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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

प्रारंभिक मंगलाचरण, प्राक्कथन एवं 'हिन्दू' शब्द की ऐतिहासिक व्युत्पत्ति

Uploaded By Rajesh Tanti.
हिंदुत्व
(हिंदी)
वीर सावरकर
वीर सावरकरजी का यह लघुग्रंथ प्रथम अंग्रेजी में सन १९२३ में 'मराठा' इस नाम से,
उनके बंदीवास के कारण, प्रसिद्ध हुआ था ।
इसका श्री. ल. ना. गर्दे के द्वारा सन १९२६ में प्रकाशित हुआ यह हिंदी भाषांतर ।

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हिन्दुत्व
( " एक मराठा " कृत " हिन्दुत्व " नामक अंगरेजी
पुस्तकका हिन्दी अनुवाद )
भाषांतरकार
श्रीलक्ष्मणनारायण गर्दे
पौष १६८२
मूल्य ॥।)

प्रकाशक—
लक्ष्मणनारायण गर्दे
१, नरसिंग लेन आमहर्स्ट स्ट्रीट
कलकत्ता ।
इस पुस्तकके सब अधिकार प्रकाशकको प्राप्त हैं।
मुद्रक—
किशोरीलाल केडिया,
वणिक प्रेस, १ सरकार लेन
कलकत्ता ।

प्रस्तावना

“हिन्दुत्व” क्या है ? इसी प्रश्नका प्रामाणिक और तर्क-
शुद्ध उत्तर इस पुस्तकमें दिया गया है। हम यह समझते हैं
कि इस समय प्रत्येक हिन्दूको यह जाननेकी आवश्यकता
है कि हिन्दुत्व क्या है। हिन्दुत्वकी पहचान ही हिन्दू-संघ-
टनका आधार है। यदि हम यही नहीं जानते कि हिन्दुत्व क्या
है अथवा वह कौनसी बात है जो प्रत्येक हिन्दूमें है, चाहे
उसका धर्मसंप्रदाय कुछ भी हो, तो हम यही नहीं जानते कि
हम हिन्दूसंगठनके नामसे किसका संघटन करने चले हैं अथवा
क्या करना चाहते हैं। हमने बहुतसे ऐसे लोगोंको देखा है
कि जो हिन्दूसंगठन चाहते हैं, पर यह नहीं जानते कि हिन्दूका
हिन्दुत्व क्या है या हिन्दूकी परिभाषा क्या है। बहुतसे
लोग तो यह समझते हैं कि हिन्दू तो कोई एक जाति ही नहीं है,
न कोई एक धर्म ही है और इसलिये “हिन्दू”की कोई परिभाषा ही
नहीं हो सकती। परन्तु यह कहते हुए भी वे इस बातको अस्वी-
कार नहीं करते, कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता कि, हिन्दु-
स्थानमें या हिन्दुस्थानके बाहर जो कोई हिन्दू हैं वे यह जानते हैं
कि हम हिन्दू हैं, और अन्य लोग भी यह जानते हैं कि ये हिन्दू
हैं। इसीसे यह बात सिद्ध है कि हिन्दू जब हैं तब कुछ न कुछ

हिन्दुत्व भी है। उस हिन्दुत्वको हम हिन्दूधर्म कह सकते हैं। पर
'धर्म' शब्दका आजकल इतना संकुचित अर्थ होने लगा है कि
उससे लोग एक विशिष्ट प्रकारके धर्म-संप्रदायका ही अर्थ ग्रहण
करते हैं। इसलिये इस पुस्तकमें जानबूझकर हिन्दूका वह सहज-
धर्म, जिससे हिन्दू हिन्दू कहाता है, "हिन्दू-धर्म" नहीं कहा गया,
बल्कि "हिन्दुत्व" कहा है जिससे किसी संप्रदायके धर्मका भ्रम
उसमें न हो। हिन्दुस्थानमें हिन्दू-जातिके अन्तर्गत सनातनधर्म
समाजसे लेकर राधास्वामी पन्थतक नानाविध धर्म-संप्रदाय हैं।
ऐसे प्रत्येक संप्रदाय या समाजका संप्रदाय-धर्म उस समाज या
संप्रदायका समाजत्व या संप्रदायत्व है। परन्तु इन सब समा-
जोंका आधारभूत एक धर्म है, एक तत्व है और वह सबके लिये
सामान्य है। उसी धर्म या तत्वका नाम है 'हिन्दुत्व'। वह
हिन्दुत्व क्या है, यह प्रत्येक हिन्दूको जानना चाहिये, प्रत्येक हिन्दू-
समाजको जानना चाहिये, प्रत्येक हिन्दू-धर्मसंप्रदायको जानना
चाहिये। प्रत्येक मनुष्यको जैसे पहले यह जानना चाहिये कि
हम मनुष्य हैं और तभी वह मानवधर्मशास्त्रमें अपना विशिष्ट
धर्म जाननेका अधिकारी होता है, वैसे ही प्रत्येक हिन्दूको
पहले यह जानना चाहिये कि हम हिन्दू हैं और तभी वह अपने
विशिष्ट धर्म-संप्रदायका अधिकारी होता है। "हम हिन्दू हैं"
इस बातकी पहचान जिस हिन्दू व्यक्ति या समाजको न
हो, उसे यही पता नहीं है कि हम कहाँ हैं, हमारे अस्तित्वका
आधार क्या है, हमारी शक्तिका उद्गमस्थान क्या है। इसलिये

