कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
About this granth
The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.
This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.
| प्रकरण ३१ | कोष्ठागाराध्यक्षः |
|---|---|
| अध्याय १५ |
(१) कोष्ठागाराध्यक्षः सीताराष्ट्रक्रयिमपरिवर्तकप्रामित्यकापमित्यक-सिंहनिकान्यजातव्ययप्रत्यायोपस्थानान्युपलभेत ।
(२) सीध्यक्षोपनीतः सस्यवर्णकः सीता ।
(३) पिण्डकरः, षड्भागः सेनाभक्तं, बलिः, करः, उत्सङ्गः, पार्श्वं, पारिहीणिकम्, औपायनिकं, कौष्ठेयकं च राष्ट्रम् ।
(४) धान्यमूल्यं कोशनिर्हारः प्रयोगप्रत्यादानं च क्रयिमम् ।
(५) सस्यवर्णानामर्घान्तरेण विनिमयः परिवर्तकः ।
कोष्ठागार का अध्यक्ष
( १ ) कोष्ठागार ( कोठार ) के अध्यक्ष ( कोठारी ) को चाहिए कि वह १. सीता, २. राष्ट्र, ३. क्रयिम, ४. परिवर्तक, ५. प्रामित्यक, ६. आपमित्यक, ७. सिंहनिका, ८. अन्यजात, ९. व्ययप्रत्याय और १०. उपस्थान, इन दस बातों के संबंध में अच्छी जानकारी प्राप्त करे ।
( २ ) राजकीय कर के रूप में एकत्र धान्य को सीता कहा जाता है; उसको एकत्र करने वाले अधिकारी को सीताध्यक्ष कहते हैं । कोष्ठागार के अध्यक्ष को चाहिए कि वह शुद्ध एवं पूरा सीता लेकर उसको व्यवस्था से रखे ।
( ३ ) राष्ट्र के दस भेद होते हैं : १. पिण्डकर ( गाँवों से वसूल किया जाने वाला नियत राजकीय कर ) २. षड्भाग ( राजा को दिया जाने वाला अन्न का छठा भाग ), ३. सेनाभक्त ( युद्धकाल में विशेष रूप से निर्धारित कर ), ४. बलि ( छठे भाग के अतिरिक्त कर ), ५. कर ( जलाशयों और जंगलों का कर ), ६. उत्संग ( राजकुमार के जन्मोत्सव पर दी जाने वाली भेंट ), ७. पार्श्व ( नियत कर के अतिरिक्त कर ) ८. पारिहीणिक ( गाय बच्छियों के नुकसान पर दंड रूप में प्राप्त धन ), ९. औपायनिक ( भेंट स्वरूप प्राप्त धन ) और १०. कौष्ठेयक ( राजधन से बने हुए तालाबों तथा बगीचों का कर ) ।
( ४ ) क्रयिक तीन प्रकार का होता है : १. धान्यमूलक ( धान्य को बेच कर प्राप्त हुआ धन ), २, कोशनिर्हार ( धन देकर खरीदा हुआ अन्न ) और ३. प्रयोग-प्रत्यादान ( ब्याज आदि से प्राप्त धन ) ।
( ५ ) एक अनाज देकर उसके बदले दूसरा अनाज लेना परिवर्त्तक कहलाता है ।
१५८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) सस्ययाचनमन्यतः प्रामित्यकम् ।
(२) तदेव प्रतिदानार्थमापमित्यकम् ।
(३) कुट्टकरोचकसक्तुशुक्तपिष्टकर्म तज्जीवनेषु तैलपीडनमौरभ्र-चाक्रिकेष्विक्षूणां च क्षारकर्म सिंहनिका ।
(४) नष्टप्रस्मृतादिरन्यजातः ।
(५) विक्षेपव्याधितान्तरारम्भशेषं च व्ययप्रत्यायः ।
(६) तुलामानान्तरं हस्तपूरणमुत्करो व्याजी पर्यूषितं प्रार्जितं चोपस्थानमिति ।
(७) धान्यस्नेहक्षारलवणानाम् ।
(८) धान्यकल्पं सीताध्यक्षे वक्ष्यामः । सर्पिस्तैलवसामज्जानः स्नेहाः ।
(९) फाणितगुडमत्स्यण्डिकाखण्डशर्कराः क्षारवर्गः ।
( १ ) किसी मित्र आदि से सहायता रूप में ऐसा अन्न लेना, जो फिर लौटाया न जाय, प्रामित्यक कहलाता है ।
( २ ) ब्याज सहित पुनः लौटा देने के वायदे पर लिया हुआ अन्न आदि कर्ज । आपमित्यक कहलाता है ।
( ३ ) कूट-पीस कर, छान-बीन कर, सत्तू पीस कर, गन्ना आदि को पेर कर, आटा पीस कर, तिलों का तेल निकाल कर, भेड़ों के बाल काट कर और गुड़, राव, शक्कर आदि पर आजीविका निर्भर करने वाले लोगों से जो कर लिया जाता है उसे सिंहनिका कहते हैं ।
( ४ ) नष्ट हुए तथा भूले हुए धन का नाम अन्यजात है ।
( ५ ) व्ययप्रत्याय तीन प्रकार का होता है : १, विक्षेपशेष (सेना के व्यय से बचा हुआ धन), २, व्यधितशेष (औषधालय के व्यय से बचा धन) और ३, अन्तरारम्भशेष (दुर्ग आदि की मरम्मत से बचा हुआ धन) सब व्ययप्रत्याय धन है ।
( ६ ) बाट-तराजू की पसंघा से, तौलने के बाद मुट्ठी-दो-मुट्ठी दिया हुआ अधिक अन्न, तौली या गिनी हुई वस्तु में कोई दूसरी ही वस्तु मिला देना, छीजन के रूप में ली हुई वस्तु, पिछले वर्ष का बकाया और चतुराई से उपार्जित धन उपस्थान कहलाता है ।
( ७ ) अब इसके उपरान्त धान्य, स्नेह, क्षार और लवण का निरूपण किया जाता है ।
( ८ ) इनमें धान्यवर्ग के पदार्थों का विस्तृत विवरण आगे 'सीताध्यक्ष' नामक प्रकरण में किया जायेगा । घी, तेल, वसा और मज्जा, ये चार प्रकार के स्नेह पदार्थ हैं ।
( ९ ) गन्ने से बने : राभ, गुड़, गुड़खांड़, खांड और शक्कर में क्षारवर्ग के पदार्थ हैं ।
प्र० ३१ : अ० १५ ] कोष्ठागार का अध्यक्ष १५९
(१) सैन्धवसामुद्रविडयवक्षारसौवर्चलोद्भेद्जा लवणवर्गः ।
(२) क्षौद्रं मार्द्वीकं च मधु ।
(३) इक्षुरसगुल्मधुफाणितजाम्बवपनसानामन्यतमो मेषशृङ्गीपिप्प-
लीक्वाथाभिषुतो मासिकः षाण्मासिकः सांवत्सरीको वा चिद्भिटोर्वारुके-
क्षुकाण्डाम्रफलामलकावसुतः शुद्धो वा शुक्तवर्गः ।
(४) वृक्षाम्लकरमर्दाम्रविदलामलकमातुलुङ्गकोलबदरसौवीरकपरूष-
कादिः फलाम्लवर्गः ।
(५) दधिधान्याम्लादिर्द्रवाम्लवर्गः ।
(६) पिप्पलीमरिचशृङ्गिवेरराजाजीकिराततिक्तगौरसर्षपकुस्तुम्बुरुचो-
रकदमनकमरुवकशिग्रुकाण्डादिः कटुकवर्गः ।
(७) शुष्कमत्स्यमांसकन्दमूलफलशाकादि च शाकवर्गः ।
(८) ततोऽर्धमापदर्थं जानपदानां स्थापयेत् । अर्धमुपयुञ्जीत । नवेव
चानवं शोधयेम् ।
( १ ) लवण छह प्रकार का होता है : १. सेंधा, २. समुद्री, ३. विड, ४. जवाक्षार, ५. सज्जीखार और ६. लोना मिट्टी से बना ।
( २ ) शहद दो प्रकार का होता है : क्षौद्र ( मक्खियों द्वारा एकत्र ) और २. मार्द्वीक ( मुनक्का तथा दाख के रस से बनाया हुआ ) ।
