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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

२७४ ज्ञानयोग

२७४ ज्ञानयोग

सम्बन्ध में प्रश्न उपस्थित होंगे—तथा और भी अनेक प्रकार के संदेह उठेंगे, परन्तु हम देखेंगे कि सभी मे हम अपने पूर्व सस्कारों के द्वारा सचालित होते है। हमारे मन पर इन पूर्व सस्कारों का अतिशय प्रभाव है। जो बाल्यकाल से केवल सगुण ईश्वर की और मन के व्यक्तिगत तत्व (The personality of the mind) की बात सुनते है, उनके लिये पूर्वोक्त बाते अवश्य ही अति कर्कश मालूम पड़ेगी, किन्तु यदि हम उन्हे सुने और यदि दीर्घकाल तक उनकी चिन्ता करे, तो वे बाते हमारे प्राणों मे भिद जायेंगी, हम फिर इस तरह की बाते सुनकर भयभीत न होंगे।

हाँ, दर्शन की उपकारिता अर्थात् कार्यकारिता के सम्बन्ध मे मुख्य प्रश्न अवश्य है। उसका केवल एक ही उत्तर दिया जा सकता है। यदि प्रयोजनवादियों के मत मे सुख का अन्वेषण करना मनुष्य के लिये कर्तव्य है, तो आध्यात्मिक चिन्ता मे जिन्हें सुख मिलता है, वे क्यो न आध्यात्मिक चिन्ता मे सुख का अन्वेषण करे ? अनेक लोग विषयभोग मे सुख पाने के कारण विषयसुख का अन्वेषण करते है, किन्तु ऐसे अनेक व्यक्ति हो सकते है जो उच्चतर भोग का अन्वेषण करते है। कुत्ता केवल खाने पीने से सुखी होता है। किन्तु वैज्ञानिक विषयसुख को तिलाञ्जलि दे, केवल कुछ ही तारों की स्थिति जानने के लिये ही शायद किसी पर्वत के शिखर पर वास करते है। वे जिस अपूर्व सुख का आस्वाद पाते है, कुत्ता उसे समझने मे अक्षम है। कुत्ता उन्हे देखकर हँस सकता है और उन्हे पागल कह सकता है। हो सकता है बिचारे वैज्ञानिक को विवाह भी करने की सुविधा न मिली हो। हो सकता है, वे केवल रोटी के कुछ टुकड़े और थोडेसे पानी के आधार पर ही पर्वत के शिखर पर रहते है। किन्तु वैज्ञानिक कहेगे, “ भाई कुत्ते ! तुम्हारा सुख केवल इन्द्रियों में आबद्ध है; तुम

अपरोक्षानुभूति २७५

इस सुख का भोग कर रहे हो। तुम उसे छोड़कर उच्चतर कोई भी सुख नहीं जानते, किन्तु हमारे लिये यही सबसे बढ़कर सुखकर है। और यदि तुम्हे अपने मनोनुकूल सुखान्वेषण का अधिकार है,—तो हमें भी है।" हमारा यही भ्रम है कि हम समस्त जगत् को अपने ही भाव से चलाना चाहते है। हम अपने ही मन को समस्त जगत् का मापदण्ड बनाना चाहते हैं। तुम्हारी दृष्टि में इन्द्रियविषयो मे ही सर्वापेक्षा अधिक सुख है। किन्तु हमे भी उन्हीं से सुख मिलेगा, इसका कोई अर्थ नहीं है। जिस समय तुम इस मत को लेकर जिद्द करते हो, तभी हमारा तुमसे मतभेद होता है। सांसारिक हितवादी (Worldly Utilitarian) के साथ धर्मवादी का यही प्रभेद है। सांसारिक हितवादी कहते हैं—"देखो, हम कितने सुखी है!"

"हम तुम्हारे धर्म-तत्त्वो को लेकर माथापच्ची नहीं करते। वे नो अनुसंधानातीत है। उन सभो का अन्वेषण न कर हम बड़े सुख मे हैं।" बहुत अच्छा, अच्छी बात है। हे हितवादियो! तुम लोग जिससे सुखी होते हो, वह ठीक है। किन्तु यह संसार बड़ा भयानक है। यदि कोई व्यक्ति अपने भाई का कोई अनिष्ट करके सुख प्राप्त कर सके, तो ईश्वर उसकी उन्नति करता है। किन्तु जब वही व्यक्ति आकर हमे अपने मत के अनुसार कार्य करने का परामर्श देता है और कहता है, यदि तुम इस तरह नहीं करते हो तो तुम मूर्ख हो तो उससे हम कहते है, तुम भ्रान्त हो, क्योंकि तुम्हारे लिये जो सुखकर है, उसे यदि हम करे, तो हम प्राण रखने मे भी समर्थ न हो सकेगे। यदि हमे सोने के कुछ टुकड़ों के लिये दौड़ना पडे, तो हमारा जीना ही निरर्थक होगा। धार्मिक व्यक्ति हितवादी को यही