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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages

ऋतुकाल वर्णित कर्म

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अथ य इच्छेद् दुहिता मे पण्डिता जायेत।
सर्वमायुरियादिति तिलौदनं पाचयित्वा
सपिप्पन्तश्नीयातामीश्वरो जनयितवै।

ब्रह्मदण्डकपोनिषद् ६/४/१७

अर्थ- जिनकी इच्छा हो कि हमारी कन्या पण्डिता हो और पूर्ण सौ वर्ष की आयु भोगने वाली हो तो वह दम्पति तिल और चावल की खिचड़ी पकाकर उसमें घी मिलाकर खायें। ऐसा करने से उक्त प्रकार की कन्या को उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं।

अथ य इच्छेत्युन्नो मे पण्डितो विगीतः समितिगंमः।

शुश्रुषितां वांच भाषिता जायेत सर्वाण्वेदाननु बुवीत॥

सर्वमायुरियादिति माध्वं सौदनं पाचयित्वा सपिप्पन्तः।

न्तमश्नीयातामीश्वरो जनयितवा औक्षेणवासवमेणवा॥

ब्रह्मदण्डकपोनिषद् ६/४/१८

अर्थ- जिसकी यह इच्छा हो कि हमारा पुत्र प्रख्यात पण्डित विद्वान्नों की सभा में निर्भय प्रवेश करने वाला तथा श्रवण सुखद वाणी बोलने वाला हो, चारों वेदों का जानने वाला और पूर्ण सौ वर्ष की आयु का भोगने वाला हो तो वह दम्पति उक्ता तथा ऋषभक औषधियों से निकाला हुआ रस घृत संयुक्त चावलों में मिलाकर खायें तो वह उक्त प्रकार का पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ होंगे।

व्यवन्प्राश अवलेह में अष्टवर्ग के नाम से आठ औषधियाँ पड़ती हैं, जिनका अभी तक सही पता नहीं चला है। उसी अष्ट वर्ग में उक्ता और ऋषभक नाम की दो बुटियाँ हैं। जो उपरोक्त सेवन के लिए लिखीं हैं। इनकी उपेक्षा में शतावरी तोला, अश्वगन्ध नागीरी १ तोला, लाल इलायची के दाने आधा तोला लेकर कूट लें। इसका चूर्ण ६ माशा पुष्प और ६ माशा स्त्री घृत युक्त चावलों में मिलाकर सेवन करें। यदि किसी कारण से चावल न प्राप्त हो सकें तो दूध के साथ प्रयोग कर सकते हैं।

इच्छानुसार सन्तान

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वैरिन्द्र गुप्तः

CC-0: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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उपरोक्त सारे भोजनों का लाभ तभी प्राप्त होगा जबकि दम्पति कम से कम १॥ मास तक ब्रह्मचर्य से रहते हुए प्रयोग करें, तत्पश्चात् गर्भधान करें तो उत्तम सन्तान लाभ होगा।

यस्मिन्नुणं सन्वयितयेन् चानन्त्यमश्नुते।

स एव धर्मजः पुत्रः कामजानितरान्विदुः॥

मनु ९/१०७

अर्थ- जिसके उत्पन्न होने से (पितृ) ऋण दूर होता है और मोक्ष प्राप्त होता है उसी को धर्मज पुत्र जाने। औरों को कामज कहते हैं।

मनुष्य शरीर को मोक्ष तभी मिलती है जब अच्छे कर्म करे। अपने शरीर द्वारा संसार के कष्ट को दूर करने वाले, विद्वान् और धर्म का सत्य पथ दिखाने वाले पुत्र को जन्म देने से ही मोक्ष मिलती है अर्थात् मन. आत्मा, शरीर को सुख और शान्ति मिले, यही मोक्ष का द्वार है।