( ३ ) सिरका शुक्तिवर्ग का पदार्थ है । ईख का रस, गुड़, शहद, राव, जामुन का रस, कटहल का रस, इनमें से किसी एक को मेढ़ासिंगी और पीपल के क्वाथ के साथ मिलाकर एक मास, छह मास तथा वर्ष भर बन्द करके रखा जाय, और उसके बाद मीठी ककड़ी, कड़ी ककड़ी, ईख, आम का फल एवं आँवला, ये पाँचों चीजें उसमें डाल दी जाँय या न भी डाली जाँय; इस विधि से जो रस तैयार होगा उसे सिरका कहते हैं । एक मास का सिरका निकृष्ट, छह मास का मध्यम और साल भर का उत्तम कहा जाता है ।
( ४ ) इमली, करौंदा आम, अनार, आंवला; खट्टा नीबू, झरबेर बेर, प्योंदी बेर, उन्नाव और फालसा आदि खट्टे रस के फल अम्लवर्गीय हैं ।
( ५ ) दही, काँजी, मट्ठा आदि पनीली खट्टी चीजें द्रववर्गीय हैं ।
( ६ ) पीपल, मिर्च, अदरख, जीरा, चिरायता, सफेद सरसों, धनियां, चोरक, दमनक, मैनफल और सैंजन आदि कडुवे पदार्थ कटुवर्गीय हैं ।
( ७ ) सूखी मछली, सूखा मांस, कन्द, मूल, फल आदि शाकवर्गीय पदार्थ हैं ।
( ८ ) स्नेहवर्ग से लेकर शाकवर्ग तक जितने पदार्थ गिनाये गये हैं, राजा को चाहिए कि, उन सब की उपज का आधा भाग आपत्तिकाल में जनपद की सुरक्ष
१६० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) क्षुण्णघृष्टपिष्टभृष्टानामार्द्रशुष्कसिद्धानां च धान्यानां वृद्धिक्षय-प्रमाणानि प्रत्यक्षीकुर्वीत ।
(२) कोद्रवव्रीहीणामर्ध सारः, शालीनामष्टभागोनः, त्रिभागोनो वरककाणाम् प्रियङ्गूणामर्ध सारो नवभागवृद्धिश्च । उदारकस्तुल्यः । यवा गोधूमाश्च क्षुण्णाः ।
(३) तिला यवा मुद्गमाषाश्च घृष्टाः । पञ्चभागवृद्धिर्रोधूमः सक्तवश्च । पादोना कलायचमसी । मुद्गमाषाणामर्धपादोना । शैम्बानामर्ध सारः । त्रिभागोने मसूराणाम् ।
(४) पिष्टमामं कुल्माषश्चाध्यर्धगुणः । द्विगुणो यावकः । पुलाकः पिष्टं च सिद्धम् ।
(५) कोद्रववरकोदारकप्रियङ्गूणां, त्रिगुणमन्नं, चतुर्गुणं व्रीहीणाम्, पञ्चगुणं शालीनाम्, तिमितमपरान्नं द्विगुणमर्धाधिकं विरूढानाम् ।
के लिए सुरक्षित रखे । आधी उपज का उपयोग स्वयं कर ले । इसी प्रकार नई फसल या नया सामान आ जाने पर पुराने स्टाक को उपयोग में ले लिया जाय और उसकी जगह नया स्टाक भर दिया जाय ।
(१) कोष्ठागार के अध्यक्ष को चाहिए कि वह कूटा हुआ, साफ किया हुआ, पीसा हुआ, भूना हुआ, भीगा हुआ, सुखाया हुआ और पकाया हुआ; जितना भी धान्य है; अपने सामने तुलवाकर उसकी घट-बढ़ की जाँच करें ।
(२) उनकी घट-बढ़ का नियम इस प्रकार है : कोदों और धान में आधी भूसी निकल जाती है; बढ़िया धान का भी आधा भाग भूसी में निकल जाता है, लोभिया आदि अनाजों में तीसरा हिस्सा चोकर का निकल जाता है । काकुन में प्रायः आधा हिस्सा भूसी निकल जाती है, किन्तु कभी-कभी उसका नवाँ हिस्सा भी बढ़ जाता है । मोटे चावल में आधा ही भाग बन पाता है, जौ और गेहूं में कूटने पर छीजन नहीं होती है ।
(३) तिल, जौ, मूंग और उड़द भी दलने पर बराबर बने रहते हैं गेहूं और भुने हुए जौ पीसने पर पञ्चमांश बढ़ जाते हैं । मटर पीसने पर चौथाई हिस्सा कम हो जाती है । पीसने पर मूंग और उड़द का आठवाँ हिस्सा कम हो जाता है । ज्वार की फलियों में आधा चोकर निकल जाता है । दलने पर मसूर का तीसरा हिस्सा कम हो जाता है ।
(४) पिसे हुए कच्चे गेहूँ तथा मूंग और उड़द आदि पकाये जाने पर ड्योढ़े हो जाते हैं । पकाये जाने पर चावल और सूजी भी दुगुने हो जाते हैं ।
(५) कोदों, लोभिया, उदारक और कांगनी पकाये जाने पर तिगुने हो जाते
प्र० ३१ : अ० ३५ ] कोष्ठगाराध्यक्ष के कर्तव्य १६१
(१) पञ्चभागवृद्धिर्भृष्टानाम् । कलायो द्विगुणः लाजा भरुजाश्च । षट्कं तैलमतसीनाम् । निम्बकुशाम्रकपित्थादीनां पञ्चभागः । चतुर्भागिकास्तिलकुसुम्भमधूकेङ्गुदीस्नेहाः ।
(२) कार्पासक्षौमाणां पञ्चपले पलसूत्रम् ।
(३) पञ्चद्रोणे शालीनां द्वादशाढकं तण्डुलानां कलभभोजनम्, एकादशकं व्यालानां, दशकमौपवाह्यानाम्, नवकं सान्नाह्यानाम्, अष्टकं पत्तीनां, सप्तकं मुख्यानां, षट्कं देवीकुमाराणाम्, पञ्चकं राज्ञाम् । अखण्डपरिशुद्धानां वा तण्डुलानां प्रस्थः ।
(४) चतुर्भागः सूपः, सूपषोडशो लवणस्यांशः, चतुर्भागः सर्पिषः तैलस्य वा, एकमार्यभक्तम् । प्रस्थषड्भागः सूपः अर्धस्नेहमवराणाम् । पादोनं स्त्रीणाम् । अर्धं बालानाम् ।
हैं । पकाये जाने पर विरञ्जफूल चावल और बासमती पंचगुने हो जाते हैं । खेत से अधकच्ची हालत में काटा गया अन्न और व्रीहि धान पकाने पर दुगुने ही बढ़ पाते हैं । उन्हें कुछ अच्छी अवस्था में खेत से काटा जाय तो वे ढाई गुना भी बढ़ सकते हैं ।
( १ ) यदि वे भूने जांय तो उनका पंचमांश बढ़ जाता है । भुने हुए मटर, धान और जौ दुगुने हो जाते हैं । पेरने पर अलसी में छटा भाग ही तेल निकलता है । निंबौरी, कुशा; आम की गुठली और कैथे में पाँचवां हिस्सा ही तेल निकलता है । तिल, कुसुम्भ, महुआ और इंगुदी में चौथा हिस्सा ही तेल निकलता है ।
( २ ) पाँच पल कपास और रेशम में एक पल सूत तैयार होता है ।
( ३ ) पाँच द्रोण ( २० आढक ) धान में से कूट-छाटकर जब बारह आढक चावल शेष रह जाता है तब वह हाथी के बच्चों के खाने योग्य होता है । वही बीस आढक धान अधिक साफ कर देने पर जब ग्यारह आढक बचा रह जाय तो उन्मत्त हाथियों के खाने योग्य; जब दसवाँ हिस्सा रह जाय तो राज-सवारी के हाथियों के खाने योग्य; जब नवाँ हिस्सा रह जाय तो युद्धोपयोगी हाथियों के खाने योग्य; आठवाँ हिस्सा रह जाय तो पैदल सेना के भोजन योग्य; जब सातवाँ हिस्सा रह जाय तो प्रधान सेनापति के योग्य; जब छठा हिस्सा रह जाय तो रानियों एवं राजकुमारों के भोजन योग्य और जब साफ करते-करते बीस आढक में से पाँच आढक ही बचा रह जाय तो वह राजाओं के भोजन योग्य होता है । अथवा उस बीस आढक में से साफ और साबूत एक प्रस्थ दाना निकालकर राजा के उपयोग के लिए लेना चाहिए ।
