ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
१२४ ज्ञानयोग
१२४ ज्ञानयोग
के अनुकरण से क्या लाभ है ? तथापि हम सारे जीवन भर केवल इसी के लिये चेष्टा करते रहते हैं; यही माया है।
इन्द्रियाँ मनुष्य की आत्मा को बाहर खींच लाती हैं। मनुष्य उन स्थानो मे सुख और आनन्द की खोज कर रहा है जहाँ वह उन्हे कभी भी नहीं पा सकता। युगो से हम यह सीखते आ रहे है कि यह निरर्थक और व्यर्थ है; यहाँ हमे सुख नहीं मिल सकता, परन्तु हम सीख नही सकते ! अपने अनुभव के अतिरिक्त और किसी उपाय से हम सीख नही सकते। हम प्रयत्न करते है; हमे धक्का लगता है, फिर भी क्या हम सीखते है ? नहीं, फिर भी नही सीखते। पतंग जैसे दीपक की लौ पर जलते है उसी प्रकार हम इन्द्रियो में सुख की प्राप्ति की आशा से अपने को बार बार झोकते है। हम फिर लौटते है, ताजगी लेकर; इसी प्रकार चलता रहता है और अन्त मे असमर्थ होकर, धोखा खाकर हम मर जाते है; और यही माया है।
यही बात हमारी बुद्धि के सम्बन्ध मे भी है। हम जगत् के रहस्य की मीमांसा करने की चेष्टा करते है—हम इस जिज्ञासा, इस अनुसन्धान की प्रवृत्ति को बन्द नही रख सकते; किन्तु हम लोगो को यह जान लेना चाहिये कि ज्ञान प्राप्तव्य वस्तु नहीं है—कुछ पद अग्रसर होते ही अनादि अनन्त काल का प्राचीर बीच मे व्यवधान के रूप मे आ खडा होता है जिसे हम लाँघ नहीं सकते। कुछ दूर बढ़ कर अनादि देश का व्यवधान आकर खड़ा हो जाता है जिसे अतिक्रमण नहीं कर सकते; सभी कुछ अनतिक्रमणीय हो कर हम हम कार्यकारण रूपी दीवार की सीमा से बद्ध है। हम इसे लाँघ कर आगे नहीं जा
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सक्ने। तो भी हम चेष्टा करते रहते है। चेष्टा हमे करनी ही पड़ेगी; यही माया है।
प्रत्येक साँस मे, हृदय की प्रत्येक धड़कन मे, अपनी प्रत्येक गति मे हम समझते है कि हम स्वतन्त्र हैं, और उसी क्षण हम देखते है कि हम स्वतन्त्र नही है। क्रीत दास—हम प्रकृति के क्रीत दास है—शरीर, मन तथा सभी चिन्ताओ एवं सभी भावो मे हम प्रकृति के क्रीत दास है; यही माया है।
ऐसी एक भी माता नही है जो अपनी सन्तान को अद्भुत शिशु—महापुरुष नही समझती है। वह उसी बालक को लेकर पागल हो जाती है, उसी बालक के ऊपर उसके प्राण पडे रहते है। बालक बडा हुआ—शायद् बिलकुल शराबी और पशुतुल्य हो गया—जननी के प्रति बुरा व्यवहार तक करने लगा। जितना ही उसका दुर्व्यवहार बढता है उतना ही जननी का प्रेम भी बढ़ता है। लोग इसे जननी का नि.स्वार्थ प्रेम कह कर खूब प्रशंसा करते है—उनके मन मे प्रश्न भी नही उठता कि वह माता जन्म भर के लिये केवल एक क्रीत दासी के समान है—वह प्रेम किये बिना रह ही नही सकती। हजारो बार उसकी इच्छा होती है कि वह इस मोह का त्याग कर देगी, किन्तु वह कर ही नही सकती। अतः वह इसे सुन्दर पुष्पों से सजा कर उसी को अद्भुत प्रेम कह कर व्याख्या करती है; यही माया है।
हम सब का यही हाल है। नारद ने एक दिन श्रीकृष्ण से पूछा, “प्रभो, आपकी माया कैसी है, मै देखना चाहता हूँ।” कई दिन के बाद श्रीकृष्ण नारद को लेकर एक जंगल मे गये। बहुत दूर जाने के बाद श्रीकृष्ण नारद से बोले—“नारद, मुझे बड़ी प्यास लगी है।
