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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages

प्रसव

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मिनट में १२० सुनाई पड़े तो पुत्र है और केवल २० या २२ की ध्वनि सुनाई पड़े तो पुत्री जानो।

गर्भ स्थिति के २॥। मास हो जाने पर प्रातः काज निहार मुंह गर्भिणी को खाण्ड के एक बताशे में बद्ध की टहनी तोड़ कर दो बूँद दूध टपका कर ताजे जल से सेवन करा दें। यदि पच जाये तो पुत्र है। वमन हो जाय तो कन्या।


सन्तान का गौर वर्ण बनाना

इसके लिए १ माशा बंसलोचन, ५ नग बादाम की मींग छिलका उतारी हुई पीसकर बूरा मिलाकर सेवन करायें। दूध की खीर का भोजन नित्य करायें। गोला मिश्री का सेवन। टमाटर बीज रहित, अमरूद, अनार, सेब, सन्तरा आदि का अधिक प्रयोग करें। शुद्ध केशर पान में रखकर या दूध में डालकर पीना चाहिए। बंसलोचन ५ तोला बबूल की पत्ती २० तोला, कमल गट्टे की मींग २० तोला। कमल गट्टे की मींग की जीभ निकाल देनी चाहिए यह मींग के बीच में पीले रंग की होती है, इसमें विष का अंश होता है। तीनों को पीस कर २ माशा दूध के साथ सेवन करें। बंसलोचन १ तोला, सितोपलादि चूर्ण १ तोला, केशर १ माशा, तीनों को बारीक पीसकर रखलें इसमें से १ माशा नित्य दूध के साथ सेवन करें। पत्ते वाले शाकों का प्रयोग करने से सन्तान का वर्ण श्याम होता है। यह सब उपचार सन्तान का गौर वर्ण करने के लिए गर्भ के छठे मास से प्रारम्भ करके अन्त तक करना चाहिए।

नोट- टमाटर का बीज सावक होता है इससे गर्भ पात हो जाता है इसलिये टमाटर का बीज गर्भणी को नहीं देना चाहिए।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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संस्कार

मानव को छोड़कर परमपिता परमात्मा ने सभी जीव जन्तुओं को उनकी प्रकृति के अनुसार जन्म से ही कुछ प्रकृतियों प्रदान की हैं। जिनमें कभी परिवर्तन नहीं होता। परन्तु उस जगत्तियन्तना ने मानव को कोई भी प्रकृति प्रदान नहीं की। मानव की प्रकृति जल रूप बनाई है। जिस प्रकार जल दूध के साथ मिलकर अपने रूप को त्याग कर दूध रूप हो जाता है। आप जल का जिस वस्तु के साथ संयोग कर देंगे, जल उसी वस्तु के अनुरूप हो जायगा और अपना अस्तित्व त्याग देगा। ठीक इसी प्रकार मानव की प्रकृति है।

एक बार मानव के बच्चे को भेड़िया उठाकर ले गया। वह मानव का बच्चा जंगल में भेड़ियों के साथ पलता रहा। वह भेड़ियों की-सी बोली बोलता, भेड़ियों का ही भोजन पाता, भेड़ियों की तरह उछल कूद करता और भेड़ियों की ही तरह नग्न रहता। किसी प्रकार वह मानव का बच्चा पकड़वा कर नगर में लाया गया। नगरवासियों ने उसे रोटी दी, वह उसे सँध कर फँक देता, पहनने के लिये वस्त्र दिये उसे भी फाड़कर फँक देता और अपनी मानवीय बोली न बोलकर भेड़ियों की ही बोली बोलता।

अब आप दूसरी ओर देखिये! इसी प्रकार एक सिंह का बच्चा भेड़ियों के झुण्ड में फँस कर उन्हीं के साथ चला गया, और भेड़ियों के साथ रहने लगा। उस सिंह के बच्चे में भी भेड़ियों जैसी उछल कूद कायरता आ गई। वह भी सिंह को देख कर भेड़ियों के साथ भयभीत होकर भाग जाता। परन्तु प्रकृति ने उसे जो अपनी बोली दी थी वह उसे न भूला और वह अपनी ही बोली बोलता। एक बार सिंह ने देखा कि हमारा एक बच्चा भेड़ियों के साथ रहकर भेड़ियों जैसा कायर हो गया है। सिंह भेड़ियों के झुण्ड पर झपटा और सिंह के बच्चे को पकड़ नदी के किनारे लाकर

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वीरेन्द्र गुप्तः

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जन्म समय

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उसे जल में अपनी और उसकी छाया से छाया मिलाकर दिखाया और समझाया। बेटा यह भेड़िये तो हमारा भोजन हैं और तु इनके साथ खेलता है। वही सिंह का बच्चा जो कुछ समय पूर्व भेड़ियों के साथ खेलता था वह अब उसे अपना भोजन समझने लगा।

देखिये! एक सिंह का बच्चा जो संगत से कुछ बदल गया था पुनः अपनी प्रकृति के अनुरूप बन गया। परन्तु भेड़ियों के बीच मानव का पला हुआ बच्चा अपना भोजन, बोली रहन सहन और प्रकृति आदि सभी कुछ छोड़ बैठा। वह अनेक प्रयत्न करने पर भी नहीं सुधर पाता।

