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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

१८ ज्ञानयोग

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१८ ज्ञानयोग

हमारी बुद्धि, ज्ञान, जीवन, प्रत्येक घटना में यही विषम विरुद्ध भाव दिखाई पड़ता है। सुख दुःख का और दुःख सुख का अनुगामी हो रहा है। सुधारक आते हैं और किसी जाति के दोषों को दूर करने का प्रयत्न करते हैं, किन्तु इसी बीच मे किसी दूसरी दिशा में बीस हजार दोष उस सुधार से पहले ही उठ खडे होते हैं। पतनोन्मुख जीर्ण अट्टालिका की भाँति एक स्थान पर जीर्णोद्धार करते करते दूसरे स्थान पर जीर्णता आक्रमण कर देती है। भारतीय स्त्रियों के बालविधवा हो जाने के दोष को दूर करने के लिये हमारे सुधारक लोग चीत्कार तथा प्रचार कर रहे हैं। किन्तु पाश्चात्य देशों मे अविवाहित रहना ही प्रधान दोष माना जाता है। एक स्थान पर अविवाहिताओ का कष्ट दूर करने मे सहायता करनी होगी तो दूसरे स्थान पर विधवाओं का कष्ट मिटाने का यत्न करना होगा; शरीर मे पुरानी वातव्याधि के समान शिर-स्थान से हटाने पर यह कमर आदि का आश्रय ले लेती है, वहाँ से हटाने पर पैरों का आश्रय ढूँढती है।

कोई कोई दूसरों की अपेक्षा अधिक धनवान हो गये हैं—विद्या, सम्पत्ति और ज्ञानानुशीलन केवल उन्हीं की सम्पत्ति हो गये हैं। ज्ञान कितना महत्तर और मनोहर है, ज्ञानानुशीलन कितना सुन्दर है! यह केवल कुछ लोगों के हाथ में है। कितनी भयानक बात है। अब सुधारक आये और सर्वसाधारण में इस ज्ञान का विस्तार करने लगे। इससे जनसाधारण एक प्रकार से कुछ सुखी हुए अवश्य, किन्तु ज्ञानानुशीलन जितना ही अधिक होने लगा, शारीरिक सुख शायद उतना ही अन्तर्हित होने लगा। अब कौन से मार्ग का अवलम्बन किया जाय?—क्योकि सुख के ज्ञान से ही तो दुःख का

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माया १९.

ज्ञान् होता है। हम लोग जो थोड़ासा सुख भोग रहे है, अन्य कहीं पर उससे उतना ही दुःख उत्पन्न हो रहा है। सभी वस्तुओ की यही अवस्था है। युवकगण शायद इस बात को न समझ पायें। किन्तु जिन्होने संसार मे बहुत दिन बिताये है, जिन्होने बहुतसी यंत्रणाये भोगी है वे इस बात को समझ सकेंगे। यही माया है। दिन रात ये समस्त व्यापार संघटित हो रहे है, किन्तु इनकी ठीक प्रकार से मीमांसा करना असम्भव है। इस प्रकार यह सब जो हो रहा है उसका कारण क्या है? इस विषय मे वास्तव मे न्यायसंगत कोई प्रश्न ही नही हो सकता; अतएव इस प्रश्न का उत्तर भी असम्भव है। इसका कारण जाना नहीं जा सकता। उत्तर देने से पहले इसका तात्पर्यबोध ही नहीं होगा, यह क्या है यह हम नहीं जान सकते। हम इसे एक क्षण को भी स्थिर नही रख सकते—प्रति क्षण यह हमारे हाथ से निकलता रहता है। हम सब अन्धे यंत्रो के समान परिचालित हो रहे हैं। यद्यपि हमने कभी कभी निःस्वार्थ भाव से जो कार्य किया है, परोपकार की जो चेष्टा की है उसे स्मरण करके कह सकते है, ‘क्यो, यह कार्य तो हमने समझ बूझ कर, सोच विचार कर किया था।’ किन्तु वास्तव मे हम उन कार्यों को किये बिना रह ही नहीं सकते थे, इसी कारण उन्हे किया था। मुझे इसी स्थान पर खड़े हो कर आप लोगो को भाषण द्वारा उपदेश देना पड़ रहा है और आप लोगो को बैठ कर इसे सुनना पड़ रहा है, यह भी हम लोग बिना किये रह नहीं सकते इसीलिये कर रहे है। आप घर लौट जायेंगे, शायद कुछ लोग थोड़ी बहुत शिक्षा भी प्राप्त करेगे. दूसरे शायद मन मे कहेगे, यह आदमी व्यर्थ ही वक रहा है। मैं भी घर चला जाऊँगा और सोचूँगा कि मैने आज भाषण दिया। यही माया है।

२० ज्ञानयोग

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२० ज्ञानयोग

अतएव इस संसार की गति के वर्णन का नाम ही माया है। साधारणतया लोग यह बात सुन कर भयभीत हो जाते हैं। हमें साहसी होना पड़ेगा। अवस्था के विषय को छिपाने से रोग का प्रतिकार नहीं होगा। कुत्तो से पीछा किये जाने पर जिस प्रकार खरगोश अपने मुँह को टाँगों मे छिपा कर अपने को निरापद समझता है, उसी प्रकार हम लोग भी आशावादी अथवा निराशावादी होकर ठीक उस खरगोश के समान कार्य करते है। यह रोगमुक्ति की औषधि नहीं है।

