ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
७८ ज्ञानयोग
७८ ज्ञानयोग
मनुष्य हो जायेंगे। जिस मार्ग से ब्रह्मलोक मे जाया जाता है, जहाँ से, पतन अथवा प्रत्यावर्तन की सम्भावना नहीं रहती उसे देवयान कहते हैं, और चन्द्रलोक के मार्ग को पितृयान कहते हैं।
अतएव वेदान्त-दर्शन के मत मे मनुष्य ही जगत् मे सर्वश्रेष्ठ प्राणी है और यह पृथ्वी ही सर्वश्रेष्ठ स्थान है, कारण कि एक मात्र यहीं पर मुक्त होने की सम्भावना है। देवता आदि को भी मुक्त होने के लिये मनुष्य-जन्म ग्रहण करना पड़ेगा। इसी मानव-जन्म मे ही मुक्ति की सब से अधिक सुविधा है।
अब हम इसके विरोधी मत की आलोचना करेंगे। बौद्ध लोग इस आत्मा का अस्तित्व एकदम अस्वीकार करते हैं। वे कहते हैं कि शरीर और मन के पीछे आत्मा नामक एक पदार्थ है, यह मानने की क्या आवश्यकता है? इस शरीर और मन का यन्त्र स्वतःसिद्ध है, यह कहने से क्या यथेष्ट व्याख्या नहीं हो जाती? और एक तीसरे पदार्थ की कल्पना से क्या लाभ? यह युक्ति खूब प्रबल है। जितनी दूर तक अनुसन्धान किया जाय, यही मालूम होता है कि यह शरीर और मन का यन्त्र स्वतःसिद्ध है, और हममे से अनेक इस तत्त्व को इसी भाव से देखते हैं। तब फिर शरीर और मन के अतिरिक्त अथच शरीर और मन के आश्रयभूमि स्वरूप आत्मा नामक एक पदार्थ के अस्तित्व की कल्पना की आवश्यकता क्या है? बस शरीर और मन कहना ही तो पर्याप्त है; नियत परिणामशील जड़स्रोत का नाम शरीर है और नियत परिणामशील चिन्तास्रोत का नाम मन है। तब जो एकत्व की प्रतीति हो रही है वह कैसे? बौद्ध कहते हैं कि यह एकत्व वास्तविक नहीं है। मान लो कि एक जलती मशाल को
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घुमाया जा रहा है। घुमाने पर एक ही अग्नि का वृत्तस्वरूप या गोल आकार हो जायगा। वास्तव में कोई वृत्त है नहीं, किन्तु मशाल के नियमित घूमने से उसने यह वृत्त का आकार धारण कर लिया है। इसी प्रकार हमारे जीवन मे भी एकत्व नही है; जड़ की राशि क्रमागत रूपं से चल रही है। सम्पूर्ण जड़राशि को एक कह कर संबोधित करने की इच्छा होगी तो कर सकते हो, किन्तु उसके अतिरिक्त वास्तव मे कोई एकत्व नहीं है। मन के सम्बन्ध मे भी यही बात है; प्रत्येक चिन्ता दूसरी चिन्ताओं से पृथक है। इस प्रबल चिन्तास्रोत मे ही इस भ्रमात्मक एकत्व का भाव रख दिया जाता है; अतएव फिर तीसरे पदार्थ की आवश्यकता क्या है ? यह जो कुछ देखा जाता है, यह जड़स्रोत और यह चिन्तास्रोत—केवल इन्हीं का अस्तित्व है; इनके बाद और कुछ सोचने की आवश्यकता ही क्या है ? अनेक आधुनिक सम्प्रदायों ने बौद्धों के इस मत को ग्रहण कर लिया है, किन्तु वे सभी इसे अपना अपना आविष्कार कह कर प्रतिपादित करना चाहते है। अधिकांश बौद्ध दर्शनो मे मोटी बात यही है कि यह दृश्यमान जगत् पर्याप्त है। इसके पीछे और कुछ है कि नहीं यह अनुसन्धान करने 'की बिलकुल ही आवश्यकता नहीं है। यह इन्द्रियग्राह्य जगत् ही सर्वस्व है—किसी वस्तु को इस जगत् के आश्रय रूप में कल्पना करने की आवश्यकता ही क्यो पड़ी ? सब ही गुणसमष्टि है। ऐसे अनुमानिक पदार्थ की कल्पना करने की क्या आवश्यकता है कि जिस मे वे सब गुण लगे रहे हो ? पदार्थ का ज्ञान आता है केवल गुणराशि के वेग से स्थान-परिवर्तन के कारण, कोई अपरिणामी पदार्थ वास्तव मे इनके पीछे है, ऐसी बात नहीं। हम देखते हैं कि यह युक्ति अति प्रबल है और साधारण मनुष्य की अनुभूति के पक्ष मे खूब सहायक
