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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

प्रारंभिक भूमिका व विस्तृत प्रस्तावना

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कौटिलीय

अर्थशास्त्रम्


चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी-१

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SC

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2-3

॥ श्रीः ॥

विद्याभवन संस्कृत ग्रन्थमाला
७५

॥ श्रीः ॥

कौटिलीयम्

अर्थशास्त्रम्

हिन्दीव्याख्योपेतम्

व्याख्याकारः—

वाचस्पति गैरोला

अध्यक्ष : पाण्डुलिपि-विभाग, हिन्दी संग्रहालय,
हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग

चौखम्बा विद्याभवन

वाराणसी २२१००१

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प्रकाशक—
चौखम्बा विद्याभवन
( भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रकाशक तथा वितरक )
चौक ( बनारस स्टेट बैंक भवन के पीछे ),
पो० बा० नं० ६९
वाराणसी २२१००१

सर्वाधिकार सुरक्षित
तृतीय संस्करण १९८४
मूल्य १२५-००

अन्य प्राप्तिस्थान—
चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन
( भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रकाशक तथा वितरक )
के० ३७/११७, गोपाल मन्दिर लेन
पो० बा० नं० १२९
वाराणसी २२१००१

मुद्रक—
श्रीजी मुद्रणालय
वाराणसी

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THE
VIDYABHAWAN SANSKRIT GRANTHAMALA
75
❦ ❧

ARTHAŚĀSTRA

OF

KAUṬILYA

AND

THE CĀṆAKYA SŪTRA

Edited With
INTRODUCTION, HINDI TRANSLATION & GLOSSARY

By

Shri Vachaspati Gairola

Head of the Manuscript Department
Hindi Sangrahalaya, Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad.

(चौखम्बा)

CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN

VARANASI

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© CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN
(Oriental Booksellers & Publishers)
CHOWK (Behind The Benares State Bank Building)
Post Box No. 69
VARANASI 221001


Third Edition
1984


Also can be had of
CHAUKHAMBA SURBHARATI PRAKASHAN
(Oriental Booksellers & Publishers)
K. 37/117, Gopal Mandir Lane
Post Box No. 129
VARANASI 221001

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महामहोपाध्याय
पं० गणपति शास्त्री
की
पुण्यस्मृति
में

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रागरागिणिकुसुम

द्वितीय सोपान ०१

कि

गीतकाण्ड

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भूमिका

समिति : सभा

समिति : प्राचीन भारत में शासन-व्यवस्था के परिचालन के लिए आज की भाँति सभायें तथा समितियाँ नियुक्त होती थीं । उदाहरण के लिए प्रौढ़ों की राजसभा, जनता की सार्वजनिक सभा, व्यापारियों तथा व्यवसायियों का मण्डल ( पूग ), राज्यों का 'संघ' और कुटुम्बों ( कुलों ) की ग्रामसभायें । ये ही सभायें कानून बनातीं तथा उसको जनता में क्रियान्वित करती थीं । इन सभाओं का प्रमुख कार्य जनता का प्रतिनिधित्व करना और राजा के निर्वाचन तथा सार्वजनिक भलाई के लिए अपनी राय देना था । कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में सभा : समिति की गंभीर व्याख्या की गयी है ।

यदि हम सभा : समिति के इतिहास की खोज करते हैं तो उसके बीज हमें मानव-सभ्यता के मूल में बिखरे दिखायी देते हैं । मनुष्य की उदयवेला से ही उसके इतिहास का आरम्भ होता है ।

वैदिक साहित्य के अध्ययन से हमें विदित होता है कि उस समय राष्ट्रीय जीवन-सम्बन्धी सार्वजनिक कार्यों को संपन्न करने के लिए समिति की व्यवस्था थी । यह समिति सर्वसाधारण प्रजाजनों ( विशः ) द्वारा आयोजित तथा स्वीकृत होती थी । उसी के द्वारा राजा का चुनाव होता था । वह इतनी महत्त्वपूर्ण थी कि उसमें सभी लोगों का उपस्थित होना अनिवार्य बताया गया है (ऋग्वेद १०।१७३।१; अथर्ववेद ६।८७।१ ) । राजनीतिक दृष्टि से इस लोकसंस्था का दूसरा भी महत्त्व था; क्योंकि उसी के द्वारा राजा के अतिरिक्त राजव्यवस्था का भी संचालन होता था । यही कारण है कि ऋग्वेद ( १०।१९१।३ ) में उसकी नीति तथा मंत्रणा के लिए शुभकामना प्रकट की गयी है । निर्वाचित राजा के लिए 'समिति' की प्रत्येक बैठक में उपस्थित होना आवश्यक था ( ऋग्वेद ९।६२।६ ) ।