दूसरी ओर सांसारिक जीवन की प्रचुरता, सुख और स्वच्छन्दता भोगने वाले इस मायावाद के सम्बन्ध मे बड़ी आपत्तियाँ उठाते है। इस देश में, इंग्लैण्ड मे निराशावादी होना बहुत कठिन है। सभी मुझसे कहते है—जगत् का कार्य कितने सुंदर रूप से चल रहा है, जगत् कितना उन्नतिशील है ! किन्तु वे अपने जीवन को ही अपना जगत् समझते है। एक पुराना प्रश्न उठता है—ईसाई धर्म ही एक मात्र धर्म है। कारण, ईसाई धर्म को मानने वाली सभी जातियाँ समृद्धिशाली हैं। इस प्रकार की युक्ति से तो यह सिद्धान्त स्वयं ही भ्रामक सिद्ध हो जाता है। अन्य जातियो का दुर्भाग्य ही तो ईसाई जातियों की समृद्धि का कारण है, क्योकि एक का सौभाग्य दूसरो के शोणित द्वारा शोषण के बिना नही बनता। तो जब समस्त पृथिवी ईसाई धर्म को ही मानने लगेगी तब भक्ष्य स्वरूप इतर जातियो का नाश करने वाली ईसाई जाति स्वयं ही दरिद्र हो जायगी। अतः इस युक्ति ने अपना ही खण्डन कर दिया। उद्भिज पशुओ के लिये अन्न स्वरूप है, मनुष्य पशुओ का भोक्ता है, और सब से अधिक गर्हित कार्य यह है कि मनुष्य एक दूसरे का, दुर्बल बलवान् का भक्ष्य बन रहा है। यही हाल सर्वत्र विद्यमान्

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माया <span style="float: right;">२१</span>

है। यही माया है। इस रहस्य की आप क्या मीमांसा करते है ? हम प्रतिदिन ही नई नई युक्तियाँ सुनते है। कोई कहते है, अन्त मे सब का कल्याण होगा। इस प्रकार की सम्भावना अत्यन्त संदेहास्पद होने पर भी हम ने स्वीकार कर ली। किन्तु इस पैशाचिक उपाय से मंगल होने का कारण क्या है ? पैशाचिक रीति को छोड़ कर क्या मंगल द्वारा ही मंगलसाधन नही हो सकता ? वर्तमान मनुष्यो की सन्तान सुखी होगी; किन्तु उससे हमे क्या फल मिलेगा जिसके लिये हम इस समय ये भयानक यन्त्रणाये भोग रहे हैं ? यही माया है। इसकी मीमांसा नहीं है। सुना जाता है कि दोषों का क्रमशः धीरे धीरे दूर होता जाना क्रमविकासवाद ( Darwin's Evolution ) की एक विशेषता है; संसार से दोष का इस प्रकार क्रमशः दूर हो जाने पर अन्त मे केवल मंगल ही मंगल रह जायगा। सुनने मे तो बड़ा अच्छा लगता है। इस ससार मे जिसके पास सब वस्तुओ का प्राचुर्य है, जिन्हे प्रतिदिन कठोर यन्त्रणा सहनी नही पडती, जिन्हे क्रमविकास के चक्र मे पिसना नहीं पडता, उन लोगों के दम्भ को इस प्रकार के सिद्धान्त बढ़ा सकते है। सचमुच ही उनके लिये ये सिद्धान्त अत्यन्त हितकर और शान्तिप्रद हैं। साधारण जनसमूह यन्त्रणा भोगा करे—इनकी क्या हानि है ? वे सब मारे जायें—इसके लिये ये सोच विचार क्यों करे ? ठीक बात है, किन्तु यह युक्ति आदि से अन्त तक भ्रमपूर्ण है। प्रथम तो, ये लोग बिना किसी प्रमाण के ही धारणा कर लेते हैं कि संसार मे अभिव्यक्त मंगल और अमंगल का परिमाण एकदम निर्दिष्ट है। दूसरे, इससे भी अधिक दोषयुक्त धारणा यह है कि मंगल का परिमाण तो क्रमवृद्धि-शील है और अमंगल निर्दिष्ट परिमाण मे विद्यमान रहता है। अतएव ऐसा समय आयेगा कि जब अमंगल का अंश इसी प्रकार क्रमविकास

२२ ज्ञानयोग

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२२ ज्ञानयोग

के द्वारा घट जाने पर अन्त में बिलकुल नष्ट हो जायगा और केवल मंगल ही विराजित रहेगा—यह कहना बड़ा सरल है। किन्तु क्या यह प्रमाणित किया जा सकता है कि अमंगल का परिमाण निर्दिष्ट रहता है ? क्या अमगल की भी क्रमशः वृद्धि नहीं हो रही है ? एक जंगली मनुष्य है जो मनोवृत्तियों के परिचालन से सर्वथा अनभिज्ञ है, एक पुस्तक भी नहीं पढ़ सकता, हस्तलिपि किसे कहते है, उसने कभी सुना भी नहीं; आज रात को उसके बीस टुकड़े कर दो, कल वह स्वस्थ हो उठेगा। धार धरा हुआ अस्त्र उसके शरीर मे घुसा कर बाहर निकाल लो, फिर भी वह अच्छा हो जायगा; किन्तु हम अधिक सभ्य होने पर भी मार्ग मे चलते हुए ठोकर खाते ही मर जाते हैं।

मशीनो के द्वारा धन आदि सुलभ हो रहा है; उन्नति और क्रमविकास की वृद्धि हो रही है; किन्तु एक व्यक्ति धनी हो जायगा इसलिये लाखो मनुष्यो को पीसा जा रहा है—एक व्यक्ति धनवान बने इसलिये सहस्रो मनुष्य दरिद्र से दरिद्रतर हो रहे हैं—संख्यातीत मनुष्य के वंशज क्रीतदास बनाये जा रहे हैं। जगत् की धारा ही ऐसी है। जो मनुष्य पशुवत् हैं उनके समस्त सुखभोग इन्द्रियो में ही सीमित हैं; उनके दुख और सुख इन्द्रियों के भीतर ही सन्निविष्ट हैं। यदि उसे पर्याप्त भोजन नहीं मिलता अथवा उसे कोई शारीरिक रोग या कष्ट होता है तो वह अपने को अभागा समझता है। इन्द्रियो मे ही उसके सुख-दुख का उत्थान और पर्यवसान हो जाता है। इस प्रकार के व्यक्ति की जब उन्नति होती रहती है तो उसके सुख की सीमा के विस्तार के साथ ही साथ उतने ही परिमाण में उसके दुःख की भी वृद्धि होती जाती है। जंगली मनुष्य ईर्ष्या के वश में होना

