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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

भोजन

दौत

जब बच्चे के दौत निकलने आरम्भ होते हैं उस समय उस को इतना कष्ट होता है कि वह लिखा नहीं जा सकता। बच्चा उस समय तक बोलता नहीं इसी कारण वह अपने कष्ट को नहीं कह सकता। जिसके कारण बच्चों को ज्वर, दस्त, नेत्र रोग आदि अनेक व्याधियाँ लग जाती हैं। ऐसी अवस्था में बच्चे की विशेष सावधानी रखनी चाहिए।

सिरस के बीजों को पानी में भिगो दें जब बीज फूल जायें तो उन्हें सुई द्वारा एक डोरे में पोकर माला बना लें। यह माला बच्चे के गले में कण्ठ से लगी हुई पहिनने से दौत सुगमता से निकल आते हैं या एक लाकेट ताँबे का बनवाकर उसके बीचों बीच में आर-पार एक छिद्र कराकर उसमें जस्ता और चाँदी की मिश्रित कौल लगाकर उस पर बिजली चढ़ा लें। यह लाकेट भी बच्चों के दौत सुगमता से निकलने में साधक है। बच्चे के मसूड़ों पर शहद में सहागे की खोल मिलाकर मलना उपयुक्त है।


नेत्र

गिरती हुई नेत्र ज्योति- यह आश्चर्य की बात है कि वर्तमान पीढ़ी की आँखों की ज्योति गिरती जा रही है। इससे भी अधिक आश्चर्य जनक तथ्य यह है कि इसका कारण स्पष्ट करने वाला कोई वैज्ञानिक सिद्धान्त विद्यमान नहीं है। यद्यपि इसका कारण वंश परम्परा, पौष्टिक पदार्थों की कमी, जीवन का आधुनिक सभ्य ढंग, स्वास्थ्य की दुर्बलता बताये जाते हैं। फिर भी वास्तविक कारण अभी भी कल्पना का विषय बना हुआ है।

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पशु-पक्षियों के जीवन के सूक्ष्म अध्ययन और इस तथ्य के आधार पर कि पुरानी पीढ़ी के लोगों में नेत्र विकार व्यापक रूप धारण किये हुए न था, मैं यह सुझाव देना चाहूँगा कि नेत्र विकार का एक कारण यह है कि जन्म के होते ही बच्चे को तेज, कृत्रिम और अत्यभाविक रोशनी के दर्शन करा दिये जाते हैं। पशु-पक्षी का कोई बच्चा उस दिन आँखें नहीं खोलता जिस दिन वह जन्म लेता है। परन्तु मानवीय बच्चों को जन्म ग्रहण करते समय ही न केवल सूर्य की अपितु कृत्रिम तेज रोशनी दिखा दी जाती है।

पुरानी पीढ़ी की मातायें प्रसव के बाद के सप्ताह में अन्धेरे कमरों में रहती थीं। इस प्रथा से बहुत सम्भवतः शिशु के नेत्र विकारों से मुक्त रहते थे। वैज्ञानिक दृष्टि से भी नवजात बच्चों को अत्यधिक प्राणपद वायु में रखने से उनमें नेत्र विकार का होना सिद्ध हो चुका है।

बच्चों के नेत्र विकार का एक कारण जैसा ऊपर कहा गया है। उनका जन्म के समय अत्यधिक प्रकाश में रखा जाना ही हो सकता है मेरा यह सुझाव नहीं कि प्रसव एकदम घोर अधिधारे कमरे में हो, मेरा सुझाव तो यह है कि नवजात शिशु को एक सप्ताह तक तेज स्वभाविक तथा अस्वाभाविक प्रकाश से बचाया जाय। सम्भव है ऐसा करने से हम बच्चों की आँखों को क्षति पहुँचने से बचा सकें।

बालक के नेत्रों को धुएँ और तीव्र प्रकाश से बचायें, प्रकाश उनके नेत्रों पर न पड़े परन्तु पीछे की ओर प्रकाश रखें। बच्चे के नेत्रों में नित्य सरसों के तेल की पारी हुई स्याही में शुद्ध देसी घी मिलाकर लगाना चाहिए या बिना घी मिलाये भी कोरी स्याही लगा सकते हैं। इससे बच्चों के नेत्र बढ़ते हैं। यदि यह स्याही बच्चों के ५ वर्ष तक लगाते रहें तो बच्चों को नेत्र रोगों के होने का भय नहीं रहता।

★★★

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

भोजन

बच्चों को एक बादाम दूध में घिस कर नित्य चटाना उत्तम है। बच्चों को कम से कम ५ नग मुनक्का नित्य सेवन करानी चाहिए। मुनक्का से शक्ति बढ़ती है और शरीर में रक्त उत्पन्न होता है। बच्चे को अन्न कम से कम १॥ या २ वर्ष के पश्चात् ही देना उत्तम है।

बच्चों को दिन में एक बार या दूसरे दिन सुहागे की खील १ रत्ती दूध में घोलकर देने से पेट ठीक रहता है और यह बच्चों का कैलिशियम है।

बच्चों को ठण्ड का विकार हो जाने पर जायफल और केशर जल में घिस कर दिन में दो बार देना चाहिए। अथवा देसी घी में जायफल घिस कर सीने पर मलना भी उत्तम है।


रक्षा

बच्चों की रक्षा का भार माता-पिता ही पर है। बच्चों को खोटी संगत, खोटे अध्यापक, खोटे सेवक और दुराचारी जनों से सदैव बचाते रहना चाहिए। बच्चों को नाच रंग, श्रृंगारित खेल तमाशे तथा अन्य दूषित वातावरण वाले स्थानों में नहीं भेजना चाहिए तथा साथ भी न ले जाना चाहिए। इससे बच्चों का ब्रह्मचर्य खण्डित हो जाने का भय है। बच्चों के वस्त्र पर मौहल्ले का नाम तथा मकान नम्बर और पिता का नाम लिखवा देना चाहिए, जिससे बच्चा खो जाने पर सुगमता से कोई भी उसे उसके वस्त्र पर लिखे पते पर पहुँचा दे।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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