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हो जाती है। वास्तव में एक लाख मनुष्यों में एक व्यक्ति भी इस दृश्य जगत् से अतीत और किसी वस्तु की -धारणा भी कर सकता है कि नहीं इसमें सन्देह है। अधिकांश लोगों के लिये प्रकृति नित्य-परिणामशील मात्र है। हम लोगों मे भी कम लोगों ने हमारे सब के पीछे स्थित उस स्थिर समुद्र का कुछ कुछ आभास भी पाया होगा। हमारे लिये यह जगत् केवल तरंगपूर्ण है। इस प्रकार हमे दो मत मिलते हैं। एक तो यह कि शरीर और मन के पीछे एक अपरिणामी सत्ता रहती है; दूसरा यह कि इस जगत् में निश्चलत्व नामक कुछ भी नहीं है, सब कुछ चञ्चल है, सभी कुछ परिणाम है, जो हो अद्वैत-वाद में ही इन दोनो मतो का सामञ्जस्य मिलता है।
अद्वैतवादी कहते हैं, 'जगत् का एक अपरिणामी आश्रय है'—द्वैतवादियो की यह बात सत्य है। किसी अपरिणामी पदार्थ की कल्पना किये बिना हम परिणाम की कल्पना कर ही नहीं सकते। किसी अपेक्षाकृत अल्पपरिणामी पदार्थ की तुलना मे किसी पदार्थ की परिणाम के रूप मे चिन्ता की जा सकती है, और 'उसकी अपेक्षा 'भी अल्प परिणामी पदार्थ के साथ तुलना मे उसे भी परिणामी रूप मे निर्देश किया जा सकता है जब तक कि एक पूर्ण अपरिणामी पदार्थ को बाध्य होकर स्वीकार न कर लिया जाय। यह जगत्-प्रपञ्च अवश्य ही एक ऐसी अवस्था में था जब यह स्थिर शान्त था; जब यह दो शक्तियो के सामञ्जस्य-रूप मे था अर्थात् जब वास्तव मे किसी भी शक्ति का अस्तित्व नही था; कारण, वैषम्य न होने पर शक्ति का विकास नहीं होता। यह ब्रह्माण्ड फिर उसी साम्यावस्था की प्राप्ति की ओर जा रहा है। यदि हमारा किसी विषय के सम्बन्ध में निश्चित ज्ञान है, तो वह यही है।
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द्वैतवादी जब कहते हैं कि कोई अपरिणामी पदार्थ है तब वह ठीक ही कहते हैं; किन्तु वह शरीर और मन से बिलकुल अतीत है, शरीर और मन से बिलकुल पृथक् है, यह कहना भूल-है। बौद्ध लोग जो कहते है कि समुदय जगत् केवल परिणाम-प्रवाह मात्र है यह बात भी सत्य है; कारण, जब तक मै जगत् से पृथक् हूँ; जब तक मै अपने अतिरिक्त और सभी कुछ देख रहा हूँ, मोटी बात है कि जब तक द्वैतभाव रहेगा; तब तक यह् जगत् परिणामशील ही प्रतीत होगा। किन्तु वास्तविक बात यह है कि यह जगत् परिणामी भी है और अपरिणामी भी। आत्मा, मन और शरीर ये तीनो पृथक् वस्तुएँ नही है वरञ्च एक ही है। एक ही वस्तु कभी देह, कभी मन और कभी देह और मन से अतीत आत्मा प्रतीत होती है। जो शरीर की ओर देखते हैं व मन तक को भी नहीं देख सकते; जो मन को देखते है वे आत्मा को नही देख पाते; और जो आत्मा को देखते है उनके लिये शरीर और मन दोनो न जाने कहाँ चले जाते है ! जो लोग केवल गति देखते है वे सम्पूर्ण स्थिर भाव को नही देख पाते, और जो इस सम्पूर्ण स्थिर भाव को देख पाते है उनके निकट गति न जाने कहाँ चली जाती है। सर्प मे रज्जु का भ्रम हुआ। जो व्यक्ति रज्जु मे सर्प ही देखता है उसके लिये रज्जु कहाँ चली जाती है, और जब भ्रान्ति दूर होकर वह व्यक्ति रज्जु ही देखता है तो फिर उसके लिये सर्प नही रहता।
तो हमने देखा कि वस्तु एक ही है और वही एक नाना रूप से प्रतीत होती है। इसको आत्मा कहे या वस्तु कहे या अन्य कुछ नाम दे, जगत् मे एकमात्र इसी का अस्तित्व है। अद्वैतवादियो की
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