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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 342 of 918

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Page 342

२५८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) अभियुक्तो न प्रत्यभियुञ्जीत, अन्यत्र कलहसाहससार्थसमवायेभ्यः । न चाभियुक्तेऽभियोगोऽस्ति ।
(२) अभियोक्ता चेत् प्रत्युक्तस्तदहरेव न प्रतिब्रूयात्, परोक्तः स्यात् । कृतकार्यविनिश्चयो ह्यभियोक्ता, नाभियुक्तः ।
(३) तस्याप्रतिब्रुवतस्त्रिरात्रं सप्तरात्रमिति । अत ऊर्ध्वं त्रिपणावरार्ध्यं द्वादशपणपरं दण्डं कुर्यात् । त्रिपक्षादूर्ध्वमप्रतिब्रुवतः परोक्तदण्डं कृत्वा यान्यस्य द्रव्याणि स्युस्ततोऽभियोक्तारं प्रतिपादयेदन्यत्र प्रत्युपकरणेभ्यः । तदेव निष्पततोऽभियुक्तस्य कुर्यात् । अभियोक्तुर्निष्पातसमकालः परोक्तभावः । प्रेतस्य व्यसनिनो वा साक्षिवचनाः सारम् । अभियोक्ता दण्डं दत्त्वा कर्म कारयेत् । आधिं वा स कामं प्रवेशयेत् । रक्षोधनरक्षितं वा कर्मणा प्रतिपादयेदन्यत्र ब्राह्मणादिति ।


( १ ) फौजदारी, डाका, व्यापारियों और लिमिटेड कम्पनियों के झगड़ों को छोड़कर अभियुक्त, अभियोक्ता पर उलटा मुकदमा नहीं चला सकता है। अभियुक्त भी पहिली बात को लेकर अभियोक्ता पर पुनः मुकदमा नहीं चला सकता है।

( २ ) जवाबतलबी : जवाबतलब किये जाने पर तत्काल ही वादी यदि उत्तर नहीं देता तो उसको पराजित समझा जाय । क्योंकि पूरे सोच-विचार के बाद ही अभियोक्ता दावा दायर करता है, जब कि अभियुक्त ऐसी स्थिति में नहीं रहता है ।

( ३ ) मुहलत : इसलिए, अभियुक्त यदि फौरन ही जवाब न दे सके तो उसे तीन से सात रात तक की मुहलत दी जाय । इतनी मुहलत मिलने पर भी यदि वह उत्तर नहीं दे पाता तो उस पर तीन से बारह पण तक का दण्ड किया जाय । यदि डेढ़ महीने की मुहलत के बाद भी वह अपने अभियोग की सफाई पेश नहीं कर पाता तो उसको देय धन का पाँचवाँ हिस्सा दण्ड दिया जाय और उसकी सम्पत्ति में से जितना भी न्यायसंगत हो उतना हिस्सा अभियोक्ता को दिलाया जाय; सारी सम्पत्ति को दिये जाने के बाद भी यदि कुछ कर्जा बाकी रह जाय तो अभियुक्त के जीवन-निर्वाह योग्य अन्न, वस्त्र, बर्तन, बिस्तर आदि सामान अभियोक्ता को नहीं दिलाया जाय । यदि अभियोक्ता अपराधी सिद्ध हो जाय तब उपर्युक्त सारे अधिकार अभियुक्त को दिये जायें; किन्तु अभियुक्त ही यदि अपराधी साबित हो जाय तो उसको सफाई पेश करने की मुहलत न दी जाय; बल्कि तत्काल ही पूर्वोक्त दण्ड दिया जाय । यदि बीच ही में अभियुक्त मर जाय या किसी भारी विपदा में फँस जाय तो उसके गवाहों की सहादत के अनुसार अदालत अपराधी अभियोक्ता को यथोचित दण्ड देकर उससे काम ले । नियत समय तक न्यायालय उसको अपने अधिकार में रखे अथवा उससे जन-कल्याण सम्बन्धी कार्यों को कराये । यदि अभियोक्ता ब्राह्मण हो तो उससे ऐसे कार्य न करवाये जायँ ।