इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextपशु-पक्षियों के जीवन के सूक्ष्म अध्ययन और इस तथ्य के आधार पर कि पुरानी पीढ़ी के लोगों में नेत्र विकार व्यापक रूप धारण किये हुए न था, मैं यह सुझाव देना चाहूँगा कि नेत्र विकार का एक कारण यह है कि जन्म के होते ही बच्चे को तेज, कृत्रिम और अत्यभाविक रोशनी के दर्शन करा दिये जाते हैं। पशु-पक्षी का कोई बच्चा उस दिन आँखें नहीं खोलता जिस दिन वह जन्म लेता है। परन्तु मानवीय बच्चों को जन्म ग्रहण करते समय ही न केवल सूर्य की अपितु कृत्रिम तेज रोशनी दिखा दी जाती है।
पुरानी पीढ़ी की मातायें प्रसव के बाद के सप्ताह में अन्धेरे कमरों में रहती थीं। इस प्रथा से बहुत सम्भवतः शिशु के नेत्र विकारों से मुक्त रहते थे। वैज्ञानिक दृष्टि से भी नवजात बच्चों को अत्यधिक प्राणपद वायु में रखने से उनमें नेत्र विकार का होना सिद्ध हो चुका है।
बच्चों के नेत्र विकार का एक कारण जैसा ऊपर कहा गया है। उनका जन्म के समय अत्यधिक प्रकाश में रखा जाना ही हो सकता है मेरा यह सुझाव नहीं कि प्रसव एकदम घोर अधिधारे कमरे में हो, मेरा सुझाव तो यह है कि नवजात शिशु को एक सप्ताह तक तेज स्वभाविक तथा अस्वाभाविक प्रकाश से बचाया जाय। सम्भव है ऐसा करने से हम बच्चों की आँखों को क्षति पहुँचने से बचा सकें।
बालक के नेत्रों को धुएँ और तीव्र प्रकाश से बचायें, प्रकाश उनके नेत्रों पर न पड़े परन्तु पीछे की ओर प्रकाश रखें। बच्चे के नेत्रों में नित्य सरसों के तेल की पारी हुई स्याही में शुद्ध देसी घी मिलाकर लगाना चाहिए या बिना घी मिलाये भी कोरी स्याही लगा सकते हैं। इससे बच्चों के नेत्र बढ़ते हैं। यदि यह स्याही बच्चों के ५ वर्ष तक लगाते रहें तो बच्चों को नेत्र रोगों के होने का भय नहीं रहता।
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इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri