कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
About this granth
The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.
This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.
प्र० २८ : अ० १२ ] खनिज सम्बन्धी कार्य १३७
(१) तत्प्रतिरूपकमुग्रगन्धरसं शिलाजतु विद्यात् ।
(२) पीतकास्ताम्रकास्ताम्रपीतका वा भूमिप्रस्तरधातवो भिन्ना नील-राजीमन्तो मुद्गमाषकृसरवर्णा वा दधिबिन्दुपिण्डचित्रा हरिद्राहरीतकी-पद्मपत्रशैवलयकृत्प्लीहानवद्यवर्णा भिन्ना श्लक्ष्णबालुकालेखाबिन्दुस्वस्तिक-वन्तः सगुलिका अर्चिष्मन्तस्तप्यमाना न भिद्यन्ते बहुफेनधूमाश्च सुवर्ण-धातवः प्रतीवापार्थास्ताम्ररूप्यवेधनाः ।
(३) शङ्खकर्पूरस्फटिकनवनीतकपोतपारावतविमलकमयूरग्रीवावर्णाः सस्यकगोमेदकगुडमत्स्यण्डिकावर्णाः कोविदारपद्मपाटलीकलायक्षौमातसी-पुष्पवर्णाः ससीसाः साञ्जनाः विस्रा भिन्ना श्वेताभाः कृष्णाः कृष्णाभाः श्वेताः सर्वे वा लेखाबिन्दुचित्रा मृदवो ध्मायमाना न स्फुटन्ति बहुफेन-धूमाश्च रूप्यधातवः ।
(४) सर्वधातूनां गौरववृद्धौ सत्त्ववृद्धिः । तेषामशुद्धा मूढगर्भा वा
बैठ जाय अथवा सौ पल ताँबा या चांदी उसके ऊपर डालकर यदि वह उसको एक पल जल सुनहरा बना दे तो समझना चाहिए कि इस जल-स्रोत के नीचे अवश्य ही सोने की खान है।
( १ ) यदि किसी स्थान पर उसी के समान केवल तेज गन्ध या उग्र रस की संभावना हो तो समझना चाहिए कि वहाँ पर शिलाजीत का उत्पत्तिस्थान है।
( २ ) पीले या ताँबे अथवा दोनों रङ्गों की मिट्टी और पत्थर जिनके तोड़ने पर बीच में नीली रेखायें या मूंग, उड़द, तिल आदि के समान या दही के छोटे-छोटे कणों के समान छोटी-छोटी बूंदों वाला, हल्दी, हरीतकी, कमलपत्र, सेवार, यकृत, प्लीहा तथा केसर के समान या तोड़ने पर बारीक रेत की रेखाओं, बूंदों, स्वस्तिक-चिह्नों, मोटे रेत के कणों के समान, कान्ति युक्त और तपाये जाने पर न फटने वाली तथा बहुत झाग एवं धुआं देने वाली सुवर्ण धातु होती है। इस प्रकार की मिट्टी और पत्थर से ताँबा तथा चाँदी को सोना बनाया जा सकता है।
( ३ ) शंख, कपूर, स्फटिक मणि, मक्खन, जङ्गली कबूतर, पालतू कबूतर, सफेद तथा लाल रङ्ग की मणि, मयूर ग्रीवा, नील मणि, गोरोचन, गुड़, शक्कर, कचनार, कमल, पाटली, मटर, अलसी आदि के समान रङ्ग वाले, सीसा, अंजन, दुर्गन्ध से युक्त, तोड़ने पर बाहर से सफेद मालूम होने वाले किन्तु भीतर तथा बाहर से काले और भीतर से सफेद प्रतीत होने वाले अथवा हर प्रकार की रेखाओं तथा बूंदों से युक्त, मृदु, तपाये जाने पर जो फटे नहीं किन्तु बहुत झाग और धुआं उगलें, इस प्रकार की धातु रूप्यधातु कही जाती हैं।
( ४ ) इन सभी धातुओं के सम्बन्ध में यह समझना चाहिए कि उनमें जितना
१३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
१३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
तीक्ष्णमूत्रक्षारभाविता राजवृक्षवटपीलुगोपित्तरोचनामहिषखरकरभमूत्र-
लण्डपिण्डबद्धास्तत्प्रतीवापास्तदवलेपा वा विशुद्धाः स्रवन्ति ।
(१) यवमाषतिलपलाशपीलुक्षारैर्गोक्षीराजक्षीर्वा कदलीवज्रकन्दप्रती-
वापो मार्दवकरः ।
(२) मधुमधुकमजापयः सतैलं घृतगुडकिण्वयुतं सकन्दलीकम् ।
यदपि शतसहस्रधा विभिन्नं भवति मृदु त्रिभिरेव तन्निषेकैः ॥
(३) गोदन्तशृङ्गप्रतीवापो मृदुस्तम्भनः ।
(४) भारिकः स्निग्धो मृदुश्च प्रस्तरधातुर्भूमिभागो वा पिङ्गलो हरितः
पाटलो लोहितो वा ताम्रधातुः ।
(५) काकमेचकः कपोतारोचनावर्णः श्वेतराजिनद्धो वा विस्रः
सीसधातुः ।
ही भारीपन होगा वे उतनी ही उत्तम कोटि के सिद्ध होंगी। इनमें जो धातु अशुद्ध हो अथवा मैल जम जाने के कारण जिसके गुण-दोषों का यथार्थ ज्ञान नहीं हो पा रहा हो उसका शोधन कर लिया जाय। शोधन के प्रकार ये हैं : तीक्ष्णमूत्र (मनुष्य हाथी-घोड़ा, गाय, गधा, बकरा आदि में से किसी का मूत्र), तीक्ष्णक्षार, अमलतास, बरगद, पीलु, गोरोचन, भैंसे का मूत्र, बालक का मूत्र तथा उनके पुरीष, (मल) आदि वस्तुओं में कई बार धातुओं की भावनाएं देने से वे विशुद्ध हो जाती हैं, अमल-तास आदि के चूर्ण से अथवा उनके लेप से भी धातु का मल नष्ट होकर वे अपने असली रूप में आ जाती हैं।
(१) जो उड़द, तिल, ढाक, पीलु, वृक्ष का क्षार और गाय तथा बकरी के दूध में केला एवं सूरण को एक साथ मिलाकर यदि उनमें सोने-चांदी की भावना दी जाय तो वे नर्म हो जाते हैं।
(२) शहद, मुलहटी, बकरी का दूध, तेल, घी, गुड़ की शराब और खादर में पैदा होने वाले झाड़ आदि सब को मिलाकर, उनमें तीन बार सोने-चांदी की भावना दी जाय तो वे चाहे जितने भी कटे-फटे खुरदरे क्यों न हों, मुलायम हो जाते हैं।
(३) यदि पिघले हुए सोने-चांदी के ऊपर गाय के दाँत तथा सींग का चूर्ण बुरक दिया जाय तो सोना-चांदी ठोस हो जाते हैं।
(४) जहाँ पाषाणधातु, भूमिधातु, और ताम्रधातु, इन तीन प्रकार के पत्थर तथा मिट्टी के चिकने एवं मृदु भू-भाग हों, वहाँ ताँबे की खान होती है। ताँबा चार प्रकार का होता है : १. पिङ्गल २. हरित ३. पाटल और ४. लोहित।
(५) जो भूमि-भाग कौए के समान काला, कबूतर तथा गोरोचन की आकृति वाला, सफेद रेखाओं से युक्त और दुर्गन्धपूर्ण हो, वहाँ सीसा की खान समझनी चाहिए।
प्र० २८ : अ० १२ ] खनिजसम्बन्धी कार्य १३९
(१) ऊषरकर्बुरः पक्वलोष्ठवर्णो वा त्रपुधातुः ।
(२) कुरुम्बः पाण्डुरोहितः सिन्दुवारपुष्पवर्णो वा तीक्ष्णधातुः ।
(३) काकाण्डभुजपत्रवर्णो वा वैकृन्तकधातुः ।
(४) अच्छः स्निग्धः सप्रभो घोषवान् शीततीव्रस्तनुरागश्च मणिधातुः ।
(५) धातुसमुत्थं तज्जातकर्मान्तेषु प्रयोजयेत् ।
(६) कृतभाण्डव्यवहारमेकमुखम्, अत्ययं चान्यत्रकर्तृक्रेतृविक्रेतृणां स्थापयेत् ।
(७) आकरिकमपहरन्तमष्टगुणं दापयेदन्यत्र रत्नेभ्यः ।
(८) स्तेनमनिसृष्टोपजीविनं च बद्ध्वा कर्म कारयेद्, दण्डोपकारिणं च ।
( १ ) जो भूमि-भाग ऊसर जमीन की भांति कुछ सफेदी लिये हो, अथवा पके हुए ढेले के रंग का हो, वहाँ सफेद सीसे की खान समझनी चाहिए ।
