ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
१५४ ज्ञानयोग
१५४ ज्ञानयोग
स्थितियों पर विजय प्राप्त कर सकेगे। उनको पराजित करने का उपाय क्या है ? वास्तव मे तो हम बाहर के विषयों में परिवर्तन उत्पन्न करके उनके ऊपर विजय प्राप्त कर नहीं पाते। छोटी सी मछली जल मे रहने वाले अपने शत्रुओं से अपनी रक्षा करना चाहती है। किस प्रकार वह इस कार्य को करती है ? आकाश मे उड़ कर, पक्षी बन कर। मछली ने जल अथवा वायु में कोई परिवर्तन नहीं किया—जो कुछ भी परिवर्तन हुआ वह उसके अपने अन्दर ही हुआ। परिवर्तन सदा 'अपने' अन्दर ही होता है। इसी प्रकार हम देखते है कि समस्त क्रमविकास मे परिवर्तन 'अपने' अन्दर ही होते होते, प्रकृति पर विजय प्राप्त हो रही है। इसी तत्व का धर्म और नीति में प्रयोग करो तो देखोगे कि यहाँ भी 'अशुभजय' 'अपने' भीतर परिवर्तन के द्वारा ही साधित हो रही है। सभी कुछ 'अपने' ऊपर निर्भर रहता है। यह 'अपने' के ऊपर ज़ोर डालना ही अद्वैतवाद की वास्तविक दृढ भूमि है। 'अशुभ, दुःख' यह सब बात कहना ही भूल है, कारण, बहिर्जगत् मे इनका कोई अस्तित्व नहीं है। क्रोध के कारणों के बार बार होने पर भी इन सब घटनाओं मे स्थिर भाव से रहने का यदि हमे अभ्यास होजाय, तो हमारे अन्दर क्रोध का उद्रेक कभी नहीं होगा। इसी प्रकार लोग मुझसे चाहे कितनी ही घृणा करे, यदि मै उसका अपने ऊपर प्रभाव नहीं लेता, तो मेरा भी उनके प्रति घृणाभाव उत्पन्न नहीं होगा। इसी प्रकार 'अशुभजय' करना पड़ता है—'अपनी' उन्नति का साधन करके। अतएव आप देखते है कि अद्वैतवाद ही एकमात्र ऐसा धर्म है जो आधुनिक वैज्ञानिकों के सिद्धान्तों के साथ भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही दिशाओं मे मिल जाता है, इतना ही
ब्रह्म और जगत् १५५
नही वरन् इन सभी सिद्धान्तो से भी उच्चतर सिद्धान्तो को स्थापित करता है और इसी कारण से यह आधुनिक वैज्ञानिको को बहुत भाता है। वे देखते है कि प्राचीन द्वैतवादी धर्म उनके लिये पर्याप्त नहीं है, उनसे उनकी ज्ञान की भूख नहीं मिटती। किन्तु इस अद्वैतवाद मे उनके ज्ञान की भूख मिटती है। केवल दृढ़ विश्वास रहने से ही मनुष्य का काम नहीं चलेगा, ऐसा विश्वास होना चाहिये जिससे उसकी ज्ञानवृद्धि चरितार्थ हो। यदि मनुष्य से जो कुछ वह देखे उसी पर विश्वास करने को कहा जाय तो वह शीघ्र ही पागलखाने मे चला जायगा। एक बार एक महिला ने मेरे पास एक पुस्तक भेजी—उसमे लिखा था, सभी बातों पर विश्वास करना उचित है। उसमे यह भी लिखा था कि मनुष्य की आत्मा अथवा इस प्रकार की अन्य किसी वस्तु का अस्तित्व ही नहीं है। किन्तु स्वर्ग मे देव-देवियाँ हैं और एक प्रकाश का सूत्र हममे से प्रत्येक के मस्तक के साथ स्वर्ग का संयोग कर रहा है। लेखिका को इन सब बातो का पता कैसे लगा? उन्होने प्रत्यादिष्ट होकर इन सब तत्वो को जाना था और उन्होने मुझसे भी इनपर विश्वास करने को कहा था। जब मैंने उनकी इन सब बातो पर विश्वास करना अस्वीकार कर दिया तब उन्होने कहा—"तुम अवश्य ही बड़े दुराचारी हो—तुम्हारे लिये अब कोई आशा नहीं है।" जो भी हो, इस उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम भाग मे भी हमारे बाप-दादा से आया हुआ धर्म ही एक मात्र सत्य है, अन्य जिस किसी स्थान मे जिस-किसी भी धर्म का प्रचार हो रहा है वह अवश्य ही मिथ्या है—इस प्रकार की धारणा अनेक स्थानो मे है। इससे प्रमाणित होता है कि हमारे भीतर अभी भी अनेक दुर्बलताये है—ये दुर्बलताये दूर करनी होंगी।