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माया २३

नहीं जानता, कचहरी में जाना नहीं जानता, वह नियमित कर देना नहीं जानता, समाज द्वारा निन्दित होना नहीं जानता, पैशाचिक मानव-प्रकृति से उत्पन्न जो भीषण अत्याचार एक दूसरे के हृदय के गुप्त से गुप्त भावो का अन्वेषण करने मे लगा हुआ है उसके द्वारा वह दिन रात पर्यवेक्षित होना नहीं जानता। वह नहीं जानता कि भ्रान्तज्ञान से सम्पन्न गर्वित मानव किस प्रकार पशु से भी सहस्र गुना पैशाचिक स्वभाव वाला हो जाता है। इसी प्रकार हम जिस समय इन्द्रियपरायणता से उन्मुक्त होने लगते है, हमारी सुखानुभव की उच्चतर शक्ति की वृद्धि के साथ साथ यन्त्रणानुभव की शक्ति की भी पुष्टि होती है। स्नायुमण्डल और भी सूक्ष्म होकर अधिक यन्त्रणा के अनुभव मे समर्थ हो जाता है। सभी समाजो मे यह बात दिन प्रति दिन प्रत्यक्ष होती जाती है कि साधारण मूर्ख मनुष्य तिरस्कृत होने पर अधिक दुःखी नही होता किन्तु अधिक प्रहार होने पर दुःखी हो जाता है। सभ्य पुरुष एक बात भी सहन नही कर सकते। उनका स्नायुमण्डल इतना सूक्ष्म भावग्राही हो गया है। उनकी सुखानुभूति सहज हो गई है इसीलिये उनका दुख भी बढ़ गया है। दार्शनिक पण्डितो का क्रमविकास-वाद इसके द्वारा अधिक समर्थित नही होता। हम अपनी सुखी होने की शक्ति को जितना ही बढ़ाते है, हमारी यन्त्रणा-भोग की शक्ति उसी परिमाण मे बढ़ जाती है। मेरा विनीत मत यही है कि हमारी सुखी होने की शक्ति यदि समयुक्तान्तर श्रेणी के नियम (Arithmetical Progression) से बढ़ती है तो दूसरी ओर दुखी होने की शक्ति समगुणितान्तर श्रेणी (Geometrical Prog-

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२४ ज्ञानयोग

ression) * के नियम से बढ़ेगी। जंगली मनुष्य समाज के सम्बन्ध मे अधिक नहीं जानता। किन्तु हम उन्नतिशील लोग जानते है कि हम जितने ही उन्नत होगे, हमारी सुख और दुःख के अनुभव करने की शक्ति उतनी ही तीव्र होगी। हममे से तीन चौथाई मनुष्य जन्म से ही जो पागल रहते है यह प्रायः सभी जानते है। यही माया है।

अतएव, हम देखते है कि माया संसार-रहस्य की व्याख्या करने के निमित्त कोई विशेष मतवाद नहीं है। संसार मे घटनांये जिस प्रकार होती रही हैं, माया उन्हीं का वर्णन मात्र है। विरुद्ध भाव ही हमारे अस्तित्व की भित्ति है; सर्वत्र इन्हीं भयानक विरुद्ध भावों के बीच मे से होकर हम चलते हैं। जहाँ मगल है वहीं अमगल रहता है; जहाँ अमंगल है वहीं मंगल है। जहाँ जीवन है मृत्यु वहीं छाया की भाँति उसका अनुसरण कर रही है। जो हँस रहा है उसीको रोना पड़ेगा; जो रो रहा है वह भी हँसेगा। यह क्रम बदल नहीं सकता। हम लोग अवश्य ही ऐसे स्थान की कल्पना कर सकते है जहाँ केवल मङ्गल ही रहेगा, अमङ्गल रहेगा नही; जहाँ हम केवल हँसेंगे, रोयेगे नही। किन्तु जब तक ये सब कारण समान रूप से विद्यमान हैं तब तक इस प्रकार का संघटन स्वयं ही असम्भव है। जहाँ हमें हँसाने की शक्ति विद्यमान है वहीं रुलाने की भी शक्ति प्रच्छन्न रूप से विद्यमान है; जहाँ सुख उत्पन्न करने वाली शक्ति विद्यमान है दुःख देने वाली शक्ति भी वही छिपी हुई है।


* समयुक्तान्तर श्रेणी नियम जैसे ३।५।७।९ इत्यादि, यहाँ पर प्रत्येक परवर्ती अपने पूर्ववर्ती अङ्क से दो दो अधिक है। समगुणितान्तर जैसे ३।६।१२।२४ इत्यादि यहाँ पर प्रत्येक परवर्ती अङ्क अपने पूर्ववर्ती अङ्क का दुगुना है।