इसी कारण मानव के निर्माण में हमारे महर्षियों ने संस्कारों की रचना की। मानव के बच्चे का स्वयं कोई स्वभाव नहीं होता, उसे संस्कारों द्वारा जैसा आप बनायेंगे वैसा ही बनकर तैयार होगा।

हम पीछे लिख आये हैं कि संस्कारों से ही उत्तम सन्तान होती है। गर्भाधान के पश्चात् पुंसवन संस्कार हो तत्पश्चात् सीमन्तोन्त्यन संस्कार होना चाहिए। यह संस्कार किस प्रकार किये जायें इसको लिखने की यहीं आवश्यकता नहीं क्योंकि महर्षि दयानन्द सरस्वती की लिखित संस्कार विधि में मनुष्यों के १६ संस्कार लिखे हैं उसी में से विधि देखकर करें।

★★★

प्रसव

समय जानना-समय रहते प्रसव की उचित व्यवस्था करने के लिए ये आवश्यक है कि प्रसव का सम्भावित समय ज्ञात हो। यह समय गर्भ स्थिति से ठीक ९ मास १० दिन पश्चात् होता है। यदि गर्भ में विकार है तो इससे पूर्व तथा पश्चात् भी प्रसव हो सकता है। गर्भ में जब भ्रूण सर्व प्रथम हिलता है, तो उसके ४ मास २० दिन के पश्चात् प्रसव (बालक का जन्म) होता है। अन्तिम मासिक धर्म होने की तिथि से आगे सात दिन जोड़ने के

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वीरेन्द्र गुप्तः

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उपरान्त पीछे की ओर तीन मास गिनने से प्रसव का सम्भावित समय ज्ञात हो जाता है।

प्रसव स्थान- प्रसव काल से पूर्व ही यह निश्चय कर लेना चाहिए कि प्रसव कहाँ हो। चिकित्सालय अथवा प्रसूतिका गृह में प्रसव होना माँ और बच्चे दोनों के लिए ही हितकर है।

१- यह नहीं कहा जा सकता कि प्रसव काल में कब और कौसी आकस्मिक अवस्थायें उत्पन्न हो जायें। चिकित्सालय में ऐसी आकस्मिक अवस्थाओं की तत्काल उचित चिकित्सा हो सकती है।

२- कोई भी घर अथवा अन्य स्थान इतना स्वच्छ नहीं रहता जितना चिकित्सालय या प्रसूति का गृह आदि विशेष रूप से बनाये जाते हैं।

३- चिकित्सालय में माँ और बच्चे को हर प्रकार का आवश्यक परामर्श हर समय मिल सकता है।

४- चिकित्सालय में माँ को लगभग २ सप्ताह का पूर्ण विश्राम मिल जाता है। जो इस अवस्था में अधिक आवश्यक है।

प्रसव आरम्भ होने के लक्षण- प्रारम्भ में योनि से रक्त मिश्रित स्त्राव होता है इसके साथ साथ गर्भाशय का आर्कूचन प्रारम्भ होता है। जिसके कारण पेट में एक विशेष प्रकार की एंठन और दबाव का अनुभव होता है। जो कि पेट से चलकर रानों तक अनुभव होता है। यह एंठन पीठ से भी प्रारम्भ हो सकती है और जब पीठ से पेट की ओर, और पेट से नीचे रानों की ओर आती है। प्रारम्भ में यह एंठन बहुत अधिक नहीं होती और अधिक समय पूर्व होती है। धीरे-धीरे इसकी गति बढ़ती जाती है और यह तीव्र दर्द में परिणित होने लगती है, साथ ही बीच के अन्तर का समय भी कम होता जाता है। बस यही प्रसव का निकटतम समय है। ऐसे समय में बिलम्ब नहीं करना चाहिए, अपने जहाँ का निश्चय कर रखा हो प्रसव के लिए तत्काल ले जाना चाहिए। ***

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जन्म समय

प्रसव के पश्चात् स्त्री को निम्नलिखित योग दस बारह दिन तक देने से शरीर की समस्त व्याधियों से छुटकारा मिल जाता है।

पीपल छोटी १॥ तोला गाय के कच्चे दूध में भिगो दें इस दूध को दूसरे दिन बदल देना चाहिए इसी प्रकार १० दिन तक पीपलें दूध में भीगी रहें। १० दिन पश्चात् जल से धोकर मोटे कपड़े से भली प्रकार मसल कर पीपलों के दाने निकाल लें। इसके अभाव में ६४ प्रहरी पीपल के चूर्ण का प्रयोग कर सकते हैं।

उपरोक्त पीपल के दाने ६ माशा, स्वर्ण भस्म ३ रत्ती, रजत भस्म ६ रत्ती, इन तीनों वस्तुओं को खरल में डालकर घोटें जब बारीक होकर एक हो जायें तो इसकी २-२ रत्ती की मात्रा से पुड़ियाँ बनालें प्रसव के पश्चात् शरद् ऋतु में प्रातः सायं और ग्रीष्म ऋतु में केवल प्रातःकाल मधु में मिलाकर सेवन करायें।

बालक को स्वच्छ कर उष्ण जल से स्नान कराकर पिता अपनी गोद में लेकर बालक की जीभ पर घृत और मधु मिलाकर सोने की शलाका से (३%) अक्षर लिखें और दहिने कान में (वेदोसीति) तेरा गुप्त नाम वेद है ऐसा कहें। इस जातकर्म (जन्म समय) के संस्कार का विवरण संस्कार विधि में देखें और वैसा ही करें।

