ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
२८४ ज्ञानयोग
२८४ ज्ञानयोग
यन की एक विशेष उपकारिता है। वास्तव में यह सत्य भी है, क्योंकि वेद को लोग इतनी पवित्रता की दृष्टि से देखते हैं कि संसार के अन्यान्य धर्मशास्त्रों में जिस तरह नाना प्रकार की मिलावट हुई है, वेद में वैसी नहीं होने पाई। वेद में अति उच्च विचार और निम्नतम विचारों का भी समावेश है। सार, असार, अति उन्नत विचार, और साथ ही सामान्य छोटी-छोटी बातें भी उसमें सन्निविष्ट हैं। किसीने भी उसमें परिवर्तन या परिवर्धन करने का साहस नहीं किया। हाँ, टीकाकारों ने अवश्य ही व्याख्या के बल से अति प्राचीन विषयों से अद्भुत-अद्भुत नये भाव निकालना आरम्भ किया, अनेक साधारण वर्णनों के भीतर वे आध्यात्मिक तत्त्व देखने लगे, किन्तु मूल जैसे का तैसा ही रहा—इसी मूल में ऐतिहासिक गवेषणा के अनेक विषय हैं। हम जानते हैं कि मनुष्य की चिन्तन-शक्ति जितनी ही उन्नत होती है उतना ही वे धर्म के पूर्व भावों को परिवर्तित कर उनमें नवीन नवीन ऊँचे भावों को मिलाते हैं। यहाँ एक, वहाँ एक—इस प्रकार नई नई बातें जोड़ी जाती हैं, कहीं कहीं एक आध बात निकाल भी दी जाती है। टीकाकार की ही तो कला ठहरी ! सम्भवतः वैदिक साहित्य में ऐसा नहीं किया गया। और यदि हुआ हो तो प्रथमतः उसका पता ही नहीं चलता। हमें इससे लाभ यह है कि हम विचार के मूल उत्पत्तिस्थान में पहुँच सकते हैं—देख सकते हैं कि किस प्रकार क्रमशः उच्च से उच्चतर विचारों का, किस प्रकार से स्थूल आधिभौतिक धारणाओं से लेकर सूक्ष्मतर आध्यात्मिक धारणाओं का विकास हो रहा है और अन्त में किस प्रकार वेदान्त में उन सबों की चरम परिणति हुई है। वैदिक साहित्य में अनेक प्राचीन आचार-व्यवहारों का भी आभास पाया जाता है। पर उपनिषद् में उन
आत्मा का मुक्त स्वभाव
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सभो का वर्णन अधिक नही है। वह एक ऐसी भाषा मे लिखा गया है जो अत्यन्त सक्षिप्त है और सरलता से याद रखी जा सकती है।
प्रतीत ऐसा होता है कि इस ग्रन्थ के लेखक मानो केवल कई घटनाओ को स्मरण रखने के उपाय लिख रहे है। मानो उनकी ऐसी धारणा है कि ये सब बाते सभी जानते है। इससे असुविधा यह होती है कि हम उपनिषद् मे लिखी कथाओ के वास्तविक तात्पर्य को ग्रहण नहीं कर सकते। इसका कारण यह है-यह सब जिन लोगो के समय मे लिखा गया था वे लोग उन घटनाओ को जानते थे, किन्तु आज उनकी किम्बदन्ती भी वर्तमान नही है,-और जो एकाध है भी, वह भो अतिरंजित होगई है। उनकी ऐसी नयी व्याख्या होगई है कि जब हम पुराणो मे उनके विवरण पढ़ते है तो देखते है कि वे उच्छ्वासात्मक काव्य बन गये है।
पाश्चात्य देशो मे जैसे हम पाश्चात्य जाति की राजनीतिक उन्नति के विषय मे एक विशेष भाव देख पाते है कि वे किसी प्रकार अनियन्त्रित शासन सहन नही कर सकते, वे किसी प्रकार के बन्धन को-जैसे कोई उनके ऊपर शासन करे-सहन नही कर सकते, वे जैसे क्रमशः उच्च से उच्चतर प्रजातन्त्र-शासन-प्रणाली की उच्च उच्चतर धारणा तथा बाह्य स्वाधीनता की उच्च से उच्चतर धारणा प्राप्त कर रहे हैं ठीक वैसी ही घटना दर्शन मे घटती है; किन्तु भेद यही है कि यह आध्यात्मिक जीवन की स्वाधीनता है। 'अनेक-देववाद' से क्रमशः लोग 'एकेश्वरवाद' मे पहुँचते है-उपनिषद मे फिर मानो इसी एकेश्वरवाद के विरुद्ध युद्धघोषणा हुई है। जगत