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माया २९

अतएव वेदान्त-दर्शन आशावादी अथवा निराशावादी नहीं है। वह तो दोनो ही बातों का प्रचार करता है; सारी घटनाये जिस प्रकार होती है वह उसे उसी रूप में ग्रहण करता है; अर्थात् उसके मत मे यह संसार मङ्गल और अमङ्गल, सुख और दुःख का मिश्रण है; एक को बढ़ाओ, दूसरा भी साथ साथ बढ़ेगा। केवल सुख का संसार अथवा केवल दुःख का संसार होही नहीं सकता। इस प्रकार की धारणा ही स्वतःविरोधी है। किन्तु इस प्रकार का मत व्यक्त करके और इस विश्लेषण के द्वारा वेदान्त ने यही एक महारहस्य का मर्म निकाला है कि मङ्गल और अमङ्गल ये दो एकदम विभिन्न सत्तायें नहीं है। इस संसार मे ऐसी एक भी वस्तु नहीं है जिसे एकदम मंगल जनक या एकदम अमङ्गल जनक कहा जा सके। एक ही घटना जो आज शुभ जनकं मालूम पड़ती है, कल अशुभ मालूम पड सकती है। एक ही वस्तु जो एक व्यक्ति को दुःखी करती है दूसरे को सुखी बना सकती है। जो अग्नि बच्चे को जला देती है, वही अनशन से जर्जर व्यक्ति के लिये उत्तम खाद्यान्न भी पका सकती है। जिस स्नायुमण्डल के द्वारा दुःख का ज्ञान हमारे अन्दर प्रवेश करता है, सुख का ज्ञान भी उसी के द्वारा हमे मिलता है। अमङ्गल का निवारण करने का एक मात्र उपाय मङ्गल का निवारण ही है, अन्य कोई उपाय नहीं है—यह निश्चित है। मृत्यु का निवारण करने के लिये जीवन का निवारण करना पड़ेगा। मृत्युहीन जीवन और असुख-हीन सुख ये बातें अपनी ही विरोधी हैं, इनमे कोई सत्य नहीं है। कारण, दोनो ही एक ही वस्तु का विकास हैं। कल जो शुभदायक लगता था आज वह वैसा नहीं लगता। जब हम विगत जीवन की आलोचना

२६ ज्ञानयोग

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२६ ज्ञानयोग

करते है, विभिन्न युगो के समस्त आदर्शों की आलोचना करते है, तभी इस बात की सत्यता दिखाई पडती है। एक समय था जब कि सुन्दर तेजस्वी घोड़ो की जोड़ी को हाँक कर चलाना ही मेरा आदर्श था, अब वह भावना नहीं होती। बचपन मे सोचता था कि अमुक मिठाई प्रस्तुत कर लेने पर मै पूर्ण सुखी होऊँगा। कभी सोचता था, स्त्री-पुत्र से युक्त तथा प्रचुर धनसम्पन्न होने पर सुखी होऊँगा। अब वे सब लड़कपन की बाते सोच कर हँसी आती है। वेदान्त कहता है कि जिन समस्त आदर्शों का अवलम्बन करते हुए, अपने शारीरिक व्यक्तित्व का परिहार करने मे, हममे भय का सञ्चार होता है, समय आने पर उन्ही आदर्शों को देखकर हम हँसेगे। सभी अपनी अपनी देह की रक्षा करने मे व्यग्र है। कोई भी इसका परित्याग करने की इच्छा नही करता। इस देह की यथेच्छ समय तक रक्षा कर लेने पर हम अत्यन्त सुखी होगे, हम सब इसी रूप मे सोचते है। किन्तु समय आने पर यह बात भी याद करके हम हँसेगे। अतएव, यदि हमारी वर्तमान अवस्था सत् भी नही है, असत् भी नही है—किन्तु दोनो का संमिश्रण है, असुख भी नही है, सुख भी नहीं है—किन्तु दोनो का ही संमिश्रण है, इस प्रकार का विषम विरुद्ध भाव जब उत्पन्न हुआ तब वेदान्त की आवश्यकता क्या है? अन्यान्य दर्शनशास्त्र तथा धर्ममतादिको की भी क्या आवश्यकता है? विशेषतः शुभ कर्म आदि करने का ही क्या प्रयोजन है? यही प्रश्न मन मे उठता है, कारण, लोग यही पूछेगे कि यदि शुभ कर्म करने का यत्न करने पर अमंगल रहना ही है एव सुखोत्पादन का यत्न करने पर पर्वत के समान असुख की राशि उपस्थित हो जानी है तब फिर इस यत्न की आवश्यकता ही

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माया २७

क्या है ? इसका उत्तर यह है कि—पहले तो दुःख को दूर करने के लिये तुम्हे कर्म करना पड़ेगा; कारण, स्वयं सुखी होने का यही एक मात्र उपाय है। हममे से प्रत्येक अपने अपने जीवन मे शीघ्र या देरी मे इस बात की यथार्थता को समझ लेते है। तीक्ष्णबुद्धि लोग कुछ शीघ्र और मन्दबुद्धि लोग कुछ देर मे इसे समझ सकते हैं ! मन्दबुद्धि लोग उत्कट यन्त्रणा भोगने के बाद तथा तीक्ष्ण-बुद्धि लोग थोड़ी यन्त्रणा पाने के बाद ही इसे समझ जाते है। दूसरे, यद्यपि हम जानते है कि यह जगत् केवल सुखपूर्ण हो, दुःख न रहे—ऐसा समय कभी भी न आयेगा, तथापि हमे यही कार्य करना होगा। यदि दुख बढ़ता जाता है तो भी हम उस समय अपना कार्य करेगे। ये दोनो शक्तियाँ ही जगत् को जीवित रखेगी; अन्त में एक दिन ऐसा आयेगा कि जब हम स्वप्न से जागेगे एवं इस मिट्टी के पुतले का बनाना बन्द कर देगे। सचमुच हम चिरकाल मिट्टी के पुतले बनाने मे लगे है । हमे यह शिक्षा लेनी होगी; और यह शिक्षा प्राप्त करने में बहुत देर लगेगी ।