प्रसूतिका को प्रथम दिन आवश्यकता पड़ने पर केवल साँठ ३ माशा, अजवायन १॥ माशा, देसी पान १ नग, २॥ सेर जल में डाल कर दो उबाल का देना चाहिए और निरन्तर १० दिन पर्यन्त यही जल पीने को देना चाहिए ठंडा या गर्म ऋतु अनुसार तथा इच्छा पर निर्भर है।

इसके पश्चात् दो उबाल का सादा जल १५ दिन तक दें, फिर सादा जल में लोहे की किसी वस्तु को जिस पर जंग आदि न लगी हो लेकर १० बार अग्नि में तपाकर जल में बुझायें

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प्रसूतिका का पेट बँध जाने पर

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इस जल को प्रसूतिका को एक मास तक पिलायें। प्रसूतिका को कच्चा (बिना उबाले) जल नहीं पिलाना चाहिए इससे बहुत हानि होती है। और पेट आगे को निकला ही रहता है क्योंकि कच्चे जल के पीने से पेट की रंगें ठण्डी पड़ जाती हैं इस लिए सिक्कुड़ नहीं पाली प्रसव के पश्चात् प्रसूतिका के पेट पर पड़ी लगभग १० दिन तक निरन्तर बाँधनी चाहिये। इससे पेट के बड़े रहने का भय नहीं रहता पड़ी कसकर बाँधनी चाहिए।

दूसरे दिन से गुरुकुल काँगड़ी की चाय दूध मिलाकर पाँच दिन पर्यन्त देनी चाहिए।

तीसरे दिन से घी २० तोला, गुड़ २० तोला, सौंठ १॥ तोला, जीरा सफेद २ तोला, अजवायन ३माशा, पिस्ता, बादाम की मींग चिरौजी, मखाना, गींद, काजू, अखरोट की मींग, यह सब ५५ तोला सबको कूट पीस कर घी और गुड़ के साथ पाक बनालें इसे नित्य २ तोला प्रातः सायं १५ दिन तक दें।

चौथे दिन से उपरोक्त चाय में घी डाला जा सकता है और बादाम का छाँका घी डालकर एक सप्ताह तक दिया जा सकता है।

बालक को पान देसी आधा अजवायन १ माशा और नीम के पत्ते ३ नग, जल १ पाव। पकाये हुए जल में किंचित गुड़ मिलाकर ३ दिन तक दें और माता का दूध न दें। जब तीसरे चौथे दिन माता तथा बालक का पेट साफ हो जाय तो बालक को माता का दूध देना चाहिए, और माता को शनैः-शनैः हल्का अन्न देना आरम्भ कर दें। कौकड़ की छाल १ पाव, ४ सेर जल में पका कर रखें प्रसूतिका को इस जल से गर्भ द्वार (योनि) को नित्य दिन में ३-४ बार धोना चाहिए तथा छपके लगाया करें, क्योंकि प्रसव के पश्चात् गर्भद्वार अधिक फैल जाता है और उसे पूर्व स्थिति में लाने के लिये ऐसा करना उचित है। इसी प्रकार गर्भावस्था में पेट बढ़ जाता है और प्रसव के पश्चात् सिक्कुड़ने

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स्तन पान के समय कुछ ध्यान देने योग्य बातें

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लगता है, पेट की त्वचा पर भुर्रियों पड़ जाती हैं। पेट की त्वचा और रंगों को सही स्थान पर लाने के लिए यह आवश्यक है कि प्रसूतिका को प्रसव के २० दिन पश्चात् टब में कौकड़ की छाल का तैयार किया हुआ गर्म जल भर लें और उसी में २ तोला फिटकरी पीस कर और मिला दें तत्पश्चात् प्रसूतिका की तेल मालिश करके टब में १५-२० मिनट बैठा लें तथा प्रसूतिका पेट को जल में लेटे-लेटे हल्के हाथ से मले जल का गर्म होना अनिवार्य है। इस क्रिया के १५ या २० दिन तक करने से प्रसूतिका का पेट और गर्भ द्वार अपने प्राकृतिक रूप में आ जाते हैं। इससे कमर और शरीर का दर्द, आलस्य आदि सब दूर होकर स्वस्थ हो जाती है। प्रसूतिका को प्रसव के ४ या ५ दिन पश्चात् देवद्वारादि क्वाथ सात दिन तक देना चाहिए इससे प्रसूतिका का ज्वर, वेदना, आलस्य को दूर करके शरीर को निरोगी करता है। इसको उपेक्षा में १ मास तक शरद् ऋतु में दशमूलारिष्ट और ग्रीष्म ऋतु में दशमूला अर्क का प्रयोग कर सकते हैं।

प्रसूतिका की मालिश सरसों के तेल की नित्य १५ या २० दिन तक अवश्य होनी चाहिए और बालक की लोई भी १ वर्ष तक होती रहनी चाहिए (गेहूँ के आटे में सरसों का तेल और पानी मिलाकर बच्चे के मलने को लोई कहते हैं)।

देवद्वारादि क्वाथ

देवद्वार, बघदूध्या, पोखर मूल, पीपल छोटी, सौठ, कायफल, नागर मोथा, चिरायता, कुटकी, धनियाँ, हर्र की बकली, गजपीपल, जवाशा, गोखरु, कटैली की जड़, अतीस, गिलोय, काकड़ा सिंगी, काला जीरा।