( २ ) जो भूमि भाग चिकने पत्थरों वाला, कुछ सफेदी एवं लाली लिये हो, अथवा उसकी आकृति निर्गुण्डी के पुष्प से मिलती हो, वहाँ लोहे की खान समझनी चाहिए ।
( ३ ) जो भूमि-भाग कौवे के अण्डे या भोजपत्र की आकृति का हो, वहाँ इस्पाती लोहे की खान समझनी चाहिए ।
( ४ ) जो भूमि-भाग, इतना स्वच्छ हो कि जिसमें परछाई दिखाई दे, जो चिकना, दीप्त, शब्द देने वाला, अत्यन्त शीतल और फीके रंग वाला हो, वहाँ मणियों की खान जाननी चाहिए ।
( ५ ) खान से प्राप्त सुवर्ण आदि के लाभ को पुनः खान के कार्यों में लगाकर अधिक लाभ प्राप्त करना चाहिए ।
( ६ ) किसी एक नियत स्थान में ही सुवर्ण आदि धातुओं की बिक्री की व्यवस्था करनी चाहिए, उससे अन्यत्र बेचने वाले व्यक्तियों को दण्डित किया जाना चाहिए ।
( ७ ) धातुओं की चोरी करने वाले व्यक्ति पर, चोरी का आठ गुना दण्ड करना चाहिए, किन्तु यदि वह रत्नों की चोरी करता है तो उसको प्राणदण्ड दिया जाना चाहिए ।
( ८ ) जो व्यक्ति चोरी करे अथवा राजा की अनुमति के बिना धातुओं का व्यापार करे, उसे पकड़कर खान के कार्य में लगा देना चाहिए, और जिस व्यक्ति को न्यायालय ने प्राणदण्ड की सजा दी हो, किन्तु कारणवश वह उस दण्ड को पूरा न कर सके तो, ऐसे व्यक्ति को भी खान में लगा देना चाहिए ।
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(१) व्ययक्रियाभारिकमाकरं भागेन प्रक्रयेण वा दद्यात्, लाघविकामात्मना कारयेत् ।
(२) लोहाध्यक्षः ताम्रसीसत्रपुवैकृन्तकारकूटवृत्तकंसताललोहकर्मान्तान् कारयेत्, लोहभाण्डव्यवहारं च ।
(३) लक्षणाध्यक्षः चतुर्भागताम्रं रूप्यरूपं तीक्ष्णत्रपुसीसाञ्जनानामन्यतमाषबीजयुक्तं कारयेत् पणम्, अर्धपणं पादमष्टभागमिति । पादाजीवं ताम्ररूपं माषकंमर्धमाषकं काकणीमर्धकाकणीमिति ।
(४) रूपदर्शकः पणयात्रां व्यावहारिकों कोशप्रवेश्यां च स्थापयेत् ।
( १ ) यदि खान पर लोगों का कर्जा चढ़ गया हो और उस कर्जा को चुकता कर देने पर ही लाभ निर्भर हो तो, खान के अध्यक्ष को चाहिए कि वह थोड़ी-थोड़ी किस्तों में उस कर्जे को चुकता कर दे अथवा राजा से, कुछ सोना देकर, एक मुस्त रकम देकर, वह उस कर्जे को सर्वथा चुकता कर दे । यदि थोड़ी पूंजी या थोड़े श्रम से कार्य पूरा हो सकता है तो, अध्यक्ष स्वयं ही वैसा कर दे ।
( २ ) अध्यक्ष को चाहिए कि वह ताँबा, सीसा, त्रपु, वैकृंतक, आरकूट, वृत्त, कंस और ताल आदि अन्य प्रकार के लोहों का कार्य अपनी देख-रेख के कराये । लोहे की बनी वस्तुओं एवं तत्सम्बन्धी कार्य-व्यवहार को भी वह अपनी निगरानी में करवावे ।
( ३ ) टकसाल के अध्यक्ष ( लक्षणाध्यक्ष ) को चाहिए कि वह पण, अर्धपण, पादपण तथा अष्टभागपण नामक चार चाँदी के सिक्कों को विधिपूर्वक ढलवावे । १६ माष का एक पण होता है । उसमें ४ माष ताँबा, लोहा, राँगा, सीसा तथा अंजन, इनमें से कोई भी एक माष, बाकी ११ माष चाँदी होनी चाहिए । इसी हिसाब से अर्धपण ( अठन्नी ), पादपण ( चवन्नी ) और अष्टभागपण ( दुअन्नी ) आदि को ढलवावे । पण के चौथे हिस्से को व्यवहार में लाने के लिए ताँबे का एक अलग सिक्का होना चाहिए, जिसमें चौथाई हिस्सा चाँदी एक हिस्सा लोहा, सीसा आदि में से कोई एक और ग्यारह माष ताँबा होना चाहिए, इस सिक्के का नाम मापक है, जिसका वजन सोलह माष होता है, इसका भी अर्धमापक सिक्का तैयार करवाना चाहिए, इसके पादमापक तथा अष्टभागमापक के लिए 'काकणी' तथा 'अर्धकाकणी' नामक सिक्कों को बनवाना चाहिए ।
( ४ ) सिक्कों के विशेषज्ञ को इस बात की व्यवस्था कर देनी चाहिए कि कौन-सा सिक्का चलाया जाय और कौन-सा सिक्का खजाने में जमा किया जाय । सौ पण पर जो आठ पण राज्यभाग जनता से लिया जाता है, उसका नाम रूपिक है;
प्र० २८ : अ० १२ ] खनिज सम्बन्धी कार्य १४१
रूपिकमष्टकं शतं, पञ्चकं शतं व्याजीं, पारीक्षिकमष्टभागिकं शतम् । पञ्चविंशतिपणमत्ययं चान्यत्र कर्तृ क्रेतृविक्रेतृपरीक्षितृभ्यः ।
(१) खन्यध्यक्षः शङ्खवज्रमणिमुक्ताप्रबालक्षारकम्मान्तान् कारयेत्, पणनव्यवहारं च ।
(२) लवणाध्यक्षः पाकमुक्तं लवणभागं प्रक्रयं च यथाकालं संगृह्णीयाद्, विक्रयाच्च मूल्यं रूपं व्याजीं च ।
(३) आगन्तुलवणं षड्भागं दद्यात् । दत्तभागविभागस्य विक्रयः । पञ्चकं शतं व्याजीं, रूपं, रूपिकं च । क्रेता शुल्कं, राजपण्यच्छेदानुरूपं च वैधरणं दद्यात् । अन्यत्रक्रेता षट्छतमत्ययं च ।
(४) विलवणमुत्तमं दण्डं दद्यात्, अनिसृष्टोपजीवी च । अन्यत्र वानप्रस्थेभ्यः । श्रोत्रियास्तपस्विनो विष्टयश्च भक्तलवणं हरेयुः ।
सौ पण पर पाँच पण राज्यभाग व्याजी और सौ पण पर आठ पण राज्यभाग पारीक्षिक कहलाता है । यदि कोई पारीक्षिक का अपहरण करे तो उसे पच्चीस पण दण्ड दिया जाय, यदि अधिक अपहरण करे तो, अपहृतधन के हिसाब से, उस पर दुगुना, चौगुना दण्ड नियत करना चाहिए । किन्तु सिक्कों को बनाने, बेचने, खरीदने और परीक्षा करने वाले अधिकारियों के लिए दण्ड-विधान की व्यवस्था कुछ दूसरी ही है ।
( १ ) खान के अध्यक्ष को चाहिए कि वह शंख, वज्र, मणि, मुक्ता, प्रवाल तथा सभी तरह के क्षारों की उत्पत्ति और उनके क्रय-विक्रय की सुव्यवस्था करे ।
( २ ) लवण के अध्यक्ष को चाहिए कि वह बिक्री के लिए तैयार नमक को और किसी दूसरी खान से कुछ शर्तों के आधार पर नियत मात्रा में उपलब्ध होने वाले नमक को ठीक समय से संग्रह कर ले, उसको चाहिए कि वह उसके विक्रय का, बिक्री से प्राप्त होने वाले मूल्य का और रूप एवं व्याजी का सुप्रबंध करे ।
( ३ ) विदेश से बिक्री के लिए आये हुए नमक का छठा भाग राजकर के रूप में देना चाहिए । जो व्यक्ति समुचित राजकर एवं तौल का टैक्स अदा करे वही उसको बेचने का अधिकारी है, और उसे पाँच प्रतिशत व्याजी, रूप तथा रूपिक भी राजकर के रूप में अदा करना चाहिए । उस माल को खरीदने वाला व्यक्ति भी राजकर अदा करे, उसकी छीजन भी वह पूरी करे । राजकीय बाजार का कोई व्यापारी यदि बाहर से नमक मँगाता है तो उससे छह प्रतिशत राजकर के अतिरिक्त जुर्माना भी अदा किया जाय ।