वेदान्त कहता है—अनन्त ही सान्त हो गया है। जर्मनी में इसी भित्ति के ऊपर दर्शन-शास्त्र-रचना की चेष्टा की गई थी। इंग्लैण्ड मे अब भी इस प्रकार की चेष्टा चल रही है ? किन्तु इन सब दार्शनिको के मत का विश्लेषण करने पर यही सारांश निकलता है कि अनन्तस्वरूप ( Hegel's Absolute Mind ) अपने को जगत् मे व्यक्त करने की चेष्टा कर रहा है। यदि यह बात सत्य मान ली जाय तो अनन्त कभी न कभी अपने को व्यक्त करने मे समर्थ हो ही जायगा। अतएव निरपेक्षावस्था विकासितावस्था से नीची है; कारण,

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विकसितावस्था मे ही तो निरपेक्ष स्वरूप अपने को व्यक्त कर रहा है। जब तक अनन्त स्वरूप अपने को सम्पूर्ण रूप से बाहर निकाल नहीं पाता तब तक हमे इसी अभिव्यक्ति मे उत्तरोत्तर सहायता करनी होगी। सुनने मे यह बात बड़ी मधुर है, और हमने अनन्त, विकास, व्यक्ति आदि दार्शनिक शब्दों का भी प्रयोग किया। किन्तु सान्त किस प्रकार अनन्त हो सकता है, एक किस प्रकार दो कोटि का हो सकता है, इस सिद्धान्त की न्यायसंगत मूलभित्ति क्या है, यह प्रश्न तो दार्शनिक पण्डित लोग स्वभावतः ही पूछ सकते है। निरपेक्ष एव अनन्त सत्ता सोपाधिक होकर ही इस जगत् रूप मे प्रकाशित हुई है। यहाँ पर सभी कुछ सीमाबद्ध रहेगा ही। जो कुछ भी इन्द्रिय, मन और बुद्धि के भीतर से आयेगा उसको स्वतः ही सीमाबद्ध होना पडेगा, अतएव ससीम का असीम होना नितान्त मिथ्या है। ऐसा हो ही नही सकता।

दूसरे पक्ष मे, वेदान्त कहता है, यह ठीक है कि निरपेक्ष एवं अनन्त सत्ता अपने को सान्त रूप मे व्यक्त करने की चेष्टा कर रही है। किन्तु एक समय ऐसा आयेगा जब इस उद्योग को असम्भव जान कर उसे अपने पाँव पीछे लौटाने पड़ेंगे। यह पीछे पाँव लौटाना ही यथार्थ धर्म का आरम्भ है। वैराग्य ही धर्म का प्रारम्भ है। आधुनिक मनुष्य से वैराग्य की बात कहना अत्यन्त कठिन है। अमेरिका मे मेरे बारे मे लोग कहते हैं कि मानो मै पाँच हजार वर्ष पूर्व के किसी अतीत और विलुप्त ग्रह से आकर वैराग्य का उपदेश दे रहा हूँ; इंग्लैंड के दार्शनिक पंडित शायद यही कहेगे। किन्तु वैराग्य और त्याग ही केवल इस जीवन की एक मात्र सत्य वस्तु है। प्राणपण से चेष्टा करके देखो यदि कोई दूसरा उपाय प्राप्त कर सकते हो। यह

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माया २९

कभी भी न हो सकेगा। ऐसा समय आयेगा जब अन्तरात्मा जागेगा—इस लम्बे विषादमय स्वप्न से जाग उठेगा; बालक खेल-कूद छोड़ कर अपनी जननी के निकट लौट जाने को उद्यत होगा। वह समझेगा—

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥

काम्य वस्तु के उपभोग से कभी वासना की निवृत्ति नहीं होती, वरञ्च घृताहुति के द्वारा अग्नि के समान वासना और भी बढ़ती है। इस प्रकार क्या इन्द्रिय विलास, क्या बुद्धि-वृत्ति के परिचालन से उत्पन्न आनन्द, क्या मानवात्मा का उपभोग्य सब प्रकार का सुख—सभी मिथ्या है—सभी माया के अधीन है। सभी इस संसार के बन्धन के अन्तर्गत हैं : हम उसे अतिक्रमण नहीं कर पाते। हम उसके अन्दर अनन्त काल पर्यन्त दौड़ते फिर सकते हैं, किन्तु उसका अन्त नहीं पा सकते; एवं जब भी हम सुख का कण प्राप्त करने की चेष्टा करेंगे तभी दुःख का ढेर हमे घेर लेगा। यह कितनी भयानक अवस्था है ! जब मैं इस पर विचार करने की चेष्टा करता हूँ, मुझे निःसंशय ही यह अनुभूति होती है कि यही मायावाद है—सभी कुछ माया है—यह वाक्य ही इसकी एक मात्र ठीक ठीक व्याख्या है। इस ससार मे क्या दुःख ही वर्तमान है ! यदि आप लोग विभिन्न जातियो के बीच परिभ्रमण करेंगे तो आप समझ सकेंगे कि यदि एक, जाति अपने दोष का एक उपाय के द्वारा प्रतिकार करने की चेष्टा कर रही है तो दूसरी किसी अन्य उपाय का अवलम्बन कर रही है। एक ही दोष को विभिन्न जातियो ने विभिन्न प्रकार से प्रतिरोध करने

