इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
निद्रा
निद्रा
जिस प्रकार शरीर संचालन के लिए हमें भोजन की आवश्यकता रहती है, उसी प्रकार जब हमारे शरीर के अंग प्रत्यंग कार्य करते-करते थक जाते हैं और वे विश्राम करना चाहते हैं तब वही विश्राम हमारी निद्रा लेने से हमारे शरीर यन्त्र थकान को दूर करके पुनः नये बन जाते हैं, यदि निद्रा न हो तो थोड़े ही समय में शरीर नष्ट हो जाय। जिस प्रकार रेल का इंजिन २४ घण्टे बराबर चलने से तप्त हो जाता है, यदि वह इंजिन उस समय नहीं बदला जाय तो वह गर्मी से फट कर नष्ट हो जाय। यही स्थिति इस शरीर को है यदि निद्रा न ली जाय तो शरीर में कोई न कोई उपद्रव खड़ा होकर स्वास्थ्य को नष्ट कर डालेगा। पूर्ण निद्रा लेने से सुख, बल और जीवन की वृद्धि होती है। कम तथा अधिक निद्रा से रोग, कृशता, निर्बलता आदि होकर शरीर का नाश होने लगता है इसलिए सम्यक और योग्य समय में निद्रा का सेवन करना आवश्यक है। उत्तम निद्रा के लिए यथेष्ट चारपाई, सुन्दर बिछौना, तकिया और ऋतु अनुसार ओढ़ने का वस्त्र एवं उत्तम कमरा होना चाहिए। सोने का कमरा शान्त और हवादार हो, जहाँ चारों ओर की वायु प्रवेश हो सके, क्योंकि शुद्ध वायु मनुष्य जीवन तथा शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। कमरे में रात्रि को बहुत हल्का प्रकाश रहना उत्तम है।
प्राच्योदिशि शिरस्सप्तं याम्याया मथवानुप।
सदैवस्वपतः पुंसो विपरीतं तु रोगदम्।
बिष्णु पुराण ३/११/१११
अर्थ- सदा सोते समय पूर्व या दक्षिण दिशा को सिर करके सोना चाहिए, इसके विपरीत सोने से रोग पैदा होते हैं।
स्वगृहे प्राक् शिराशोते श्वसुर्यं दक्षिणा शिरा।
प्रत्यक् शिरा प्रावासे तु न कदाचिदुदक शिरा॥ गायः
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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अर्थ- पूर्व दिशा की ओर सिर करके सोने से धन की प्राप्ति होती है, दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोने से आयु बढ़ती है, पश्चिम दिशा की ओर सिर करके सोने से चिन्ता रहती है और उत्तर दिशा को सिर करके सोने से मृत्यु होती है। पश्चिमी विद्वान् भी मानने लगे हैं कि उत्तर को सिर करके सोने से नेत्रों की ज्योति नष्ट हो जाती है, वह कहते हैं कि हमारे शरीर में एक रेखा खड़ी रहती है, परन्तु उत्तर की ओर सिर करके सोने से ध्रुव की शक्ति से यह रेखा बेड़ी होकर लहराने लगती है, इससे मस्तिष्क रोग, नेत्र रोग हो जाते हैं। सदा उत्तर को सिर करके सोने वाला या तो पागल हो जायगा या अन्धा हो जायगा। जब रोगी मरणोपसन्न हो और दम घुट रहा हो तो उसका सिर उत्तर दिशा की ओर करने की प्रथा हमारे भारत वर्ष में प्रचलित है, इससे प्राण सुगमता से निकल जाता है, इससे सिद्ध होता है कि उत्तर दिशा में प्राणकर्षक कोई वस्तु अवश्य है।
पूर्वरात्रे व्यतीतेतु सङ्ख्येद्वैतमिदिरम्।
पादौपक्षालयेत्पूर्वं पश्चाच्छव्यां समाविशेत्॥
यमः
अर्थ- यमाचार्य का मत है कि एक प्रहर रात्रि व्यतीत हो जाने पर सोने के लिए अन्तःपुर में प्रवेश करे और चारपाई पर बैठकर पीवों को भली प्रकार धोकर तौलिया से साफ करके ईश्वर का स्मरण करते हुए सो जावे। ऐसा करने से निद्रा खूब आती है और स्वप्नदोषादि नहीं होते।
चारपाई पर पहले बार्यी करवट लेटक ८ शर्वास लो फिर दार्यी करवट से १६ और फिर सीधे चित होक ३२ शर्वास लेकर चाहें जिस करवट सो जाओ। पीठ के बल चित और बाई करवट सोने से पाचन शक्ति ठीक रहती है और आयु बढ़ती है।
वाम दिशायामनलो नामेरुव्यव्ति जन्तूनाम्।
तव्यात्तु वाम पार्श्वं शयति भुक् प्रपाकर्थम्।।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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अर्थ- बाई करवट सोने से भोजन शीघ्र पचता है, क्योंकि नाभि से ऊर्ध्व बायाँ ओर आँन रहती है। पिताशय यकृत के ऊपर दाहिनी ओर होता है और वह नीचे की ओर पित्त छोड़ता है, बाई करवट सोने से पित्त ठीक गिरता रहता है और दाहिनी करवट सोने से बन्द रहता है। इसी प्रकार बृहदान्न जो दाहिनी ओर से प्रारम्भ होकर नीचे मल ले जाती है। बाई करवट लेटने से बराबर अन्न सार बृहदान्न से होकर निकलता रहता है और दाहिनी करवट लेटने से निकलने में कठिनाई होती है।
सोते समय चारपाई के पांस लाठी, खड़ाऊ और जल का लोटा अवश्य होना चाहिए। सोते समय मुख से पान, अपनी चारपाई पर से स्त्री और पुष्प माला हटा देनी चाहिए। पानादि को मुख में रख कर सोने से दाँतों में रोग होकर कौड़ा लग जाता है और मुख से दुर्गन्ध आने लगती है। जब पुष्प कुछ कुम्हला जाते हैं। तो उन पर छोटे छोटे जन्तु आकर बैठ जाते हैं। यदि सोते समय अपने समीप से पुष्प माला न अलग की तो यह जन्तु स्वर्वास द्वारा शरीर में प्रविष्ट होकर रोग उत्पन्न कर देते हैं।
रात्रि को स्त्री के साथ सोने से स्त्री पुरुष, रजः और वीर्य के रोगों से परिक्रान्त हो अपना जीवन नष्ट करते हैं, क्योंकि 'पिताधिक्यं यतः स्त्रियाः' स्त्री जाति में पिताधिक होता है। जब वह एक साथ लेटते हैं तो जो वीर्य नवनीत की भीति समस्त शरीर में व्याप्त होता है वह स्त्री की स्पर्श, जनित ऊष्मा से द्रवित हो प्रति समय पतित होता रहता है जो मूत्र करने में जरा सी उतेजना होने पर निकल जाता है और इस कारण निर्बलता प्रति दिन बढ़ती जाती है। जिससे वीर्य के द्रवीभूत होने से सन्तान जनक शुक्र का गुण विनष्ट हो जाता है।
एक साथ सोने से प्रतिदिन मैथुन करना पड़ता है, क्योंकि स्त्रियों में ऋणात्मक, पुरुषों में धनात्मक विद्युत शक्ति होती है, जो एक दूसरे को अपनी ओर खींचती है इससे मन विवश होकर
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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