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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

गर्भ स्थित न होने पर

गर्भ स्थित न होने के कारण और उसका उपचार

गर्भ स्थित न होने के अनेक कारण हैं। जिनमें से मुख्य यह हैं—

  1. १- गर्भाशय में मेध (चर्बी) का बढ़ जाना।
  2. २- गर्भाशय में शोथ (सूजन) का होना।
  3. ३- गर्भाशय में केशाद नाम के कीटों का प्रविष्ट हो जाना।
  4. ४- रजः और वीर्य का दूषित हो जाना।
  5. ५- वन्ध्यापन।
  6. ६- जनित इन्द्रियों का लघु या दीर्घ होना।
  7. ७- वीर्य में सन्तानोत्पादक कौट के अभाव का होना।

उपरोक्त व्याधियों का निराकरण इस प्रकार, करें—

१- गर्भाशय में मेध के बढ़ जाने से गर्भ द्वारा का मुख छोटा हो जाता है जिस कारण गर्भाशय में वीर्य नहीं पहुँच पाता ऐसी दशा में नारी रत्न चूर्ण का दो-तीन मास तक सेवन कराने से लाभ होगा (कुछ अनुभव में देखें प्रयोग नं. २५)।

२- गर्भाशय में शोथ का होना गर्भस्थित होने में बाधक है। ऐसी दशा में भपके से खींचा हुआ मकोय का जल १ तोला और अशोकारिष्ट एक तोला या पुनर्नवासव भोजन के पश्चात् दोनों समय तथा प्रातः गौ दूध के साथ चन्द्रप्रभा वटी की २ गोली। लगभग २-३ मास तक देने से रोग दूर होकर गर्भ स्थित हो जायगा।

३- केशाद नाम के कीटाणु सर के बालों को खा जाते हैं। ऐसी दशा में सर पर गंज नामक रोग हो जाता है। किसी भी

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

असावधानी के कारण यह केशाद कीटाणु स्त्री के गर्भाशय में प्रविष्ट हो जायें तो यह गर्भ में गर्भित रजः वीर्य और भ्रूण को खा जाते हैं। इसी कारण गर्भ स्थित नहीं हो पाता। ऐसी दशा में रात्रि को सोते समय एक ताजा हरी मूली को भली प्रकार चाकू तथा जल से स्वच्छ करके स्त्री अपनी योनि में रखे। प्रातः निकालने पर आप देखेंगे कि मूली पर अनेक काले रंग के बारीक-बारीक कीटाणु लगे हुए हैं। यही केशाद नाम के कीटाणु हैं जो गर्भ में भ्रूण को खा जाते हैं। उस मूली को सावधानी के साथ दूर कहीं फेंक दें। इसी प्रकार मूली का निरन्तर प्रयोग करें। जब तक कीटाणु निकलने बन्द न हो जायें। जब इन कीटाणुओं से गर्भाशय स्वच्छ हो जायेगा तो निश्चय ही गर्भ स्थित हो जायेगा।

४- रजः वीर्य के दूषित हो जाने पर स्त्रियों के लिए सुपारीपाक और पुरुषों के लिए बानरी गुटका प्रयोग करना और ३ मास तक ब्रह्मचर्य से रहना उत्तम रहेगा। यह योग 'कुष्ठ अनुभव' में देखें।

५- बन्ध्यापन तो एक प्रकार से असाधारण अवस्था है जो सातवीं रात्रि में गर्भाधान करने का फल होता है। फिर भी प्रभु से याचना करते हुए स्त्री को नारी रत्न चूर्ण का (कुष्ठ अनुभव का प्रयोग नं. २५) ४-४ माशा प्रातः सायं जीवित बछड़े वाली गाय के दूध से ६ मास तक निरन्तर प्रयोग कराने से लाभ हो सकता है। यदि प्रभु की कृपा हुई तो अवश्य ही गर्भ स्थित होगा।

६- जनित इन्द्रियों की लघुता-दीर्घता का तो विवाह से पूर्व ही जान लेना उचित है। क्योंकि यदि स्त्री की योनि गहरी और पुरुष की इन्द्रिय छोटी होगी तो ना तो स्त्री ही सन्तुष्ट होगी और न ही वीर्य गर्भाशय तक पहुँचेगा और यदि स्त्री की योनि कम गहरी और पुरुष की इन्द्रिय लम्बी होगी तो स्त्री को अधिक कष्ट होने के कारण वीर्य अपने स्थान पर नहीं पहुँच सकेगा। इसलिए इसकी जानकारी विवाह से पूर्व करा लेना उचित रहता है। इसको भली प्रकार समझने और परीक्षा करने के लिए वात्सायन काम सूत्र

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आदि में स्त्री और पुरुषों की आकृतियों के चिन्ह दिये हैं। उनसे ही जनित इन्द्रियों के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करें।