समिति में उपस्थित प्रत्येक वक्ता इस बात के लिए यत्नशील रहता था कि उसका भाषण ओजस्वी, सर्वप्रिय और अकाट्य सिद्ध हो ( अथर्ववेद २।२७ ) । अथर्ववेद के इस वचन से यह ध्वनि निकलती है कि समिति के वक्ताओं के विभिन्न मत होते थे और उनमें विभिन्न दृष्टियों से जनहित की

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चिन्तना की जाती थी । इस समिति में राजनीतिक विषयों के अतिरिक्त शिक्षा और ज्ञान-संबंधी बातों पर भी वाद-विवाद हुआ करता था । मूलतः वह एक धर्मपालिका या न्यायपालिका भी होती थी ।

समिति के सदस्य समाज के विभिन्न समुदायों या क्षेत्रों ( वर्गों ) के प्रति-निधि होते थे । उस युग में प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त का आदर होता था । ग्राम-संघटन के प्रतिनिधि को ग्रामणी कहा जाता था । यहाँ तक कि ग्रामणी के नाम पर ग्राम शब्द का व्यवहार हुआ ( काशिका ५।३।११२ ) । इस प्रकार गाँवों, व्यापारियों, दार्शनिकों और राजनीतिकों के अपने-अपने प्रति-निधि होते थे । वे प्रतिनिधि समिति के प्रमुख अंग थे । अथर्ववेद में इन समि-तियों और ग्रामों की बड़ी स्तुति की गयी है ( १२।१।५६ ) । वैदिक काल के परवर्ती समाज में समिति के संघटन के मुख्य आधार ग्राम ही हुआ करते थे ।

इस प्रकार की समिति की ऐतिहासिक प्राचीनता के संबंध में ठीक-ठीक पता नहीं चलता है। अथर्ववेद ( ७।१२ ) में उसको अनादि और प्रजापति की कन्या कहा गया है। उसके अस्तित्व और कार्यों का प्रमाण सर्वप्रथम ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में और उसके बाद छान्दोग्य उपनिषद् में मिलता है।

ऋग्वेद ( ६।२८।६; ८।४।६; १०।३४।६० ) के अनेक स्थलों पर समिति : सभा की विशेषताओं पर कई तरह से प्रकाश डाला गया है । वहाँ उसको एक ऐसा समुदाय बताया गया है, जिसको सामाजिक व्यवहारों तथा सार्वजनिक मामलों पर विवाद करने का पूरा अधिकार था ।

लगभग सूत्रग्रन्थों के निर्माण ( ५०० ई० पूर्व ) के समय से समिति की जगह परिषद् ( पर्षत् ) ने ले ली थी ( पारस्कर गृह्यसूत्र ३।१३।४ ) । इस प्रकार हमें विदित होता है कि सार्वजनिक संघटनों या संस्थाओं के लिए समिति शब्द का प्रयोग वैदिककाल में ही होने लगा था ।

सभा : समिति के अतिरिक्त वेदकालीन सार्वजनिक संस्था सभा के अस्तित्व का भी पता चलता है । अथर्ववेद ( ७।१२।१-४ ) में उसको समिति की बहिन और प्रजापति की दो कन्याओं में से एक माना गया है । सायणा-चार्य ने उसकी व्याख्या करते हुए लिखा है कि 'नरिष्ठा' ( सभा ) बहुत से लोगों के उस निर्णय को कहते हैं, जिसका कथमपि उल्लंघन न हो सके । उसका निर्णय अमान्य नहीं हो सकता है, क्योंकि वह समुदाय की वस्तु है और एकस्वर में कही हुई बात है ।

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इस संबंध में स्वर्गीय विद्वान् डॉ० काशीप्रसाद जायसवाल का कथन है कि संभवतः वह चुने गये लोगों की एक स्थायी संस्था होती थी और समिति के अधीन होकर कार्य करती थी ( हिन्दू राजतंत्र १, पृष्ठ २६ ) । यह सभा प्रमुखतया राष्ट्रीय न्यायालय का कार्य करती थी ।