( ४ ) घटिया या मिलावटी नमक बेचने वाले व्यापारी को उत्तम साहस दण्ड देना चाहिए । इसी प्रकार जो राजाज्ञा के विरुद्ध नमक को बनाता है या उसका
१४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
१४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) अतोऽन्यो लवणक्षारवर्गः शुल्कं दद्यात् ।
(२) एवं मूल्यं विभागं च व्याजीं परिघमत्ययम् ।
शुल्कं वैधरणं दण्डं रूपं रूपिकमेव च ॥
खनिभ्यो द्वादशविधं धातुं पण्यं च संहरेत् ।
एवं सर्वेषु पण्येषु स्थापयेन्मुखसंग्रहम् ॥
(३) आकरप्रभवः कोषः कोषाद्दण्डः प्रजायते ।
पृथिवी कोषदण्डाभ्यां प्राप्यते कोषभूषणा ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे आकरकर्मान्तप्रवर्तनं नाम द्वादशोऽध्यायः, आदितः द्वात्रिंशः ।
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व्यापार करता है, उसे भी उत्तम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए । किन्तु यह नियम वानप्रस्थियों पर लागू नहीं होता है । श्रोत्रिय, बेगार ढोने वाले और तपस्वी लोग बिना कीमत दिये भी अपने उपयोग के लायक नमक ले जा सकते हैं ।
( १ ) इनके अतिरिक्त, नमक और क्षार का उपयोग करने वाले सभी लोग नमक के अध्यक्ष और क्षार के अध्यक्ष को शुल्क अदा करें ।
( २ ) इस प्रकार मूल्य, विभाग, व्याजी, परिघ, अत्यय, शुल्क, वैधरण, दण्ड, रूप, रूपिक, खनिज पदार्थ और भिन्न-भिन्न प्रकार के विक्रेय पदार्थों का संग्रह करना चाहिए । राज्यभर की सभी मंडियों में प्रमुख विक्रेय वस्तुएँ बिक्री के लिए रखी जानी चाहिए ।
( ३ ) कोष की उन्नति खान पर निर्भर है; कोष की समृद्धि से शक्तिशाली सेना तैयार की जा सकती है । इस कोषगर्भा पृथिवी को कोष और सेना से ही प्राप्त किया जा सकता है ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में आकरकर्मान्तप्रवर्तन नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण २९ | ## अक्षशालायां सुवर्णाध्यक्षः |
|---|---|
| अध्याय १३ |
(१) सुवर्णाध्यक्षः सुवर्णरजतकर्मान्तानामसम्बन्धावेशनचतुःशाला-मेकद्वारामक्षशालां कारयेत् । विशिखामध्ये सौवर्णिकं शिल्पवन्तमभिजातं प्रात्ययिकं च स्थापयेत् ।
(२) जाम्बूनदं शातकुम्भं हाटकं वैणवं शृङ्गिशुक्तिजं, जातरूपं रस-विद्धमाकरोद्गतं च सुवर्णम् ।
(३) किञ्जल्कवर्णं मृदु स्निग्धमनादि भ्राजिष्णु च श्रेष्ठं, रक्तपीतकं मध्यमं, रक्तमवरं श्रेष्ठानाम् ।
(४) पाण्डु श्वेतं चाप्राप्तकम् । तद्द्येनाप्राप्तकं तच्चतुर्गुणेन सीसेन
अक्षशाला में सुवर्णाध्यक्ष के कार्य
( १ ) सुवर्णाध्यक्ष को चाहिए कि वह सोने-चाँदी के प्रत्येक कार्य को करने के लिए एक अक्षशाला का निर्माण करवावे, उसमें एक ही प्रधान द्वार होना चाहिए, उसके चारों ओर, एक दूसरे से अलग, चार बड़े भवन होने चाहिए । विशिखा (सर्राफा बाजार) में चतुर, कुलीन, विश्वस्त और पारखी सर्राफों को बसाया जाय ।
( २ ) सोना पाँच प्रकार का होता है; उसके रङ्ग भी पाँच होते हैं : १. जाम्बू-नद ( मेरु पर्वत से निकलने वाली जम्बू नदी से उत्पन्न जामुनी रङ्ग का ), २. शात-कुम्भ ( शतकुम्भ पर्वत से उत्पन्न, कमलरज के समान ), ३. हाटक ( सोने की खान से उत्पन्न, सेवतीपुष्प की भाँति ), ४. वैणव ( वेणु पर्वत पर उत्पन्न कर्णिकारपुष्प की आकृति का ) और ५. शृंगिशुक्तिज ( स्वर्णभूमि में उत्पन्न, मैनसिल के रङ्ग का ) । सुवर्ण के तीन प्रकार : १. जातरूप ( स्वयं शुद्ध ), २. रसविद्ध ( रसायन क्रियाओं द्वारा निर्मित ) और ३. आकारोद्गत (अशुद्ध, खानों से निकाला हुआ) ।
( ३ ) कमलरज की आकृति का, मृदु, स्निग्ध, शब्दरहित और चमकदार सोना सर्वोत्तम; लाल-पीत वर्ण मिश्रित सोना मध्यम; और केवल लाल वर्ण का निकृष्ट होता है ।
( ४ ) उत्तम कोटि के सुवर्ण में से जिसमें कुछ पीलाई एवं सफेदी हो वह अप्राप्तक कहलाता है । उस सोने में जितना मैल मिला हो, उससे चौगुना सीसा डालकर उसे शुद्ध करना चाहिए । सीसा मिला देने से यदि वह फटने लगे तो उसे
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शोधयेत्, सीसान्वयेन भिद्यमानं शुष्कपटलैर्ध्मापयेत्, रूक्षत्वाद्विद्रुद्यमानं तैलगोमये निषेचयेत् ।
(१) आकरोद्गतं सीसान्वयेन भिद्यमानं पाकपत्राणि कृत्वा गण्डिकासु कुट्टयेत्, कन्दलीवज्रकन्दकल्के वा निषेचयेत् ।
(२) तुत्थोद्गतं गौडिकं काम्बुकं चाक्रवालिकं च रूप्यम् । श्वेतं स्निग्धं मृदु च श्रेष्ठम् । विपर्यये स्फोटनं च दुष्टम् । तत्सीसचतुर्भागेन शोधयेत् ।
(३) उद्गतचूलिकमच्छं भ्राजिष्णु दधिवर्णं च शुद्धम् ।
(४) शुद्धस्यैको हारिद्रस्य सुवर्णो वर्णकः । ततः शुल्बकाकण्युत्तराप-सारिता आ चतुःसीमान्तादिति षोडश वर्णकाः ।
(५) सुवर्णं पूर्वं निकष्य पश्चाद्वर्णिकां निकषयेत् । समरागलेखमनि-म्नोन्नते देशे निकषितम् । परिमृदितं परिलीढं नखान्तराद्वा गैरिकेणाव-
जंगली कण्डों की आग में तपाना चाहिए । यदि शुद्ध करते समय रूखापन आ जाने से वह फटने लगे तो तेल और गोबर को मिलाकर बार-बार उसमें भावना देनी चाहिए ।
( १ ) खान से निकाले हुए सोने को भी सीसा मिलाकर शुद्ध किया जाना चाहिए । यदि सीसा मिलाने से वह फटने लगे तो उसके साथ पके हुए पत्ते मिला लिए जाँय और तब उसको लकड़ी के तख्ते पर रखकर खूब कूटा जाना चाहिए । अथवा कन्दलीलता, श्रीवेर और कमलजड़ का क्वाथ बनाकर तब तक उस सुवर्ण को उसमें भिगोया जाय, जब तक कि उसका फटना दूर नहीं होता है ।
( २ ) चाँदी चार प्रकार की होती है : १. तुत्थोद्गत ( तुत्थ नामक पर्वत से उत्पन्न, चमेली पुष्प के समान ), २. गौडिक ( असम में उत्पन्न, तगरपुष्प की आकृति की ), ३. कांबुक ( कांबु पर्वत से उत्पन्न ) और ४. चाक्रवालिक ( चक्रवाल खान से उत्पन्न, कन्दपुष्प के समान ) । श्वेत, स्निग्ध और मुलायम चाँदी सर्वोत्तम समझी जाती है । इनके विपरीत काली, रूक्ष, खरखरी और फटी हुई चाँदी खराब होती है । खराब चाँदी में चौथाई सीसा डालकर उसको शुद्ध करना चाहिए ।
