इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextखा लिया और कहा जब वह मुझे खायेगा तो सब उसके पेट में पहुँच जायगा। फिर जब वह राक्षस आया और नित्य जैसा मीठा आदि और व्यक्ति नहीं देखा तो बड़े भयंकर शब्द से गंजा, तभी भीम ने भी उससे ऊँचे स्वर से उत्तर दिया कि सामान तो मैंने खा लिया है अब तू मुझे खा ले सब तेरे पेट में पहुँच जावेगा व्यर्थ क्यों चिल्लाता है। पर वह ज्यों ही इसकी ओर झपटा तभी भीम ने उसे पकड़ कर भूमि पर दे पटक और उसके दोनों पैर चीर कर फेंक दिये। उसके मरते ही वहाँ जय-जयकार की ध्वनि चहुँ ओर गुँज उठी। 'भीम ने केवल उस ब्राह्मणी का ही कष्ट दूर नहीं किया वरन् नगर के सभी बालकों को प्राण दान दिया। इसलिए मेरे बच्चे कैसे मरते।'
जो दूसरों की रक्षा करने के लिये अपने आपको और अपने बच्चों की आहुति देता है, उसे तथा उसके बच्चों की रक्षा ईश्वर करता है और चिरंजीवी होने का वरदान देता है।
शिक्षा
भारत में स्वतन्त्र होने से पूर्व राज्य कार्य, बोलचाल तथा शिक्षा आदि सभी कार्य उर्दू भाषा के माध्यम से होते थे। उसी समय में एक धनी पुरुष सेठ मोतीचन्द के एक इकलौता पुत्र था। उनके और कोई सन्तान न थी। देश में उर्दू का प्रचार होने के कारण सेठ मोतीचन्द ने एक मौलाना लड़के को पढ़ाने के लिए लगा लिया। वह मौलाना कई वर्ष तक लड़के को पढ़ाते रहे। अपने स्वभाव के अनुसार मौलाना साहब पौन घण्टा लड़के को उर्दू पढ़ाते और शेष पाव घण्टे में अपने मजहब की प्रशंसा करते। जिसका लड़के पर यह प्रभाव पड़ा कि उसने मुसलमान होना स्वीकार कर लिया और अपने माता-पिता से कह दिया कि मैं मुसलमान मजहब
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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