सारी वस्तुएँ समान भाग लेकर दरदरा कट लें। मात्रा २॥ तोला लेकर आधा सेर जल में पका कर, जब जल १ छटीक रह जाय तो छान कर पिला दें।

प्रसूतिका को 'सौभाग्य सौंठी' का सेवन कराना चाहिये। ★★★

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प्रसूतिका का पेट बढ़ जाने पर

प्रसव के २० दिन पश्चात् पीपला मूल का चूर्ण २ माशा प्रातःकाल दूध से लेने पर बढ़ा हुआ पेट ठीक हो जायेगा। एक मास तक सेवन करें।


शिशु पालन

जिस देश के शिशुओं की देखभाल दिनचर्या पर पूर्ण ध्यान दिया जाता है वह देश स्वस्थ, निरोगी और बलिष्ठ होता है।

नवजात शिशु का शरीर अत्यन्त कोमल होता है। इसलिये उसकी रक्षा के लिये अत्यन्त सावधानी की आवश्यकता है। प्रसुता स्वयं दुर्बल होती है, वह भली प्रकार बालक की देखभाल नहीं कर सकती और न सारा भार उसके ऊपर ही छोड़ना चाहिए। प्रसुता के पास चतुर स्त्री को उसकी देखभाल के लिए हर समय उपस्थित रहना चाहिए।

सबसे पहले बालक के शरीर की भली प्रकार सफाई करनी चाहिए। उसके शरीर पर मल चिपका होता है। इस लिये केवल पानी डालने से मल साफ नहीं होता इसलिये बालक के शरीर को हल्के हाथ से मल को साफ करना चाहिये। बालक को स्नान के समय हवा नहीं लगनी चाहिए, स्नान बन्द कमरे में हल्के गर्म जल से कराना चाहिए। शरीर पोछ कर ऋतु अनुसार वस्त्र पहनायें।

बालक का पेट साफ रखना आवश्यक है इसके लिए जन्म घड़ी पका कर रख लेनी चाहिए इसको गर्म करके देने से बच्चे को दस्त होकर पेट साफ हो जाता है और यदि ठन्डा ही

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रति समय बच्चे को स्तन पान कराने से हानियाँ

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पिलाया जाय तो दस्त होते हों तो बन्द हो जाते हैं इससे पाचन क्रिया ठीक रहती है।

जन्म घुड़ी

४ माशा हरं छोटी, ४ माशा हरं बकली, ६ माशा सौफ, २ माशा सनाय, २ माशा अजवायन, २ नग उन्नाव, ४ माशा बायविडंग, २ नग मरोइफली, १ माशा इन्द्र जी मीठा, १ माशा सुहाग खील, १ माशा गुदा अमलतास, २ माशा गुलाब फूल, १ माशा मुलेठी, १ नग मुनक्का, १ नग ढकपन्ना, १ नग बाखुम्बा, आधा नग अंजीर, १ माशा नरकाचूर, १ माशा खुबकला।

सब को दरदरा करके इसमें से २ तोला औषधि को लेकर आध पाव जल में पकाओ जब जल २॥ तोला रह जाय तो उतार कर छान लो और शीशी में भरकर रख लो। मात्रा एक चम्मच (टीस्पून) का थोड़ा शहद मिलाकर दें।


स्तन पान के समय कुछ ध्यान देने योग्य बातें

दूध- बच्चे का सर्वोत्तम भोजन माता का दूध है। बच्चे को जन्म के चौथे दिन से स्तन पान कराना उचित है। स्तन पान के समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि बच्चे का सर ऊँचा और कमर नीची रहे जिससे दूध सीधा पेट में पहुँचता रहे।

स्तन अथवा स्तन वृत्त कठोर होने पर सुपारी को पानी में घिस कर लेप करने से स्तन कोमल हो जाते हैं और बच्चा सुगमता से दूध पीने लगता है।

स्तनों का मल, पसीना आदि धोकर साफ करके ही दूध पिलाना चाहिए। बालक को जितनी बार स्तन पान कराया जाय हर बार स्तनों को जल से धो लेना चाहिए और पहले थोड़ा-सा

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माता का दूध कम होने पर

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दूध निकाल कर भूमि पर गिरा देने के पश्चात् बालक को स्तन पान करायाँ।

देखा गया है जब कोई स्त्री अपने बालक को स्तन पान कराने को होती है और उस समय यदि उसके पास कोई बूढ़ा स्त्री हो तो वह कहती पहले एक थार भूमि माता को चढ़ा दे। वह बूढ़ी माता इसके रहस्य को नहीं जानती। जब बालक ने स्तन पान करते- करते स्तन को छोड़ दिया तो उस समय थोड़ा-सा दूध स्तन वृत्त में रह जाता है। जो बाहर की चाय लगने से जम जाता है। जब वह जमा हुआ दूध बालक के पेट में पहुँचने तो बालक को अनेक रोग हो जायेंगे। जैसे दूध का डालना, दस्तों का हो जाना, अपच आदि व्याधियाँ हो जाती हैं। इसीलिए स्तन पान कराने से पहले स्तन के अग्रभाग का जमा हुआ दूध निकालने के कारण ही भूमि पर पहले दूध की थार गिरा देने की प्रथा थी।

भोजन बनाने के पश्चात् तत्काल बालक को स्तन पान नहीं कराना चाहिए। इससे बच्चे में पित्त दोष उत्पन्न हो जाता है और स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता है। इस कारण जब शरीर ठण्डक पाले तब ही बालक को स्तन पान करायाँ।