चाहे कोई सिख हो या सनातनी, आर्यसमाजी हो या जैनी,
ब्राह्मण हो या चांडाल, उसे अपने मनुष्यत्वकी पहचानके
बाद सबसे पहला ज्ञान यह होना चाहिये कि हम हिन्दू हैं,
हिन्दुत्व हमारा प्राण है, अखिल हिन्दू-जाति ही हमारा आधार
है। चाहे कोई आध्यात्मिक दृष्टिसे देखे, या सांसारिक दृष्टिसे, इस
सिद्धान्तको वह अस्वीकार नहीं कर सकता। उसे यह मानना ही
होगा कि हिन्दू-जातिके अन्तर्गत सब समाजों और धर्म-संप्रदायों
आधार हिन्दुत्व है और इसलिये यह जानना होगा कि वह
हिन्दुत्व क्या है। प्रस्तुत पुस्तकका वही विषय है और इसलिये
हम यहाँ उसका विस्तार नहीं करेंगे। पाठक पुस्तक पढ़कर यह
स्वयं अनुभव करेंगे कि समग्र हिन्दू-जाति एक है, इस जातिका
मनःसंस्कार और इतिहास एक है; जन्मभूमि एक है और
रक्त भी एक है। हिन्दू-जातिमें सनातनधर्म-समाजके चारों या
पाँचों वर्ण, आर्यसमाज, सिख, जैन, बौद्ध, लिंगायत तथा अन्य
असंख्य पंथ हैं; पर इन सबमें जो जीवनरस प्रवाहित हो रहा है,
वह एक हिन्दू-रक्त ही है। रक्त-संबंधसे बढ़कर दृढ़ बन्धन दूसरा
है ही नहीं। इस समय हिन्दू-जातिके भिन्न-भिन्न वर्णों और
समाजोंमें परस्पर रक्त-संबंध नहीं होता। हम सनातनधर्मावलंबी
ऐसा चाहते भी नहीं। यही नहीं, बल्कि असवर्ण-विवाहके हम
घोर विरोधी भी हैं। पर ऐसा होते हुए भी हम इस बातको
अस्वीकार नहीं कर सकते कि यह जो हिन्दू-जाति है, यह एक ही
रक्तसे उत्पन्न हुई है और प्रत्येक हिन्दूमें हमारे पूर्वतम पितरोंका

रक्त ही प्रवाहित हो रहा है। इस तरह अफ़गानिस्तानके मुसल-
मान और हिन्दुस्थानके मुसलमानोंमें जितना जीवनैक्य-संबंध
संभव नहीं है उतना हम हिंदुओंमें है। पृथ्वीके और किसी देशकी
किसी जातिमें ऐसा रक्त-संबंध-जन्य जीवनैक्य नहीं जैसा हिन्दू-
जातिमें, क्योंकि हिन्दू-जातिने इस संबंधमें रक्तकी विशुद्धताकी
रक्षा की है और हिन्दू-जातिमें जो अनुलोम-प्रतिलोम विवाहका
निषेध हुआ उसका कारण भी विशुद्ध रक्तकी रक्षा ही है, जिससे
हिन्दू-जातिमें आज शुद्ध, शुद्धतर और शुद्धतम हिन्दू-रक्त वर्ण-
वर्णान्तरोंमें देखा जाता है और साथ ही समग्र हिन्दू-जातिमें
एक ही हिन्दू-रक्त प्रवाहित होता है। यह हिन्दू-रक्त हिन्दू-जाति-
का जीवनैक्य है। क्या इस जीवनैक्यको हम आप अपने अन्तः-
करणमें अनुभव करते हैं ? यदि नहीं करते तो हम अपने आपको
नहीं पहचानते—सिख सनातनियोंको नहीं पहचानते, ब्राह्मण
चांडालको नहीं पहचानते, हिन्दू हिन्दूको नहीं पहचानते और इस
जीवनसंग्राममें शत्रु मित्रको—अपने परायेको—भूलकर आप ही
अपने काल होते हैं ! इसलिये हिन्दुओ, सावधान ! अपने आपको
पहचानो; तुम सब हिन्दू हो, तुम सब बंधु-बंधु हो—ब्राह्मणसे
चांडालतक एक ही हिन्दू-रक्त हिन्दू-जातिमें प्रवाहित हो रहा है
समग्र हिन्दू-जाति एक विराट कुटुम्बके समान है, जिसकी जन्म-
भूमि, संस्कृति और इतिहास एक ही है। जन्मभूमि, रक्त-संबंध,
संस्कृति और इतिहास इन चारों बंधनोंसे बद्ध और कोई जाति
संसारमें नहीं है। हिन्दू-जातिकी इस एकताको अनुभव करना

