तक का जुर्माना सरकार को अदा करे।

(१) जिस स्त्री के विवाह में न तो दहेज मिला है और न उसके पास अपना निजी धन है, उसको दहेज तथा स्त्री धन के बराबर धन देकर और उसके जीवन-निर्वाह के पर्याप्त सम्पत्ति देकर कोई भी पुरुष कितनी ही स्त्रियों के साथ विवाह कर सकता है। क्योंकि स्त्रियाँ पुत्र पैदा करने के लिए ही होती हैं। यदि एक पुरुष की अनेक पत्नियाँ एक ही साथ रजस्वला हों तो पति को चाहिए कि वह सबसे पहिले विवाहिता पत्नी के पास समागम के लिए जाय अथवा उस पत्नी के पास जाय जिसका कोई पुत्र जीवित हो।

(२) यदि कोई पुरुष ऋतु-काल को छिपाकर अपनी स्त्री से संसर्ग नहीं करता तो उसको सरकार की ओर से छियानवे पण दंड दिया जाय। किसी भी पुरुष को चाहिए कि वह पुत्रवती, पवित्र जीवन वाली, बन्ध्या, मृतपुत्रा और मासिकधर्मरहित स्त्री के साथ तब तक संभोग न करे जब तक संभोग के लिए वह स्वयं राजी न हो। संभोग की इच्छा होते हुए भी कोढ़िन या पागल स्त्री से संभोग नहीं करना चाहिए, किन्तु; पुत्र की इच्छा रखने वाली स्त्री किसी भी कोढ़ी या उन्मत्त पुरुष के साथ संसर्ग कर सकती है।

(३) किसी भी नीच, प्रवासी, राजद्रोही, घातक, जाति तथा धर्म से गिरे हुए और नपुंसक पति से स्त्री विवाह विच्छेद कर सकती है।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में विवाहसंयुक्त नामक दूसरा अध्याय समाप्त।

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