क्रोध के समय भी बालक को स्तन पान नहीं कराना चाहिए। क्रोधी व्यक्ति के रक्त को यदि खरगोश के शरीर में प्रवेश करा दिया जाय तो वह खरगोश मर जायगा। इसीलिये क्रुद्ध अवस्था में यदि बालक को स्तन पान करा दिया गया तो वह तत्काल मूर्छित हो जायगा। यदि बालक पहले से ही निर्बल है तो वह मृत्यु को भी प्राप्त हो सकता है।

स्तन के पश्चात् स्तन पान कराने से ठण्ड का विकार बालक को हो जाता है।


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माता के दूध के विकार और शोधन

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रति समय बच्चे को स्तन पान कराने से हानियाँ

जब समागम समय बच्चा जागने या रोने लगता है तो उस समय समागम के आनन्द में बाधा न पड़े इसलिए माता बच्चे के मुख में स्तन दे देती है, जिससे बालक चुप हो जाय और इन्द्रिय आनन्द भंग न हो।

पाठको! जिस समय स्त्री और पुरुष दोनों कामावेश में होते हैं उस समय उनके सारे शरीर का रक्त उबल पड़ता है। जिसके कारण माता के दूध में पित्त विकार उत्पन्न हो जाता है, ऐसा दूध बच्चे को देना मानों अपने ही हाथों बच्चे को काल के गाल में देना है। अपने इन्द्रिय सुख के कारण अपने आत्मज की बलि चढ़ा देना कहीं की बुद्धिमत्ता है। समागम की भावना, समागम समय तथा समागम के एक घन्टे पश्चात् तक अर्थात् जब तक समागम के पश्चात् शरीर शान्त और सम्यक न हो जाय तब तक बच्चे को स्तन पान कराना मानों विष देना है।

इस समय में बच्चे को स्तन पान कराने से १० प्रतिशत रोग उत्पन्न हो जाते हैं। और बालक को उन रोगों का सामना करना कठिन हो जाता है। जिसके फल स्वरूप वह या तो अपनी जीवन यात्रा को यहीं समाप्त कर देता है या रोगी होकर सदैव के लिए निर्बल हो जाता है। रोग जैसे सूखा, पसली का चलना, हरे पीले दस्त, दूध डालना, निमोनिया आदि अनेक रोग हैं जो बच्चे में उत्पन्न हो जाते हैं। आपने देखा होगा कि अक्सर बच्चों को घोर गर्मियों की ऋतु में निमोनिया हो जाता है। जिसका मुख्य कारण समागम समय या समागम के पश्चात् तत्काल बच्चे को स्तन पान करा देना है। इसलिए समागम की समाप्ति के एक घन्टे

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दूध सुखाना

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पश्चात् बालक को स्तन पान कराना उचित है।

इस प्रकार स्तन पान से बालक सभी रोगों से बचकर हृष्ट-पुष्ट रहेंगे।

साधारणतया स्तन पान दिन में ४ या ५ बार और रात्रि में १ बार कराना उचित है। यदि किसी कारण माता का दूध कम हो, अथवा बिल्कुल न हो तो गाय का दूध सर्वोत्तम है। गाय का दूध ३ भाग और जल ६ भाग एक उबाल का। बालक जैसे-जैसे बड़ा होता जाय वैसे-वैसे दूध की मात्रा अधिक और जल की कम करते जाना चाहिए। यह भी बच्चे को ३-३ घन्टे बाद देना चाहिए। शरद् ऋतु में बालक के दूध में औटते समय एक-दो पीपल छोटी तोड़कर डाल दें या सौंठ का छोटा-सा टुकड़ा। इससे बच्चे को ठण्ड का विकार नहीं होता और पाचन क्रिया भी ठीक रहती है।


माता का दूध कम होने पर

शतावर्ष का चूर्ण समान भाग मिश्री मिलाकर ६ माशा प्रातः, सायं को दूध के साथ देने से स्त्रियों के दूध अधिक उतरने लगता है।

अथवा

तोदरी सफेद बड़ी वाली का चूर्ण ६ माशा को १ पाव दूध १ पाव जल में मिलाकर मन्द मन्द अग्नि पर पकायें जब दूध मात्र रह जाने पर मीठा डालकर सेवन कराने से स्त्रियों को दूध अधिक उतरने लगता है।

इनका सेवन कम से कम दो सप्ताह तक अवश्य करें।


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दन्त निकलना

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माता के दूध के विकार और शोधन

१-वायु विकार- माता के दूध को काँच के सफेद पात्र में डाल कर देखने से उसका रंग सीवला या लाली की झलक लिए हो, और साथ ही उसमें झागों की अधिकता हो, तथा उसका स्वाद कसैला हो, और जल में डालने से मिलकर एक न हो जाय परन्तु उसके ऊपर रहे, तो दूध में वायु विकार समझना चाहिए।

ऐसा दूध बालक का पेट नहीं भरता, मुँह तथा गले का सूजना, गला बैठ जाना, स्वर क्षीण हो जाना, नींद न आना शरीर सूख जाना, मूत्र का रुकना, मल शुष्क होना आदि रोग हो जाते हैं। ऐसी दशा में माता का दूध शुद्ध करने के लिए दशमूल का क्वाथ सेवन कराना चाहिए।