वाजसनेयी संहिता में प्रयुक्त सभाचार ( ३०।६ ) और अथर्ववेद में प्रयुक्त सभासद ( ३।१९।१; ७।१२।२; १८।५५।६ ) शब्द का अभिप्राय उस व्यक्ति से बताया गया है, जो सभा में उपस्थित होकर न्याय करता है । महाभारत ( ४।१।२४ ) में सभास्तार का प्रयोग न्यायाधीश के लिए किया गया है । उसमें एक जगह ( ५।३५।३८ ) यह कहा गया है कि वह सभा, सभा नहीं है, जिसमें प्रौढ़ लोग न हों; और वे प्रौढ, प्रौढ नहीं, जो नियम घोषित न कर सकें । अथर्ववेद ( ६।८८; ५।१० ) में उसको जनता की आवाज और न्याय का एकमात्र निदर्शन करने वाली कहा गया है । ऋग्वेद ( १०।१९१।३ ) में एक विशेष बात इस संबंध में यह भी कही गयी है कि राज्य की अभ्युन्नति के लिये राजा और सभा में भेद होना परमावश्यक है ।

इस प्रकार यद्यपि सभी प्राचीन ग्रंथों के उद्धरणों से यह स्पष्ट है कि समिति तथा 'सभा' के अधिकारों में कुछ अन्तर अवश्य था, किन्तु उसका संवैधानिक ढाँचा लगभग एक ही था ।

आदिम आर्यसंघों का स्वरूप

आदिम आर्य-संघों की संघटन-व्यवस्था की ओर आधुनिक लेखकों का ध्यान तब गया जब वे सर्वथा ध्वस्त हो चुके थे और उनकी जगह वर्ग-शासन-सत्ता एवं नये युद्धों ने ले ली थी; अर्थात् जब गृहयुद्ध, शासनसत्ता, कर, कानून और आचार के आन्तरिक संघटन के बनाने का प्रश्न समाज के सामने उपस्थित हुआ था । इस दृष्टि से वैदिक साहित्य में साम्य-संघ के आंतरिक विधानों के बारे में कुछ नहीं कहा गया है; उसमें न तो धन की चर्चा है न व्यक्तिगत अधिकारों का विवेचन और न दण्ड के लिये कोई व्यवस्था ही । उसमें संसार, मनुष्य, अग्नि, पशु, धन आदि की उत्पत्ति कैसे हुई, इन्हीं प्रश्नों पर अधिकतर विचार किया गया है । ब्राह्मण-ग्रन्थों में अवश्य ही आचार, सत्ता और व्यवहार के सम्बन्ध में जिज्ञासायें प्रगट की गयी हैं । वैदिक साहित्य की अपेक्षा महाभारत और स्मृतियों में यह बात हमें अधिक स्पष्ट रूप में देखने को मिलती है कि आदिम आर्यसंघों और परवर्ती सामाजिक संगठनों में क्या अन्तर था एवं उनके संचालन का स्वरूप क्या था ।

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प्रागैतिहासिक संघ : इतिहासकारों ने प्रागैतिहासिक मानव-सभ्यता के विकास को उसकी प्रमुख प्रवृत्तियों के आधार पर प्रस्तर, कांस्य या लौह आदि अनेक अवस्थाओं में विभक्त किया है। प्रागैतिहासिक मानव ने अपनी जीविकोपार्जन के साधन अन्न, वस्त्र, आश्रय-स्थान आदि के लिये प्रकृति से संघर्ष किया। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये उसने जितने साधनों का उपयोग किया, जितने व्यक्ति संघटित हुए, उन व्यक्तियों की जो योग्यता, कार्यक्षमता आदि थी वे सब मिलकर उस युग की उत्पादन शक्तियाँ कहलायीं। उत्पादन की ये शक्तियाँ समाज की आवश्यकता और क्रियाशीलता के अनुसार सदा ही बदलती रहती हैं।