( ४ ) प्रस्थ का चौथा हिस्सा दाल, दाल का सोलहवां हिस्सा नमक, दाल का चौथा हिस्सा घी या तेल; इतना एक आर्य की भोजन-सामग्री है । छोटी स्थिति
११ कौ०
१६२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) मांसपलविंशत्या स्नेहार्धकुडुवः, पलिको लवणस्यांशः, क्षार-पलयोः, द्विधरणिकः कटुकयोगः, दध्नश्चार्धप्रस्थः ।
(२) तेनोत्तरं व्याख्यातम् । शाकानामध्यर्धगुणः, शुष्काणां द्विगुणः, स चैव योगः ।
(३) हस्त्यश्वयोस्तदध्यक्षे विधाप्रमाणं वक्ष्यामः । बलीवर्दानां माषद्रोणं यवानां वा पुलाकः । शेषमश्वविधानम् । विशेषो—घाणपिण्याकतुला कणकुण्डकं दशाढकं वा ।
(४) द्विगुणं महिषोष्ट्राणाम् । अर्धद्रोणं खरपृषतरोहितानाम् । आढकमेणकुरङ्गाणाम् । अर्धाधिकमजैलकवराहाणां द्विगुणं वा कणकुण्डकम् । प्रस्थौदनः शुनाम् । हंसक्रौञ्चमयूराणामर्धप्रस्थः । शेषाणामतो मृगपशुपक्षिव्यालानामेकभक्तादनुमानं ग्राहयेत् ।
के नौकरों के लिए प्रस्थ का षष्ठांश दाल, प्रस्थ का अष्टमांश घी या तेल और बाकी सामग्री पहिले जैसी होनी चाहिए । उसमें चौथाई भाग कम स्त्रियों के लिए और उसका आधा हिस्सा सामान बालकों के लिए होना चाहिए ।
(१) मांस पकाने के लिए बीस पल मांस में आधी कुडुव घी या तेल, एक पल नमक या नमक की जगह एक पल सज्जीखार या जवाखार, दो धरण मसाला, और आधा प्रस्थ (दो कुडुव) दही डालना चाहिए ।
(२) इससे कम-ज्यादा मांस पकाना हो तो उक्त अनुपात से ही उसमें सामान डालना चाहिए । हरे शाक में, मांस के लिए ऊपर जो अनुपात बताया गया है, उसकी ड्योढ़ी मात्रा उपयोग में लानी चाहिए । सूखे शाक अथवा सूखे मांस में वही सामग्री दुगुनी करके डालनी चाहिए ।
(३) हाथी और घोड़े की खुराक का वर्णन आगे चलकर 'अश्वाध्यक्ष' तथा 'हस्त्यध्यक्ष' प्रकरण में किया जायेगा । बैलों के लिए एक द्रोण उड़द तथा उतने ही अध उबले जौ देने चाहिए । बाकी खुराक उनकी घोड़ों की खुराक जैसी है । घोड़ों की अपेक्षा बैलों को सूखे तिलों के कल्क के सौ पल और दस आढक चावलों की बनी भूसी अधिक देनी चाहिये ।
(४) भैंसों और ऊँटों के लिए बैलों से दुगुनी खुराक होनी चाहिए । गधा और हिरणों को वही सामग्री आधा द्रोण (दो आढक) देनी चाहिए । एण और कुरंग जाति के हिरणों को वही भोजन एक आढक देना चाहिए । वही खुराक बकरी भेड़ ताथा सूअरों को आधा आढक; अथवा चावल की कनकी और भूसी मिलाकर एक आढक खुराक देनी चाहिए । कुत्तों को एक प्रस्थ भात देना चाहिए । हंस, क्रोंच और मोरों की आधा प्रस्थ खुराक है । इनके अतिरिक्त जंगली या पालतू जितने भी पशु
प्र० ३१ : अ० १५ ] कोष्ठागाराध्यक्ष के कर्तव्य १६३
(१) अङ्गारांस्तुषान् लोहकर्मान्तभित्तिलेप्यानां हारयेत् । कणिकाः दासकर्मकरसूपकाराणाम् । अतोऽन्यदौदनिकापूपिकेभ्यः प्रयच्छेत् ।
(२) तुलामानभाण्डं रोचनीदृषन्मुसलोलूखलकुट्टकरोचकयन्त्रपत्रकशूर्पचालनिकाकण्डोलीपिटकसम्मार्जन्यश्चोपकरणानि ।
(३) मार्जकारक्षकधारकमापकमापकदायकदापकशलाकाप्रतिग्राहकदासकर्मकरवर्गश्च विष्टिः ।
(४) उच्चैर्धान्यस्य निक्षेपो मूताः क्षारस्य संहताः ।
मृत्काष्ठकोष्ठाः स्नेहस्य पृथिवी लवणस्य च ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे कोष्ठागाराध्यक्षो नाम पञ्चदशोऽध्यायः,
आदितः पञ्चत्रिंशः ।
—: ० :—
पक्षी हैं, उनको एक दिन खिलाकर, उसी अनुपात से उनकी खुराक निर्धारित कर लेनी चाहिए ।
( १ ) कोयला, चोकर और भूसी आदि सामग्री लुहारों तथा मकान पोतने वालों को दे देनी चाहिए । चावलों की कनकी क्रीतदासों, दूसरे कर्मकरों तथा रसोइयों को दे देनी चाहिए । इसके अतिरिक्त जो कुछ बचे, वह साधारण अन्न पकाने वालों तथा पकवान बनाने वाले नौकरों में वितरित कर देना चाहिए ।
( २ ) भोजनालय में नियमित रूप से उपयोग में आनेवाली सामग्री की तालिका इस प्रकार है : तराजू, बाट, चक्की, सिल-लोढ़ा, मूसल, ओखली, धान कूटने का मूसल, आटा पीसने की चक्की, सूप, छलनी, कडी, पिटारी और झाडू ।
( ३ ) झाडू लगाने वाला, कोष्ठागार का रक्षक, तौलने वाला, तुलवाने वाला अधिकारी, समान देने वाला, देने वाला अधिकारी, बोझ उठाने वाला, क्रीतदास और चाकर, ये सब विष्टि कहलाते हैं ।
( ४ ) अनाज को जमीन के स्पर्श से ऊपर रखना चाहिए; गुड़ और राख आदि चीजें ऐसी जगह रखनी चाहिए, जहाँ सील न पहुँच सके; घी और तेल के रखने के लिए मृतदान या लकड़ी के पात्र होने चाहिये; और नमक को जमीन पर किसी बर्तन पर रख लेना चाहिए ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में कोष्ठागाराध्यक्ष नामक
पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ३२ |
|---|
| अध्याय १६ |
पण्याध्यक्षः
(१) पण्याध्यक्षः स्थलजलजानां नानाविधानां पण्यानां स्थलपथवारिपथोपयातानां सारफल्ग्वर्घान्तरं प्रियाप्रियता च विद्यात् । तथा विक्षेपसंक्षेपक्रयविक्रयप्रयोगकालान् ।
(२) यच्च पण्यं प्रचुरं स्यात्तदेकीकृत्यार्घमारोपयेत् । प्राप्तेऽर्घे वार्घान्तरं कारयेत् ।
(३) स्वभूमिजानां राजपण्यानामेकमुखं व्यवहारं स्थापयेत्, परभूमिजानामनेकमुखम् । उभयं च प्रजानामनुग्रहेण विक्रापयेत् । स्थूलमपि च लाभं प्रजानामौपघातिकं वारयेत् । अजस्रपण्यानां कालोपरोधं संकुलदोषं वा नोत्पादयेत् ।
पण्य का अध्यक्ष
(१) पण्य के अध्यक्ष को चाहिए कि वह स्थल-जल में उत्पन्न तथा स्थल-जलमार्ग से बिक्री के लिए आई हुई अनेक प्रकार की बहुमूल्य एवं अल्पमूल्य वस्तुओं के तारतम्य और उनकी लोकप्रियता ( माँग ) तथा अप्रियता ( अरुचि ) आदि के संबंध में अच्छी तरह जानकारी प्राप्त करे । उसको इस बात का भी पता होना चाहिए कि कम चीज को बढ़ाने, बढ़ी हुई को घटाने, बेची जाने योग्य वस्तु को खरीदने एवं खरीदी हुई वस्तु को बेच देने का उपयुक्त समय कौन है ।