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५
ही हिन्दू-संगठनका आधार है। जिस दिन हिन्दू-जातिके प्रत्येक
समाजमें यह चैतन्य - यह सत्य - जाग उठेगा कि हम सबसे
पहले हिन्दू हैं और हिन्दुत्व ही हमारा प्राण है, उस दिन हिन्दू-
संगठन सिद्ध हो जायगा - उस दिन हिन्दू-जाति इतनी बलवान
होगी कि संसारका कोई संघ या गुट उसका सामना नहीं कर
सकेगा।
इस समय-हिन्दू जातिपर संकट है। पर संकटकाल ही
जागरणका काल है, जब अपने आपको भूले हुए हिन्दू अपने
आपको पहचानने लगते हैं। अपने आपको भूलनेसे ही संकट
आ घेरता है और अपने आपको पहचाननेसे ही संकट दूर हो
जाता है। जब जब हिन्दू-जातिपर संकट आया है और जब जब
उसने उस संकटसे पार पाया है, तब तब उसने अपने आपको
पहचाननेका परिचय दिया है और आत्मस्मृतिको जगाकर
विराट् हिन्दू-जातिने एक होकर अपने अस्तित्वकी रक्षा की है,
अपनी संस्कृतिसे दूसरोंको भी लाभ पहुँचाया है। हिन्दू-जातिके
इस जागरणका इतिहास प्रस्तुत पुस्तकके “हिन्दवानेकी ढाल”
प्रकरणमें अपनी दिव्य झलक एक बार दिखाकर यह बता जाता
है कि हिन्दुओ ! कहाँ भटक रहे हो ? किस सोचमें डूबे हो ?
क्या तुम दुर्बल हो ? क्या तुम फूटके बीज हो ? क्या तुम
सदासे दूसरोंकी गुलामी करते आये हो ? नहीं, नहीं, यह
सारा भ्रम है; तुम्हारी सिंहशक्तिको उभरने न देनेके लिये यह
जाल बिछाया गया है; जरा अपने इतिहासके स्वच्छसरो-

वरमें अपने रूपकी परछाईं देखो, तो देखोगे कि तुम वही आर्य-
सिंह हो जो संसारके अन्य बड़े बड़े राष्ट्रोंके नामशेष होनेपर
भी, अबतक जीते हो ; जो युगयुगान्तरोंसे विद्या, वैभव और
पराक्रमके प्रकाशसे संसारको शिक्षा, दीक्षा और दंड देते चले
आ रहे हो ! हां, इन अगणित वर्षोंके इतिहासमें इधर हजार-बारह
सौ वर्ष तुम्हारे कभी दासत्वमें और कभी उस दासत्वको नष्ट
करनेके प्रयत्नमें बीते हैं ! पर यह हजार बारह सौ वर्षका इति-
हास ही तुम्हारा इतिहास नहीं है, इसके पूर्व न जाने कितने
हजार वर्ष तुम्हारे पराक्रमके प्रखर प्रकाशमें बीते हैं। और इन
हजार-बारह सौ वर्षका इतिहास भी तुम्हारे दासत्वका इतिहास
नहीं, बल्कि दासत्वको नष्ट करनेके लिये संग्रामपर संग्राम करते
रहनेका ही इतिहास है। यह इसी कालका इतिहास है कि अरबके
रेगिस्तानसे रेतीके कणोंके समान असंख्य अरब आक्रमणका-
रियोंने ईरान, शाम, फिलस्तीन आदि देशोंमें रहनेवाली जातियों-
को निःशेष कर मुसलमान बना डाला और उसी विजयोन्मादकी
अप्रतिहत लहरें छठी शताब्दीके अन्तमें सिन्धुके तट-प्रदेशपर
आकर गिरने लगीं, तब तुम्हीं तो थे जिन्होंने वहीं उन्हें रोक
रखा। और किस देश या जातिने यह नमूना संसारको दिखाया
कि पृथ्वीको पादाक्रांत करते चले आते आक्रमणकारियोंसे इस
तरह जूझे कि दस-बीस वर्ष नहीं, सौ-पचास भी नहीं, चार सौ
वर्षतक उन्हें सिन्धमें अटके रह जाना पड़ा, आक्रमणकारी आगे
नहीं बढ़ सके ? संसारमें और कोई शक्ति जिसे नहीं रोक सकी,