( ३ ) जिसमें बुदबुदे उठे हों, जो स्वच्छ, चमकदार और दही के समान श्वेत हो, वह शुद्ध चाँदी होती है ।
( ४ ) हल्दी के समान स्वच्छ, शुद्ध सुवर्ण का सोलह माष का वर्णक शुद्ध वर्णक कहलाता है । उसमें चतुर्थांश तांबा मिला दिया जाय और उतना ही हिस्सा सुवर्ण कम कर दिया जाय; इसी तरह सोने का हिस्सा कम करके और तांबे का हिस्सा मिलाकर सोलह वर्णक बन जाते हैं । ये सोलहों मिश्र वर्णक कहलाते हैं और उनमें शुद्ध वर्णक को जोड़ दिया जाय तो सत्रह वर्णक हो जाते हैं ।
( ५ ) वर्णक की परीक्षा करने से पूर्व सुवर्ण की परीक्षा कर लेनी चाहिए; सोने को पहिले कसौटी पर घिसना चाहिये और तत्पश्चात् वर्णक को घिसने के बाद
प्र० २६ : अ० १३ ] सुवर्णाध्यक्ष के कार्य १४५
चूर्णितमुपांधि विद्यात् । जातिहिङ्गुलकेन पुष्पकासीसेन वा गोमूत्रभावितेन दिग्धेनाग्रहस्तेन संस्पृष्टं सुवर्णं श्वेतीभवति ।
(१) सकेसरः स्निग्धो मृदुभ्राजिष्णुश्च निकषरागः श्रेष्ठः ।
(२) कालिङ्गकस्तापीपाषाणो वा मुद्गवर्णो निकषः श्रेष्ठः । समरागी विक्रयक्रयहितः । हस्तिच्छविकः सहरितः प्रतिरागी विक्रयहितः । स्थिरः परुषो विषमवर्णश्चाप्रतिरागी क्रयहितः ।
(३) छेदश्चिक्कणः समवर्णः श्लक्ष्णो मृदुभ्राजिष्णुश्च श्रेष्ठः ।
(४) तापे बहिरन्तश्च समः किञ्जल्कवर्णः कुरण्डकपुष्पवर्णो वा श्रेष्ठः । श्यावो नीलश्चाप्राप्तकः ।
उनमें समान वर्ण तथा समान रेखाएँ दिखाई दें; घिसने से ऊँचा-नीचा न हो तो वर्णक को ठीक समझना चाहिए । १. यदि विक्रेता वर्णक को उत्कृष्ट बताने के उद्देश्य से कसौटी को उस पर जोर से रगड़ दें, या २. विक्रेता उसकी हीनता बताने के लिए कसौटी को धीरे से रगड़े, अथवा ३. नाखून में गेरु आदि कोई लाल-पीली वस्तु छिपाकर सोने के साथ कसौटी पर रेखा बना दे, तो इस प्रकार से यह तीनों प्रकार का कपटपूर्ण व्यवहार कहा जाता है । कपटी सर्राफ सोने को घटिया सिद्ध करने के लिए गो-मूत्र में भावना दिये गये एक विशेष प्रकार के सिंगरफ के साथ कुछ पीले रङ्ग के हरताल के साथ लिपटे हुए लेप को हाथ के अग्रभाग के स्पर्श से सोने का रङ्ग फीका कर देते हैं ।
(१) केसर के समान रङ्ग वाली, स्निग्ध, मृदु और चमकदार रेखा जिस कसौटी पर खिंचे, उसे सर्वोत्तम समझना चाहिए ।
(२) कलिङ्ग देश के महेन्द्र पर्वत से अथवा तापी नदी से उत्पन्न, मूंग के समान आकृति वाली कसौटी सर्वोत्तम समझनी चाहिए । सोने के रङ्ग को ठीक तरह से ग्रहण करने वाली कसौटी क्रेता-विक्रेता, दोनों के लिए उचित है। हस्तिचर्म के समान खरखरी, हरे रङ्ग की और विपरीत रङ्ग को बताने वाली कसौटी सोना बेचने वालों के हक में अच्छी है । इसी प्रकार ठोस, कठोर, खरखरी, तरह-तरह के रङ्गों वाली और असली रङ्ग को न बताने वाली कसौटी सोना खरीदने वालों के लिए अच्छी नहीं है ।
(३) चिकना, बाहर-भीतर एक रङ्ग वाला, स्निग्ध, मृदु और चमकदार, सोने का टुकड़ा श्रेष्ठ समझा जाता है ।
(४) यदि सोने का टुकड़ा, तपाये जाने पर, बाहर भीतर एक ही रङ्ग दे या वह कमलरज के समान दिखाई दे या वह कुणरड के फूल की भाँति हो जाय तो उसे
१० कौ०
१४६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण
(१) तुलाप्रतिमानं पौतवाध्यक्षे वक्ष्यामः। तेनोपदेशेन रूप्यसुवर्णं दद्यादाददीत च।
(२) अक्षशालामनायुक्तो नोपगच्छेत्। अभिगच्छन्नुच्छेद्यः आयुक्तो वा सरूप्यसुवर्णस्तेनैव जीयेत। विचितवस्त्रहस्तगुह्याः काञ्चनपृषतत्वष्टृतपनीयकारवो ध्मायकचरकपांसुधावकाः प्रविशेयुर्निष्कसेयुश्च। सर्वं चैषामुपकरणमनिष्ठिताश्च प्रयोगास्तत्रैवावतिष्ठेरन्। गृहीतं सुवर्णं धृतं च प्रयोगं करणमध्ये दध्यात्। सायं प्रातश्च लक्षितं कर्तृकारयितृमुद्राभ्यां निदध्यात्।
(३) क्षेपणो गुणः क्षुद्रकर्मेति कर्माणि। क्षेपणः काचार्पणादीनि। गुणः सूत्रवानादीनि। घनं सुषिरं पृषतादियुक्तं क्षुद्रकर्मेति।
भी श्रेष्ठ समझना चाहिए। यदि तपाने से उसमें फर्क पड़ जाय, उस पर नीलिमा छा जाये तो समझना चाहिए कि वह खोटा है।
(१) सोना-चाँदी तौलने का विधान आगे चलकर 'पौतवाध्यक्ष' प्रकरण में कहा जायगा। उस प्रकरण में निर्दिष्ट तौल के अनुसार ही सोना-चाँदी देने और लेने चाहिएँ।
(२) अक्षशाला में वे ही व्यक्ति प्रवेश करें, जो वहाँ कार्य करने के लिए नियुक्त किए गए हैं। निषेध करने पर भी यदि कोई प्रवेश करते हुए पकड़ा जाय तो उसका सर्वस्व अपहरण कर लेना चाहिए। अक्षशाला में कार्य करने वाला कोई भी व्यक्ति यदि अपने साथ सोना चाँदी ले जाता हुआ पकड़ा जाय तो उसे भी यथायोग्य दण्ड देना चाहिए। रसप्रयोग से सोना बनाने वाले, छोटी-छोटी गोली बनाने वाले, बड़े-बड़े पात्र बनाने वाले, तरह-तरह के आभूषण बनाने वाले, झाडू देने वाले तथा अन्य परिचारक, अपनी-अपनी वर्दी पहिने तलाशी देकर अक्षशाला में प्रवेश करें और बाहर निकलें। इन कारीगरों के औजार एवं आधे बनाये हुए आभूषण आदि अक्षशाला में ही रहें, बाहर कदापि न जाने पावें। भांडागार से तौल कर लिया गया सोना तथा उससे बने हुए आभूषण आदि, कार्य करने के अनन्तर, भाँडागार के लेखक को भली भाँति तौल कर सौंप देना चाहिए और विधिवत् उसको रजिस्टर में दर्ज करवा देना चाहिए। सायं और प्रातः प्रतिदिन, काम खत्म होने और शुरू होने पर सौवर्णिक तथा सुवर्णाध्यक्ष से मुहर लगाकर भण्डार का लेखक उस सुवर्ण को भण्डार में बन्द करके रख दे।
(३) आभूषण सम्बन्धी कार्य तीन प्रकार के होते हैं : १. क्षेपण, २. गुण और ३. क्षुद्रक। आभूषणों पर मणियों के जोड़ने को क्षेपण कहते हैं। सोने के बारीक सूतों को जोड़ने के लिए गुण कहा जाता है। ठोस तथा पोले, छोटी-छोटी बूंदों या गोलियों से बने आभूषण सम्बन्धी कार्य को क्षुद्रक कहते हैं।
प्र० २६ : अ० १३ ] सुवर्णाध्यक्ष के कार्य १४७
(१) अर्पयेत् काचकर्मणः पञ्चभागं काञ्चनं दशभागं कटुमानम् । ताम्रपादयुक्तं रूप्यं रूप्यपाद्युक्तं वा सुवर्णं संस्कृतकं तस्माद्रक्षेत् ।
