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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

१५८ ज्ञानयोग

१५८ ज्ञानयोग

हैं। अतः योरोप की मुक्ति इस समय इसी विचार द्वारा पवित्र हुये धर्म अद्वैतवाद के,ऊपर निर्भर है; और एक मात्र यही अद्वैतवाद, यह निर्गुण ब्रह्म का भाव ही विद्वानों के ऊपर प्रभाव डाल सकता है। जब कभी धर्म लुप्त होने का उपक्रम होता है और अधर्म का अभ्युत्थान होता है तभी इसका आविर्भाव होता है। इसीलिये योरोप और अमेरिका में प्रवेश प्राप्त कर यह दृढ़मूल होता जा रहा है।

इसमे केवल एक बात और जोड़ देनी होगी। प्राचीन उपनिषद बड़े उच्च कवित्व से पूर्ण हैं। उपनिषदों के वक्ता ऋषि लोग महाकवि थे। आपको अवश्य ही याद होगा कि प्लेटो ने कहा है—कवित्व के द्वारा भी जगत् मे अलौकिक सत्य का प्रकाश होता है। मानों कवित्व द्वारा उच्चतम सत्यों को जगत् को देने के लिये विधाता ने साधारण मनुष्यो से बहुत ऊँची पदवी पर आरूढ़ कवियों के रूप मे उपनिषदों के ऋषियों की सृष्टि की थी। वे प्रचार भी नही करते थे अथवा दार्शनिक विचार भी नहीं करते थे और लिखते भी नही थे। उनके हृदय के झरने से संगीत का फुहारा बहता था। उसके वाद बुद्धदेव में हम देखते है—हृदय अनन्त सहनशक्ति वाला—उन्होंने धर्म को सर्व साधारणोपयोगी बना कर प्रचार किया । असाधारण धीशक्तिसम्पन्न शंकराचार्य ने उसको ज्ञान के प्रखर आलोक मे प्रकाशित किया। हमको अब चाहिये कि इस प्रखर ज्ञान-सूर्य के साथ बुद्धदेव के इस अद्भुत हृदय—इस अद्भुत प्रेम और दया को, सम्मिलित करें। अत्यन्त ऊँचे दार्शनिक भाव भी इसमे रहें, यह विचारपूत हो और साथ ही साथ इसमे उच्च हृदय, प्रबल प्रेम और

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दया का योग रहे। तभी मणि और काञ्चन का योग होगा, तभी विज्ञान और धर्म एक दूसरे को सहयोग देगे। यही भविष्य में धर्म होगा और यदि हम इसको ठीक ठीक ले सकें तो यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि यह सभी काल और अवस्थाओं के लिये उपयोगी होगा। यदि आप घर जाकर स्थिर भाव स विचार करें तो देखेगे कि सभी विज्ञानों मे कुछ न कुछ त्रुटि है। किन्तु ऐसा होने पर भी यह निश्चय जानिये कि आधुनिक विज्ञान को इसी एक मार्ग पर आना पडेगा—पड़ेगा क्यों—वह तो अभी भी इस ओर आ रहा है। जब कोई बड़ा वैज्ञानिक कहता है कि सभी कुछ उस एक शक्ति का विकास है तब क्या आपके मन मे नहीं आता कि उस समय वे उपनिषदो मे वर्णित उसी ब्रह्म की महिमा का कीर्तन करते हैं ?

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥
कठोपनिषद्, २।२।९

“जिस प्रकार एक ही अग्नि जगत मे प्रविष्ट हो कर नाना रूपों में प्रकट होती है उसी प्रकार वह सब जीवों का अन्तरात्मा एक ब्रह्म नाना रूपो मे प्रकाशित हो रहा है और वह जगत के बाहर भी है।” विज्ञान किस ओर जा रहा है, क्या आप नही समझ रहे है? हिन्दू जाति मनस्तत्व की आलोचना करते करते दर्शन के द्वारा आगे बढी थी। योरोपीय जातियाँ बाह्य प्रकृति की आलोचना करते करते अग्रसर हुईं। अब दोनों एक स्थान पर पहुँच रहे हैं। मनस्तत्व के भीतर होकर हम उसी एक अनन्त सार्वभौमिक सत्ता में पहुँच रहे है-