(२) जो विक्रेय वस्तु अधिक तादात में उपलब्ध हो, पण्याध्यक्ष को चाहिए कि, उसे एकत्र कर व्यापार-कौशल से पहिले तो उसका दाम बढ़ा दे और जब समझ ले कि उसमें उचित लाभ हो गया है, तो फिर उसका भाव कम करके उसको बेचे ।
(३) अपने राज्य में उत्पन्न सरकारी वस्तुओं की बिक्री का प्रबंध एक ही जगह किसी नियत स्थान पर करना चाहिए । दूसरे देश में उत्पन्न वस्तुओं का विक्रय अनेक स्थानों में करना चाहिए । स्वदेश और परदेश की वस्तुओं की बिक्री का ऐसा प्रबंध करना चाहिए, जिससे प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट न हो । यदि किसी वस्तु में अधिक लाभ की संभावना हो, किन्तु उससे प्रजा को कष्ट पहुँचता हो, तो राजा को वह कार्य तत्काल रुकवा देना चाहिए । जल्दी ही बिक जाने योग्य वस्तुओं को रोके रखना अथवा उनको बेचने का ठेका किसी एक व्यक्ति को देकर पुनः लोभ-वश वह ठेका दूसरे को देना, सर्वथा अनुचित है ।
प्र० ३२ : अ० १७ ] पण्य का अध्यक्ष १६५
(१) बहुमुखं वा राजपण्यं वैदेहकाः कृतार्थं विक्रीणीरन् । छेदानुरूपं च वैधरणं दद्युः ।
(२) षोडशभागो मानव्याजी । विंशतिभागस्तुलामानम् । गण्यपण्यानामेकादशभागः ।
(३) परभूमिजं पण्यमनुग्रहेणावाहयेत् । नाविकसार्थवाहेभ्यश्च परिहारमायतिकमं दद्यात् । अनभियोगश्चार्थिष्वागन्तूनामन्यत्रसभ्योपकारिभ्यः ।
(४) पण्याधिष्ठातारः पण्यमूल्यमेकमुखं काष्ठद्रोण्यामेकच्छिद्रापिधानायां निदध्युः । अह्नश्चाष्टमे भागे पण्याध्यक्षस्यार्पयेयुः इदं विक्रीतमिदं शेषमिति । तुलामानभाण्डकं चार्पयेयुः । इति स्वविषये व्याख्यातम् ।
(५) परविषये तु—पण्यप्रतिपण्ययोरर्घं मूल्यं च आगमय्य शुल्कवर्त्तन्यातिवाहिकगुल्मतरदेयभक्तभाटकव्ययशुद्धमुदयं पश्येत् । असत्युदये भाण्डनिर्वहणेन पण्यप्रतिपण्यार्घेण वा लाभं पश्येत् । ततः सारपादेन स्थलव्यवहारमध्वना क्षेमेण प्रयोजयेत् । अटव्यन्तपालपुरराष्ट्रमुख्यैश्च प्रतिसंसर्गं गच्छेदनुग्रहार्थम् ।
( १ ) अनेक स्थानों पर बिकने वाली राजकीय वस्तुओं को सभी व्यापारी एक ही भाव से बेचें । यदि बेचते-बेचते मूल्य में कुछ कमी हो जाये तो उस कमी को व्यापारी ही पूरा करें ।
( २ ) गोदाम में सुरक्षित माल का सोलहवाँ भाग कर रूप में राजा को देना चाहिए; उसे व्याजी या मानव्याजी कहा जाता है । तौले जाने वाले माल का बीसवाँ भाग और गिने जाने वाले माल का ग्यारहवाँ भाग राजा के लिए कर में देना चाहिए ।
( ३ ) विदेशी माल को मँगाने में कर आदि की कुछ रियायत होनी चाहिए । नाव तथा जहाज आदि से माल मँगाने वाले व्यापारियों पर राजकर की छूट होनी चाहिए । विदेश से आये व्यापारियों को भी राजा बिना ही अभियोग ( प्रतिषेध ) के ऋण देने की व्यवस्था करे; किन्तु विदेशी व्यापारियों के सहयोगियों पर अभियोग होना चाहिए ।
( ४ ) राजकीय वस्तुओं को बेचने वाले व्यापारी, सायंकाल आठवें पहर में पण्याध्यक्ष के पास बिक्री का सब रुपया, लकड़ी की एक बंद संदूकची में रख कर उपस्थित हों, और बतायें कि इतना माल बिक गया है यथा इतना बाकी है । माप तौल के बाँटों को भी पण्याध्यक्ष के सुपुर्द कर दें । यहाँ तक अपने राज्य की विक्रेय वस्तुओं के संबंध में कहा गया है ।
( ५ ) परदेश में किस रीति से व्यापार किया जाता है, उसका विधान इस प्रकार है : निर्यात-व्यापार के संबंध में पण्याध्यक्ष को पहिली बात तो यह समझनी चाहिए कि स्वदेश तथा विदेश में बेची जाने वाली किन चीजों के मूल्य में परस्पर न्यूनाधिक्य है; इसके अतिरिक्त बिक्रीकर, सीमांत अधिकारी का टैक्स, सुरक्षा के
१६६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) आपदि सारमात्मानं वा मोक्षयेत् । आत्मनो वा भूमिमप्राप्तः सर्वदेयविशुद्धं व्यवहरेत् ।
(२) वारिपथे च यानभाटकपथ्यदनपण्यप्रतिपण्यार्घप्रमाणयात्राकाल-भयप्रतीकारपण्यपत्तनचारित्राण्युपलभेत ।
(३) नदीपथे च विज्ञाय व्यवहारं चरित्रतः ।
यतो लाभस्ततो गच्छेदलाभं परिवर्जयेत् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे पण्याध्यक्षो नाम षोडशोऽध्यायः,
आदितः षट्त्रिंशः ।
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लिए पुलिस को मार्गकर, जंगल के रक्षक का कर, नदी पार करने का कर, अपने भोजनादि का व्यय और भाड़ा आदि निकाल कर कितना बच सकेगा; इस पर भी विचार करे । इस प्रकार हिसाब लगाने पर कुछ बचत न दीख पड़े तो अपने माल को विदेश में ले जाकर, भविष्य में लाभ की प्रतीक्षा करते हुए, उसके विक्रय की व्यवस्था करे; अथवा अपने माल से वहाँ के लोकप्रिय माल को बदल कर उस रूप में अपने लाभ की बात सोचे । यदि विचारित योजना सफल होती दिखाई दे तो लाभ का चौथा भाग व्यय करके सुरक्षित स्थल मार्ग के द्वारा व्यापार करना आरंभ कर दे । जंगल तथा सीमा के रक्षकों से, नगर-प्रधान और राष्ट्र के प्रतिष्ठित पुरुषों से घनिष्ठता बढ़ानी चाहिए, जिससे कि व्यापार में कोई बाधा न आने पावे ।
( १ ) विदेश मे व्यापार करते हुए यदि आपत्ति आ पड़े तो सर्वप्रथम रत्नों की और अपनी रक्षा करनी चाहिए । यदि दोनों की रक्षा संभव न हो तो रत्नों का लोभ छोड़ कर वह अपने को बचाये । जब तक वह अपने देश में न लौट आवे तब तक वहाँ के जो सरकारी टैक्स हो उनको नियमपूर्वक अदा करते हुए अपने व्यापार को संभाले रखे ।
( २ ) जल-मार्ग से व्यापार करने वाले व्यापारी को यानभाटक ( नाव तथा जहाज का किराया ); पथ्यदन ( मार्ग में खाने-पीने का खर्च ), पण्य तथा प्रतिपण्य के मूल का प्रमाण ( अपनी तथा पराई विक्रेय वस्तु के मूल्य का तारतम्य ), यात्रा-काल ( किस ऋतु में यात्रा करनी चाहिए, उसकी अवधि ), भयप्रतीकार ( चोर आदि से सुरक्षा के उपाय ), और गंतव्य देश के आचार-व्यवहारों की जानकारी आदि के संबंध में बारीकी से विचार करने के अनंतर ही यात्रा करनी चाहिए ।
