ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
३६ ज्ञानयोग
३६ ज्ञानयोग
आया ? प्रकृति ने तो दिया नहीं। प्रकृति कहती है—' जाओ, वन मे जाकर बसो।' मनुष्य कहता है—“मै मकान बनाऊँगा, प्रकृति के साथ युद्ध करूँगा।” और वह यही कर रहा है । मानव जाति का इतिहास प्राकृतिक नियमो के साथ युद्ध का इतिहास है और मनुष्य की ही अन्त मे प्रकृति पर विजय होती है। अन्तर्जगत् मे आकर देखो, वहाँ भी यही युद्ध चल रहा है, यही पाशव मानव और आध्यात्मिक मानव का संग्राम, प्रकाश और अन्धकार का संग्राम निरन्तर जारी है। मानव यहाँ भी जीत रहा है। स्वाधीनता की प्राप्ति के लिये प्रकृति के बन्धन को चीर कर मनुष्य अपने गन्तव्य मार्ग को प्राप्त करता है । हमने अभीतक माया का ही वर्णन देखा है । वेदान्ती पण्डितो ने इस माया को अतिक्रमण करके ऐसी किसी वस्तु को जान लिया है जो माया के अधीन नही है, और यदि हम उसके पास पहुँच सके तो हम भी माया के पार हो जायेंगे । ईश्वरवादी सभी धर्मों की यह साधारण सम्पत्ति है । किन्तु वेदान्त के मत मे यह धर्म का प्रारम्भ है, अन्त नहीं। जो विश्व की सृष्टि तथा पालन करने वाले है, जो मायाधिष्ठित हैं, जिन्हें माया या प्रकृति का कर्ता कहा जाता है, उन्हीं सगुण ईश्वर का ज्ञान वेदान्त का अन्त नही है । यही ज्ञान बढ़ते बढ़ते, अन्त मे वेदान्ती देखता है कि जिसे वह बाहर खडा हुआ समझता था वह उसके अन्दर ही है और वह स्वयं वही है । जो अपने को बद्धभावापन्न समझता था वह स्वयं ही वही मुक्त-स्वरूप है ।
३. मनुष्य का यथार्थ स्वरूप
( लन्दन में दिया हुआ भाषण )
पञ्चेन्द्रियग्राह्य जगत् मे मनुष्य इतना अधिक आसक्त हो जाता है कि वह उसे सहज मे ही त्याग करना नहीं चाहता । किन्तु वह इस बाह्य जगत् को चाहे कितना ही सत्य या साररूप क्यो न समझे प्रत्येक व्यक्ति तथा जाति के जीवन मे एक समय ऐसा आता है कि जब उसे अनिच्छा से भी जिज्ञासा करनी होती है, कि क्या यह जगत् सत्य है ? जिन व्यक्तियों को अपनी इन्द्रियो की गवाही मे अविश्वास करने का तनिक भी समय नहीं मिलता, जिनके जीवन का प्रत्येक क्षण किसी न किसी प्रकार के विषयभोग मे बीतता है, मृत्यु उनके भी सिरहाने आकर खड़ी हो जाती है और विवश होकर उन्हे भी कहना पड़ता है—क्या यह जगत् सत्य है ? इसी एक प्रश्न मे धर्म का आरम्भ होता है और इसी के उत्तर में धर्म की इति भी हो जाती है । इतना ही क्यो, सुदूर अतीत काल में जिसका निश्चित इतिहास भी अब नही मिलता, उसी रहस्यमय पौराणिक युग मे भी, सभ्यता के उस अस्फुट उषाकाल मे भी, हम देखते है कि यही एक प्रश्न उस समय भी पूछा गया है—क्या यह जगत् सत्य है ?
कवित्वमय कठोपनिषद् के प्रारम्भ मे हम यह प्रश्न देखते है, मनुष्य के मरने पर, कोई कोई लोग कहते है कि उसका अस्तित्व