३० ज्ञानयोग

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३० ज्ञानयोग

की चेष्टा की है किन्तु कोई भी कृतकार्य न हो सका। यद्यपि दोष को धीरे धीरे कम करते हुए किसी अंश मे रोका भी जा सकता है किन्तु दूसरे किसी अंश मे ढेर का ढेर अशुभ सञ्चित होता रहता है। इसकी गति ही ऐसी है। हिन्दुओं ने जाति के जीवन मे किसी प्रकार सतीत्व धर्म को उत्पन्न करने के लिये अपनी सन्तान को तथा धीरे धीरे समस्त जाति को बालविवाह के द्वारा अधोगामी कर दिया है। किन्तु यह बात भी मै अस्वीकार नही कर सकता कि बालविवाह ने हिन्दू जाति को सतीत्व धर्म से विभूषित किया है। तुम चाहते क्या हो ? यदि जाति को सतीत्व धर्म से थोडा बहुत विभूषित करना चाहते हो तो इसी भयानक बाल्यविवाह द्वारा समस्त स्त्रीपुरुषों को शारीरिक विषय मे अधोगामी करना पड़ेगा। दूसरी ओर क्या तुम्हारी जाति विपत्तियो से रहित है ? कभी नहीं। कारण, सतीत्व ही जाति की जीवनी शक्ति है। क्या आप ने इतिहास में नही पढा है कि जातियो की मृत्यु का चिन्ह असतीत्व के भीतर से ही आता है—जब यह किसी जाति के भीतर प्रवेश करता है तभी उसका विनाश निकट पहुँचता है। इन सब दुःखजनक प्रश्नों की मीमांसा कहाँ मिलेगी ? यदि माता-पिता अपनी सन्तान के लिये पात्र या पात्री का निर्वाचन करे तब इस तथाकथित प्रेम के दोष का निवारण हो सकता है। भारत की बेटियाँ भावुक होने की अपेक्षा कार्यकुशल अधिक होती है। उनके जीवन में कल्पनाप्रियता को अधिक स्थान नही मिलता। किन्तु यदि लोग अपने आप ही स्वामी और स्त्री का निर्वाचन करते है तब उन्हे इससे अधिक सुख नहीं मिलता। भारतीय नारियाँ अधिक सुखी है। स्त्री और स्वामी के बीच कलह अधिकांश नहीं होता। दूसरी ओर अमेरिका मे जहाँ स्वाधीनता की अधिकता है वहाँ सुखी

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माया

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परिवार बहुत कम देखने मे आते है। थोडे बहुत सुखी परिवार हो भी सकते है, परन्तु असुखी परिवारों तथा असुखकर विवाहों की सख्या वर्णनातीत है। मै जिस किसी सभा मे गया हूँ, वहाँ सुनता हूँ कि उसमे उपस्थित एक तिहाई स्त्रियों ने अपने पति-पुत्रो को बहिष्कृत कर दिया है। इसी प्रकार सभी जगह है। इससे क्या सिद्ध होता है ? सिद्ध होता है कि इस सब आदर्श के द्वारा अधिक सुख प्राप्त नहीं हो सकता। हम सभी सुख के लिये उत्कट चेष्टा कर रहे है, किन्तु एक ओर कुछ प्राप्त होने के पहले ही दूसरी ओर दुःख उपस्थित हो जाता है।

तब क्या हम कोई भी शुभ कर्म न करे ? अवश्य करे, और पहले की अपेक्षा अधिक उत्साहित होकर हम इस कार्य को करे। किन्तु यही ज्ञान-शिक्षा हमारे औद्धत्य एवं तआस्सुव ( Fanaticism ) को नष्ट करेगी। तब अगरेज उत्तेजित होकर हिन्दू को “ओह्, पैशाचिक हिन्दू! नारियो के प्रति कैसा असद्व्यवहार करता है!”—यह कहकर अभिशप्त नही करेगे। तब वे विभिन्न जातियों की प्रथाओं को आदरणीय बनाने की शिक्षा देगे। तआस्सुब कम होगा, कार्य अधिक होगा। तआस्सुब मे आदमी अधिक कार्य नही कर पाता। वह अपनी शक्ति का तीन चौथाई व्यर्थ ही व्यय कर देता है। जिन्हे धीर प्रशान्त चित्त 'काम के आदमी' कह कर पुकारा जाता है वे ही कर्म करते है। निरर्थक वाक्यपटु तआस्सुबी व्यक्ति कुछ भी नहीं कर पाता। अतएव इसी ज्ञान के द्वारा कार्यकारिणी शक्ति की वृद्धि होगी। घटनाचक्र ऐसा ही है, यह जान कर हमारी तितिक्षा भी अधिक होगी। दुःख और अमङ्गल के दृश्य

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ज्ञानयोग

हमे साम्यभाव से च्युत नहीं कर सकेगे और छाया के पीछे पीछे दौड़ा नहीं सकेगे। अतएव संसार की गति ही ऐसी है यह जान कर हम सहिष्णु बनेगे। उदाहरण स्वरूप हम कह सकते है कि सभी मनुष्य दोषशून्य हो जायेगे, पशु भी मनुष्यत्व प्राप्त कर इसी अवस्था में से होकर गुजरेगे और वनस्पतियो की भी यही दशा होगी। किन्तु यह एक बात निश्चित है—यह महती नदी प्रबल वेग से समुद्र की ओर बह रही है; तृण, पत्ते आदि सब इसके स्रोत मे बह रहे है और सम्भवत विपरीत दिशा में बहने की भी चेष्टा कर रहे है, किन्तु ऐसा समय आयेगा जब प्रत्येक वस्तु उस समुद्र के वक्षःस्थल मे खिंच कर पहुँच जायगी। अतएव, जीवन समस्त दुःख और क्लेश, आनन्द, हास्य और क्रन्दन के सहित उसी अनन्त समुद्र की ओर प्रबल वेग से प्रवाहित हो रहा है, यह निश्चित है और केवल समय का प्रश्न है जब कि तुम, मै, जीव, उद्भिद् और साधारण जीवाणु रूप जो कुछ भी जहाँ पर है, रह चुका है, सब कुछ उसी अनन्त जीवन-समुद्र में—मुक्ति और ईश्वर में पहुँचकर रहेगा।

