ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
५८ ज्ञानयोग
५८ ज्ञानयोग
मनुष्य नाम से पुकारा जाता है वह इसी जगत् की अतीत अनन्त सत्ता का सामान्य आभास मात्र है, उसी सर्वस्वरूप अनन्त अग्नि का एक कण मात्र है। किन्तु वह अनन्त ही तो उसका वास्तविक स्वरूप है।
इस ज्ञान का फल—इस ज्ञान की उपकारिता क्या है? आज-कल सभी विषयो को उनकी इस उपकारिता से ही नापा जाता है। अर्थात् मोटी बात यो है कि इससे कितने रुपये, कितने आने और कितने पैसो का लाभ है? किन्तु लोगो को इस प्रकार प्रश्न करने का क्या अधिकार है? क्या सत्य को भी उपकार या धन के मापदण्ड से नापा जायगा? मान लो कि इससे कोई लाभ नही होता तो क्या यह सत्य कुछ कम सत्य हो जायगा? उपकार अथवा प्रयोजन सत्य का निर्णायक कभी नही हो सकता (Bentham's Utilitarianism and Jame's Pragmatism)। जो भी हो, इस ज्ञान मे बड़ा उपकार तथा प्रयोजन भी है। हम देखते है, सब लोग सुख की खोज करते है; किन्तु अधिकांश लोग नश्वर मिथ्या वस्तुओं मे उसको ढूँढ़ते फिरते है। इन्द्रियो मे कभी किसी को सुख नही मिलता। सुख तो केवल आत्मा मे ही मिलता है। अतएव आत्मा मे इस सुख की प्राप्ति ही मनुष्य का सबसे बड़ा प्रयोजन है। और एक बात यह है कि अज्ञान ही सब दुःखो का कारण है, और मेरी समझ मे सब से बड़ा अज्ञान यही है कि जो अनन्त स्वरूप है वह अपने को सान्त मान कर रोता है; समस्त अज्ञान की मूलभित्ति यही है कि अविनाशी, नित्य शुद्ध पूर्ण आत्मा होते हुए भी हम सोचते हैं कि हम छोटे मन, छोटे छोटे देह मात्र हैं; यही समस्त स्वार्थपरता का मूल है। जब ही मै अपने को एक क्षुद्र देह समझ कर विवेचना करता,
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हूँ तभी मैं उसकी—जगत् के अन्यान्य शरीरो के सुख-दुःख की ओर दृष्टि बिना डाले ही—रक्षा करने की तथा उसका सौन्दर्य सम्पादन करने की इच्छा करता हूँ। उस समय तुम और मै भिन्न हो जाता हूँ। और जब ही यह भेद-ज्ञान आता है तभी यह सब प्रकार के अमंगल का द्वार खोल देता है और सब प्रकार के दुखों की उत्पत्ति करता है। अतः पूर्वोक्त ज्ञानलाभ से यह लाभ होगा कि आजकल की मनुष्य-जाति का एक बहुत छोटा अंश भी यदि क्षुद्र भाव का त्याग कर सके तो कल ही यह संसार स्वर्गरूप मे परिणत हो जायगा, किन्तु नाना प्रकार के यन्त्रो के तथा बाह्य जगत् सम्बन्धी ज्ञान की उन्नति से यह कभी नही हो सकता। जिस प्रकार अग्नि मे तेल डालने से अग्निशिखा और भी वर्धित होती है उसी प्रकार इन सब वस्तुओ से दुःखों की ही वृद्धि होती है। आत्मज्ञान के अतिरिक्त जितना भी भौतिक ज्ञान उपार्जित किया जाता है वह केवल अग्नि मे घृताहुति मात्र है। इससे केवल स्वार्थपर लोगों के हाथों मे दूसरों का कुछ लेने के लिये, दूसरों के लिये अपना जीवन बिना दिये दूसरो के कन्धो पर बैठ कर खाने के लिये एक और यंत्र एक और सुविधा मात्र आजाती है।
एक और प्रश्न है—क्या इसे कार्य रूप मे परिणत करना सम्भव है ? वर्तमान समाज मे क्या इसको कार्य रूप मे परिणत किया जा सकता है ? इसका उत्तर यही है कि सत्य—प्राचीन अथवा आधुनिक किसी समाज का भी सम्मान नही करता। समाज को ही सत्य का सम्मान करना पड़ेगा, अन्यथा ध्वंस अवश्यम्भावी है । सत्य ही समस्त प्राणियो तथा समाज का मूल आधार है, अतः सत्य कभी