(२) पृषतकाचकर्मणस्त्रयो हि भागाः परिभाण्डं द्वौ वास्तुकम् । चत्वारो वा वास्तुकं त्रयः परिभाण्डम् ।
(३) त्वष्टृकर्मणः । शुल्बभाण्डं समसुवर्णेन संयूहयेत् । रूप्यभाण्डं घनं घनसुषिरं वा सुवर्णार्धेन अवलेपयेत् । चतुर्थभागसुवर्णं वा बालुकाहिङ्गुल-कस्य रसेन चूर्णेन वा वासयेत् ।
(४) तपनीयं ज्येष्ठं सुवर्णं सुरागं, समसीसातिक्रान्तं पाकपत्रपक्वं सैन्धविकयोज्ज्वलितं नीलपीतश्वेतहरितशुकपोतवर्णानां प्रकृतिर्भवति ।
( १ ) मणियों की जुड़ाई सम्बन्धी कार्य को काचकर्म कहते हैं । मणि के पाँचवें हिस्से को सोने से पिरो दे; मणि इधर-उधर न होने पावे, उसके लिए चारों ओर से सोने की पट्टी लगी रहती है उसको कटुमान कहा जाता है। मणि का जितना हिस्सा सोने में पिरो दिया जाय उसका आधा हिस्सा ( दसवाँ भाग ) कटुवान का होना चाहिए; स्वर्णकार शुद्ध किए हुए सोने में मिलावट कर सकते हैं; चाँदी की जगह ताँबा और सोने की जगह चाँदी भर कर वे उतने अंश को हड़प कर सकते हैं; यह मिलावटी सोना-चाँदी शुद्ध ही जैसा प्रतीत होता है; इसलिए इस सम्बन्ध में अध्यक्ष को पूरी निगरानी रखनी चाहिए ।
( २ ) मिश्रित काचकर्म के सम्बन्ध में ध्यान रखना चाहिए कि पहिले गुटिका आदि से मिश्रित काचकर्म के लिए जितना सुवर्ण निर्धारित हो उसके पाँच भाग किए जाँय; उनमें तीन भाग पद्म, स्वस्तिक आदि बनाने के लिए और दो भाग उसका आधारपीठ बनाने के लिए होता है; यदि मणि बड़ी हो तो सुवर्ण के सात हिस्से करने चाहिए । जिनमें चार हिस्से आधार के लिए और शेष तीन हिस्से स्वस्तिक आदि के लिए काम में लाये जाँय ।
( ३ ) ताँबे तथा चाँदी के घनपात्र की विधि इस प्रकार है : जितना ताँबे का पात्र हो उतना ही सोने का पत्र उसके ऊपर चढ़वा देना चाहिए; चाँदी का पात्र चाहे ठोस हो या पोला हो, उस पर उसके भार से आधे, सोने का पानी चढ़वा दे; अथवा चौथा हिस्सा सोना लेकर उसे बालू और शिंगरफ के चूर्ण एवं रस के साथ मिलाकर भूसी अग्नि में पिघलाकर पानी की तरह चढ़वा दे ।
( ४ ) आभूषण आदि के लिए प्रस्तुत, कमलरज के समान स्वच्छ, स्निग्ध और चमकदार सोना उत्तम किस्म का है । वह शुद्ध सोना नील, पीत, श्वेत, हरित और शुकपोत ( तोते का बच्चा ) आदि रङ्ग के आभूषणों के योग्य होता है । अशुद्ध सुवर्ण में उसके परिमाण का सीसा डालकर उसे शुद्ध किया जाय; अथवा उसके पतले-पतले पत्र बनाकर फिर अरणे के कण्डों की तपन से उसको शुद्ध किया जाय;
| १४८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
|---|
तीक्ष्णं चास्य मयूरग्रीवाभं श्वेतभङ्गं चिमिचिमायितं पीतचूर्णितं काकणिकः सुवर्णरागः।
(१) तारमुपशुद्धं वा। अस्थिन्तुत्थे चतुः, समसीसे चतुः, शुष्कतुत्थे चतुः, कपाले त्रिर्गोमये द्विः, एवं सप्तदशतुत्थातिक्रान्तं सैन्धविकयोज्ज्वलितम्। एतस्मात्काकण्युत्तरापसारिता। आ द्विभाषादिति सुवर्णे देयं, पश्चाद्रागयोगः। श्वेततारं भवति।
(२) त्रयोंऽशाः तपनीयस्य द्वात्रिंशद्भागश्वेततारमूर्च्छितं तत् श्वेतलोहितकं भवति। ताम्रं पीतकं करोति।
(३) तपनीयमुज्जवाल्य रागत्रिभागं दद्यात्। पीतरागं भवति।
(४) श्वेततारभागौ द्वावेकस्तपनीयस्य मुद्गवर्णं करोति।
या सिंधदेश की मिट्टी के साथ घिसकर उसे शुद्ध किया जाय। इस सुवर्ण के साथ इस्पाती लोहा भी नील, पीत आदि आभूषणों के योग्य होता है। इस्पाती लोहा मोर की गर्दन के समान आकृति का और काटने पर श्वेत, चमकता हुआ होना चाहिये। यदि गरम करके उसका चूर्ण बनाया जाय और उसको एक काकिणी सोने में मिला दिया जाय तो सोने का रङ्ग खिल उठता है।
(१) लोहे के स्थान पर शुद्ध चाँदी भी मिलाई जा सकती है। हड्डी के चूर्ण के साथ मिली हुई मिट्टी से बनी हुई घरिया में चार बार, मिट्टी और सीसे से बनी घरिया में चार बार, शुद्ध मिट्टी से बनी घरिया में तीन बार और गोबर में तीन बार—इस प्रकार सत्रह बार घरिया में बदलने के बाद सिंधदेश की खारी मिट्टी में रगड़ देने से श्वेतवर्ण की शुद्ध रूप्यधातु तैयार हो जाती है। उसमें से एक काकिणी चाँदी सोने में मिलाई जा सकती है। इस प्रकार दो माष तक चाँदी मिलाकर उतना सोना निकाला जा सकता है। इस प्रकार सोने में चाँदी मिला देने से और तदनन्तर उसको चमका देने वाली चीजों के सहयोग से सुवर्ण भी चाँदी की तरह चमकने लगता है।
(२) बत्तीस भागों में विभक्त साधारण सोने में तीन भाग निकालकर उनकी जगह तीन भाग शुद्ध सोना और शेष चाँदी को एक साथ मिलाकर घरिया में उलटने-पुलटने से उसका रङ्ग श्वेत-लाल मिश्रित रङ्ग का हो जाता है। यदि पूर्वोक्त रीति से चाँदी के साथ या तांबे को सोने में मिला दिया जाय तो वह उसके रङ्ग को पीला बना देता है।
(३) साधारण सोने को खारी मिट्टी से चमका कर उसमें शुद्ध सोने का तीसरा भाग मिला दिया जाय तो उसका रंग लाल-पीला हो जाता है।
(४) दो भाग शुद्ध चाँदी में एक भाग सोने को मिला कर भावना देने से उसका रङ्ग मूंग के समान हो जाता है।
प्र० २९ : अ० १३ ] सुवर्णाध्यक्ष के कार्य १४९
(१) कालायसस्यार्धभागाभ्यक्तं कृष्णं भवति। प्रतिलेपिना रसेन द्विगुणाभ्यक्तं तपनीयं शुकपत्रवर्णं भवति। तस्यारम्भे रागविशेषेषु प्रतिवर्णिकां गृह्णीयात्।
(२) तीक्ष्णताम्रसंस्कारं च बुध्येत। तस्माद्वज्रमणिमुक्ताप्रवालरूपाणामपनेयमानं च रूप्यसुवर्णभाण्डबन्धप्रमाणानि चेति।
(३)
समरागं समद्वन्द्वमशक्तं पृषतं स्थिरम्।
सुप्रमृष्टमसंपीतं विभक्तं धारणे सुखम्॥
अभिनीतं प्रभायुक्तं संस्थानमधुरं समम्।
मनोनेत्राभिरामं च तपनीयगुणाः स्मृताः॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे अक्षशालायां सुवर्णाध्यक्षं नाम त्रयोदशोऽध्यायः, आदितस्त्रयस्त्रिंशः।
—: ० :—
(१) सोने का छठा हिस्सा लोहा मिला देने से उसका रंग काला हो जाता है। पिघले हुए लोहे तथा शुद्ध चाँदी से मिला हुआ दुगुना सोना सुवापंखी रंग का हो जाता है। इसी प्रकार पूर्वोक्त नील, आदि रङ्गों के भेद को जानने के लिए प्रत्येक वर्णक को ग्रहण करना चाहिए।