२-पित्त विकार- माता के दूध का रंग काला, पीला या तीबे के रंग को समान हो अथवा उसे जल में डालने से जल पर पीले रंग की लकीरें सी दिखाई दें। स्वाद में कुछ कुछ खट्टास, कड़वाहट या चरपरापन हो और गर्म प्रतीत हो तो पित्त का विकार समझना चाहिए।

ऐसे दूध से बालक को पतले और पीले दस्त आते हैं, दस्तों में रक्त भी आ जाता है, शरीर गर्म रहता है, प्यास अधिक लगती है और बालक बैचेन रहता है।

ऐसी दशा में माता को गिलोय शतावर, पटोलपत्र, नीम की छाल, लाल चन्दन और सारिवा। इन सबको समान भाग लेकर क्वाथ बनाकर पिलावें।

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३-कफ विकार- माता का दूध अधिक सफेद, अधिक मीठा और अधिक गाढ़ा अथवा चिकना हो, जल में डालने से नीचे बैठ जाय और उसमें घी या तेल की सी गन्ध आती हो, तो कफ का विकार समझना चाहिए।

ऐसा दूध पीने से बच्चे को खाँसी, जुकाम, आँव, बदहज्मी, दूध डालना, लार बहना और अधिक नींद आना आदि रोग होते हैं।

ऐसी दशा में माता को हरड, बहेड़ा, आँवला, मोथा, चिरायता और कूटकी समान भाग का क्वाथ पिलावें।

यदि किसी कारण यह ज्ञात न हो सके कि दूध में कौन सा विकार है और बच्चा रोगी और निर्बल होता जाता हो तो निम्नलिखित क्वाथ पिलावें। उससे सर्व प्रकार के दोष दूर होकर माता का दूध शुद्ध हो जाता है।

पाठा (जलजमनी) कूटकी, साँठ, देवदारू, मुर्वा, मोथा, गिलोय, इन्द्र जी मीठा, चिरायता, सारिवा। इनमें से जितनी वस्तुएँ मिल सकें समान भाग लेकर क्वाथ बनाकर प्रातः सायं पिलावें।


दूध सुखाना

यदि दुर्भाग्य वश बच्चे की मृत्यु हो गई हो तो ऐसी दशा में जब माता के दूध बढ़ जाने से स्तनों में वेदना होने लगती है तो दूध को सुखा देना ही उत्तम होता है। इसके लिए मसूर की दाल को कच्ची (जो पकाई न गई हो) जल में पीस कर स्तनों पर गाढ़ा-गाढ़ा लेप कर देने से दूध सूख जाता है। इस क्रिया के एक बार करने से दूध सूख जायगा।

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भोजन

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दौत

जब बच्चे के दौत निकलने आरम्भ होते हैं उस समय उस को इतना कष्ट होता है कि वह लिखा नहीं जा सकता। बच्चा उस समय तक बोलता नहीं इसी कारण वह अपने कष्ट को नहीं कह सकता। जिसके कारण बच्चों को ज्वर, दस्त, नेत्र रोग आदि अनेक व्याधियाँ लग जाती हैं। ऐसी अवस्था में बच्चे की विशेष सावधानी रखनी चाहिए।

सिरस के बीजों को पानी में भिगो दें जब बीज फूल जायें तो उन्हें सुई द्वारा एक डोरे में पोकर माला बना लें। यह माला बच्चे के गले में कण्ठ से लगी हुई पहिनने से दौत सुगमता से निकल आते हैं या एक लाकेट ताँबे का बनवाकर उसके बीचों बीच में आर-पार एक छिद्र कराकर उसमें जस्ता और चाँदी की मिश्रित कौल लगाकर उस पर बिजली चढ़ा लें। यह लाकेट भी बच्चों के दौत सुगमता से निकलने में साधक है। बच्चे के मसूड़ों पर शहद में सहागे की खोल मिलाकर मलना उपयुक्त है।


नेत्र

गिरती हुई नेत्र ज्योति- यह आश्चर्य की बात है कि वर्तमान पीढ़ी की आँखों की ज्योति गिरती जा रही है। इससे भी अधिक आश्चर्य जनक तथ्य यह है कि इसका कारण स्पष्ट करने वाला कोई वैज्ञानिक सिद्धान्त विद्यमान नहीं है। यद्यपि इसका कारण वंश परम्परा, पौष्टिक पदार्थों की कमी, जीवन का आधुनिक सभ्य ढंग, स्वास्थ्य की दुर्बलता बताये जाते हैं। फिर भी वास्तविक कारण अभी भी कल्पना का विषय बना हुआ है।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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पशु-पक्षियों के जीवन के सूक्ष्म अध्ययन और इस तथ्य के आधार पर कि पुरानी पीढ़ी के लोगों में नेत्र विकार व्यापक रूप धारण किये हुए न था, मैं यह सुझाव देना चाहूँगा कि नेत्र विकार का एक कारण यह है कि जन्म के होते ही बच्चे को तेज, कृत्रिम और अत्यभाविक रोशनी के दर्शन करा दिये जाते हैं। पशु-पक्षी का कोई बच्चा उस दिन आँखें नहीं खोलता जिस दिन वह जन्म लेता है। परन्तु मानवीय बच्चों को जन्म ग्रहण करते समय ही न केवल सूर्य की अपितु कृत्रिम तेज रोशनी दिखा दी जाती है।