७- जिस वीर्य में सन्तानोत्पादक कौटुम्ब का अभाव हो तो उस वीर्य से कदापि गर्भ स्थापित नहीं हो सकेगा। इसके लिए पुरुष को उचित है कि निम्न लिखित योग ३ मास तक निरन्तर सेवन करें। साथ में स्त्री सेवन का ३ मास तक परित्याग रखें। ऐसा करने से वीर्य में सन्तानोत्पादक कौटुम्ब बलवान होकर गर्भ स्थापित हो जायेगा।

भुने हुए बिनौलों का आटा ५० ग्राम, सलाव मिश्री पंजे की १० ग्राम, सफेद मूसली १० ग्राम, बीज बन्द १० ग्राम, तालमखाना १० ग्राम, लजवन्ती १० ग्राम, उटंगन १० ग्राम, कौंच बीज छिलका उतार कर १० ग्राम, शतावर १० ग्राम, गोखुर पहाड़ी १० ग्राम, पीपल की दाढ़ी २० ग्राम, सैमल की मूसली १० ग्राम, तोदरी सफेद १० ग्राम, तोदरी लाल १० ग्राम, साँठ १० ग्राम भूसी इसबगोल १०० ग्राम, २५० ग्राम मिश्री। भूसी को छोड़कर सबको बारीक कूट लें। ४ से ६ माशा तक दो समय दूध से लें।

गर्भ स्थित न होने पर

किन्हीं सज्जनों का विचार है कि यह आवश्यक नहीं कि जिस दिन गर्भाधान संस्कार के लिए निश्चय किया है उस दिन गर्भ स्थिति हो ही जाय। तो फिर उत्तम तिथि का निश्चय करके कैसे गर्भ स्थित हो सकता है।

प्रिय बन्धुओं! ऐसा नहीं है, जो निश्चित तिथि के दिन गर्भाधान किया जाय और गर्भ स्थित न हो। मैंने पूर्व की पंक्तियों में महाभारत काल के एक नियोग का दृश्य प्रस्तुत किया है। आप उसे पढ़कर देखें। उस घटना से तीन महत्वपूर्ण विषयों पर आश्चर्यजनक प्रकाश पड़ता है।

डक्छानुसार सन्तान

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प्रथम-पुत्र की कामना के लिए नियोग कराया था। सो तीनों बार पुत्रों का ही जन्म हुआ। दूसरे- गर्भाधान समय अम्बिका अम्बालिका और दासी की जैसी जैसी भावना बनी वैसी- वैसी सन्तान ने जन्म लिया। तीसरे- व्यास जी ने अम्बिका अम्बालिका और दासी के साथ केवल एक ही एक बार गर्भाधान कृत्य किया और उसी समय गर्भ स्थित हो गया।

प्रथम महत्त्वपूर्ण विषय यह सिद्ध हुआ कि पुत्र या पुत्री को अपनी इच्छानुसार जन्म दिया जा सकता है। दूसरे गर्भाधान समय पुरुष की अपेक्षा स्त्री के विचारों का बच्चे पर तत्काल प्रभाव पड़ता है और बच्चा वैसा ही बन जाता है। तीसरे निश्चित तिथि में ही केवल एक ही बार में गर्भाधान क्रिया द्वारा गर्भ स्थित हो सकता है। हाँ यह सम्भव हो सकता है कि अम्बिका अम्बालिका और दासी को पूर्व से ही किसी औषधि का प्रयोग कराया गया हो जिससे गर्भाशय वीर्य को तत्काल ग्रहण कर सके। रोग रहित स्त्री पुरुषों के लिए इसी आशय के प्रयोगों का उल्लेख करते हैं जो परीक्षित भी हैं।

स्वर्ण भस्म २ चावल, नागकेशर का चूर्ण १ माशा (यदि नागकेशर बंगाल की मिल जाय तो अति उत्तम है) दोनों को मिलाकर एक मात्रा बनी। जब स्त्री को मासिक धर्म होकर रक्त विकार गिर जावे और स्नान कर शुद्ध हो, जिस दिन गर्भाधान का विचार हो उस दिन तक जीवित बछड़े वाली गाय के दूध से प्रातःकाल स्त्री को सेवन करायें यह योग तत्काल गर्भ स्थापन होने में उत्तम साधक है।

अथवा

मकरध्वज स्वर्ण सिन्दूर १ माशा, सितोपलादि चूर्ण ३ माशा दोनों को खरल में डालकर भली प्रकार घोटें, एक रस हो जाने पर उसकी १० मात्रा बनालें। जब स्त्री को मासिक धर्म होकर रक्त विकार गिर जावे और स्नान कर शुद्ध हो उसी दिन से १० दिन इच्छानुसार सन्तान

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