(२) सोने का रङ्ग बदलने के लिए उपयोग में आने वाले लोहे, ताँबे को शुद्ध करना आवश्यक है; इसलिए उनके शुद्ध करने की विधि भली भाँति जान लेनी चाहिए। जिससे वज्रमणि, मुक्ता, प्रवाल आदि उत्तम रत्नों में मिलावट न हो सके और सोने-चाँदी आदि के आभूषण में कोई न्यूनाधिक्य मेल करके गड़बड़ी न कर सके, इसके लिए उत्तम रत्नों और सोना-चाँदी आदि के आभूषणों के संबंध में अच्छी तरह जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।
(३) १. एक सा रङ्ग होना, २. वजन तथा रूप में समान होना, ३. बीच में गांठ आदि का न होना, ४. टिकाऊ होना, ५. अच्छी तरह चमकाया हुआ होना, ६. ठीक तरह बना हुआ होना, ७. अलग-अलग हिस्सों वाला, ८. पहनने में सुखकर, साफ-सुथरा, १० कांतिमान, ११. अच्छा दिखाई देने वाला, १२. एक जैसी बनावट का, १३. अयुक्त छिद्रों से रहित और १४. मन तथा आँखों को अच्छा लगने वाला, ये चौदह गुण सोने के आभूषणों में होते हैं।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में अक्षशाला में सुवर्णाध्यक्ष नामक तेरहवां अध्याय समाप्त।
—: ० :—
| प्रकरण ३० | विशिखायां सौवर्णिक प्रचारः |
|---|---|
| अध्याय १४ |
(१) सौवर्णिकः पौरजानपदानां रूप्यसुवर्णमावेशनिभिः कारयेत् । निर्दिष्टकालकार्यं च कर्म कुर्युः, अनिर्दिष्टकालं कार्यापदेशम् ।
(२) कालातिपातने पादहीनं वेतनं तद्द्विगुणश्च दण्डः । कार्यस्यान्यथाकरणे वेतननाशः, तद्द्विगुणश्च दण्डः ।
(३) यथावर्णप्रमाणं निक्षेपं गृह्णीयुस्तथाविधमेवार्पयेयुः, कालान्तरादपि ब तथाविधमेव प्रतिगृह्णीयुरन्यत्र क्षीणपरिशीर्णाभ्याम् ।
(४) आवेशनिभिः सुवर्णपुद्गललक्षणप्रयोगेषु तत्तज्जानीयात् ।
राजकीय स्वर्णकारों के कर्तव्य
( १ ) सौवर्णिक ( राज्य का प्रधान आभूषण व्यापारी ) को चाहिए कि वह नगरवासियों और जनपदवासियों के सोने-चाँदी के आभूषणों का कार्य शिल्पशाला में बैठकर काम करने वाले सुनारों द्वारा कराये । सुनारों को चाहिए कि वे समय और वेतन को नियत करके ही कार्य करें; यदि कार्य की अधिकता हो या वायदे की अवधि बीत रही हो, तो उन्हें नियत समय से भी अधिक कार्य करना चाहिए ।
( २ ) यदि कोई सुनार वायदे के अनुसार कार्य पूरा न करे तो उसके वेतन का चौथाई भाग जब्त करके उसे वेतन का दुगुना दण्ड दिया जाय । यदि कोई सुनार अभीष्ट जेवर को न बनाकर दूसरा ही जेवर बनाकर दे, तो उसकी मजदूरी जब्त कर उसे नियत वेतन का दुगुना दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) सुनारों को चाहिए कि वे जिस प्रकार और जितने वजन का सोना आदि आभूषण बनाने के लिए लें, उसी प्रकार और उतने ही वजन का आभूषण बना कर वापिस करें । सुनार के परदेश चले जाने अथवा उसकी मृत्यु हो जाने के कारण यदि सुनार के घर सोना बहुत दिनों तक पड़ा रह जाय तो उसके उत्तराधिकारियों से वह सोना वापिस ले लेना चाहिए । यदि सोना नष्ट हो गया हो या छीज गया हो तो सुनार से उसका मुआवजा भी लेना चाहिए ।
( ४ ) सौवर्णिक को चाहिए कि वह सुनारों के द्वारा किए जाने वाले पुद्गल तथा लक्षण आदि कपट प्रयोगों के संबंध में भी अच्छी जानकारी रखे ।
प्र० ३० : अ० १४ ] राजकीय स्वर्णकारों के कर्तव्य १५१
(१) तप्तकलधौतकयोः काकणिकः सुवर्णे क्षयो देयः । तीक्ष्णकाकणी रूप्यद्विगुणो रागप्रक्षेपस्तस्य षड्भागः क्षयः ।
(२) वर्णहीने माषावरे पूर्वः साहसदण्डः, प्रमाणहीने मध्यमः, तुलाप्रतिमानोपधावुत्तमः, कृतभाण्डोपधौ च ।
(३) सौवर्णिकेनादृष्टमन्यत्र वा प्रयोगं कारयतो द्वादशपणो दण्डः, कर्तुर्द्विगुणः सापसारश्चेत् । अनपसारः कण्टकशोधनाय नीयेत । कर्तुश्च द्विशतो दण्ड पणच्छेदं वा ।
(४) तुलाप्रतिमानमाण्डं पौतवहस्तात्क्रीणीयुः । अन्यथा द्वादशपणो दण्डः ।
(५) घनं घनसुषिरं संयूह्यमवलेप्यं सङ्घात्यं वासितकं च कारुकर्म ।
( १ ) यदि खोटे सोने-चाँदी के आभूषण बनाने के लिए दिए जाँय तो सुनार को एक काकणी ( ¼ माष ) छीजन देनी चाहिए । सोने का रङ्ग बदलने के लिए एक काकणी लोहा और दो काकणी चाँदी उसमें मिलानी चाहिए । एक काकणी लोहा और दो काकणी चाँदी का छटा भाग छीजन के लिए निकाल लेना चाहिए ।
( २ ) यदि अपनी अज्ञानता के कारण सुनार एक माष सुवर्ण को कांतिहीन कर दे तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए; तौल में कम करे तो मध्यम साहस दण्ड; और तराजू-बाट में कपट करे तो उत्तम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए; इसी प्रकार सोने-चाँदी के बने हुए पात्र में यदि कोई व्यक्ति हेर-फेर करे तो उसे भी उत्तम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए ।
( ३ ) सौवर्णिक की अनुमति प्राप्त कर या न प्राप्त कर यदि कोई व्यक्ति शिल्प-शाला ( विशिखा ) से बाहर किसी सुनार से आभूषण बनवाये तो उसे बारह पण दण्ड देना चाहिए, और जेवर बनाने वाले सुनार को चौबीस पण । उनके लिए यह दण्ड-व्यवस्था उसी दशा में है यदि उन पर चोरी की आशंका न हो तो और यदि उन पर चोरी किए जाने की आशंका हो तो उन्हें कण्टकशोधक ( प्रदेष्टा ) के पास न्याय के लिए ले जाना चाहिए । यदि अपराध सिद्ध हो जाय तो सुनार पर दो-सौ पण दण्ड निर्धारित किया जाय और इतना धन देने से यदि वह इन्कार करे तो उसकी उंगलियाँ कटवा देनी चाहिए ।
( ४ ) सुनारों को चाहिए कि वे सोना-चाँदी तौलने के बाट-तराजू कहीं से न खरीद कर पौतवाध्यक्ष के यहाँ से ही खरीदें । यदि वे ऐसा नहीं करते तो उन पर बारह पण का दण्ड कर देना चाहिए ।
( ५ ) सुनारों के १. घन ( ठोस गहना ), २. घनसुषिर ( ऊपर से ठोस तथा भीतर से पोले कड़ा आदि गहने ), ३. संयूह्य (ऊपर से मोटा पत्ता चढ़ाये आभूषण),
१५२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) तुलाविषममपसारणं विस्रावणं पेटकः पिङ्गश्चेति हरणोपायाः ।
(२) सन्नामिन्युत्कीर्णिका भिन्नमस्तकोपकण्ठी कुशिक्या सकटुकक्ष्या वारिवेल्ल्ययस्कान्ता वा दुष्टतुलाः ।