सबसे पहले मनुष्य जब संगठनों की ओर प्रवृत्त होकर अपने सामाजिक जीवन का निर्माण करने में अग्रसर हो रहा था, उसका परिचय इतिहासकारों ने एक जांगल मानव के रूप में प्राप्त किया। कंद मूल और फल ही उसका आहार था। उसने पत्थरों के औजार तैयार किये; रगड़ से वह आग भी पैदा कर चुका था; धनुष-बाण का भी वह आविष्कार कर चुका था; वह गाँवों में बसने लग गया था, और टोकरियाँ बुनना तथा अस्त्र-शस्त्र बनाना भी उसने सीख लिया था। मनुष्य की दूसरी उन्नतावस्था बर्बरयुग के नाम से कही गयी है। इस युग में मिट्टी की कला अधिक विकसित हुई। पशु-पालन और पौधे उगाना इस युग की बड़ी विशेषताओं में हैं। मकान बनाने के लिये ईंटों और पत्थरों का प्रयोग भी इस युग में होने लगा था। इस युग में भोजन के लिये मांस तथा दूध पर्याप्त रूप में उपलब्ध था। लेखन-कला का जन्म भी इसी युग में हुआ। सभ्यता के तीसरे युग में पहुँच कर मनुष्य ने सारी जांगल प्रवृत्तियों और बर्बर स्वभाव को छोड़कर श्रम के विभाजन तथा उत्पादन की दिशा में अधिक उन्नति की। इस युग में विनिमय और उत्पादन की नयी शक्तियों ने वर्ग-भेद, शोषण, दासता, विरोध और निजी संपत्ति को जन्म दिया, जिससे पूरे समाज में क्रांति हुई।

ऐतिहासिक संघ : मनुष्य के आर्थिक जीवन के इतिहास का आरम्भ उत्पादन की शक्तियों, वितरण की अवस्थाओं और विनिमय के माध्यमों के जन्म से होता है। आर्ययुगीन प्राग्भारतीय समाज में इन शक्तियों, अवस्थाओं तथा माध्यमों का क्या स्वरूप था, इसका विवरण हमें भारत के प्राचीन साहित्य के अनुशीलन से प्राप्त होता है।

ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भारतीय समाज की चार अवस्थायें बतायी गयी हैं : कृतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। हिन्दू समाज के

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इन चारों युगों का संचालक धर्म रहा है। धर्म अर्थात् रहन-सहन का ढंग; शासन सत्ता के नियम, विवाह-संबंध आदि। हिन्दू-साहित्य के प्राचीनतम प्रमाण वेद, धार्मिक प्रवृत्ति से परिचालित उक्त युग-परिवर्त्तन को किस रूप में प्रस्तुत करते हैं, इसका परिचय श्री डांगे के शब्दों में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है "पूरा वेद-साहित्य सिर्फ एक माँग उपस्थित करता है। और उस माँग को पूरा करने के लिए उपायों को खोजता है। वह माँग धन है। इस धन के दो रूप हैं। एक है अन्न और दूसरा है प्रजा ( मनुष्य ) धन या अन्न उस समाज के उत्पादन के साधनों, आर्थिक उत्पादन की क्रियाशीलता का द्योतक है जिसका सीधा संबंध प्रजा से जुड़ा है। इन दो प्रश्नों पर सभी वेद-संहिताओं में बहुत मात्रा में सामग्री मिलती है" ( पृ० ७३ ) ।

अग्नि की उत्पत्ति : आर्ययुगीन मानव के सामने पहिली समस्यायें भोजन, निवास, आग और आत्मरक्षा की थी। कृतयुग में जब कि मनुष्य नितांत ही जंगली अवस्था में था, उसको कई कारणों से, जैसे—भोजन, रोग तथा शत्रुओं के कारण, एक स्थान से दूसरे स्थान में भटकना पड़ा। प्रकृति के विरोध में, आत्मरक्षा के लिए, उसने निरन्तर संघर्ष किया। धीरे-धीरे उसने आग का पता लगाया, जिसका श्रेय महर्षि अंगिरस को है ( ऋग्वेद ५।२।८; १०३२।६; ५।११।६ )। आग का पता लग जाने से तत्कालीन जन-जीवन में महान् क्रांतिकारी परिवर्त्तन हुआ। उसको प्राकृतिक शक्ति के रूप में देखा गया। एक ओर तो उसका उपयोग पशुओं तथा मछलियों के मांस को भूनने में किया गया और दूसरी ओर उसको शत्रुबाधा को दूर करने तथा भूत-प्रेतादि को भगाने वाली महाशक्ति के रूप में भी पूजा जाने लगा ( ऋग्वेद ३।१५।१; ) । धीरे-धीरे मनुष्य ने समझा कि ये पशु, जो दूध देते हैं, जिनका मांस खाकर जीवित रहा जा सकता है; उनकी रोमयुक्त खाल को ओढ़ कर सर्दी दूर की जा सकती है और उनकी हड्डियों तथा उनके सींगों से उपयोगी औजार भी बनाये जा सकते हैं।