मै एक बार फिर कहता हूँ कि वेदान्त का दृष्टिकोण आशावादी अथवा निराशावादी नहीं है। यह संसार केवल मंगलमय है अथवा केवल अमंगलमय है ऐसा मत यह व्यक्त नहीं करता। वह कहता है कि हमारे मंगल और अमंगल दोनो का मूल्य बराबर है। ये दोनो इसी प्रकार हिलमिल कर रहा करते है। संसार ऐसा ही है, यह समझ कर तुम सहिष्णुता के साथ कर्म करो। किन्तु किम क्रिय? यदि घटनाचक्र इसी प्रकार का है तो हम क्या करे? हम अज्ञेयवादी क्यो न हो जायें? आजकल के अज्ञेयवादी भी तो कहते है कि

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माया ३३

इस रहस्य की कोई मीमांसा नहीं है; वेदान्त की भाषा मे कहेगे कि इस मायापाश से मुक्ति नहीं है। अतएव सन्तुष्ट होकर सब उपभोग करो। किन्तु यहाँ भी एक अति असंगत महाभ्रम रह जाता है। और वह यह है। तुम जिस जीवन से चारो ओर से घिरे हुए हो उस जीवन के विषय में तुम्हारा ज्ञान किस प्रकार का है? क्या जीवन शब्द से तुम केवल पाँच इन्द्रियो से आबद्ध जो जीवन है उसे ही लेते हो? इन्द्रियात्म ज्ञान मे तो हम पशुओं से अधिक भिन्न नहीं है। किन्तु मुझे विश्वास है कि यहाँ बैठे हुए लोगो मे से एक भी ऐसा नहीं है जिसकी आत्मा सम्पूर्ण भाव से केवल इन्द्रियो मे आबद्ध हों। अतएव हमारे वर्तमान जीवन का अर्थ इन्द्रियात्म ज्ञान की अपेक्षा और भी कुछ है। सुखदुःख का अनुभव कराने वाली हमारी मनोवृत्ति और चिन्ता-शक्ति भी तो हमारे जीवन का प्रधान अंग है। और उस महान आदर्श अर्थात् पूर्णता की ओर अग्रसर होने की कठोर चेष्टा भी क्या हमारे जीवन का उपादान नहीं है? अज्ञेयवादियो के (Spencer's Agnosticism) मत में वर्तमान जीवन की रक्षा करना हमारा कर्त्तव्य है। किन्तु जीवन कहने से हमारे सामान्य सुखदुःख के साथ साथ हमारे जीवन के अस्थि मज्जा स्वरूप, अर्थात् सारभूत इस आदर्श के अन्वेषण की, इस पूर्णता की ओर अग्रसर होने की चेष्टा का भी तात्पर्य है। हमें इसी को प्राप्त करना होगा। अतएव हम अज्ञेयवादी नही हो सकते और अज्ञेयवादी के प्रत्यक्ष ससार को लेकर नहीं चल सकते। अज्ञेयवादी तो जीवन के उपयुक्त उपादान को छोड़कर अवशिष्ट अंश को सर्वस्व मानते हैं। वे इस आदर्श को ज्ञान का अगोचर कह कर इसके अन्वेषण का परित्याग कर देते है। यही स्वभाव, यही जगत्, इसे ही माया कहते हैं। वेदान्त

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३४ ज्ञानयोग

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३४ ज्ञानयोग

के शब्दों मे यही प्रकृति है। किन्तु चाहे देवोपासना के द्वारा हो, चाहे मूर्तिपूजा द्वारा, चाहे दार्शनिक विचारों के अवलम्बन से आचरित हो, अथवा देव चरित्र, पिशाच चरित्र, प्रेत चरित्र, साधु चरित्र, ऋषि चरित्र, महात्मा चरित्र अथवा अवतार चरित्र की सहायता से अनुष्टित हो, सभी धर्मों का, चाहे वे उन्नत धर्म हो चाहे अपरिणत, सभी का उद्देश्य एक ही है। सभी धर्म इस प्रकृति के बन्धन को तोडने की थोडी बहुत चेष्टा कर रहे है। सक्षेप मे सभी धर्म स्वाधीनता की ओर अग्रसर होने की कठोर चेष्टा कर रहे हैं। जाने या अनजाने मनुष्य समझ गये है कि वे बन्दी हैं। वे जो बनने की इच्छा करते है सो नहीं है। जिस समय, जिस मुहूर्त में उन्होने अपने चारों ओर दृष्टिपात किया उसी मुहूर्त मे वे समझ गये कि वे बन्दी है। उसी क्षण उन्हे अनुभूति हो गई कि वे बन्दी है। वे यह भी समझे कि इस सीमा से जकडा हुआ जो कोई भी उनके भीतर रह रहा है वह देह से भी अगम्य स्थान को उड जाना चाहता है। ससार के उन निम्नतम धर्मों मे भी जहाँ दुर्दान्त, नृशंस, आत्मीयों के घरो मे लुक छिप कर फिरने वाले, हत्या तथा सुराप्रिय मृत पितर या मृत-प्रेतों की पूजा की जाती है उनमे भी स्वाधीनता का यह भाव हम पाते हैं। जो लोग देवताओं की उपासना करते है वे उन्ही सब देवताओ को अपनी अपेक्षा अधिक स्वाधीन देखते है—द्वार बन्द होने पर भी देवता लोग घर की दीवारों को पार करके आ सकते है; दीवारे उनके मार्ग मे बाधक नहीं होतीं, ऐसा भक्त का विश्वास होता है। यही स्वाधीनता का भाव क्रमशः बढते बढते अन्त मे सगुण ईश्वर के आदर्श मे परिणत होता है। इस आदर्श का केन्द्रीय भाव है—ईश्वर माया से अतीत है। मुझे मानों ऐसा लगता है कि मै दूर से आता हुआ एक शब्द सुन रहा हूँ और देखता हूँ कि