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भी समाज के अनुसार अपना गठन नहीं करेगा। यदि निःस्वार्थपरता के समान महान सत्य समाज में कार्य रूप मे परिणत नहीं किया जा सकता तो ऐसे समाज को छोड़ कर वन मे जाकर बसना ही अच्छा है। इसीका नाम साहस है। साहस दो प्रकार का होता है। एक साहस होता है तोप के मुँह मे दौड़ पड़ना। यदि यही वास्तविक साहस होता तो सिंह आदि मनुष्य से श्रेष्ठ होते। किन्तु एक और साहस होता है जिसे सात्त्विक साहस कह कर पुकार सकते है। एक बार एक दिग्विजयी सम्राट भारतवर्ष मे आया। उसके गुरु ने उसे भारतीय साधुओं से साक्षात्कार करने का आदेश दिया था। बहुत खोज करने के बाद उसने देखा कि एक वृद्ध साधु एक पत्थर के ऊपर बैठे है। सम्राट को उनके साथ कुछ देर बातचीत करने से बड़ा सन्तोष हुआ। अतएव उसने साधु को अपने साथ देश ले जाने की इच्छा प्रकट की। साधु ने इसे स्वीकार नही किया और कहा—“मै इसी वन मे बड़े आनन्द मे हूँ।” सम्राट बोला—“मैं समस्त पृथिवी का सम्राट हूँ। मै आपको असीम ऐश्वर्य तथा उच्च पद-मर्यादा दूँगा।” साधु बोले—“ऐश्वर्य, पदमर्यादा, किसी मे भी मेरी आकांक्षा नहीं है।” तब सम्राट ने कहा—“आप यदि मेरे साथ नही जायेगे तो मैं आपका विनाश कर दूँगा।” इस पर साधु बहुत हँसे और बोले—“महाराज, तुमने जितनी बाते कही, उनमे यही सब से अधिक अज्ञानपूर्ण मालूम होती है। क्या तुम मेरा संहार कर सकते हो ? सूर्य मुझे सुखा नहीं सकता, अग्नि मुझे जला नही सकती, कोई यंत्र भी मेरा संहार नहीं कर सकता, कारण कि मैं जन्म रहित अविनाशी, नित्यविद्यमान, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान आत्मा हूँ।” यह एक अन्य प्रकार की साहसिकता है। सन १८५७ ई. मे सिपाही-विद्रोह
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के समय एक मुसलमान सिपाही ने एक संन्यासी महात्मा को तलवार से भोंक दिया। हिन्दू विद्रोहियों ने इस मुसलमान को स्वामीजी के पास लाकर कहा—"आप कहे तो इसकी हत्या कर दे हम?" स्वामीजी ने उनकी ओर मुँह फिरा कर कहा—"भाई, तुम्हीं वह हो, तुम्हीं वह हो।" यही कहते-कहते उन्होंने शरीर छोड़ दिया। यह भी एक प्रकार की साहसिकता है। यदि तुम सत्य के आदर्श पर समाज का संगठन नही कर सकते, यदि तुम इस प्रकार समाज-संगठन नहीं कर सकते कि जिसमे वह सर्वोच्च सत्य-स्थान पा सके तब फिर तुम अपने बाहुबल पर क्या अभिमान करते हो? तब फिर तुम अपनी सारी पाश्चात्य संस्थाओं का क्या अभिमान करते हो? अपनी महानता तथा श्रेष्ठता का तुम क्या गौरव करते हो, यदि तुम दिन-रात यही कहते रहते हो कि, "इसका कार्य मे परिणत करना असम्भव है।" पैसा-कौड़ी को छोड़ कर क्या और कुछ भी करने योग्य नहीं है? यदि यही है तो अपने समाज पर इतना अहंकार क्यो करते हो? वही समाज सर्वश्रेष्ठ है जहाँ सर्वोच्च सत्य को कार्य मे परिणत किया जा सकता है—यही मेरा मत है। और यदि समाज इस समय उच्चतम सत्य को स्थान देने मे समर्थ नही है तो उसे इस योग्य बनाओ। उसको इस योग्य बनाओ और जितनी शीघ्र तुम इस कार्य मे सफल होगे उतना ही अच्छा। हे नरनारिगण! आत्मा के सम्बन्ध मे जाग्रत होओ, सत्य मे विश्वास करने का साहस करो, सत्य के अभ्यास का साहस करो। संसार मे कितने ही साहसी नरनारियो की आवश्यकता है। साहसी होना वडा कठिन है। शारीरिक साहस मे तो व्याघ्र मनुष्य से श्रेष्ठ है, उसके स्वभाव मे ही इस प्रकार की साहसिकता है। बल्कि इस