अग्नि की सहायता से मनुष्य की उन्नति का एक दूसरा रूप सामने आया। ज्यों ही उसको यह ज्ञात हुआ कि अग्नि के द्वारा कच्चे लोहे को पिघला कर बड़े-बड़े असंभव कार्य भी संभव हो सकते हैं, कि समाज का ढांचा ही बदल गया; किन्तु मनुष्य की यह सूझ बहुत बाद की है। जांगल युग से बर्बर युग में पहुँच कर, अर्थात् कृतयुग के आविष्कारों का विकास कर जब उसने त्रेतायुग में प्रवेश किया तो प्रकृति के सामने उसने अपनी जिन दुर्बलताओं को स्वीकार किया था, उन पर उसने विजय प्राप्त कर ली। उसने अपने

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यायावरीय जीवन को समाप्त कर बस्तियां बसायीं; उसने अनियमित भोजन-व्यवस्था को नियमित बनाया; वस्त्रों के द्वारा उसने अपनी नग्नता को ढका । इस प्रकार की विकासावस्था में पहुँच कर उसने उत्पादन की नई प्रणाली, सामाजिक संघटन के नये ढंग और कला के नवीन स्वरूपों को जन्म दिया ।

यज्ञ की सृष्टि : अग्नि का पता लग जाने के बाद यज्ञ की सृष्टि हुई । यज्ञ, जो कि ब्रह्म के अस्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित हुआ और जिसके द्वारा भविष्य के लिए आदिम साम्यसंघ के तत्त्वों का निर्माण हुआ । यज्ञ और ब्रह्म के संबंध में श्री डांगे का कथन है कि "आर्यों के साम्यसंघ का नाम ही ब्रह्म है और यज्ञ उस समाज की उत्पादन प्रणाली है । आदिम साम्यसंघ और उत्पादन की सामूहिक प्रणाली का यही रूप था । उत्पादन की इस प्रणाली तथा विराट् ब्रह्म के स्वरूप अथवा साम्यसंघ का ज्ञान वेद है । हिन्दू-परंपरा ने इतिहास को इसी तरह से लेखबद्ध किया है; और आर्य-इतिहास के सबसे प्राचीन युग-आदिम साम्यवाद के युग को समझने के लिए यही एक कुञ्जी है" ( भारत : आदिम साम्यवाद से दासप्रथा तक का इतिहास, पृ० ७८-७९ )।

सत्र यज्ञ में आदिम साम्यसंघ के प्रचुर तत्त्व समाविष्ट हुए मिलते हैं । यह यज्ञ एक सामूहिक आयोजन के रूप में सम्पन्न होता था । इसके आयोजन में भी सामूहिक श्रम होता था और उसका फल-विभाजन भी सामूहिक रूप में हुआ करता था । जब तक कि प्राचीन आर्यसंघों में व्यक्तिगत सम्पत्ति, वर्गभेद और शासनसत्ता का जन्म नहीं हुआ था, उनकी सामूहिक उत्पादन-प्रणाली का नाम यज्ञ था, जिनका ज्ञान वेदों में सुरक्षित है । "इस यज्ञ ने आर्यों के साम्यसंघ को समुन्नत, धनवान् और वैभवशाली बनाकर उसे नष्ट होने से बचा लिया था......जब मानव-समाज प्रगति के पथ पर और आगे बढ़ा और उसने धातुओं को पिघलाना सीखकर हंसिया या खुरपी बनाना सीख लिया था, तब भी आर्यों के धार्मिक विधिकर्म अपने पूर्वजों की भाँति देवताओं को प्रसन्न करने के लिए और उन्हीं की भाँति धन प्राप्त करने के लिए उन पूर्वजों के कार्यों का अनुसरण करते थे—वे उन्हीं छन्दों को गाते थे .....प्राचीन काल में यज्ञ एक यथार्थ था। बाद में वह मिथ्या वस्तु हो गयी थी । समाज के उत्तराधिकारियों ने इस अस्तित्वहीन यज्ञ को अपने उत्तराधिकार में पाया । इन उत्तराधिकारियों में अतीत काल की विचारधारा और उसके व्यवहार के कुछ अवशेष थे । वे उस यज्ञ को विधि रूप में और मंत्रों के छंदों को इस आशामय विश्वास से अपने साथ लिये रहे मानो उसके

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अनुकरण द्वारा धन और आनंद की उपलब्धि हो सकती है” ( डांगे पृ० ६१-९२ ) ।