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ज्ञानयोग

जो सब वस्तुओं की अन्तरात्मा स्वरूप है, जो सब का सार और सभी वस्तुओं का सत्यस्वरूप है, जो नित्यमुक्त, नित्यानंद और नित्यसत्तास्वरूप है। बाह्य विज्ञान के द्वारा भी हम उसी एक तत्त्व पर पहुँचते हैं। यह समस्त जगत्प्रपञ्च उसी एक का विकास है—वह जगत् में जो कुछ भी है उस सब का समष्टि स्वरूप है। और समग्र मानवजाति मुक्ति की ओर अग्रसर हो रही है, बन्धन की ओर वह कभी जा ही नहीं सकती। मनुष्य नीतिपरायण क्यों हो ? क्योंकि नीति ही मुक्ति का और दुर्नीति बन्धन का मार्ग है।

अद्वैतवाद का एक और विशेषत्व यह है कि अद्वैत सिद्धान्त अपने आरम्भ काल से ही अन्य धर्मों या मतों को तोड़ फोड़ कर फेंक देने की चेष्टा नहीं करता। अद्वैतवाद का एक और महत्व यह है कि यह प्रचार करना महान् साहस का कार्य है कि—

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम् ।
जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन् ॥
— गीता, ३ । २६

“ ज्ञानी लोगों को अज्ञ अतएव कर्म में आसक्त व्यक्तियों में बुद्धिभेद उत्पन्न नही करना चाहिये, विद्वान व्यक्ति को स्वंयं युक्त रह कर उन लोगों को सब प्रकार के कर्मों में नियुक्त करना चाहिये ।”

अद्वैतवाद यही कहता है—किसी की बुद्धि को विचलित मत करो, किन्तु सभी को उच्च से उच्चतर मार्ग पर जाने में सहायता करो। अद्वैतवाद जिस ईश्वर का प्रचार करता है वह समस्त जगत

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का समष्टि स्वरूप है; यदि यह मत सत्य है तो यह अवश्य ही सब मतों को अपने विशाल उदर मे ग्रहण कर लेगा। यदि ऐसा कोई सार्वजनीन धर्म है जिसका लक्ष्य सबको ग्रहण करना हो, तो उसका केवल कुछ लोगों के ग्रहण करने योग्य ईश्वर का एक विशेष भाव से प्रचार करने से काम नहीं चलेगा, उसमें सब भावों की समष्टि होना आवश्यक है। अन्य किसी मत मे यह समष्टि का भाव उतना परिस्फुटित नही है, फिर भी वे सभी उसी समष्टि की प्राप्ति की चेष्टा कर रहे है। विशेष विशेष भावो का अस्तित्व केवल इसीलिये है कि वे सर्वदा ही समष्टि बनने की चेष्टा करते रहते है। इसीलिये अद्वैतवाद के साथ भारतवर्ष के किसी भी सम्प्रदाय का पहले से ही कोई विरोध नही था। भारत मे आजकल भी अनेक द्वैतवादी है, जिनकी संख्या भी अत्यधिक है। इसका कारण है, अशिक्षित लोगों के मन मे स्वभावतः द्वैतवाद का उदय होता है। द्वैतवादी कहते है कि यही जगत् की एक विल्कुल स्वाभाविक व्याख्या है, किन्तु इन द्वैतवादियो के साथ अद्वैत-वादियो का कोई विवाद नही है। द्वैतवादी कहते है, “ईश्वर जगत् के बाहर है, वह स्वर्ग के बीच एक विशेष स्थान मे रहता है।” अद्वैतवादी कहते है, “जगत् का ईश्वर उसका अपना ही अन्तरात्मा-स्वरूप है, उसको दूरवर्ती कहना ही नास्तिकता है। उसको स्वर्ग में अथवा अन्य किसी दूरवर्ती प्रदेश में अवस्थित किस प्रकार कहते हो? उससे पृथक होने का भाव मन मे लाना भी भयानक है! वह तो अन्यान्य सब वस्तुओं से हमारे अधिक निकट है। ‘तुम्ही वह हो’—इस एकत्व सूचक वाक्य को छोड़ किसी भी भाषा मे ऐसा कोई शब्द नहीं है जिसके द्वारा उसकी निकटता प्रकट की जा सके। जिस प्रकार द्वैतवादी अद्वैतवादियों की बातो से डरते है और उसे

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