( ३ ) इसी प्रकार नदी मार्ग के संबंध मे भी उक्त बातों को ध्यान में रखकर, गंतव्य देश के आचार-विचार, चरित्र आदि का ज्ञान प्राप्त कर, जिस मार्ग से अधिक लाभ की संभावना हो उसी का अनुसरण करे; जहां लाभ की आशा न हो, और कष्ट भी अधिक मिले, उस मार्ग को छोड़ देना चाहिए ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में पण्याध्यक्ष नामक सोलहवां अध्याय समाप्त ।
— : ० : —
| प्रकरण ३३ | कुप्याध्यक्षः |
|---|---|
| अध्याय १७ |
(१) कुप्याध्यक्षो द्रव्यवनपालैः कुप्यमानाययेत् । द्रव्यवनकर्मान्तांश्च प्रयोजयेत् द्रव्यवनच्छिदां च देयमत्ययं च स्थापयेदन्यत्रापद्भ्यः ।
(२) कुप्यवर्गः—शाकतिनिशधन्वनार्जुनमधूकतल कसा लशिश पारिमे-दराजादनशिरीषखदिरसरलतालसर्जश्वकर्णसोमवल्ककश। म्नप्रियकधवादिः सारदारुवर्गः ।
(३) उटजचिमियचापवेणुवंश सातीनकण्टकभाल्लूकादिर्वेणुवर्गः ।
(४) वेत्रशीकवल्लीवाशीश्यामलतानागलतादिर्वल्लीवर्गः ।
कुप्य का अध्यक्ष
( १ ) कुप्य के अध्यक्ष को चाहिए कि वह जंगल की रक्षा में नियुक्त पुरुषों द्वारा बढ़िया-बढ़िया लकड़ी मंगवाये । लकड़ी से बनने योग्य दूसरे कार्यों को भी वही करवाये । लकड़ी काटकर जीविकोपार्जन करने वाले लोगों को वह वेतन पर नियुक्त कर ले और आज्ञा का उल्लंघन करने पर उनके लिए दण्ड भी निर्धारित कर ले; किन्तु किसी आपत्ति के कारण कार्य में विघ्न उपस्थित हो जाय तो उन्हें दण्ड न दिया जाय ।
( २ ) कुप्यवर्ग में सर्वप्रथम सारदारु वर्ग ( सर्वोत्तम लकड़ी ) का निरूपण किया जाता है : शाक ( सागून ), तिनिश ( तैहुँआ ), धन्वस ( पीपल ), अर्जुन, मधुक ( महुआ ), तिलक ( फरास ), साल, शिंशपा ( शीशम ), अरिमेद ( दुर्गन्धित खैर ), राजादन ( खिरनी ), शिरीष ( सिरसा ), खदिर ( खैर ), सरल ( देवदारु) ताल ( ताड़ ), सर्ज ( साल ), अश्वकर्ण ( बड़ा साल ), सोमवल्क ( सफेद खैर ), कश ( बबूल ), आम्र, प्रियक ( कदंब ), धव ( गूलर ) आदि सर्वोत्तम लकड़ी सारदारुवर्ग के अन्तर्गत हैं ।
( ३ ) उटज ( खोखला ), चिमिय ( ठोस ), चाप ( कुछ पोला और ऊपर से खुरदरा ), वेणु ( चिकना, पोला ), वंश ( लंबी पोरियों वाला ), सातीन, कंटक ( दोनों काँटेदार ) और भाल्लूक ( मोटा, लंबा, कंटकरहित ), ये सब बाँसों के भेद हैं ।
( ४ ) वेत्र ( बेंत ), शीकबल्ली ( हंसबल्ली ), वाशी ( सफेद फूलों की लता), श्यामलता ( काली लता ), नागलता, ( नागबल्ली ) आदि सब लताओं के भेद हैं ।
| १६८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
|---|
(१) मालतीमूर्वार्कशणगवेथुकातस्यादिर्वल्कवर्गः ।
(२) मुञ्जबल्बजादि रज्जुभाण्डम् । तालीतालभूर्जानां पत्रम् । किंशुककुसुम्भकुङ्कुमानां पुष्पम् ।
(३) कन्दमूलफलादिरौषधवर्गः ।
(४) कालकूटवत्सनाभहालाहलमेषशृङ्गमुस्ताकुष्ठमहाविषवेल्लितक-गौराद्र्रबालकमार्कंटहैमवतकालिङ्गकदारदकाङ्कोलगरक्रोष्ट्रकादीनि विषाणि ।
(५) सर्पाः कीटाश्च । त एव कुम्भगताः । विषवर्गः ।
(६) गोधासेरकद्वीपिंशिशुमारसिंहव्याघ्रहस्तिमहिषचमरसृमरखड्ग-गोमृगगवयानां चर्मास्थिपित्तस्नावस्थ-( ? )-दन्तशृङ्गखुरपुच्छानि अन्येषां वापि मृगपशुपक्षिव्यालानाम् ।
(७) कालायसताम्रवृत्तकांस्यसीसत्रपुवैकृन्तकारकूटानि लोहानि ।
( १ ) मालती ( चमेली ), मूर्वा ( मरोरफली ), अर्क ( आक ), शण (सन), गवेथुका ( नागवला ) और अतसी ( अलसी ), आदि वल्कवर्ग के हैं ।
( २ ) मुंज ( मूंज ), बल्वज ( लवा घास ), ये रज्जु, अर्थात् रस्सी बनाने बनाने की घासें हैं । ताली ( ताड़ का एक भेद ), ताल ( ताड़ ),भूर्ज ( भोजपत्र ), इनका पत्ता लिखने के काम में आता है । किंशुक ( पलाश के फूल ), कुसुम्भ ( कुसुम के फूल ), और कंकुम ( केसर ), ये सब वस्त्र आदि रंगने के साधन हैं ।
( ३ ) कंद ( बिदारी, सूरण आदि ), मूल ( अनंतमूल, कामराज, खस आदि ), और फल ( आंवला, हर्रा, बहेडा आदि ), ये सब औषधिवर्ग हैं ।
( ४ ) कालकूट, वत्सनाभ, हलाहल, मेषशृङ्ग, मुस्ता, कुष्ठ, महाविष, वेल्लितक, गोराद्रं, बालक, मार्केट, हैमवत, कलिगक, दारदक, अङ्कोलसारक और कुष्ट्रक इत्यादि सब विष हैं ।
( ५ ) धारीदार साँप, मेंढक तथा छिपकली आदि को सीसे के घड़े में बन्द करके आगे आने वाले 'औपनिषदिक' प्रकरण में लिखी गई विधि के अनुसार जब संस्कार किया जाता है तो वह भी विष बन जाते हैं ।
( ६ ) गोधा ( गोह ), सेरक ( सफद गोह ) द्वीपी ( वघेरा ), शिशुमार (बड़ी जाति की मछली ), सिंह, व्याघ्र, हाथी, भैंसा, चमरगाय, साँभर, गैंडा, गाय, हरिण और नीलगाय इनकी खाल, हड्डी, दाँत पित्ता, नसें, सींग, खुर और पूंछ आदि सभी उपयोग में आने वाली चीजें संग्रह-योग्य हैं; इनके अतिरिक्त अन्य मृग, पशु-पक्षी, साँप आदि जानवरों के चर्म का भी संग्रह करना चाहिए ।
( ७ ) काला लोहा, तांबा, काँसा, सीसा, राँगा, इस्पात और पीतल, ये सब लोहे के भेद हैं ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में कुप्याध्यक्ष सत्रहवां अध्याय समाप्त ।
प्र० ३३ : अ० १७ ] कुप्य का अध्यक्ष १६९
(१) विदलमृत्तिकामयं भाण्डम् ।
(२) अङ्गारतुषभस्मानि मृगपशुपक्षिव्यालवाटाः काष्ठतृणवाटाश्चेति ।
(३) बहिरन्तरश्च कर्मान्ता विभक्ताः सर्वभाण्डिकाः ।
आजीवपुररक्षार्थाः कार्याः कुप्योपजीविना ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे कुप्याध्यक्षो नाम सप्तदशोऽध्यायः,
आदितोः सप्तत्रिंशः ।
—: ० :—
( १ ) पात्र दो प्रकार के होते हैं एक विदलमय ( पिटारी, टोकरी आदि ) और दूसरे मृत्तिकामय ( घड़े, शकोरे आदि ) ।