उत्पत्ति और श्रम का विभाजन : यद्यपि आदिम साम्यसंघ की उत्पादन-शक्तियों में विकास हो रहा था; फिर भी श्रम की मात्रा बढ़ जाने पर भी जीवन में दरिद्रता बढ़ रही थी । सत्र श्रम के द्वारा जो श्रम-विभाजन की व्यवस्था थी भी उसके द्वारा ऐसी आशा नहीं थी कि जीवन में एक ऐसी स्थिति आ सकेगी, जिससे स्थायी रूप से आर्थिक हित का विकास हो सकेगा । यद्यपि इन उत्पादन के आरंभिक साधनों में विकास नहीं हो पाया था; तथापि सारे उत्पादन पर उत्पादकों का ही नियंत्रण था । उत्पादन के इन अविकसित साधनों के कारण आदिम साम्यसंघ ( कम्यून ) में श्रम-विभाजन की रीति का अभाव रहा । इसका एक बहुत बड़ा कारण यह भी था कि तब तक समाज में न तो वर्ण-भेद की विधायें पैदा हुई थीं और समाज का आकार बहुत छोटा था । पूरे साम्यसंघ का निर्माण विशों ( वस्ती के निवासी ) द्वारा होता था ।

आदिम साम्यसंघ में विभिन्न वर्गों की उत्पत्ति और श्रम-विभाजन की प्रणाली का उदय धीरे-धीरे हुआ । सत्र यज्ञों के युग में हम इतना अन्तर अवश्य पाते हैं कि जहाँ पुरुषों का कार्य शिकार करना, युद्ध करना, पशु-पालन था वहाँ नारी घर का प्रवन्ध करती थीं, भोजन बनाती थीं, पशुओं को पालती थीं और बस्ती की निकटतम भूमि में अन्न उपजाती थीं । किन्तु ये इतने अस्पष्ट प्रमाण हैं कि इनके द्वारा ठीक तरह से श्रम-विभाजन की वास्तविक रूपरेखा नहीं समझी जा सकती है ।

वस्तुतः यज्ञ के अनुयायी आर्यों का प्राचीन समाज एक गण-संघटन था । उस संघटन के सभी सदस्य कुटुम्ब से एवं रक्त से संबंधित थे और उसको स्वयंचलित सशस्त्र संघटन कहा जा सकता है । इस प्रकार के प्राचीनतम दस गण थे, जिनके नाम हैं : यदु, तुर्वश, द्रुह्यु, अणु, पुरु, अंग, वंग, कलिंग, पुंद्र और सुह्म ।

विवाह सम्बन्ध : आर्य-समूहों के संघटन का एक ठोस आधार गोत्र शब्द से प्रकट होता है । हिन्दुओं की विवाह-संबंधी व्यवस्था के लिए सगोत्र-असगोत्र को दृष्टि में रखना आवश्यक होता है । अपनी आदिम अवस्था में आर्य लोग अपने गोत्र के अंतर्गत ही विवाह करते थे; किन्तु बाद में, जब कि वे जनसंख्या में बढ़कर अलग-अलग क्षेत्रों में फैल चुके थे और उनका आर्थिक स्तर तथा

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विचार का धरातल अधिक व्यापक हो गया था, तब सगोत्र विवाह निषिद्ध ठहराये जाने लगे थे, जैसा कि आज भी प्रचलित है ( डाँगे, पृ० १०७ )।

हिन्दुओं की विवाह-व्यवस्था के सम्बन्ध में इतिहासकारों के विचार बहुत ही उलझे हुए रहे हैं। हिन्दुओं में बहु-पतित्व या बहु-पत्नीत्व का आधार पशुओं की यौन-प्रवृत्ति को मानने वाले कुछ पूँजीवादी बुद्धिजीवी विद्वानों का कहना है कि आरंभ में पुरुष-नारी के बीच यौन-सम्बन्ध का आधार प्राकृतिक था; किन्तु इधर नयी खोजों के द्वारा यह स्पष्ट हो गया है कि आरम्भ में भी पुरुष-नारी का यौन-सम्बन्ध समाज द्वारा ही नियन्त्रित होता था; उनके सम्बन्धों की नैतिकता या आचार-विचार का नियंत्रण न तो ईश्वर के हाथ में था और न प्रकृति के हाथों में ही।

व्यावहारिक दृष्टि से और शास्त्रीय दृष्टि से देखा जाय तो हिन्दुओं में विवाह की जो प्रणाली आज प्रचलित है, अपने प्रकृत रूप में वह ऐसी ही नहीं थी। महाभारत ( आदिपर्व, १२२ ) में लिखा है कि कलियुग के चारों विवाह और परिवार का स्वरूप सर्वथा नया था, जो कि कुछ आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक नया सामाजिक प्रयोग था और वह प्राकृतिक नहीं था। महाभारत ( शा० प० २०६, ४२-४४ ) में युगों के अनुसार यौन-सम्बन्धों के चार रूप बताये गये हैं, जिनके नाम हैं : संकल्प, संस्पर्श, मैथुन और द्वंद्व।

