इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextइस जल को प्रसूतिका को एक मास तक पिलायें। प्रसूतिका को कच्चा (बिना उबाले) जल नहीं पिलाना चाहिए इससे बहुत हानि होती है। और पेट आगे को निकला ही रहता है क्योंकि कच्चे जल के पीने से पेट की रंगें ठण्डी पड़ जाती हैं इस लिए सिक्कुड़ नहीं पाली प्रसव के पश्चात् प्रसूतिका के पेट पर पड़ी लगभग १० दिन तक निरन्तर बाँधनी चाहिये। इससे पेट के बड़े रहने का भय नहीं रहता पड़ी कसकर बाँधनी चाहिए।
दूसरे दिन से गुरुकुल काँगड़ी की चाय दूध मिलाकर पाँच दिन पर्यन्त देनी चाहिए।
तीसरे दिन से घी २० तोला, गुड़ २० तोला, सौंठ १॥ तोला, जीरा सफेद २ तोला, अजवायन ३माशा, पिस्ता, बादाम की मींग चिरौजी, मखाना, गींद, काजू, अखरोट की मींग, यह सब ५५ तोला सबको कूट पीस कर घी और गुड़ के साथ पाक बनालें इसे नित्य २ तोला प्रातः सायं १५ दिन तक दें।
चौथे दिन से उपरोक्त चाय में घी डाला जा सकता है और बादाम का छाँका घी डालकर एक सप्ताह तक दिया जा सकता है।
बालक को पान देसी आधा अजवायन १ माशा और नीम के पत्ते ३ नग, जल १ पाव। पकाये हुए जल में किंचित गुड़ मिलाकर ३ दिन तक दें और माता का दूध न दें। जब तीसरे चौथे दिन माता तथा बालक का पेट साफ हो जाय तो बालक को माता का दूध देना चाहिए, और माता को शनैः-शनैः हल्का अन्न देना आरम्भ कर दें। कौकड़ की छाल १ पाव, ४ सेर जल में पका कर रखें प्रसूतिका को इस जल से गर्भ द्वार (योनि) को नित्य दिन में ३-४ बार धोना चाहिए तथा छपके लगाया करें, क्योंकि प्रसव के पश्चात् गर्भद्वार अधिक फैल जाता है और उसे पूर्व स्थिति में लाने के लिये ऐसा करना उचित है। इसी प्रकार गर्भावस्था में पेट बढ़ जाता है और प्रसव के पश्चात् सिक्कुड़ने
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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