( २ ) कोयला, राख, मृग, पशु-पक्षी तथा अन्य जंगली जानवर, लकड़ी और घास-फूस आदि का ढेर भी कुप्य होने के कारण सङ्ग्रह-योग्य हैं ।
( ३ ) कुप्य के अध्यक्ष को और उसके सहयकों को चाहिए कि वे बाहर जंगलों के पास जनपद और दुर्ग आदि में गाड़ा तथा लकड़ी आदि से बनी हुई चीजें या सवारियों; सब तरह के बर्तन आदि को और अपनी आजीविका तथा नगर, जनपद की रक्षा के लिए अन्य आवश्यक वस्तुओं का भी संग्रह करे ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में कुप्याध्यक्ष सत्रहवां अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ३४ | ## आयुधागाराध्यक्षः |
|---|---|
| अध्याय १८ |
(१) आयुधागाराध्यक्षः साङ्ग्रामिकं दौर्गकर्मिकं परपुराभिघातिकं यन्त्रमायुधमावरणमुपकरणं च तज्जातकारुशिल्पिभिः कृतकर्मप्रमाणकालवेतनफलनिष्पत्तिभिः कारयेत् । स्वभूमौ च स्थापयेत् । स्थानपरिवर्तनमातपप्रवातप्रदानं च बहुशः कुर्यात् । ऊष्मोपस्नेहकृमिभिरुपहन्यमानमन्यथा स्थापयेत् । जातिरूपलक्षणप्रमाणागममूल्यानिक्षेपैश्चोपलभेत ।
(२) सर्वतोभद्रजामदग्न्यबहुमुखविश्वासघातिसङ्घाटीयानकपर्जन्यकबाहूर्ध्वबाह्वर्धबाहूनि स्थितयन्त्राणि ।
आयुधागार का अध्यक्ष
( १ ) आयुधागार के अध्यक्ष को चाहिए कि वह, युद्धोपयोगी सामग्री तैयार करने वाले कारीगरों एवं कुशल शिल्पियों के द्वारा युद्ध में काम देने वाले, दुर्ग की रक्षा के योग्य शत्रु के नगर को विध्वंस कर देने वाले सर्वतोभद्र ( मशीनगन ), जामदग्न्य आदि यन्त्र, शक्ति, धनुष आदि हथियार कवच और सवारी आदि जितने भी साधन हैं, उनका निर्माण करवाये; उन कारीगरों से कितने समय में कितनी मजदूरी देकर कितना काम कराया जाय इत्यादि बातों को वह पहिले ही से निश्चित कर ले । तैयार हुए सामान को उसके उपयुक्त स्थान में रखवा दिया जाय अथवा अपने ही कब्जे में रखा जाय । अध्यक्ष को चाहिए कि जिससे समान पर जंक आदि न लगे, उसको धूप-हवा भी दिलाता रहे, गर्मी, सील और घुन आदि के कारण जो हथियार खराब हो रहे हों उन्हें वहां से उठवा कर किसी ऐसे स्थान में रखवा दे, कि वे अधिक खराब न होने पावें, उन हथियारों के जाति स्वरूप, लक्षण, लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई प्राप्तिस्थान मूल्य और उपयुक्त स्थान आदि के सम्बन्ध में प्रत्येक बात को अच्छी तरह से समझ-बूझ ले ।
( २ ) दश प्रकार के स्थितयंत्र होते हैं, जिनका विवरण इस प्रकार है : १. सर्वतोभद्र ( मशीनगन ), २. जामदग्न्य ( जिसमें बीच के छेद से बड़े-बड़े गोले निकलें ), ३. बहुमुख ( किले की दीवारों में ऊँचाई पर बनाये गये वे स्थान, जहां से सैनिक गोलीवर्षा कर सकें ), ४. विश्वासघाती ( नगर के बाहर तिरछी बनावट का एक ऐसा यन्त्र, जिसको छू लेने से ही प्राणान्त हो जाय ), ५. संघाटि ( लंबे-ऊँचे बांसों से बना हुआ वह यंत्र, जो महलों के ऊपर रोशनी फेंके ), ६. यानक
प्र० ३४ : अ० १८ ] आयुधागार का अध्यक्ष १७१
(१) पञ्चालिकदेवदण्डसूकरिकामुसलयष्टिहस्तिवारकतालवृन्तमुद्गर-द्रुघणगदास्पृक्तलाकुद्दालास्फोटिमोद्घाटिमोत्पाटिमशतघ्नीत्रिशूलचक्राणि चलयन्त्राणि।
(२) शक्तिप्रासकुन्तहाटकभिण्डिपालशूलतोमरवराहकर्णकणपकर्पण-त्रासिकादीनि च हलमुखानि।
( पहियों पर रखा जाने वाला लम्बा यन्त्र ), ७. पर्जन्यक ( वरुणास्त्र, फायर ब्रिगेड ), ८. बाहुयन्त्र ( पर्जन्यक की भाँति; किन्तु उसका आधा ), ६. ऊर्ध्वबाहु ( ऊपर स्तंभ की आकृति का नजदीक की मार करने वाला यन्त्र ) और १०. अर्धबाहु ( ऊर्ध्वबाहु का आधा )।
( १ ) चलयंत्र भी अनेक हैं, जिनका व्योरा इस प्रकार है : १. पाञ्चलिक ( बढ़िया लकड़ी पर तेज धार का बना यन्त्र, जो परकोटे के बाहर जल के बीच में शत्रु को रोकने के काम में आता है ), २. देवदण्ड ( कील रहित बड़ा भारी स्तम्भ, जो परकोटे के ऊपर रखा रहता है ), ३. सूकरिका ( सूत और चमड़े की या बाँस और चमड़े की बनी मशकरी, जो परकोटे तथा अट्टालक के ऊपर ढक कर रखी जाती है ), ४. मुसलयष्टि ( खैर की मूसल का बना हुआ डंडा, जिसके आगे शूल लगा हो ), ५. हस्तिवारक ( त्रिशूल या त्रिशूल डण्डा ), ६. तालवृन्त ( चारों ओर घूमने वाला यन्त्र ), ७. मुद्गर, ८. द्रुघण ( मुद्गर के ही समान यन्त्र ), ६. गदा, १०. स्पृक्तला ( काँटेदार गदा ), ११. कुद्दाल, १२. आस्फोटिम ( चमड़े से बना हुआ चार कोना वाला, मिट्टी के ढेले या पत्थर फेंकने वाला यन्त्र ), १३. उद्घाटिम ( मुद्गर की आकृति का यन्त्र ), १४. उत्पाटिम ( खंभे आदि को उड़ा देने वाला यन्त्र ), शतघ्नी ( कीले की दीवार के ऊपर रखा जाने वाला बड़े स्तम्भ की आकृति का यन्त्र ), १५. त्रिशूल और १६. चक्र, ये सोलह प्रकार के चलयन्त्र है।
( २ ) हलमुख ( भाले की तरह ) हथियारों के नाम इस प्रकार हैं : १. शक्ति ( कनेर के पत्ते की आकृति का लोहे का बना हथियार ), १. प्रास ( चौबीस अंगुल लम्बा, दुधारा हथियार, जिसकी मूठ बीच में लकड़ी की बनी हो ), ३. कुंत ( सात हाथ का उत्तम, छह हाथ का मध्यम और पाँच हाथ का निकृष्ट ), ४. हाटक ( कुंत के समान तीन कांटों वाला हथियार ), ५. भिण्डिपाल ( मोटे फल वाला, कुन्त के समान ), ६. शूल ( तेज मुख वाला हथियार ), ७. तोमर ( बाण के समान तेज मुख वाला, जो चार हाथ का अधम, साढ़े चार हाथ का मध्यम और पांच हाथ का उत्तम समझा जाता है ), ८. वराहकर्ण ( एक प्रकार का प्रास, जिसका मुख सुअर के कान के समान होता है ), ६. कणप ( लोहे का बना हुआ, दोनों ओर तीन-तीन कांटों से युक्त, चौबीस, बाईस और बीस अंगुल का क्रमशः उत्तम, मध्यम एवं अधम ), १०. कर्पण ( तोमर के समान, हाथ से फेंका जाने वाला बाण ), ११.