डाँगे जी ने अपनी पुस्तक ( पृ० १११ ) में इन चार प्रकार के यौन-सम्बन्धों की व्याख्या करते हुए कहा है "सङ्कल्प यौन-सम्बन्ध वे होते थे जिनमें कोई बंधन नहीं था। यह सम्बन्ध किन्हीं दो व्यक्तियों में हो सकता था, जो इसकी कामना या इच्छा करते थे। इस कामना पर कोई भी समाजिक या व्यक्तिगत रोक नहीं थी। संस्पर्श वह यौन-संबंध था जिसमें अपने अत्यन्त निकट संबंधियों के साथ यौन-संबंध स्थापित करने पर रोक लगा दी गयी थी और एक गोत्र में विवाह करने का निषेध कर दिया गया था। उस समय भिन्न-भिन्न गोत्र आपस में यह संबंध स्थापित करते थे। प्राकृतिक वैवाहिक संबंध की अन्तिम अवस्था मैथुन है। यहां से यूथ-विवाह का अंत हो जाता है। जब तक पति-पत्नी की इच्छा रहती थी, तब तक वे एक कुटुम्ब में बँधे रहते थे और दूसरे नर-नारियों से यौन-संबंध नहीं स्थापित करते थे। द्वन्द्व यौन-संबंध का वह रूप है जो कलियुग में प्रचलित है और जिसके अनुसार एक पति और एक पत्नी का जोड़ा होता है। यौन-संबंध के इस रूप के अनुसार नारी, पुरुष की दासी होती है; और वह ( पुरुष ) व्यक्तिगत सम्पत्ति के अधिकार और

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एकाधिपत्य की शक्ति लेकर निरन्तर नारी के हितों का विरोधी बना रहता है।”

समान वितरण : जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती गयी, वैसे-वैसे उत्पादन की आदिम पद्धतियाँ बदलने लगीं। गण-गोत्र टूटने लगे और पूरे एशिया महाद्वीप में, जहाँ जिसको सुविधा मिली, वहीं लोग बसने लगे। जिन स्थानों पर कोई न था वहाँ बस्तियाँ बसाई जाने लगीं और जहाँ पहिले ही से लोग बस चुके थे, वहाँ अधिकार जमाने के लिए युद्ध होने लगे। अधिकारलिप्सा की भावना ने लूट-मार और युद्धों की वृद्धि कर दी थी। युद्ध में शत्रुओं को जब बंदी बनाया जाता था तो उनमें से कुछ को वीरता, सुन्दरता या कलाविद् आदि होने के कारण गण में शामिल कर दिया जाता था, जो कि पूरी तरह गण के सम्बन्धी तथा सदस्य मान लिये जाते थे; लेकिन जिनको साम्यसंघ की छोटी आर्थिक अवस्था में नहीं खपाया जा सकता था उन्हें, परिश्रम द्वारा अधिक फल की प्राप्ति न होने की संभावना से, मार दिया जाता था। उनको साम्यसंघ का शत्रु समझा जाता था और पुरुषमेध की योजना कर उन्हें अग्नि में बलिदान कर दिया जाता था। बाद में उन्हें मारा नहीं दिया जाता था, बल्कि उनके बदले अग्नि में घी की आहुति देकर उन्हें छोड़ दिया जाता था या दास बना लिया जाता था। विकास की अवस्थाएँ ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती गयीं, श्रम का मूल्य बढ़ने लगा। ऐसी दशा में युद्ध-बंदियों को आर्य लोग अग्नि में झोंक देने या भगा देने की अपेक्षा अपना दास बनाने लगे थे। “व्यक्तिगत संपत्ति और वर्ग समाज के उदय होने के साथ-साथ आर्यों के समाज ने शीघ्र ही देखा कि आचारशास्त्र का एक नियम—जो सामूहिकतावादी व्यवस्था में सबके हितों को साधता हुआ भुखमरी से सबकी रक्षा करने और साम्यसंघ के हर सदस्य के बीच एक समान की वितरण शर्त थी—किस प्रकार से अपने विरोधी रूप में प्रकट हुआ। किस तरह वही नियम उत्पीड़न, एकाधिपत्य, थोड़े से शोषकों के वर्ग के पास संपत्ति के संचय कराने में सहायक हुआ और बहु-संख्यक श्रमिकों, दुर्बलों, रोगियों, वृद्धों, दरिद्रों तथा असंख्य गरीब गृहस्थों, नये कलियुग की संस्कृति में दासों और चाकरों के लिए भुखमरी का कारण बन गया” ( डाँगे, पृ० १४१ ) ।