पुरानी पीढ़ी की मातायें प्रसव के बाद के सप्ताह में अन्धेरे कमरों में रहती थीं। इस प्रथा से बहुत सम्भवतः शिशु के नेत्र विकारों से मुक्त रहते थे। वैज्ञानिक दृष्टि से भी नवजात बच्चों को अत्यधिक प्राणपद वायु में रखने से उनमें नेत्र विकार का होना सिद्ध हो चुका है।

बच्चों के नेत्र विकार का एक कारण जैसा ऊपर कहा गया है। उनका जन्म के समय अत्यधिक प्रकाश में रखा जाना ही हो सकता है मेरा यह सुझाव नहीं कि प्रसव एकदम घोर अधिधारे कमरे में हो, मेरा सुझाव तो यह है कि नवजात शिशु को एक सप्ताह तक तेज स्वभाविक तथा अस्वाभाविक प्रकाश से बचाया जाय। सम्भव है ऐसा करने से हम बच्चों की आँखों को क्षति पहुँचने से बचा सकें।

बालक के नेत्रों को धुएँ और तीव्र प्रकाश से बचायें, प्रकाश उनके नेत्रों पर न पड़े परन्तु पीछे की ओर प्रकाश रखें। बच्चे के नेत्रों में नित्य सरसों के तेल की पारी हुई स्याही में शुद्ध देसी घी मिलाकर लगाना चाहिए या बिना घी मिलाये भी कोरी स्याही लगा सकते हैं। इससे बच्चों के नेत्र बढ़ते हैं। यदि यह स्याही बच्चों के ५ वर्ष तक लगाते रहें तो बच्चों को नेत्र रोगों के होने का भय नहीं रहता।

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इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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भोजन

बच्चों को एक बादाम दूध में घिस कर नित्य चटाना उत्तम है। बच्चों को कम से कम ५ नग मुनक्का नित्य सेवन करानी चाहिए। मुनक्का से शक्ति बढ़ती है और शरीर में रक्त उत्पन्न होता है। बच्चे को अन्न कम से कम १॥ या २ वर्ष के पश्चात् ही देना उत्तम है।

बच्चों को दिन में एक बार या दूसरे दिन सुहागे की खील १ रत्ती दूध में घोलकर देने से पेट ठीक रहता है और यह बच्चों का कैलिशियम है।

बच्चों को ठण्ड का विकार हो जाने पर जायफल और केशर जल में घिस कर दिन में दो बार देना चाहिए। अथवा देसी घी में जायफल घिस कर सीने पर मलना भी उत्तम है।


रक्षा

बच्चों की रक्षा का भार माता-पिता ही पर है। बच्चों को खोटी संगत, खोटे अध्यापक, खोटे सेवक और दुराचारी जनों से सदैव बचाते रहना चाहिए। बच्चों को नाच रंग, श्रृंगारित खेल तमाशे तथा अन्य दूषित वातावरण वाले स्थानों में नहीं भेजना चाहिए तथा साथ भी न ले जाना चाहिए। इससे बच्चों का ब्रह्मचर्य खण्डित हो जाने का भय है। बच्चों के वस्त्र पर मौहल्ले का नाम तथा मकान नम्बर और पिता का नाम लिखवा देना चाहिए, जिससे बच्चा खो जाने पर सुगमता से कोई भी उसे उसके वस्त्र पर लिखे पते पर पहुँचा दे।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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शिक्षा

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गन्धारों राजा धृतराष्ट्र की पत्नी बड़ी पतिव्रता थीं। इनके पति अन्धे थे, तो यह भी सारी आयु अपनी आँखों पर पड़ी बाँधे रहیں। वे महाभारत युद्ध समाप्त होने के पश्चात् एक दिन कुन्ती से जो युधिष्ठिर की माता थीं कहने लगीं कि मैं जैसी पतिव्रता हूँ वैसी तु नहीं पर मेरे सब पुत्र युद्ध में मारे गये और तेरे सब जीवित हैं इसका क्या कारण है? क्या परमात्मा के घर भी अन्धे हैं? उसने उत्तर दिया— कदापि नहीं। पतिव्रता होने का फल है कि उसका पति जीवित रहे, सो यह सीमायु तुरन्त प्राप्त है तेरा पति जीवित है, पर उसका यह फल तो नहीं कि उसके पुत्र भी जीवित रहें। इस कार्य को तुने नहीं किया मैंने किया। सो मेरे पुत्र जीवित हैं तेरे नहीं। 'जो औरों का अहित चाहता है उसका स्वयं अहित होता है।' यह बात सत्य और पुरातन है।

तुने मेरे पुत्रों को मारने के अर्थ लाक्षादि भवन बनवाया यह सोच कर कि उसमें आग लगा दी जायेगी तो सब मर जायेंगे, पर मारने वाले से जिलाने वाला बड़ा है। मुझे विदुर द्वारा पता लग गया, मैं अपने बच्चों को उसमें से निकाल ले गई। पीछे आग लगा दी गई और भीलनी पाँच पुत्रों सहित जलकर मर गयी। ऐसी दशा में तेरे पुत्र कैसे जीवित रहते।

