इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
शुक्राणुओं का उलझा हुआ प्रश्न
वैद्य होकर ऐसी बात कह रहे हैं? यह रोग है-भाग्य नहीं। वैद्य जी- आप ही कुछ बताइये? पण्डित जी अबकी बार जब गर्भ स्थित हो तब आप मुझे बताना। कुछ समय को परघात् गर्भ स्थित हुआ, वैद्य जी पण्डित गोपीनाथ जी को घर पहुँचे। पंडित जी ने पेड़ की डाल निकाल कर दी और कहा- उसमें से चने बराबर तोड़ कर नित्य प्रातः काल गर्भिणी मुख मे डाल कर चूसती रहे। इसका सेवन प्रसव समय तक किया जायगा। वैद्य जी ने ऐसा ही किया और समय आने पर पुत्र ने जन्म लिया। वैद्य जी ने पंडित गोपीनाथ जी का धन्यवाद किया और इस प्रयोग को जानना चाह। पंडित जी ने बताया यह प्रयोग हमारे बाबा श्री पंडित जानकी दास जी से प्राप्त हुआ और आज तक कभी असफल नहीं हुआ।
प्रयोग- जिस शनिवार के दिन पुष्प नक्षत्र हो उसी दिन काले सिरस के पेड़ की सूखी डाल हाथ से छुटा कर रख लें ध्यान रहे किसी धातु से नहीं छुटानी चाहिए।
शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष का
भ्रम निवारण
चन्द्र मास के दो पक्ष होते हैं, अमावस्या के पश्चात् बगले दिन से प्रारम्भ होने वाले पक्ष को शुक्ल पक्ष कहते हैं इसमें चन्द्रमा वृद्धि को प्राप्त होता है और पौर्णमासी के दिन चन्द्रमा पूर्ण हो जाता है इसके अगले दिन से चन्द्रमा का क्षय होने लगता है, इस पक्ष को कृष्ण पक्ष कहते हैं।
स्त्री के मासिक धर्म के भी दो पक्ष होते हैं पहला पक्ष मासिक धर्म को प्रारम्भ होने के दिन से गिना जाता है इसे शुक्ल पक्ष कहते हैं, इस पक्ष के सोलह दिनों में ही गर्भ स्थित होता है इसके पश्चात् १७वें दिन से कृष्ण पक्ष प्रारम्भ हो जाता है और
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यह अगले मासिक धर्म तक चलता है, इस पक्ष में गर्भ स्थित नहीं होता। स्त्री को यही शुक्ल और कृष्ण पक्ष हैं। इसका चन्द्रमा के शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष से कोई सम्बन्ध नहीं है।
यह धारणा बिलकुल निर्मूल और भ्रामक है कि चन्द्रमा के शुक्ल पक्ष में गर्भ स्थित होने पर पुत्र तथा कृष्ण पक्ष में गर्भ स्थित होने पर पुत्री की प्राप्ति होती है, यह नितान्त गलत है। इसका गर्भ में पुत्र-पुत्री के होने का कोई सम्बन्ध नहीं, इसमें तो केवल मासिक धर्म की 'सम' विषम' रात्रि ही प्रभावकारी होती है न कि चन्द्रमा के शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष। चन्द्रमा के शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष का बच्चे के विकासोन्मुख होने में तो अवश्य प्रभाव होता है। जिसे हमने आगे अंकित किया है।
★★★
अति सूक्ष्म विचारों का प्रभाव
आपने अति उत्तम सन्तान को प्राप्त करने के सभी साधनों पर विचार कर आचरण किया। आपने एक मास तक उत्तम भोजन लिया, ब्रह्मचर्य का पालन, मासिक धर्म की सावधानियाँ, उत्तम रात्रि, उत्तम तिथि, उत्तम नक्षत्र आदि सब कुछ विचार कर दिन का निश्चय किया। उस दिन आप आनन्दमन, प्रसन्नचित्त, शुद्ध विचारों के साथ गर्भाधान संस्कार के लिये अन्तापुर में प्रवेश कर कार्य में व्यस्त हो जाते हैं। उसी समय आपके समीपस्थ किसी साहूकार के घर पर डकैती पड़ती है। धीय-धीय बन्दूकों के फायर होने लगते हैं। उसकी भयंकर आवाजें आपके कानों तक भी पहुँची और तत्काल आपके मन में यह विचार उठा कि कहीं डकैती पड़ रही है। यदि उस समय वार्यपात होकर गर्भ स्थित हो जाय तो उस गर्भ से उत्पन्न बालक में दयुराज के विचार अवश्य ही प्रवेश कर जायेंगे। उसे कोई रोक नहीं सकेगा।