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क्या कहीं से थोडा जल लाकर पिला सकते हो ?”। नारद बोले— “प्रभो, कुछ देर ठहरिये, मै अभी जल लेकर आता हूँ।” यह कह कर नारद चले गये। कुछ दूर पर एक गाँव था, नारद वहीं जल की खोज करने लगे। एक मकान के द्वार पर पहुँच कर उन्होंने खटखटाया। द्वार खुला और एक परम सुन्दरी कन्या उनके सम्मुख आकर खड़ी हुई। उसे देखते ही नारद सब कुछ भूल गये। भगवान उनकी प्रतीक्षाकर रहे होगे,वे प्यासे होगे,हो सकता है प्यास से उनका प्राण-वियोग भी हो जाय—ये सभी बाते नारद भूल गये। सब कुछ भूल कर वे उसी कन्या के साथ बातचीत करने लगे, धीरे धीरे एक दूसरे के प्रति प्रणयभाव उत्पन्न होने लगा। तब फिर नारद उस कन्या के पिता के पास जाकर उसके साथ विवाह करने के लिये प्रार्थना करने लगे—विवाह भी हो गया और वे उसी गाँव में रहने लगे—धीरे धीरे उनके सन्तति भी होने लगी। इसी तरह रहते रहते बारह वर्ष बीत गये। नारद के ससुर भी मर गये और उनकी सम्पत्ति के नारद उत्तराधिकारी हो गये और पुत्र कलत्र, भूमि, पशु, सम्पत्ति, गृह आदि को लेकर नारद खूब स्वच्छन्दता पूर्वक सुख से रहने लगे। अन्त मे उन्हे यह बोध होने लगा कि वे खूब सुखी है। इसी समय उस देश मे बाढ आई। एक दिन रात के समय नदी दोनों तटों को तोड़कर बहने लगी और सम्पूर्ण गाँव डूब गया। मकान सब गिरने लगे; मनुष्य, पशु, पक्षी, सब बह बह कर डूबने लगे, नदी की धार में सभी कुछ बहने लगा। नारद को भी भागना पड़ा। एक हाथ से उन्होने स्त्री को पकडा, दूसरे हाथ से दो बच्चों को, और एक बालक को कन्धे पर बिठा कर उस भयङ्कर नदी को पार करने की चेष्टा करने लगे।
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कुछ दूर जाने के बाद ही लहरों का वेग बढ़ने लगा। कन्धे पर बैठे हुये शिशु की नारद किसी प्रकार रक्षा न कर सके; वह गिर कर तरंगो मे बह गया। निराशा और दुख से नारद चीत्कार कर उठे। उसकी रक्षा करने को जाते ही और एक बालक, जिसका हाथ वे पकडे हुये थे, हाथ से छूट डूब कर मर गया। अपनी पत्नी को वे अपने शरीर की समस्त शक्ति लगा कर पकडे हुये थे, अन्त में तरंगो के वेग से पत्नी भी उनके हाथ से छूट गई और वे स्वयं तट पर गिर कर मिट्टी मे लोटपोट होने लगे और बड़े कातर स्वर मे विलाप करने लगे। इसी समय मानो किसी ने उनकी पीठ पर कोमल हाथ रख कर कहा—"वत्स, कहाँ, जल कहाँ है? तुम जल लेने गये थे, मैं तुम्हारी प्रतीक्षा मे हूँ। तुम्हें गये हुये आधा घण्टा हुआ।" आध घण्टा! नारद के लिये तो बारह वर्ष बीत चुके थे! और आध घण्टे के भीतर ही ये सब दृश्य उनके मन के अन्दर से निकल गये—यही माया है! किसी न किसी रूप मे हम सब इसी माया के भीतर रहते हैं। यह बात समझना बड़ा कठिन है—विषय भी बड़ा जटिल है। इसका क्या तात्पर्य है? तात्पर्य यही है कि—यह बात बड़ी भयानक है—सभी देशों में महापुरुषो ने इसी तत्व का प्रचार किया है, सभी देशो के लोगों ने यही शिक्षा प्राप्त की है, किन्तु बहुत कम लोगों ने इस पर विश्वास किया है; उसका कारण यही है कि स्वयं बिना भोगे हुये, बिना ठोकर खाये हुये हम इस पर विश्वास नहीं कर सकते। सच पूछिये तो सभी वृथा है, सभी मिथ्या है।
सर्व-संहारक काल आकर सब को ग्रास कर लेता है, कुछ भी नहीं छोड़ता। वह पाप को खा जाता है, पापी को भी खा जाता है,