(३) रूप्यस्य द्वौ भागावेकः शुल्बस्य त्रिपुटकम् । तेनाकरोद्गतमपसार्यते तत्त्रिपुटकापसारितं, शुल्बेन शुल्बापसारितं, वेल्लकेन वेल्लकापसारितं, शुल्बार्धसारेण हेम्ना हेमापसारितम् ।
(४) मूकमूषा पूतिकिट्टः करटकमुखं नाली सन्दंशो जोङ्गनी सुवर्चि-
४. अवलेप्य ( ऊपर से पतला पत्ता चढ़ाये आभूषण ) ५. संघातय ( जुड़े आभूषण तगड़ी, जंजीर आदि ) और ६. वासितक ( रस आदि से वासित आभूषण ), ये छह प्रकार के कार्य होते हैं ।
( १ ) १. तुलाविषम, २. अपसारण, ३. विस्रावण, ४. पेटक और ५. पिङ्ग, ये पाँच तरीके सुनारों के चोरी करने के हैं ।
( २ ) काँटे या तराजू का बढ़ा-घटा होना, जिससे ठीक तरह न तौला जा सके, तुलाविषम कहलाता है । ऐसे कांटे आठ प्रकार के होते हैं : १. सन्नामिनी ( हलके लोहे से बने, जिसको उङ्गली लगाने में सहज ही इधर-उधर झुकाया जा सकता है ), २. उत्कीर्णिका ( जिसके भीतर छेदों में लोहे का चूर्ण भरा हो ), ३. भिन्नमस्तका ( जिसके आगे के हिस्से में छेद हो, जिससे हवा का रुख पाते ही वह झुक जाय ), ४. उपकंठी ( जिसमें बहुत-सी गांठें पड़ी हों ), ५. कुशिक्या ( जिसका पलड़ा दूषित हो ), ६. सकटुकक्ष्या ( जिसकी डोरी अच्छी न हो ), ७, पारिवेल्ल्य ( जो हिलती रहे ) और ८. अयस्कांता ( जिसकी डण्डी में अयस्कांत मणि लगी हो ) ।
( ३ ) नकली द्रव्य को मिलाकर असली द्रव्य को चुरा लेना अपसारण कहलाता है । वह चार प्रकार का होता है : १. दो हिस्सा चांदी और एक हिस्सा तांबा मिला कर जो घोल तैयार किया जाय उसको त्रिपुटक कहते हैं । शुद्ध सोने में यह त्रिपुटक मिला कर उतना सोना निकाल दिया जाय और किसी के खोटा बताने पर कहा जाय कि वह तो खान से ही ऐसा निकला है, इस चोरी नाम त्रिपुटकापसारित है । २. जिस सोने में ताँबा मिला कर चोरी की जाय उसको शुल्बापसारित कहते हैं । ३. लोहा-चाँदी के मिश्रित घोल को वेल्लक कहते हैं; उस वेल्लक को मिलाकर सोने की जो चोरी की जाती है उसको वेल्लकापसारित कहते हैं । ४. ताँबे के साथ आधा सोना मिलाकर उसके बदले में जो चोरी की जाती है उसे हेमापसारित कहते हैं ।
( ४ ) अपसारण के ढङ्ग इस प्रकार हैं : मूकमूषा ( बन्द घरिया ), पूतिकिट्ट ( लोहे का मैल ), करटकमुख ( सोना कतरने की कैंची ), नाली ( नाल ), संदंश
प्र० ३० : अ० १४ ] राजकीय स्वर्णकारों के कर्तव्य १५३
कालवणम्। तदेव सुवर्णमित्यपसारणमार्गाः। पूर्वप्रणिहिता वा पिण्ड-वालुका मूषाभेदादग्निष्ठा उद्ध्रियन्ते।
(१) पश्चाद्बन्धने आचितकपत्रपरीक्षायां वा रूप्यरूपेण परिवर्तनं विस्रावणम्, पिण्डबालुकानां लोहपिण्डबालुकाभिर्वा।
(२) गाढश्चाभ्युद्धार्यश्च पेटकः संयूह्यावलेप्यसङ्घात्येषु क्रियते। सीसरूपं सुवर्णपत्रेणावलिप्तमभ्यन्तरमष्टकेन बद्धं गाढपेटकः। स एव पटलसम्पुटेष्वभ्युद्धार्यः। पत्रमाश्लिष्टं यमकपत्रं वावलेप्येषु क्रियते। शुल्बं तारं वा गर्भः पत्राणाम्। संधात्येषु क्रियते शुल्बरूपं सुवर्णपत्रसंहतं प्रमृष्टं सुपार्श्वम्। तदेव यमकपत्रसंहतं प्रमृष्टम्। ताम्रताररूपं चोत्तर-वर्णकः।
( सन्सी ), जोंगनी ( लोहे की छड़ ) सुर्वचिका ( शोरा ) और नमक । उनसे जब कहा जाय कि उन्होंने सोना खोटा कर दिया है, तो झट ये कह देते हैं कि यह आप का दिया हुआ सोना है, यह खान से ही ऐसा निकला है । ये अपसारण के तरीके हैं । या पहिले ही से आग में बारीक बालुका-सी डाल दी जाती है और फिर मूषा को अग्नि में रख कर मूषा को टूट जाने का बहाना करता है और तब मालिक के सामने उस बालुका को सोने में मिला दिया जाता है और उतना ही सोना वह होशियारी से मार लेता है ।
( १ ) किसी बनी हुई वस्तु को पीछे से जोड़ते समय या पात्रों की परीक्षा करते समय खरे सोने की जगह खोटा सोना जोड़ देना विस्रावण कहलाता है । सोने की खान में उत्पन्न बालुका को लोहे की खान में उत्पन्न बालुका से बदल देना भी विस्रावण कहलाता है ।
( २ ) पेटक दो प्रकार का होता है : १. गाठ और १. अभ्युद्धार्य; इसका प्रयोग संयूह्य, अवलेप्य तथा संघात्य कर्मों में किया जाता है । सीसे के पत्ते को सोने के पत्ते से मढ़ कर वीच में लाख से जोड़ देना ही गाठपेटक कहलाता है । वही बन्धन यदि सरलता से खुलने योग्य हो तो उसे अभ्युद्धार्यपेटक कहते हैं । अवलेप्य क्रियाओं में एक ओर या दोनों ओर सोने का पतला सा पत्रा जोड़ कर सोने को चुराया जा सकता है । अथवा बाहर पत्ता लगाने की बजाय सुवर्ण पत्रों के बीच में तांबे या चांदी का पत्ता लगा कर भी सोना चुराया जाता है । संघात्य क्रियाओं में तांबे की वस्तु को एक ओर से सोने के पत्ते से मढ़कर उस हिस्से को खूब चमकदार एवं सुन्दर बना दिया जाता है । उसी तांबे की वस्तु को दोनों ओर से इसी प्रकार चमकदार एवं सुन्दर सोने के पत्तों से मढ़कर उतना ही असली सोना हड़प लिया जाता है ।
१५४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) तदुभयं तापनिकषाभ्यां निश्शब्दोल्लेखनाभ्यां वा विद्यात् । अभ्युद्धार्यं बदराम्ले लवणोदके वा सादयन्ति इति पेटकः ।
(२) घनसुषिरे वा रूपे सुवर्णमृन्मालुकाहिङ्गुलुककल्को वा तप्तोऽवतिष्ठते । दृढवास्तुके वा रूपे बालुकामिश्रजतुगान्धारपङ्को वा तप्तोऽवतिष्ठते । तयोस्तपनमवध्वंसनं वा शुद्धिः । सपरिभाण्डे वा रूपे लवणमुलकया कटुशर्करया तप्तमवतिष्ठते । तस्य क्वाथनं शुद्धिः । अभ्रपटलमष्टकेन द्विगुणवास्तुके वा रूपे बध्यते । तस्यापिहितकाचकस्योदके निमज्जत एकदेशः सीदति । पटलान्तरेषु वा सूच्या भिद्यते । मणयो रूप्यं सुवर्णं वा घनसुषिराणां पिङ्गः । तस्य तापनमवध्वंसनं वा शुद्धिः । इति पिङ्गः ।
(३) तस्माद्वज्रमणिमुक्ताप्रवालरूपाणां जातिरूपवर्णप्रमाणपुद्गललक्षणान्युपलभेत ।
( १ ) इन दोनों प्रकार के पेटकों की शुद्धता जाँचने के लिये उन्हें अग्नि में तपाये, कसौटी पर घिसवाये या हल्की चोट देकर या रेखा खींचकर या किसी तीक्ष्ण वस्तु से निशान देकर उनकी परीक्षा करे । अभ्युद्धार्य पेटक बेरी के कसैले रस में अथवा नमक के पानी में डालकर जाना जाय । ऐसा करने से उसका रङ्ग कुछ लाल-सा हो जाता है ।