॥६
उसे रोका तो हिन्दू-जातिने ही रोका और उस जमानेमें रोका
जब दैव प्रतिकूल था। सिन्धपर आक्रमण करनेके पश्चात् चार
सौ वर्षतक मुसलमान सिन्ध और मुल्तानके आगे न बढ़ सके।
इस समय मुसलमानोंने सारे यूरोपको पादाक्रांत करके स्पेन
देशमें अपना झंडा फहराया था, पर हिन्दुस्थानमें उन्हें सीमापर
ही ४ सदियोंतक लड़ना पड़ा। अन्तको दसवीं शताब्दीके
अन्तमें और ११ वीं शताब्दीके आरंभमें महमूद गजनी पश्चिमो-
त्तर सीमा लांघकर हिन्दुस्थानमें घुसा। उसने बारह बार आक्रमण
किया। बार बार हारनेपर भी हिन्दूओने उसके सामने सिर नहीं
झुकाया, उससे युद्ध ही बराबर करते रहे, और महमूद गजनी-
को सोमनाथकी लूटके बाद हिन्दू राजा भीमदेवकी सेनाके
भयसे सिन्धके रेगिस्तानके रास्ते हिन्दुस्थानसे भाग जाना पड़ा-
सम्मुख युद्धमें उसका साहस नहीं था जो सामना करता। मह-
मूद गजनीके साथ ये जो युद्ध हुए, इनमें समग्र हिन्दू-राजा संघ-
टित होकर नहीं लड़े, यद्यपि उनमें हिन्दुत्वका भाव था। वे संघ-
टनकी आवश्यकता अनुभव नहीं करते थे। एक-एक राजा इतना
बलशाली था कि संगठनका किसीको ध्यान नहीं रहा और
इसका परिणाम यह हुआ कि सिन्धपर आक्रमण होनेके ४ सौ
वर्ष पश्चात् आधा पंजाब प्रान्त मुसलमानोंके अधिकारमें चला
गया। पर अधिकारमें चला गया इसका यह मतलब नहीं है कि
मुसलमानोंका स्वामित्व स्वीकार करके हिन्दू हाथपर हाथ धरके
बैठ गये। इसके बाद ११६१ में महम्मद गोरीने भारतपर चढ़ाई

की। हिंदूपति पृथ्वीराजके तेजस्वी खड्गने समरमें यवन-सेनाका
संहार करके महम्मदको कैद किया। इसने पृथ्वीराजसे अपने
प्राणोंकी भिक्षा माँगी। हिंदूपतिने उसे छोड़ दिया। पर इस कृतघ्न-
ने अपना वचन भंग करके सन् ११६३ में फिर हिन्दुस्थानपर
अकस्मात् आक्रमण कर दिल्लीका सिंहासन भ्रष्ट किया! इस तरह
लगातार ६ सौ वर्ष लड़नेके पश्चात् हिन्दुस्थान परतंत्र हुआ!
संसारमें कौनसी ऐसी जाति है जो अपनी स्वतंत्रताके लिये पीढ़ी
दर पीढ़ी लगातार ६ शताब्दियोंतक रणचण्डीको अपने पुत्रोंकी
भेंट चढ़ा सकी हो? पर यह संग्राम यहीं समाप्त नहीं हुआ।
पृथ्वीराजकी हारके पश्चात् १०० वर्षतक मुसलमान दक्षिण-
भारतमें प्रवेश नहीं कर सके। १२६३ में अलाउद्दीनने दक्षिणपर
चढ़ाई की। असावधान और असंघटित यादव-राज्य यवन-कूट-
नीतिको न समझकर पहली ही चढ़ाईमें छिन्न-भिन्न हो गया।
यादवराज रामदेवरावने दिल्लीके बादशाहका प्रभुत्व स्वीकार
किया। पर हिंदुओंको यह स्वीकार नहीं था। रामदेवरावके
पुत्र शंकरदेवने हिन्दू-स्वातंत्र्यका झंडा फहराया और यवनसेनासे
लड़कर समरांगणमें अपना शरीर छोड़ा। यादवराजकी राजधानी
देवगिरि मुसलमानोंके अधिकारमें गयी और महाराष्ट्र पराधीन
हुआ! पर फिर रामदेवरावके जामाता हरपालदेवने महाराष्ट्रको
स्वाधीन किया। मुसलमानोंसे युद्ध जारी ही था। सन् १३१८ में
हरपालदेव मारा गया। देवगिरिका राज्य नष्ट हुआ, पर हिन्दू-
वीर्य नष्ट नहीं हुआ। दक्षिण-भारतके राज्यभ्रष्ट हिन्दू राजा और