'आज भी मूर्ख स्त्रियाँ चौराहों आदि में उतारे कराकर इस लिये रखती हैं कि उनको लौधकर औरों के बच्चे मर जायें और मेरे बच जायें। जिसका परिणाम बहुधा उल्टा ही होता है। कोई दुष्टा तो मेढ़े, बकरे, मुर्गे आदि यह समझ कर कटवाती हैं कि जीव के बदले जीव देने से मेरा बच्चा बच जायगा और एक हत्या का पाप सर पर रखती हैं। परमेश्वर को भोला बुद्ध अपना जैसा जानती हैं। ईश्वर के यहीं भी अन्धे समझ रखा है।'

पुत्रों को जीवित रखने का उपाय मैंने किया।

देख लो मेरा पति जीवित नहीं पर बच्चे जीवित हैं।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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मैंने लाक्षागृह से निकल कर एक चकरा नाम के एक नगर में पुत्रों सहित एक ब्राह्मणी के गृह पर निवास किया, उस ब्राह्मणी के एक पुत्र था। उस नगर में एक ब्रह्म नाम के राक्षस ने उपद्रव मचा रखा था। वह एक व्यक्ति को नगर से नित्य उठा ले जाता था और उसे खा जाता था। राजा ने तंग आकर अपनी प्रजा में से बारी नियत कर दी थी। जिसकी बारी होती वही अपने पुत्र को स्वयं एक स्थान पर पहुँचा देती थी।

एक दिन उस ब्राह्मणी के पुत्र की बारी आई। पुत्र की ममता का हाल आपको क्या बताऊँ पुत्रवती स्त्रियाँ ही जानती हैं। वह जल बिना मीन जैसे तड़पती थी। उसे व्याकुल देख मेरा भी हृदय कम्पित हो उठा, मैंने उससे कहा कि तू इतनी व्याकुल, विकल न हो मेरे साथ मेरे पाँच पुत्र हैं मैं उनमें से एक को आज तेरे पुत्र के बदले भेज दूँगी। उसने मेरी बात का विश्वास न करके अपने विद्यारानुकूल उत्तर दिया कि संसार में कहीं ऐसा हुआ है, मुझे जितनी एक की ममता है तुझे उतनी ही पाँच की होगी, हाथ की पाँच उंगलियों में से जिसे काटो उसी में दर्द होता है। क्या तुझे अपना कोई पुत्र भारू है वा कुथारा है मैंने कहा मेरे सब झींझों के तारे और प्राणों से प्यारे हैं, परन्तु सब शुभ कर्मों का निचोड़ (तत्व) परोपकार है।

आत्मार्थ जीवलोकेऽस्मिन्तनको न जीवति मानवः।

परपरोपकारार्थ योजीवति सजीवति॥

परोपकार शून्यस्य धिड् मनुष्यस्य जीवितम्।

धन्यास्ते पशवो येषां चर्मोप्युपकरिष्यति॥

अर्थ- अपने लिए तो सभी जीते हैं पर जीना उसका है जो दूसरों के लिए जीता है। जो उपकारी नहीं उससे तो पशु ही अच्छे हैं जो मरने पर भी चमड़े से उपकार करते हैं।

अन्त को मैंने भीम को उस दुष्ट राक्षस की भेंट के लिये भेजा। इसने जाकर प्रथम तो सब पकवानादि जो स्त्रियाँ लायी थीं

इच्छानुसार सन्तान

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योगेन्द्र गुप्तः

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खा लिया और कहा जब वह मुझे खायेगा तो सब उसके पेट में पहुँच जायगा। फिर जब वह राक्षस आया और नित्य जैसा मीठा आदि और व्यक्ति नहीं देखा तो बड़े भयंकर शब्द से गंजा, तभी भीम ने भी उससे ऊँचे स्वर से उत्तर दिया कि सामान तो मैंने खा लिया है अब तू मुझे खा ले सब तेरे पेट में पहुँच जावेगा व्यर्थ क्यों चिल्लाता है। पर वह ज्यों ही इसकी ओर झपटा तभी भीम ने उसे पकड़ कर भूमि पर दे पटक और उसके दोनों पैर चीर कर फेंक दिये। उसके मरते ही वहाँ जय-जयकार की ध्वनि चहुँ ओर गुँज उठी। 'भीम ने केवल उस ब्राह्मणी का ही कष्ट दूर नहीं किया वरन् नगर के सभी बालकों को प्राण दान दिया। इसलिए मेरे बच्चे कैसे मरते।'

जो दूसरों की रक्षा करने के लिये अपने आपको और अपने बच्चों की आहुति देता है, उसे तथा उसके बच्चों की रक्षा ईश्वर करता है और चिरंजीवी होने का वरदान देता है।


शिक्षा

भारत में स्वतन्त्र होने से पूर्व राज्य कार्य, बोलचाल तथा शिक्षा आदि सभी कार्य उर्दू भाषा के माध्यम से होते थे। उसी समय में एक धनी पुरुष सेठ मोतीचन्द के एक इकलौता पुत्र था। उनके और कोई सन्तान न थी। देश में उर्दू का प्रचार होने के कारण सेठ मोतीचन्द ने एक मौलाना लड़के को पढ़ाने के लिए लगा लिया। वह मौलाना कई वर्ष तक लड़के को पढ़ाते रहे। अपने स्वभाव के अनुसार मौलाना साहब पौन घण्टा लड़के को उर्दू पढ़ाते और शेष पाव घण्टे में अपने मजहब की प्रशंसा करते। जिसका लड़के पर यह प्रभाव पड़ा कि उसने मुसलमान होना स्वीकार कर लिया और अपने माता-पिता से कह दिया कि मैं मुसलमान मजहब

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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