| १७२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
|---|
(१) तालचापदारवशाङ्गीणि कार्मुककोदण्डद्रूणा धनूंषि ।
(२) मूर्वार्कशणगवेधुवेणुस्नायूनि ज्याः ।
(३) वेणुशरशलाकादण्डासननाराचाश्च इषवः । तेषां मुखानि छेदन-भेदनताडनान्यायसास्थिदारवाणि ।
(४) निस्त्रिंशमण्डलाग्रासियष्टयः खड्गाः । खड्गमहिषवारणविषाणदारुवेणूमूलानि त्सरवः ।
(५) परशुकुठारपट्टसखनित्रकुद्दालक्रकचकाण्डच्छेदनाः क्षुरकल्पाः ।
(६) यन्त्रगोष्पणमुष्टिपाषाणरोचनीदृषदश्चायुधानि ।
(७) लोहजालजालिकापट्टकवचसूत्रकङ्कटशिशुमारखड्गधेनुकहस्तिगोचर्मखुरभृङ्गसंघातं वर्मणि । शिरस्त्राणकण्ठत्राणकूर्पासकञ्चुकवारवाण-
त्रासिका ( प्रास जितनी, सम्पूर्ण लोहे की बनी ); ये सब हथियार हलमुख कहलाते हैं, क्योंकि इन सभी का अग्रभाग हल के अग्रभाग की तरह तेज होता है ।
( १ ) धनुष चार प्रकार से बनाये जाते हैं : १. ताल ( ताड़ का बना हुआ ), २. चाप ( अच्छे बाँस का बना हुआ ), ३. दारव ( मजबूत लकड़ी का बना हुआ ) और ४. शाङ्ग ( सींगों का बना हुआ ); आकृति और क्रिया-भेद से इनके कार्मुक, कोदण्ड और द्रूण, आदि नाम हैं ।
( २ ) मूर्वा, आख सन, गवेधुकावेणु ( रामबाँस ) और ताँत; इनसे मजबूत धनुष की डोरी बनती है ।
( ३ ) बाण के भी अनेक भेद हैं, जिनके प्रकार हैं : १. वेणु ( बाँस ), २. शर ( नरसल ), ३. शालाका ( मजबूत लकड़ी ), ४. दण्डासन ( आधा लोहा और आधा बाँस ) और ५. नाराच ( सम्पूर्ण लोहे का ) । इन बाणों के अग्रभाग में लोहे, हड्डी तथा मजबूत लकड़ी की बनी नोक छेदने, काटने, आघात पहुँचाने वाला रक्त-सहित एवं रक्तरहित घाव करने के लिए लगी रहती है ।
( ४ ) खड्ग ( तलवार ) तीन प्रकार के होते हैं : १. निस्त्रिंश ( जिसका अगला भाग काफी टेढ़ा हो ), २. मण्डलाग्र ( जिसका अगला हिस्सा कुछ गोलाकार हो ) और ३. असियष्टि ( जिसका आकार पतला एवं लम्बा हो ) । खड्ग के लिए गैंडा, भैंस की सींग, हाथीदाँत, मजबूत लकड़ी और बाँस की जड़ की मूठ बनवानी चाहिए ।
( ५ ) फरसा, कुल्हाड़ा, द्विमुखी त्रिशूल, फावड़ा, कुदाल, आरा और गँड़ासा; ये सब छुरे की धार की भाँति तेज होने के कारण क्षुरकल्प या क्षुरवर्ग के हथियार कहलाते हैं ।
( ६ ) यन्त्रपाषाण, गोष्पणपाषाण, मुष्टिपाषाण, रोचनी और दृषद; ये सब आयुध कहलाते हैं ।
( ७ ) कवच छह प्रकार से बनाये जाते हैं, जिनके तरीके इस प्रकार हैं : १. लोहजाल ( सिर से पैर तक ढकने वाला ), २. लोहजालिका सिर के अलावा सारे
प्र० ३४ : अ० १८ ] आयुधागार का अध्यक्ष १७३
पट्टनागोदरिकाः । पेटीचर्महस्तिकर्णतालमूलधमनिकाकवाटकटिकाप्रति-
हतवलाहकान्ताश्चावरणानि ।
(१) हस्तिरथवाजिनां योग्याभाण्डमालङ्कारिकं सन्नाहकल्पनाश्रोप-
करणानि । ऐन्द्रजालिकमौपनिषदिकं च कर्म ।
(२) कर्मान्तानां च,
इच्छामारम्भनिष्पत्तिं प्रयोगं व्याजमुद्दयम् ।
क्षयव्ययौ च जानीयात् कुप्यानामायुधेश्वरः ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे आयुधागाराध्यक्षो नाम अष्टादशोऽध्यायः;
आदितोऽष्टचत्वारिंशः ।
—: ० :—
शरीर को ढकने वाला ), ३. लोहपट्ट ( बाहों को छोड़ सारे शरीर को ढक देने वाला ), ४. लोहकवच ( केवल पीठ तथा छाती को ढक देने वाला ), ५. सूत्रकंकण ( सूत का बना कवच ) और ६. मछली, गैंडा, नीलगाय, हाथी तथा बैल, इन पाँचों के चमड़े, खुर एवं सींगों को मिलाकर बनाया हुआ कवच । इनके अतिरिक्त शिरस्त्राण ( सिर को ढक देने वाला ), कंठत्राण ( गले को ढक देने वाला ) कूर्पास ( आधी बाँहों को ढक देने वाला ), कंचुक ( घुटनों तक शरीर को ढक देने वाला ), वारवाण (सारी देह को ढक देने वाला ), पट्ट ( बिना बाहों एवं बिना लोहे का कवच ), नागोदरिका ( केवल हाथ की उङ्गलियों की रक्षा करने वाला ); ये सात प्रकार के आवरण ( कवच ) देह पर धारण किए जाने योग्य हैं । चमड़े की पेटी, मुँह ढकने का आवरण, लकड़ी की पेटी, सूत की पेटी, लकड़ी का पट्टा, चमड़ा एवं बाँस को कूट कर बनाई गई पेटी, पूरे हाथों को ढकने वाला आवरण और किनारों पर लोहे के पत्तों से बँधा आवरण; आदि अनेक प्रकार के होते हैं ।
( १ ) हाथी, घोड़ा, रथ आदि की शिक्षा एवं सजावट के साधन; अंकुश, कोड़े, पताका, कवच और शरीर की रक्षा करने वाले अन्य आवरण; ये सब उपकरण कहलाते हैं । ऐन्द्रजालिक और औपनिषदिक आदि जादू एवं प्रयोग-क्रियायें भी उपकरण कहलाती हैं ।
( २ ) कुप्य के अध्यक्ष को चाहिए कि वह पिछले दो अध्यायों में निर्दिष्ट द्रव्य-व्यापारों से सम्बद्ध कार्यों का आरम्भ एवं उनकी समाप्ति राजा की इच्छा तथा रुचि के अनुसार ही करे; उन विषयों और कार्यों की उपयोगिता, तथा हानि-लाभ को भी वह भलीभाँति समझे; आयुधागार के अध्यक्ष के लिए भी इन बातों का जानना आवश्यक है ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में आयुधागाराध्यक्ष नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ३५ | # तुलामानपौतवम् |
|---|---|
| अध्याय १९ |
(१) पौतवाध्यक्षः पौतवकर्मान्तान् कारयेत् ।
(२) धान्यमाषा दश सुवर्णमाषकः । पञ्च वा गुञ्जाः । ते षोडश सुवर्णः कर्षो वा । चतुष्कर्षं पलम् ।
(३) अष्टाशीतिगौरसर्षपा रूप्यमाषकः । ते षोडश धरणम् । शैम्ब्यानि वा विंशतिः ।
(४) विंशतितण्डुलं वज्रधरणम् ।
तोल और माप का अध्यक्ष
( १ ) पौतवाध्यक्ष (तोल-माप की जांच करने वाला सरकारी अफसर) को चाहिये कि वह शास्त्रोक्त विधि से तोलने-मापने के साधन तराजू, बाट आदि बनवाये ।
( २ ) दस उड़द के दाने अथवा पाँच रत्ती परिमाण का एक सुवर्णमाषक होता है । सोलह माष का एक सुवर्ण या एक कर्ष होता है । चार कर्ष का एक पल होता है; अर्थात् :