॥-
हिन्दू वीर दक्षिणमें तुंगभद्रा नदीके तटपर, उस प्राचीन परम
पुनीत पंपासरोवरके वारिप्रपातरम्य पर्वत-प्रदेशमें हिन्दू-शक्तिके
संघटनके लिये एकत्र होने लगे। सन् १३३५ में “योगेश्वर” श्री
विद्यारण्य स्वामीके उपदेश और “धनुर्द्धर” श्री हरिहर और
बुक्कके पराक्रमसे उस विजयानगर-राज्यकी स्थापना हुई जिसने
हिन्दू-विजयजयंती, हिन्दू-संस्कृति और हिन्दू-धर्मकी रक्षा
की। समग्र हिन्दू-जातिकी ओरसे इस विजयानगर राज्यने
आक्रमण-कारियोंके साथ संग्राम जारी रखा। ढाई सौ वर्ष-
तक इसने अपना काम किया। अन्तको दक्षिणके सब
मुसलमान राज्योंने मिलकर इससे घोर संग्राम किया और
सन् १५६४ में तालिकोटके उस समर-यज्ञमें विजयानगर
राज्यकी आहुति पड़ी—विजयानगर राज्य नष्ट हुआ; पर
मानो उसके चिता-भस्मसे ही, इस संग्रामके ५० वर्ष बाद ही
महाराष्ट्रने हिन्दू-शक्तिकी विजयवैजयन्ती अपने हाथमें ली और
समर्थ रामदास और छत्रपति शिवाजी उत्पन्न हुए जिन्होंने महा-
राष्ट्रको स्वाधीन करके वही संग्राम जारी रखा जो सन् ७१२ में
सिन्धु नदीके तटपर आरंभ हुआ था और एक शताब्दीके अन्दर
ही हिन्दुस्थानमें एक बार फिर “हिन्दूपदपादशाही” स्थापित कर
दी। इसीके सिलसिलेमें आगे सिखोंका उत्थान हुआ और
दक्षिण ओरसे मराठोंने, उत्तरमें सिखोंने और बीचमें राजपूतोंने
हिन्दू राज्य स्थापित करनेका जो अलग अलग उद्योग किया
वह हिन्दुत्वकी रक्षाका ही उद्योग था।

अंगरेजी राज्य स्थापित होनेके पूर्व हिन्दुस्थानमें हिन्दुओंका
राज्य था जिसकी स्वाधीनताके लिये वे ११ सौ वर्षतक लड़ते रहे
और लड़कर उन्होंने जिसे फिर पाया। दैवसंयोगसे वह स्वा-
धीनताश्री फिर हरण हुई। पर ११ सौ वर्षका यह इतिहास
संग्रामका इतिहास हैं और इसका फल प्रत्यक्ष है। हिन्दू-जाति
जीवित है। उसकी संस्कृति जीवित है। उसका इतिहास जीवित
है। उसका शुद्ध रक्त वही रक्त है जिसने विक्रम और शालि-
वाहन, दाहिर और अनंगपाल, भीमदेव और पृथ्वीराज, जयपाल
और प्रताप, विद्यारण्य और बुक्कराय, रामदास और शिवाजी, गुरु
गोविन्द और छत्रसाल, बाजीराव और माधवराव, नाना और
महादजीको उत्पन्न किया जिन्होंने हिन्दुत्वकी रक्षाका व्रत अखंड
रखा और जिनके नाम और काम आज भी हिन्दू-जातिको अपने
पवित्र व्रत और अपनी अप्रतिम शक्तिका अमोघ उपदेश देकर उसे
अपने सिंहरूपकी पहचान करा देते हैं। वही हिन्दू-जाति है।
कौन कहता है, हिन्दू कायर हैं? कौन कहता है, हिन्दू-जाति
एक नहीं है? कौन कहता है, हिन्दू दुर्बल हैं? हिन्दुओंका
हिन्दुत्व प्रत्येक हिन्दूकी शक्तिका अखंड स्रोत है। यहां नैराश्य
और भय कहाँ? यहां तो वह अजेय शक्ति है जिसने उस शक्तिको
भी जीत लिया जिसके सामने अरबसे स्पेनतक उस समय कोई
ठहर न सका। यह वह अजेय दैवी शक्ति है जिसे कोई जीत नहीं
सकता; क्योंकि यह शक्ति संसारके संहारके लिये नहीं, संसारके
उद्धारके लिये है—संसारको मनुष्योंके, मनुष्योंकी तरह, रहने-
योग्य बनानेके लिये है।

