इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
गर्भ के लक्षण और वृद्धि
इसी बीच बादशाह ने अहंकार सहित दरबारियों की ओर देखते हुए कहा- 'मेरे विचार में इससे भयंकर शेर संसार में दूसरा न होगा।'
दरबारियों की गर्दनें हिलने लगीं 'बेशक सही फरमाते हैं जहाँपनाह', आदि-आदि स्वर चहूँ और से सुनाई देने लगे। केवल यशवन्तसिंह चुप थे। जब सम्राट ने उनकी ओर देखा तो हँस दिये। सम्राट को भाल पर रेखायें पड़ गयीं, अपना अपमान समझ वह और क्रुद्ध हुआ। परन्तु वह कर ही क्या सकता था? वह तो स्वयं यशवन्तसिंह से घबराता था। अपनी मुद्रा को सँभाल बनावटी हँसी हँस कर कहने लगा 'क्यों? आप हँसे क्यों? क्या आप इसे भयंकर शेर नहीं मानते?'
'सम्राट! यह तो एक साधारण सिंह है ऐसे सिंहों से हमारे बच्चे खेलते हैं।' ईष्या के साथ बादशाह ने कहा 'ओह!'
'जी ही! यदि आशा हो तो मैं भी अपना सिंह दिखाऊँ।' ही अवश्य दिखाओ। कल उसे दरबार में अपने साथ लाना, तुम्हारे शेर और हमारे शेर की कुश्ती होगी। देखें कौन जीतता है। कुश्ती की ललकार स्वीकार कर यशवन्तसिंह बैठ गये।
दरबार समाप्त हुआ, यशवन्तसिंह घर गये उसी समय पुत्र पृथ्वीसिंह पाठशाला से पढ़कर आया। यशवन्तसिंह ने कहा 'बेटा कल दरबार देखने चलोगे' पृथ्वीसिंह ने प्रसन्न होकर कहा 'हाँ पिताजी मैं कल दरबार देखने अवश्य चल्गूंगा।'
पृथ्वीसिंह और दिनों की अपेक्षा आज दरबार जाने की प्रसन्नता में नित्य कर्मों से शीघ्र ही निबट कर तैयार हो गया।
अगले दिन दरबार और दिनों की अपेक्षा दर्शकों से अधिक भरा हुआ है। क्योंकि दरबार में सिंह की कुश्ती होने का समाचार सारे में फैल गया था। सम्राट के सिंह का पिंजरा दरबार में उपस्थित है, सभी दर्शकों को दीख रहा है। परन्तु सबकी लालायित दृष्टियाँ यशवन्तसिंह तथा उसके सिंह के आने की
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प्रतीक्षा में लगी हुई हैं। कुछ ही क्षणों के पश्चात् यशवन्तसिंह अपने प्रिय पुत्र पृथ्वीसिंह को साथ लिए दरबार में उपस्थित हुए। सबकी दृष्टि यशवन्तसिंह और उनके साथ बालक पर पड़ी, परन्तु सिंह को किसी ने नहीं देखा। सिंह को साथ न देखकर उपहास और व्यंग के साथ शाहंशाह कहने लगे 'कहिए! आपका शेर कहाँ रह गया?' क्या हमारे शेर से डर गया? खुशामदी लोगों ने साथ दिया। परन्तु यशवन्तसिंह पर इस उपहास का कोई प्रभाव न पड़ा। वह मुस्कराते हुए कहने लगे- 'मेरा सिंह मेरे पास है।' सब चौंक उठे। सम्राट ने आश्चर्य से कहा- 'कहाँ है?' यशवन्तसिंह ने मधुर स्वर में कहा- 'मेरे पास बैठा है। खुशामदी दरबारी- 'यह शेर!' कहकर हँसने लगे, साथ में औरंगजेब भी खूब हँसा और कहने लगा- 'यशवन्तसिंह तुमको क्या हो गया? कहाँ यह भयंकर शेर कहाँ एक दूध पीता बालक।' परन्तु यशवन्तसिंह चुप रहे।
