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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

कन्या और पुत्र भेद रात्रियाँ

में भी होगी। जिस समय सूर्य उत्तरायण होता है अर्थात् सूर्य की कलाओं में वृद्धि होने लगे तभी चन्द्र की कलाओं में भी विशेषता आने लगती है। जब चन्द्र की कलाओं में विशेषता होगी तो वीर्य भी विशेषता युक्त हो जाता है।

'तथा शुक्ल पक्ष का नाम 'देव' और कृष्ण पक्ष का नाम 'असुर' है। तथा उत्तरायण की 'देव' संज्ञा और दक्षिणायन की 'असुर' संज्ञा है।'

ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका
ग्रन्थप्रामाण्यप्रामाण्य विषय

सूर्य की कलाओं के क्षय और वृद्धि से छः ऋतुएँ बनती हैं। तीन उत्तरायण की वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा। और तीन दक्षिणायन की शरद, हेमन्त और शिशिर। बसन्त ऋतु के आरम्भ से सूर्य उत्तरायण होकर कलाओं में वृद्धि को प्राप्त होता है। जब किसी में किसी प्रकार की वृद्धि होती है तो उसका प्रथम प्रभाव उसकी वृद्धि पर होता है। इसी प्रकार सूर्य की प्रथम वृद्धि कला का विशेष प्रभाव वृद्धि पर ही पहुँचा। इस प्रकार जो मनुष्य अपनी सन्तान को ब्रह्मवर्चसी वेदज्ञ और तीक्ष्ण बुद्धि की बनाना चाहते हैं तो वह वसन्त ऋतु में गर्भाधान करें। जो मनुष्य चाहते हैं कि हमारी सन्तान श्री और यश से परिपूर्ण और राजश्री को प्राप्त करने वाली बलवान क्षत्रिय हो तो वह ग्रीष्म ऋतु में गर्भाधान करें। जो मनुष्य चाहते हैं कि हमारी सन्तान पशुधन, वारिण्य और धन के संग्रह करने में चतुर, वैश्य वृत्ति में पूर्ण योग्य हो तो उन्हें चाहिए कि वह वर्षा ऋतु में गर्भाधान करें।

जिस प्रकार गर्भाधान के लिए उत्तरायण परम श्रेष्ठ है उसी प्रकार मास का शुक्ल पक्ष भी परम श्रेष्ठ है।

पारिवारिक असन्तोष की धधकती ज्वालायें भयंकर परिणाम उपस्थित कर बड़े से बड़े वंश को ध्वस्त कर देती हैं। कहीं पिता पुत्र में असन्तोष है तो कहीं भाई-भाई और भाई-बहिन में। जिसका

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वीरेन्द्र गुप्तः

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मूल कारण है विपरीत प्रकृति वाले नक्षत्रों में गर्भाधान संस्कार का होना।

जिस दम्पति की इच्छा हो कि हमारे परिवार में सदैव सुख और शान्ति का वातावरण रहे तो उन्हें उचित है कि वह अपने नाम नक्षत्र के अनुकूल प्रकृति वाले ही नक्षत्रों में गर्भाधान संस्कार करें।

नक्षत्र २८ होते हैं। अभिजित नक्षत्र उत्तराषाढ़ के पश्चात् आता है जिसका समय अति न्यून है, इसी कारण उसकी गणना कम होती है। शेष २७ नक्षत्रों के अनुकूल प्रतिकूल प्रकृति के अनुसार तीन भागों में बाँटा गया है। अपने नाम नक्षत्र वाली पत्ति के नक्षत्रों में ही गर्भाधान होने से परिवार में कभी किसी में प्रतिकूलता उत्पन्न नहीं होगा।

प्रथम पत्तिद्वितीय पत्तितृतीय पत्ति
१. अश्वनि१. भरणां१. कृत्तिका
२. मृगशिरा२. रोहिणां२. अश्लेषा
३. पुनर्वसु३. आद्रा३. मघा
४. पुष्य४. पूर्वाफाल्गुनी४. चित्रा
५. हस्त५. उत्तराफाल्गुनी५. विशाखा
६. स्वाती६. पूर्वाषाढ़६. ज्येष्ठा
७. अनुराधा७. उत्तराषाढ़७. मूल
८. श्रवण८. पूर्वाभाद्रपद८. धनिष्ठा
९. रेवती९. उत्तराभाद्रपद९. शतभिष

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वीरेन्द्र गुप्त:

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कन्या और पुत्र भेद रात्रियोंँ

युग्मासु पुत्राजायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु।

तस्माद्युग्मो सुपुत्रार्थी सविशोदातवेस्त्रियम्॥

मनु ३/४८

अर्थ- (माननीय १० रात्रियों में भी) युग्म ६, ८, १०, १२, १४, और १६ रात्रियों में (गर्भाधान होने से) पुत्र उत्पन्न होता है और अयुग्म ५, ७, ९ और १५ रात्रियों में (गर्भाधान होने से कन्या) उत्पन्न होती है।

इसलिये पुत्र की इच्छा वाले युग्म रात्रियों में और कन्या की इच्छा वाले अयुग्म रात्रियों में स्त्री से समागम करें, और सरलता से समझने के लिए हमारी पुस्तक 'पुत्र प्राप्ति का साधन' देखें।

यह रात्रियाँ मासिक धर्म से आरम्भ होती हैं।

पुमान्पु सोऽधिकं शुक्रेस्त्री भवत्यधिकं स्त्रियाः।

समेऽपुमान्पु स्त्रियां वा क्षीणोऽल्पे च विपर्ययः॥

मनु ३/४९

अर्थ- पुरुष का वीर्य अधिक होने पर पुत्र और स्त्री का रजः अधिक होने पर कन्या और रजः वीर्य दोनों समान हों तो नपुंसक या एक कन्या और एक पुत्र उत्पन्न होता है। वीर्य क्षीण हो अथवा कम हो तो सन्तान नहीं होता।

इंश्वरीय व्यवस्था के अनुसार युग्म रात्रियों में स्त्री का रजः न्यून हो जाता है और अयुग्म रात्रियों में रजः अधिक हो जाता है।

यदि पुरुष का वीर्य इतनी मात्रा में न्यून है कि जो युग्म रात्रि में स्त्री का रजः कम होने पर भी उससे कम है तो ऐसी स्थिति में गर्भाधान करने पर युग्म रात्रि में भी कन्या का ही जन्म

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वीरन्द्र गुप्तः

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