ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
२०० ज्ञानयोग
२०० ज्ञानयोग
आत्मा देह के बाद देह ग्रहण करती है, शरीर के बाद शरीर प्रस्तुत करती है; और हम जो कुछ चिन्ता करते है, हम जो कुछ कार्य करते है वही सूक्ष्म भाव मे रह जाता है और समय आने पर वे ही स्थूल रूप मे व्यक्त भाव धारण करके आत्मप्रकाश के लिये उन्मुख होते हैं। मैं अपना अभिप्राय तुम्हे और भी अधिक स्पष्ट रूप से कह दूँ। जब कभी मैं तुम लोगों की ओर देखता हूँ तो मेरे मन मे एक तरग उठती है। वह मानो मेरे चिन्ताह्रद के भीतर डूब जाती है, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती जाती है, परन्तु वह बिलकुल ही नष्ट नहीं हो जाती। मन मे वह किसी भी मुहूर्त मे स्मृति-तरंग के रूप मे प्रकट होने को प्रस्तुत रहती है। इसी तरह मेरे मन के भीतर ही यह समस्त संस्कारसमष्टि विद्यमान है जो मृत्यु के समय पर साथ ही बाहर हो जायगी। मानो, इस कमरे मे कहीं एक गेंद पड़ी है और हम सब एक एक छड़ी से सब ओर से उसे मारने लगे। गेंद कमरे के एक कोने से दूसरे कोने मे दौड़ने लगी, दरवाज़े के नजदीक जाते ही वह बाहर चली गई। वह किस शक्ति से बाहर चली जाती है ?—जितनी छड़ियाँ उसे मारी गई थीं उनकी सम्मिलित शक्ति से। किस ओर उसकी गति होगी, यह भी इन सभी के समवेत फल से निर्णित होगा। इसी प्रकार, शरीर का पतन होने पर आत्मा की गति का निर्णायक क्या होगा ? उसने जैसे कर्म किये है, जैसी चिन्ताएँ की है, वे ही उसे किसी विशेष दिशा मे परिचालित करेगी। अपने भीतर उन सबो की छाप लेकर वह आत्मा अपने गन्तव्य की ओर अग्रसर होगी। यदि समवेत कर्मफल इस प्रकार हो कि भोग के लिये उसे पुनः एक नया शरीर गढ़ना होगा तो वह ऐसे पिता-माता के पास जायगी जिनसे वैसे शरीर गठन करने के उपयुक्त उपादान प्राप्त कर सके और उन्ही उपादानो के द्वारा वह एक नया
जगत्
२०१
शरीर धारण कर लेगी। इसी तरह वह आत्मा एक देह से दूसरी देह मे जाती रहेगी, कभी स्वर्ग मे जायगी तो कभी पृथ्वी पर आकर मानव देह धारण करेगी अथवा अन्य कोई उच्चतर या निम्नतर जीव-शरीर धारण करेगी। और इस प्रकार वह तब तक आगे बढ़ती जायगी जब तक उसका भोग समाप्त होकर वह अपने निजी स्थान पर लौट न आयेगी। तभी वह अपना स्वरूप जान सकती है, जान सकती है कि वह यथार्थतः क्या है। तब समस्त अज्ञान दूर हो जाता है और उसकी सारी शक्तियाँ प्रकाशित होजाती है। वह तब सिद्ध हो जाती है, पूर्णता प्राप्त कर लेती है, तब उसके लिये स्थूल शरीर की सहायता से कार्य करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। सूक्ष्म शरीर के द्वारा कार्य करने की भी आवश्यकता नहीं रहती। वह तब स्वयंज्योति व मुक्त हो जाती है, उसका फिर जन्म या मृत्यु कुछ भी नहीं होता।
अब इस विषय पर हम और अधिक कुछ आलोचना नहीं करेगे। पुनर्जन्म के बारे मे केवल एक और बात की ओर आप लोगो का ध्यान आकर्षित कर हम यह आलोचना समाप्त करेगे। यही मत केवल जीवात्मा की स्वाधीनता की घोषणा करता है। केवल यही एक मत है जो हमारी सारी दुर्बलताओ का दोष दूसरे के मत्थे नहीं मढ़ता। अपने निज के दोष दूसरे के मत्थे मढ़ना मनुष्य की स्वाभाविक दुर्बलता है। हम अपने दोष नहीं देखते है। क्या आँखे कभी अपने को देख पाती है ? किन्तु वे दूसरे सभी की आँखे देख सकती है। हम मनुष्य है, अपनी दुर्बलताये, अपनी गलतियाँ मानने को हम तब तक राजी नहीं होते जब तक हम दूसरो पर ये सब लाद सकते है। साधारणतः मनुष्य अपने दोषों तथा अपनी भूलो