बच्चा पिता के संकेत को समझ गया। तत्काल ही बच्चे के हृदय में रजपूती वीरता उनड़ पड़ी, भुजाएँ फड़कने लगीं। और मुखड़े पर लालिमा छटकने लगी। उसी क्षण पृथ्वीसिंह अपने पिता की तलवार म्यान से निकाल सिंह की ओर बढ़ा। पुत्र को सिंह की ओर बढ़ता देखकर यशवन्तसिंह ने कहा- 'बेटा! निःशस्त्र पर शस्त्र लेकर सामने जाना क्षत्रियों का धर्म नहीं।' पिता का वचन सुनते ही बच्चे ने पुत्रा तलवार छोड़ खाली हाथ ही पिजरे की ओर बढ़ा। पिजरा खोल कर राजपूत सिंह का बच्चा उस हिंसक सिंह से भिड़ गया। तत्काल ही उस यशवन्तसिंह सुत ने अहंकारी यवनिक शासक सिंह के जबाड़े को पकड़ कर चीर दिया।
पाठको क्या यशवन्तसिंह ने अपने बच्चे को पहले से ही सिंह से कुश्ती लड़ने का अभ्यास करा रखा था? या दरबार में कुश्ती की चुनौती को स्वीकार कर कुछ दिन का अवकाश लेकर लड़ना सिखाया था? नहीं-नहीं! सिंह की कुश्ती अगले ही दिन थी। परन्तु यशवन्तसिंह ने अपने पुत्र को गर्भाधान से ही सिंह
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बनाया था। उसे पूर्ण विश्वास था कि मेरा पुत्र सिंह से कुश्ती में हारेगा नहीं तभी तो निर्भय, निःसंकोच और दृढ़ता के साथ भरे दरबार में औरंगजेब की ललकार को स्वीकार किया था और विशेषता यह कि घर जाकर पुत्र से सिंह की कुश्ती के बारे में कुछ कहा भी नहीं।
गर्भाधान से लेकर ५ वर्ष की आयु तक बालक पर माता के विचार, धारणा, ध्यान, कार्य चित्रावलोकन आदि सभी बातों का प्रभाव-पड़ता है इसलिए, जिस प्रकार के बच्चे की इच्छा हो उसी प्रकार के चित्र, ग्रन्थ, गाथाओं का अवलोकन तथा मनन गर्भिणी को करना चाहिए और अपनी दिनचर्या भी उसी अनुसार रखनी चाहिए।
गर्भ के लक्षण और वृद्धि
प्रथम मास- यदि स्त्री को मासिक धर्म सम्बन्धी कोई रोग न हो, तो गर्भ धारण के पश्चात् मासिक धर्म नहीं होता। यह गर्भ का प्रथम और निश्चित लक्षण है। अधिकांश स्त्रियों का जी मिचलाता है बार-बार थूकने की इच्छा होती है, मुख से पानी अधिक निकलता है। भूख अधिक लगने लगती है, और चेहरे पर दुर्बलता के चिह्न होते हैं। स्त्रियों के मासिक धर्म का दोष, बन्ध्या दोष या अन्य व्याधि के कारण गर्भ स्थित न होने पर निम्नलिखित औषधि का प्रयोग ३ मास तक निरन्तर कराने से गर्भ सम्बन्धी सभी विकार दूर होकर गर्भ धारण करने की शक्ति प्राप्त होती है। साँठ ३ तोला, शतावर ३ तोला, असगन्ध नागौरी ३ तोला अजवायन ३ तोला, ईसबगोल १।। तोला, मिश्री १२ तोला ईसबगोल को छोड़कर सारी वस्तुओं को कूट छान लें बाद में ईसबगोल साबत ही मिला दें। मात्रा ४ माशा सुबह ४ माशा सायं दूध से
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