हिन्दुओंके “हिन्दुत्व” की रक्षाका यह पिछला इतिहास हिन्दुओं-
के खड्गका इतिहास है, पर यह खड्ग निरपराधियोंके रक्तसे रंगा हुआ
नहीं है। उसने मनुष्यत्वकी हत्या नहीं की है, सांप्रदायिक अहं-
कारके शैतानकी उपासना नहीं की है। यह वही हिन्दू-जाति है
जिसने ही पहलेपहल संसारमें अहिंसा-धर्मका प्रचार किया, जिसने
ही संसारको खड्गसे नहीं, अमरत्वके सनातन शांतिप्रद उपदेशसे
अपना शिष्य और अंकित बनाया, जिसने अहिंसा धर्मका यहां-
तक प्रचार किया कि पशु-पक्षोको मारना भी दंडनीय अपराध
माना, जिसके शांतिप्रद श्रेष्ठ जीवनको देखकर विदेशियोने ही
इसे “इंदु” की उपमा दी और आज भी आधेसे अधिक जगत
जिसकी जन्मभूमिको अपनी पुण्यभूमि मानता है। इस हिन्दू-
जातिकी विजय संसारमें सत्यकी विजय है। हिन्दू-जातिका
यही मिशन है। इसीके लिये उसे अपने “हिन्दुत्व”-रक्षाका व्रत
अखंड रखना है। अब वह परिस्थिति नहीं है जो पहले थी; पर
संग्राम अब भी है। अब उसका रूप दूसरा है—प्राण वही है।
इस इतिहाससे हमें हिन्दू-जातिके अनन्त धैर्य, अनुपम शौर्य और
अद्भुत जीवनी शक्तिका परिचय मिलता है; पर इस धैर्य, शौर्य और
जीवनी शक्तिके साथ एक बात यदि और होती तो हिन्दुस्थानके
इतिहासमें यह थोड़ासा काल जो पराभव और परदास्यमें बीता,
यह भी इस तरह न बीतता। जिस बातकी कसर आज स्पष्ट
दिखायी देती है वह बात है संघटन। यह एक ऐतिहासिक सत्य
है कि हिन्दुस्थानमें आकर कोई भी विदेशी सेना कभी किसी

संघटित हिन्दू-शक्तिका पराभव नहीं कर सकी। जब और जहां
हिन्दू विघटित हुए तब और वहां ही विदेशियोंको अवसर मिला
और इसी तरहसे हिन्दुस्थान पराधीन हुआ। सिन्धपर मुसलमा-
नोंका जो सबसे पहले आक्रमण हुआ और जिसने भारतवर्षमें
विदेशी राज्यकी नींव डाली वह आक्रमण भी कभी सफल न
होता, कभी विदेशी राज्यकी वह नींव न पड़ती यदि सिन्धके हिन्दू
एक होते और वहांके बौद्ध और सनातनधर्मावलम्बी आपसमें ही
न झगड़ते। परन्तु यह इतिहास है जो बदल नहीं सकता। हां,
इससे जो शिक्षा मिलती है वह यही है कि हिन्दू धैर्य, शौर्य और
जीवनीशक्तिमें संसारकी किसी भी जातिसे हीन नहीं, बल्कि सब
जातियोंसे श्रेष्ठ ही प्रमाणित हुए हैं और यदि यही जाति संघटित
हो तो फिरसे यह संसारकी सिरमौर बने। हिन्दू-जातिका पिछला
सहस्रों वर्षका इतिहास संसारकी किसी भी जातिसे अधिक
उज्ज्वल है और इसलिये इसका भावी इतिहास भी संसारमें सबसे
अधिक उज्ज्वल होनेवाला है।
हिन्दुत्वकी रक्षाके लिये हिन्दू-संगठन आवश्यक है। हिन्दुत्व-
की रक्षा और हिन्दुस्थानके सर्वजनसमाज-सुखदायी स्वराज्यके
लिये ही हिन्दू संगठन हो रहा है। हिन्दू-जातिको जो आत्मवि-
स्मृति हुई है उसे नष्ट करके उसे आत्मस्मरण करा देना है।
इसलिये हिन्दुत्व क्या है, यही सबसे पहले जानना और जनाना
होगा जिसमें एक हिन्दू दूसरे हिन्दूको देखते ही हिन्दुत्वके
प्राणसे समप्राण हो जाय और अहिन्दू भी अपने हिन्दू रूपको