★★★

ऋतु वर्णन

ऋतुकाल स्त्रियों के जीवनारम्भ का चिन्ह है। इसी से गर्भ धारण शक्ति का पता चलता है। यह प्रति मांस तीन दिन पर्यन्त प्रत्येक स्त्री की योनि से रजः निकलता है। इसी को स्त्रियों का मासिक धर्म तथा रजस्वला होना भी कहते हैं। रजस्वला स्त्रियों को चाहिए कि वे अपना समय एकान्त में व्यतीत करें। दुःख और क्लेश-जनक वातावरण तथा विचारों को अपने पास न आने दें। घर की किसी वस्तु को हाथ न लगायें। पृथक् मिट्टी के पात्रों में हल्का भोजन करें। भुंजार आदि छोड़ दें। तीन दिन तक स्नान भी न करें। चौथे दिन स्नान से शरीर शुद्ध करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अथ यस्य जायामार्तव विन्दत त्र्यहंकष्टसेन
पिवेदहतवासा नैनां वृषलो न वृषल्प्यपहन्यात्
त्रिरावान्त आप्लुत्य ब्रीहीन वद्यातयेत्।।

बृहदारण्यकोपनिषद् ६/४/१३

अर्थ- जिनकी स्त्री ऋतुमति हो वह स्त्री तीन दिन तक कांस्य के पात्र में पानी, भोजन न पाय और उसको कोई मलीन वस्त्र, मलीन स्त्री व मलीन पुरुष स्पर्श न करे, फिर चौथे दिन स्नान करने के अनन्तर वह सुन्दर वस्त्र पहिन धानों को कूटे। ऋतुमति स्त्री को यदि कोई मैले वस्त्र पहिनने को या मलीन स्त्री या पुरुष से स्पर्श करेगी तो सम्भव है कि उसके शरीर में दूषिन्धित कीटाणु प्रविष्ट होकर उसी को हानि पहुँचावे, इसलिए उस समय किसी मलीन द्रव्य अथवा वस्त्रादिकों को उपयोग में न लावे।


ऋतुकाल वर्जित कर्म

ऋतुमति स्त्री को तीन दिन पर्यन्त न करने वाले कर्म तथा उनको करने से उस मास में गर्भ स्थित हो जाने पर बच्चे को हानियाँ।

दिन में सोने से = सन्तान अधिक सोने वाली।

नेत्रों में अंजत काजल आदि लगाने से = अन्धों

रोने से = विकृत नेत्र तथा विकार युक्त।

स्नान और अनुलेपन करने से = निर्बल, दुबली तथा दुर्बली।

तेल मर्दन से = कुष्ठी (कुष्ठ रोग वाली)

नाखून काटने से = नाखून रहित।

दौड़ने से = चंचल

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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हँसने से = काले दाँत वाली तथा काले ओष्ठ वाली।

अतिभाषण से = बकवादी।

वेग की ध्वनि सुनने तथा बोलने से = बहरी।

लिखने से = मूर्ख।

अतिवायु सेवन से = उन्मत्त सन्तान होती है।

ऋतुभक्ति स्त्री उपरोक्त कार्य जिस ऋतु में करेगी उसके १६ दिन अर्थात् उसी मास में गर्भाधान हो जाने से उस कार्य का दोष सन्तान में अवश्य आ जायेगा। इसी लिए इन कर्मों का निषेध किया है।

नोपगच्छेत्प्रमोदोऽपि स्त्रियमार्तवदर्शने।

समानशयने चैव न शयीत तथा सह॥

मनु ४/४०

अर्थ- कामार्त पुरुष भी रजस्वला स्त्री के पास न जावे और उसके साथ बराबर बिठौने पर भी न सोवे।

अश्रीरा तन्पूर्वति रशती पाप्याभ्युगा।

पतिर्यद्द्वधोऽ वाससा स्वमङ्गमभिधत्सते।

ऋग्वेद १०/८५/३०

अर्थ- रजस्वला स्त्री के सेवन, स्पर्श साथ निद्रा आदि से पुरुष और सन्तान श्री रहित और रोगादि से दूषित हो जाते हैं।

रजसाभिलुप्तां नार्यं नरस्य ह्यु पगच्छतः।

प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुरचैव प्रहीयते॥

मनु ४/४१

अर्थ- रजस्वला स्त्री के पास जाने वाले पुरुष की प्रज्ञा, तेज, बल, नेत्र तथा आयु नष्ट होती है।

उपरोक्त व्याधि रजस्वलागामी पुरुष को होकर अनेक रोग हो जाते हैं। इसलिये रजस्वला स्त्री के साथ चार दिन तक कभी समागम न करे। रजस्वला स्त्री ठंड से बचकर रहे तथा एकान्त वास करे और चौथे दिन स्नान करके अपने पति या पुत्र का दर्शन

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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