( २ ) ठोस या पोले गहनों में सुवर्णभृत्, सुवर्णमालुका ( दोनों विशेष धातुएँ ) और शिंगरफ का चूर्ण अग्नि में तपाकर लगा दिया जाता है और उतना ही शुद्ध सोना निकाल दिया जाता है । जिस आभूषण का आधार मजबूत हो उसमें साधारण धातुओं की बालुका की लाख और सिन्दूर का घोल आग में तपाकर लगा दिया जाता है और उसके बराबर का सोना निकाल दिया जाता है । इस प्रकार के ठोस तथा पोले गहनों को आग में तपाकर उन पर चोट देने से उनकी परीक्षा करनी चाहिए । बुंदेदार मणिबन्ध जैसे गहनों को, नमक की छोटी डलियों के साथ, लपट देने वाली आग में तपाने से उनकी शुद्धि हो जाती है । बेरी के अम्ल रस में उबालकर भी उनकी शुद्धता को जाँचा जा सकता है । अभ्रक को उसके दुगुने सुवर्ण में लाख आदि से जोड़कर भी असली सोना रख लिया जाता है । उसकी परीक्षा के लिए अभ्रक लगे गहनों को बेरी के अम्ल जल में छोड़ देना चाहिये; अभ्रक लगा हिस्सा पानी में तैरता रहेगा । यदि अभ्रक की जगह ताँबा मिलाया गया हो तो सुई से छेदकर उसकी परीक्षा कर लेनी चाहिए । ठोस या पोले गहनों में काँचमणि, चाँदी और खोटा सोना मिलाकर पिंग नामक उपाय द्वारा शुद्ध सोना चुराया जा सकता है । उसको आग में तपाना तथा उसपर हथौड़े की चोट करना ही उसकी शुद्धता का उपाय है ।
( ३ ) इसलिये सौवर्णिक को चाहिए कि वह, वज्र, मणि, मुक्ता और प्रवाल की
प्र० ३० : अ० १४ ] राजकीय स्वर्णकारों के कर्तव्य १५५
(१) कृतभाण्डपरीक्षायां पुराणभाण्डप्रतिसंस्कारे वा चत्वारो हर-
णोपायाः—परिकुट्टनमवच्छेदनमुल्लेखनं परिमर्दनं वा । पेटकापदेशेन
पृषतं गुणं पिटका वा यत् परिशातयन्ति तत् परिकुट्टनम् । यद् द्विगुण-
वास्तुकानां वा रूपे सीसरूपं प्रक्षिप्याभ्यन्तरमवच्छिन्दन्ति तदवच्छेदनम् ।
यद्घनानां तीक्ष्णेनोल्लिखन्ति तदुल्लेखनम् । हरितालमनःशिलाहिङ्गुलक-
चूर्णानामन्यतमेन कुरुविन्दचूर्णेन वा वस्त्रं संयूह्य यत् परिमृद्नन्ति तत्
परिमर्दनम् । तेन सौवर्णराजतानि भाण्डानि क्षीयन्ते । न चैषां किञ्चिद-
वरुग्णं भवति ।
(२) भग्नखण्डघृष्टानां संयूह्यानां सदृशेनानुमानं कुर्यात् । अवले-
प्यानां यावदुत्पाटितं तावदुत्पाट्यानुमानं कुर्यात् । विरूपाणां वा । तापन-
मुदकपेषणं च बहुशः कुर्यात् ।
(३) अवक्षेपः प्रतिमानमग्निर्गण्डिका भण्डिकाधिकरणी पिच्छः सूत्रं
जाति, उनके रूप, गुण, प्रमाण, पुद्गल और लक्षण आदि को भली-भांति जाने, जिससे कोई व्यक्ति उनका अपहरण न कर सके ।
( १ ) पात्र और आभरण आदि के तैयार हो जाने पर, उनकी परीक्षा करते समय भी सोने आदि का चार प्रकार से अपहरण किया जा सकता है : १. परिकुट्टन से, २. अवच्छेदन से, ३. उल्लेखन से और ४. परिमर्दन से । पूर्वोक्त पेटक ढंग से परीक्षा करने के बहाने जो छोटे टुकड़े या छोटी गोली सुनार काट लिया करते हैं उसे ही परिकुट्टन कहते हैं। पत्रों से जुड़े आभूषणों में सोने मढ़े हुये कुछ सीसा के पत्ते मिलाकर और भीतर से काटकर सोना निकाल लेना ही अवच्छेदन कहलाता है । ठोस गहनों को तेज औजार से खोद देना ही उल्लेखन है । हरताल, सिंगरफ, मैनसिल और कुरुविन्द पत्थर के चूर्ण को कपड़े के साथ सानकर, उससे आभूषणों को रगड़ा जाना हो परिमर्दन कहलाता है । ऐसा करने से आभरण घिस जाते हैं; किन्तु उनपर किसी प्रकार की खरोंच या चोट नहीं दिखाई देती है ।
( २ ) परिकुट्टन अवच्छेदन आदि कपट उपायों से जितने सुवर्ण का अपहरण किया गया हो, उसका ब्योरा, उसके समानजातीय शेष अवयवों से प्राप्त करना चाहिए । जिन आभूषणों पर अवलेप्य का प्रयोग किया गया हो, उस पर से कटे सोने के टुकड़े को देखकर उसकी क्षति का अनुमान किया जाय । जिन आभूषणों में अधिक खोटा माल मिला दिया गया हो उनकी हानि का परिमाण, उनके सदृश दूसरे आभूषणों को तौलकर जाना जाय । उनको आग में तपाकर पानी में छोड़ दिया जाय और तब हथौड़े से चोट करके उनकी शुद्धता को जाँचा जाय ।
( ३ ) अपहरण के और भी तरीके हैं : १. अवक्षेप ( हाथ की सफाई से खरे
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चेल्लं बोल्लनं शिर उत्सङ्गो मक्षिका स्वकायप्रेक्षा दृतिरुदकशेरावमग्निष्ठ-
मिति काचं विद्यात् ।
(१) राजतानां विस्रं मलग्राहि परुषं प्रस्तीतं विवर्णं वा दुष्टमिति विद्यात् ।
(२) एवं नवं च जीर्णं च विरूपं चापि भाण्डकम् ।
परीक्षेतार्त्ययं चैषां यथोद्दिष्टं प्रकल्पयेत् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे विशिखायां सौवर्णिकप्रचारो नाम चतुर्दशोऽध्यायः, आदितश्चतुस्त्रिंशः ।
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माल को लेकर खोटा माल भिड़ा देना, ) २. प्रतिमान ( बदली करके चुरा लेना ), ३. अग्नि के बीच से चुरा लेना, ४. गाण्डिका ( पीटने के बहाने ), ५. भण्डिका ( घरिया में रखने के बहाने ), ६. अधिकरणी ( लोहे के पात्र में रखने के बहाने ), ७. पिच्छ ( मोर-पेंच से चुराना ), ८. सूत्र ( कांटे की डोरी के बहाने ), ९. चेल्ल ( वस्त्र में छिपा लेना ), १०. बोल्लन ( कोई किस्सा छेड़कर ) ११. उत्संग ( गोद या गुप्त अंग में छिपाकर ), १२. मक्षिका ( मक्खी उड़ाने के बहाने पिघली हुई धातु को अपने अङ्ग में लगा देना ) तथा १३. पसीना, १४. धौकनी, १५. जल का शकोरा और १६. आग में डाले हुये खोटे माल आदि के बहाने से सोना-चाँदी चुराया जा सकता है ।
( २ ) मिलावटी चाँदी के आभूषणों में पाँच प्रकार के दोष होते हैं : १. विस्र होना ( दुर्गन्ध ), २. मलिन हो जाना, ३. कठोर हो जाना, ४. खुरदुरा हो जाना और ५. रङ्ग बदल जाना ।
( १ ) इस प्रकार नये और पुराने विरूप हुए पात्रों या आभूषणों की भली-भांति परीक्षा कर लेनी चाहिए; और फिर मिलावट के अनुसार ही अपराधियों पर दण्ड की व्यवस्था करनी चाहिए।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में विशिखा में सौवर्णिक-प्रचार नामक चौदहवाँ अध्याय समाप्त ।
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