Uploaded By Rajesh Tanti.
॥४॥
देख लें तथा हिन्दू-संस्कृति के इन्दुवत सुशीतल स्वच्छ प्रकाश का
आनन्द लें । हिन्दू जैसे पहले थे, वैसे फिर हो जायं । हिन्दुत्व
ही हिन्दू-जातिका प्राण है और यह प्राण ही संघटन का आधार
है । इसलिये जिस लेखक ने हिन्दुत्व के लक्षण बतलानेवाली यह
शास्त्रीय पुस्तक लिखी है उसने सचमुच ही हिन्दू-संघटनकी
आधारभूमि ही दिखा दी है। आओ, इस आधारभूमिपर हम
आप खड़े हो जायं, हिन्दुत्व के झंडे के नीचे एक हो जायं, और
इस स्मृतिवचन को सार्थक करें कि,
येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः
तेन यायात्सतां मार्गं तेन गच्छन्न रिष्यते।
-लक्ष्मणनारायण गर्दे
सूचना—मूल पुस्तककी भाषा बहुत ही सुन्दर और ओजस्विनी है।
भाषान्तरमें जो कोई दोष हों वे मेरे हैं और गुण मूल ग्रन्थकारके। प्रथम
अध्यायके भाषान्तरमें वह अंश निकाल दिया गया है जिसमें "हिन्दुइज्म"
शब्दका ही विचार है; क्योंकि भाषांतरमें इस शब्दके विचारकी कोई आव-
श्यकता भाषांतरकारको नहीं प्रतीत हुई। अन्य सब अध्यायोंका संपूर्ण
भाषांतर है। पुस्तकके प्रत्येक अध्यायपर जो शीर्षक है वह मूल पुस्तकमें
नहीं है । शीर्षक बैठानेमें जो कोई दोष हुआ हो, वह मेरा है।
ल० ना० गर्दे

Uploaded By Rajesh Tanti.
हिन्दुत्व
( १ )
हिन्दू नाममें क्या है ?
हम हिन्दू हैं और हिन्दू ही बने रहना चाहते हैं।
हिन्दू नामके साथ हमारी यह आसक्ति देखकर कुछ लोग,
वेरोनाकी उस रूपवती कन्याके समान, जिसने अपने प्रेमीसे प्रेमके
नामपर अपना नाम बदल देनेकी याचना की थी, उसीके मुखसे
निकले हुए उद्गार इस प्रकार दोहरा सकते हैं कि, "नाममें क्या
है ? नाम हाथ नहीं है, पैर नहीं है, बाँह नहीं है, चेहरा नहीं हैं,
मनुष्य-शरीरका कोई अवयव नहीं है; फिर इसमें है ही क्या जो
हम इस नामकी पूजा करें—उसे छोड़ न सकें ! वस्तु है तो
नामकी क्या परवा ? गुलाबको गुलाब न कहकर उसे और
किसी नामसे पुकारें तो इससे उसकी सुगन्ध तो कहीं नहीं
जाती !” एक ही वस्तु है, पर भिन्न-भिन्न भाषाओंमें उसके भिन्न-
भिन्न नाम हैं। इसीसे यह सन्देह दूर हो जाता है कि शब्द विशेष
और उससे निकलनेवाले अर्थका परस्पर कोई स्वाभाविक अवि-
च्छिन्न सम्बन्ध है। परन्तु वस्तु और वस्तुवाचक शब्दका पर-
स्पर सम्बन्ध जितना ही दृढ़ और पुराना होता है उतना ही उस
शब्द और उसके अर्थका परस्पर सम्बन्ध अविच्छिन्न हो जाता है।