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आपका प्रश्न हो सकता है कि इतने लम्बे समय तक के साधन और उत्तम आचरण के ऊपर इस क्षणिक वातावरण के विचारों का प्रभाव क्योंकर हो जायगा? आचरण विचारों की पवित्रता के लिये ही होता है। आकस्मिक घटना से स्थिर विचारों के विचलित हो जाने से उसके प्रभाव को रोका नहीं जा सकता। यही अति सूक्ष्म विचारों के प्रभाव का कारण है। इसका यह अर्थ नहीं कि हमने जो साधन और उत्तम आचरण को अपनाया वह सब व्यर्थ चला गया? नहीं! ऐसा नहीं होगा, जितना आपने तप किया है उसका फल और उत्तम साधनों का प्रभाव भी बच्चे में अवश्य आर्येगे। यदि वह दस्युराज बनता है तो आदर्श दस्युराज बनेगा।
शुक्राणुओं का उलझा हुआ प्रश्न
बहुत पहले से वैज्ञानिक यह मानते चले आ रहे हैं कि वीर्य के अन्दर लाखों शुक्राणु होते हैं। नई खोज के अनुसार अब यह गिनती ५ - ६ करोड़ तक पहुँच गई है। पैथोलॉजिस्ट ६० मिलियन शुक्राणु मानते हैं। यह सभी वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं कि गर्भाधान के समय केवल एक ही शुक्रकीट सक्रिय होता है, और उसी से गर्भ धारण हो जाता है। प्रश्न उठता है कि जब केवल एक ही शुक्रकीट सक्रिय के लिये पर्याप्त उपयोगी होता है, तो प्रकृति ने एक बार के वीर्यपात में ५ - ६ करोड़ शुक्राणु के उपस्थित होने का क्या औचित्य माना है? चिकित्सक यह भी स्वीकार करते हैं कि गर्भाधान के लिये वीर्य में कम से कम ७०% सक्रिय शुक्राणुओं का होना अनिवार्य है।
यदि इससे कम सक्रिय शुक्राणु हैं तो गर्भ स्थिति का होना सम्भव नहीं है।
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आयुर्वेद में गर्भ स्थिति को लिये रजः वीर्य का दोष रहित शुद्ध होना अनिवार्य है। इनमें से किसी एक में अथवा दोनों में कोई भी दोष है तो गर्भ स्थिति नहीं हो सकेगी। यदि गर्भ स्थित हो भी गया तो उस गर्भ से उत्पन्न बालक विकृत होगा अर्थात् अंग बिहेग होगा। आयुर्वेद में पुरुष शुक्राणुओं के न्यूनाधिक होने की और स्त्रियों में अण्डे के उपस्थित होने की कोई चर्चा नहीं है। वहीं पर तो केवल शुक्र और आर्तव की परम शुद्धता का ही उल्लेख है। शुद्ध शुक्र और आर्तव के लक्षण तथा दोष अधिकृत करते हैं।
शुक्र-दोष (वीर्य)
वात पित्त श्लेष्म शोणित कृष्णपग्रन्थि
पूति पूय क्षीण मूत्र पुरीष रेतसः।
सुश्रुत शरीर स्थान २/१
वात, पित्त, कफ, रक्त, दुर्गन्ध, गौंडदार, मवाद युक्त, क्षीण वीर्य, मूत्रगन्धी, मलगन्धी, दोष वाले पुरुष गृहस्थ में असमर्थ होते हैं।
आर्तव-दोष (रजः)
तेषु कृष्णपग्रन्थि पूतियक्षीण मूत्रपुरीष
प्रकाशमसाध्य साध्यमन्यद् भवति॥
सुश्रुत २/२
कृष्णक (सड़े मुर्दे की गन्ध), गौंडदार, मवाद युक्त, क्षीण, मूत्र मल रंग वाला, अथवा छीछड़ेदार, काले रंग का, असाध्य होते हैं।
शुद्ध शुक्र-
स्फटिकाम् द्रवं सिगंधं मधुरं मधुगन्धं च।
शुक्रमिच्छान्ति केचित् तु तैलक्षौद्रनिभं तथा॥
सुश्रुत - २/१३
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