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माया ३५

भारत के प्राचीन आचार्य, प्राचीन ऋषि जगल मे बैठे इस प्रश्न पर विचार कर रहे है, बड़े बडे वयोवृद्ध पवित्रमय महर्षिगण भी इसकी मीमांसा करने मे असमर्थ रहे है परन्तु एक बालक उनके बीच खड़े हो कर घोषणा करता है—" हे दिव्य धामवासी अमृत के पुत्रगण ! सुनो, मुझे मार्ग मिल गया है। जो अन्धकार से अतीत है उसे जान लेने पर अन्धकार के बाहर जाने का मार्ग मिल जाता है।

शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः ।
आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः ॥
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥
(श्वेताश्वतर उपनिषद्)

इसी उपनिषद् से हमे यह उक्ति भी मिलती है कि यह माया हमे चारों ओर से घेरे हुये है एवं वह अति भयङ्कर है। माया के बीच मे से होकर कार्य करना असम्भव है। जो यह कहता है कि “मै इस नदी के तट पर बैठा हूँ, जब सारा पानी समुद्र मे पहुँच जायगा तब मै नदी के पार जाऊँगा,” वह उतनी ही भूल करता है जितनी कि यह कहने वाला कि “जब तक पृथिवी पूर्ण मङ्गलमय नहीं हो जाती उतने दिन कार्य करते रहने के बाद सुख भोग करूँगा। दोनो ही बाते असम्भव है। माया के बीच मे से रास्ता नही है, माया के विरुद्ध चल कर ही रास्ता मिलेगा—यह बात भी माननी पड़ेगी। हमारा जन्म प्रकृति के सहायक रूप मे नहीं वरञ्च प्रकृति के विरोधी के रूप मे हुआ है। हम बन्धन के कर्ता होकर भी स्वय को बन्दी बनाने की चेष्टा करते है। यह मकान कहाँ से

३६ ज्ञानयोग

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३६ ज्ञानयोग

आया ? प्रकृति ने तो दिया नहीं। प्रकृति कहती है—' जाओ, वन मे जाकर बसो।' मनुष्य कहता है—“मै मकान बनाऊँगा, प्रकृति के साथ युद्ध करूँगा।” और वह यही कर रहा है । मानव जाति का इतिहास प्राकृतिक नियमो के साथ युद्ध का इतिहास है और मनुष्य की ही अन्त मे प्रकृति पर विजय होती है। अन्तर्जगत् मे आकर देखो, वहाँ भी यही युद्ध चल रहा है, यही पाशव मानव और आध्यात्मिक मानव का संग्राम, प्रकाश और अन्धकार का संग्राम निरन्तर जारी है। मानव यहाँ भी जीत रहा है। स्वाधीनता की प्राप्ति के लिये प्रकृति के बन्धन को चीर कर मनुष्य अपने गन्तव्य मार्ग को प्राप्त करता है । हमने अभीतक माया का ही वर्णन देखा है । वेदान्ती पण्डितो ने इस माया को अतिक्रमण करके ऐसी किसी वस्तु को जान लिया है जो माया के अधीन नही है, और यदि हम उसके पास पहुँच सके तो हम भी माया के पार हो जायेंगे । ईश्वरवादी सभी धर्मों की यह साधारण सम्पत्ति है । किन्तु वेदान्त के मत मे यह धर्म का प्रारम्भ है, अन्त नहीं। जो विश्व की सृष्टि तथा पालन करने वाले है, जो मायाधिष्ठित हैं, जिन्हें माया या प्रकृति का कर्ता कहा जाता है, उन्हीं सगुण ईश्वर का ज्ञान वेदान्त का अन्त नही है । यही ज्ञान बढ़ते बढ़ते, अन्त मे वेदान्ती देखता है कि जिसे वह बाहर खडा हुआ समझता था वह उसके अन्दर ही है और वह स्वयं वही है । जो अपने को बद्धभावापन्न समझता था वह स्वयं ही वही मुक्त-स्वरूप है ।

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३. मनुष्य का यथार्थ स्वरूप

( लन्दन में दिया हुआ भाषण )

पञ्चेन्द्रियग्राह्य जगत् मे मनुष्य इतना अधिक आसक्त हो जाता है कि वह उसे सहज मे ही त्याग करना नहीं चाहता । किन्तु वह इस बाह्य जगत् को चाहे कितना ही सत्य या साररूप क्यो न समझे प्रत्येक व्यक्ति तथा जाति के जीवन मे एक समय ऐसा आता है कि जब उसे अनिच्छा से भी जिज्ञासा करनी होती है, कि क्या यह जगत् सत्य है ? जिन व्यक्तियों को अपनी इन्द्रियो की गवाही मे अविश्वास करने का तनिक भी समय नहीं मिलता, जिनके जीवन का प्रत्येक क्षण किसी न किसी प्रकार के विषयभोग मे बीतता है, मृत्यु उनके भी सिरहाने आकर खड़ी हो जाती है और विवश होकर उन्हे भी कहना पड़ता है—क्या यह जगत् सत्य है ? इसी एक प्रश्न मे धर्म का आरम्भ होता है और इसी के उत्तर में धर्म की इति भी हो जाती है । इतना ही क्यो, सुदूर अतीत काल में जिसका निश्चित इतिहास भी अब नही मिलता, उसी रहस्यमय पौराणिक युग मे भी, सभ्यता के उस अस्फुट उषाकाल मे भी, हम देखते है कि यही एक प्रश्न उस समय भी पूछा गया है—क्या यह जगत् सत्य है ?

कवित्वमय कठोपनिषद् के प्रारम्भ मे हम यह प्रश्न देखते है, मनुष्य के मरने पर, कोई कोई लोग कहते है कि उसका अस्तित्व