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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

११० ज्ञानयोग

११० ज्ञानयोग

किन्तु यह जोड़-गाँठ कब तक चल सकती है ? जिस प्रकार जगत् के रहस्य की व्याख्या सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती गई उसी प्रकार यह रहस्य मानों और भी रहस्यमय होता गया। देवता अथवा ईश्वर के गुण जिस प्रकार समयुक्तान्तर श्रेणी (Arithmetical progression) के नियम से बढ़ने लगे उसी प्रकार सन्देह भी समगुणितान्तर श्रेणी (Geometrical progression) के नियम से बढ़ने लगे। निष्ठुर जिहोवा के साथ जगत् का सामञ्जस्य स्थापित करने मे जो कठिनता होती थी उससे अधिक कठिनता होने लगी ईश्वरसम्बन्धी नवीन धारणा के साथ जगत् का सामञ्जस्य स्थापित करने में। सर्वशक्तिमान और प्रेममय ईश्वर के राज्य मे ऐसी पैशाचिक घटनाये क्यों घटती हैं ? सुख की अपेक्षा दुःख इतना अधिक क्यों है ? साधु भाव जितना है, असाधुभाव उससे अधिक क्यों है ? जगत् में कुछ भी खराबी नहीं है ऐसा समझ कर हम आँखे बन्द करके बैठे रह सकते है; किन्तु इससे जगत् की वीभत्सता में तो कुछ परिवर्तन होता नही। यदि इसे हम बहुत अच्छे शब्दों में कहे तो कह सकते है कि यह जगत् टैण्टालस के नरक* के समान है; उससे यह किसी अंश मे उत्कृष्ट नहीं। प्रबल प्रवृत्तियाँ, इन्द्रियों को चरितार्थ करने की सभी वासनायें विद्यमान हैं, परन्तु उनकी पूर्ति करने का उपाय नहीं है। हमारी इच्छा के विरुद्ध हमारे अन्दर एक


* ग्रीक लोगों की एक पौराणिक कथा है कि टैण्टालस नामक राजा पाताल के एक तालाब में गिर गया था। तालाब का जल उसके होठों तक आता था, परन्तु जैसे ही वह अपनी प्यास बुझाने का प्रयत्न करता था वैसे ही जल कम हो जाता था। उसके सिर के ऊपर नाना प्रकार के फल लटकते थे, और जैसे ही वह इन्हें खाना चाहता था वे ग़ायब हो जाते थे।

माया और ईश्वरधारणा का क्रमविकास १११

तरंग उठती है जो हमें आगे बढ़ने को बाध्य करती है, परन्तु जैसे ही हम एक पाँव आगे बढ़ाते हैं वैसे ही एक धक्का लगता है। हम सब टैण्टालुस की भाँति इस जगत् मे जीवित रहने को और मरने को मानो विधि-विधान से अभिशप्त हैं। पंचेन्द्रिय द्वारा सीमाबद्ध जगत् से अतीत आदर्श हमारे मस्तिष्क मे आते हैं किंतु बहुत सी चेष्टायें करने के वाद हम देखते हैं कि उन्हें हम कभी भी कार्य रूप मे परिणत नही कर सकते। इसके विरुद्ध हम 'अपने आस' पास की अवस्था की चक्की में पिस कर चूर चूर हो कर परमाणुओं में परिणत हो जाते हैं। और यदि हम आदर्शप्राप्ति की चेष्टा का परित्याग करके केवल सांसारिक भाव को लेकर रहने कीं चेष्टा करते हैं तो भी हमे पशुजीवन बिताना पड़ता है और हमारी अवनति हो जाती है। अतएव किसी ओर भी सुख नहीं है। जो लोग इस जगत् मे जिस अवस्था में उत्पन्न हुए हैं उसी अवस्था मे रहना चाहते हैं, तो उनके भाग्य में भी दुःख ही है। और जो लोग सत्य के लिये—इस पाशविक जीवन से कुछ उन्नत जीवन के लिये—प्राण देने को आगे बढ़ते हैं उन्हें सहस्र गुना दुःख होता है। यही वस्तुस्थिति है और इसकी कोई व्याख्या भी नहीं है, व्याख्या हो भी नही सकती। किन्तु वेदान्त इससे बाहर निकलने का मार्ग बतलाता है। याद रखिये कि ये सब बाते बोलते समय मुझे ऐसी अनेक बातें कहनी पड़ेंगी जिनसे आपको कुछ भय लगेगा। किन्तु जो कुछ मै कह रहा हूँ उसे आपने याद रखा, भलीभाँति हजम किया और दिन रात चिन्तन किया तो यह आपके अन्दर बैठ जायगी, आपकी उन्नति करेगी और सत्य को समझने तथा सत्य मे प्रतिष्ठित होने मे आपको समर्थ करेगी।