सोने का तोल
$$\left.\begin{array}{l} \text{१० उर्द के दाने} \ \text{५ रत्ती} \end{array}\right} = \text{१ सुवर्णमाषक}$$
१६ माष = १ सुवर्ण या १ कर्ष
४ कर्ष = १ पल
( ३ ) अठ्ठासी सफेद सरसों परिमाण का एक रूप्यमापक होता है । सोलह रूप्यमापक या बीस मूली के बीज परिमाण का एक धरण होता है; जैसे :
चाँदी का तोल
८८ सफेद सरसों = १ रूप्यमाषक
$$\left.\begin{array}{l} \text{१६ रूप्यमाषक} \ \text{२० मूली के बीज} \end{array}\right} = \text{१ धरण}$$
( ४ ) बीस चावल परिमाण का एक वज्रधरण होता है :
हीरे का तोल
२० चावल = १ वज्रधरण
प्र० ३५ : अ० १६ ] तौल और माप का अध्यक्ष १७५
(१) अर्धमाषकः, माषकः, द्वौ, चत्वारः, अष्टौ माषकाः, सुवर्णो, द्वौ, चत्वारः, अष्टौ सुवर्णाः, दश, विंशतिः, चत्वारिंशत्, शतमिति ।
(२) तेन धरणानि व्याख्यातानि ।
(३) प्रतिमानान्वयोमयानि मागधमेकलशैलमयानि, यानि वा नोदक-प्रदेहाभ्यां वृद्धिं गच्छेयुरुष्णेन वा ह्रासम् ।
(४) षडङ्गुलादूर्ध्वमष्टाङ्गुलोत्तराः दश तुलाः कारयेल्लोहपलादूर्ध्व-कपलोत्तराः । यन्त्रमुभयतः शिक्यं वा ।
(५) पञ्चविंशत्पललोहां द्विसप्तत्यङ्गुलायामां समवृत्तां कारयेत् । तस्याः पञ्चपलिकं मण्डलं बद्ध्वा समकरणं कारयेत् । ततः कर्षोत्तरं पलं, पलोत्तरं दशपलं, द्वादश पञ्चदश विंशतिरिति पदानि कारयेत् । तत आ शताद् दशोत्तरं कारयेत् । अक्षेषु नद्ध्त्रीपिनद्धं कारयेत् ।
( १ ) तोलने के बाटों ( प्रतिमानों ) का निर्माण इस क्रम से होना चाहिए : आधा माषक, माषक, दो माषक, चार माषक, आठ माषक, सुवर्ण, दो सुवर्ण, चार सुवर्ण, आठ सुवर्ण, दस सुवर्ण, बीस सुवर्ण, तीस सुवर्ण, चालीस सुवर्ण, सौ सुवर्ण, सोना तोलने के लिए ये १४ बाट होने चाहिए ।
( २ ) इसी क्रम से चांदी तोलने के लिए धरण एवं रूप्यमाषक बाटों का भी निर्माण करवाना चाहिए; अर्थात् धरण, दो धरण, चार धरण, आठ धरण, दस धरण, बीस धरण, तीस धरण, चालीस धरण और सौ धरण; एवं अर्ध माषक, माषक, दो माषक, चार माषक, आठ माषक; आदि १४ बाटों का क्रम है ।
( ३ ) तौलने के बाट लोहे के बनने चाहिए या मगध तथा मेकल देश के पत्थर के होने चाहिए; या ऐसी-वस्तुओं के बनने चाहिए, जो पानी पड़ने तथा लेप लगने से वजनी न हो जांय और गर्मी के प्रभाव से हलके न पड़ जांय ।
( ४ ) सोना-चांदी तोलने के लिये छोटी-बड़ी दस तुलाऐं बनवानी चाहिए, जिनका क्रम इस प्रकार है १. छह अंगुल की, २. चौदह अंगुल की, ३. बाईस अंगुल की, ४. तीस अंगुल की ५. अड़तीस अंगुल की, ६. छियालीस अंगुल की, ७. चौवन अंगुल की, ८. बासठ अंगुल की, ६. सत्तर अंगुल की और १०. अठहत्तर अंगुल की; उनका वजन क्रमशः एक पल से १० पल तक होना चाहिए; उनके दोनों ओर पलड़े ( शिक्य ) लगे होने चाहिए ।
( ५ ) सोना-चांदी के अतिरिक्त दूसरे पदार्थों को तोलने के लिए जो तुलायें बनवायी जाँय, उनका आकार-प्रकार इस तरह होना चाहिए; पैतीस पल लोहे से बनी हुई, तीन हाथ लंबी समवृत्ता ( गोलाकार ) नामक तुला अन्य पदार्थों को तोलने के लिए बनवानी चाहिए । उसके बीच में पाँच पल का काँटा लगवाकर ठीक मध्य में एक चिह्न भी करवा देना चाहिए । उसके बाद काँटे की गोलाकार परिधि में उस चिह्न से क्रमशः एक कर्ष, दो कर्ष, तीन कर्ष, चार कर्ष, एक पल, दो पल,
१७६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) द्विगुणलोहां तुलामतः षण्णवत्यङ्गुलायामां परिमाणीं कारयेत् । तस्याः शतपदादूर्ध्वं विंशतिः, पञ्चाशत्, शतमिति पदानि कारयेत् ।
(२) विंशतितौलिको भारः ।
(३) दशधरणिकं पलम् । तत्पलशतमायमानी ।
(४) पञ्चपलावरा व्यावहारिकी भाजन्यन्तःपुरभाजनी च ।
(५) तासामर्धधरणावरं पलम् । द्विपलावरमुत्तरलोहम् । षडङ्गुलावराश्चायामाः ।
इस प्रकार दस पल तक; दस पल के बाद बारह पल, पन्द्रह पल और बीस पल के चिह्न लगवाये जाँय । फिर बीस पल के आगे दस-दस पल का अन्तर देकर सौ पल तक के चिह्न होने चाहिए । प्रत्येक पाँच पल के बाद, मोटी जानकारी के लिये, लम्बी रेखा बनवा देनी चाहिए ।
( १ ) उक्त समवृत्ता तुला से दुगुने लोहे ( सत्तर पल परिमाण ) से बनी छियानवे अंगुल लम्बी तुला का नाम परिमाणी है । उस पर भी समवृत्ता नामक तुला के ही अनुसार सौ पल तक चिह्न लगाने के बाद एक सौ बीस, एक सौ पचास और दो सौ पल तक के चिह्न और लगने चाहिए ।
( २ ) सौ पल परिमाण की एक तुला और बीस तुला परिमाण का एक भार होता है, यथा :
१०० पल = १ तुला
२० तुला = १ भार
( ३ ) दस धरण का एक पल और सौ पल परिमाण की आयमानी नामक तुला होती है, आयमानी अर्थात् आमदनी की वस्तुओं को तोलनेवाली तुला । जैसे :
१० धरण = १ पल
१०० पल = १ आयमानी
( ४ ) आयमानी से पाँच पल कम ( ९५ पल ) परिमाण की तुला का नाम व्यावहारिकी ( क्रय-विक्रय में व्यवहार योग्य ) है, उससे पाँच पल कम (९० पल) की तुला का नाम भाजनी ( भृत्यों को द्रव्य देने योग्य ), और उससे भी पाँच पल कम ( ८५ पल ) परिमाण की तुला का नाम अन्तःपुरभाजनी ( रानी एवं राजकुमारों को द्रव्य देने योग्य ) है, अर्थात्
९५ पल = १ व्यावहारिकी
९० पल = १ भाजनी
८५ पल = १ अन्तःपुरभाजनी
( ५ ) व्यावहारिकी, भाजनी और अन्तःपुरभाजनी, इन तीनों तुलाओं में उत्तरोत्तर आधा-आधा धरण कम हो जाता है । अर्थात् आयमानी तुला में दस धरण का एक पल होता है तो व्यावहारिकी का ९½ धरण का एक पल भाजनी का ९ धरण का एक पल और अन्तःपुरभाजनी का ८½ धरण का एक पल होना चाहिए । इसी प्रकार इन तुलाओं के बनाने में लोहा भी उत्तरोत्तर दो-दो पल कम लगना