वर्ण-विभाजन : आर्यजातियों की प्रथम विकासावस्था में उत्पादन, कार्य और श्रम की अनेकता के कारण श्रम का विभाजन शुरू हुआ। इससे साम्य-संघ के सदस्यों के बीच भेद पड़ने लगा, और फलतः वे अलग-अलग कार्यों को अपना कर वर्गों में विभक्त होने लगे। लेकिन विकास की इस पहिली

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स्थिति में व्यक्तिगत संपत्ति की भावना न होने के कारण उन वर्गों में पारस्परिक विरोध या द्वेष उत्पन्न नहीं हुआ था। विकास की दूसरी अवस्था में आर्यों के विभिन्न गणों के बीच संपर्क और संघर्ष होना आरम्भ हुआ; और तभी से अतिरिक्त उत्पादन का विनिमय प्रारम्भ हुआ। इन वर्गों ने अपने को अन्य विरोधी वर्गों में बांट लिया था और आदिम साम्यसंघ सदा के लिए छिन्न-भिन्न होकर उनके बीच गृहयुद्ध या वर्गयुद्ध आरम्भ हो गया।

ऐसी स्थिति में उन्नतिशील साम्यसंघ को बाध्य होकर युद्ध-संचालन और सुरक्षा-संबंधी कार्यों को विशेष रूप से निर्वाचित व्यक्तियों एवं अधिकारियों के हाथ में सौंप देना पड़ा। जिन्होंने युद्ध का संचालन और सुरक्षा के अधिकारों को अपने हाथ में लिया वे क्षत्र हो गए। जिन्होंने ऋतुओं का विचार, बाढ़ तथा नदियों आदि की गति को जानने का कार्य संभाला वे ब्राह्मण कहलाये और बाकी जो लोग बच गये थे उन्हें विश या सामान्य लोग कहा जाने लगा, जिनकी संख्या सबसे अधिक थी। ये लोग पशु-पालन, कृषि, दस्तकारी आदि कार्य करते थे। धीरे-धीरे जब श्रम की सामूहिक स्थिति टूटने लगी तो विनिमय के साधन धन-संपत्ति का सर्वाधिकार क्षत्र ( प्रजापतियों ) तथा ब्राह्मण ( गणपतियों ) के हाथों में संचित होने लगा। इस प्रकार समाज दो प्रमुख वर्गों में बँट गया। एक ओर तो धन-संपत्ति वाले क्षत्र तथा ब्राह्मण थे और दूसरी ओर परिश्रम करने वाले विश तथा अन्य लोग हो गये। सारा समाज अमीरों और गरीबों में बँट गया। ऐसे समाज में दास या शूद्रों के लिए कोई स्थान न था। ये दास या शूद्र आर्य थे, जिन्हें युद्ध में बंदी बनाया जाता था तथा दूसरों के हाथ बेचा जा सकता था। उनका न कोई परिवार था न कोई देवता।

सर्वहारा वर्ग : यज्ञ-फल के उत्पादन का उपयोग पहिले सब लोग समान-रूप से करते थे; किन्तु बाद में अकेले ब्राह्मण ही उनके स्वामी बन गये। क्षत्र सरदारों का भी यही हाल था। केवल विश ही ऐसे थे जो शूद्रों के साथ मिल कर कठोर परिश्रम करके भी दरिद्रता का जीवन बिता रहे थे। श्री डांगे महोदय ने अपनी पुस्तक में वैदिक युग में सर्वथा असमान समाज का स्वरूप और उसके प्रति ऋग्वेद के कवि का विक्षोभ इस प्रकार उद्धृत किया है।

"क्या ईश्वर के हाथों में मनुष्य के लिए अकेला दण्ड भूख है ? अगर देवता की यह इच्छा है कि गरीब लोग भूख से मरें, तो धनी लोग अमर क्यों नहीं हैं ? मूर्ख ( धनी ) के पास भोजन का जमा होना किसी की भलाई नहीं करता। वह सिर्फ अपने-आप ही खाता है, अपने दोस्तों को भोजन नहीं देता है। लोग उसकी बुराई करते हैं" ( ऋग्वेद १०।११७ ) ।