२ हिन्दुत्व
और उस अर्थ या अभिप्रायको व्यक्त करनेकी मनोवस्थामें , वह
शब्द स्वाभाविक रीतिसे मुखसे निकल पड़ता है और उस शब्दसे
वही अर्थ ध्यानमें आ जाता है। इसके साथ ही जब उस शब्दके
साथ और भी अनेक भावनाएँ उदय होती हैं, जिनका उदय होना
उस शब्दके उच्चारणके साथ हम नहीं रोक सकते, तब तो उस
शब्द या नामका उतना ही महत्व है, जितना उस वस्तुका।
इसलिये जो लोग ऐसा कहें कि नाममें क्या है, उन्हें उदाहरणके
तौरपर अपने ही मनसे यह प्रश्न करना चाहिये कि क्या हम अपने
उपास्य दैवत राम या कृष्णका नाम बदलकर महम्मद या ईसा
रख सकते हैं? नाम हाथ, पैर, या और कोई अवयव नहीं है—
नाम तो उस वस्तुका सर्वस्व है। नामकी महिमा ऐसी है कि वह
भावना विशेषका प्रतीक हो जाता है और वह भावना मर्त्य मनुष्यों-
की कई पीढ़ियोंके बाद भी जीवित रहती हैं। राम और कृष्ण इस
मर्त्यलोकको छोड़कर चले गये, पर उनके नामकी महिमा नहीं
घटी, उस नाममें जो भाव सन्निहित हैं, वे आज भो उस नामको
लेते ही उदय हो जाते हैं। नाममें क्या रखा है? अयोध्याको
अयोध्या न कहकर होनालूलू कहें तो क्या ऐसा कह सकते हैं?
क्या शिवाजीका नाम बाटू और वाशिंगटनका नाम चंगेजखाँ रख
सकते हैं? क्या कोई मुसलमान अपनेको शौकसे यहूदी कह
सकता है? नहीं, इन नामोंमें इतिहास भरा हुआ है, आत्मगौरव
भरा हुआ है। प्रत्यक्ष जीवन भरा हुआ है। इन नामोंमें जीवनी-
शक्ति भरी हुई है।

हिन्दू नाममें क्या है ३
ऐसे जीवनप्रद और कर्तव्यसूचक तथा गौरववाचक नामोंमें
एक नाम हिन्दुत्व है, जिसके अर्थका विचार हम इस पुस्तकमें
करना चाहते हैं। इस नाममें इतनी भावनाएं और संस्थाएं छिपी
हुई हैं और वे भावनाएँ और संस्थाएँ इतनी बलवती और गम्भीर
हैं कि इस नामका विश्लेषण करना असम्भव हो जाता है।
यदि अधिक नहीं तो चालीस शताब्दियोंका इतिहास इस नाममें
भरा हुआ है—इस नामका जो अभिप्राय है उस अभिप्रायको
व्यक्त करनेकी शक्ति इसे प्राप्त करनेमें ४० शताब्दियाँ लगी हैं।
बड़े-बड़े अवतारी पुरुष और कवि, शास्त्री पण्डित और धर्मव्यव-
स्थापक, योद्धा और इतिहासकार इस नामके लिये जीये, इस
नामके लिये लड़े और इस नामपर मर मिटे ! यह नाम क्या
हमारी जातिके असंख्य कार्योंका ही परिणाम नहीं है ? कभी
युद्ध, कभी मिलाप और कभी परस्पर सहयोगके रूपमें हिन्दू
जातिने जो कुछ किया वह सब इस नाममें है। हिन्दुत्व केवल
एक शब्द नहीं है, एक सम्पूर्ण इतिहास है। हिन्दुत्वसे अभि-
प्राय किसी संप्रदायका संप्रदायधर्म नहीं हो सकता। हिन्दुत्व
हमारी हिन्दू जातिका संपूर्ण इतिहास है। हिन्दुत्वका सम्पूर्ण
भाव हृदयङ्गम करनेके लिये हमें 'हिन्दू' शब्दका ही वास्तविक अर्थ
पहले समझना होगा और यह जानना होगा कि करोड़ों मनुष्यों-
के हृदयमें इस नामका साम्राज्य कैसे प्रतिष्ठित हुआ और कैसे
इस वीर हिन्दू जातिने यह नाम धारण किया।

( २ )
हिन्दू नामकी उत्पत्ति
अभी इतना ऐतिहासिक अनुसन्धान नहीं हुआ है कि यह
निश्चित रूपसे बताया जा सके कि पहले-पहल आर्य लोग सिन्धु
नदीके किनारे कब आकर बसे और कब उन्होंने वहां अपना
अग्निहोत्र स्थापित किया। परन्तु यह निश्चित है कि प्राचीन
मिश्रवासी और बैबिलनवालोंकी जिस सभ्यताका संसारमें
इतना नाम हुआ उस सभ्यताका जब पता भी नहीं था, तभी पवित्र
सिन्धुसलिलकी कलकल ध्वनिके साथ यज्ञीय धूमकी सुगन्ध
भी प्रवाहित हुआ करती थी और वह तट-प्रदेश वेदघोषसे गूँजा
करता था, जिससे आर्योंके अन्तःकरणमें आध्यात्मिक ज्योति
प्रज्वलित रहा करती थी। ये लोग पराक्रमी थे, वीर थे, सत्या-
नुसन्धान करते हुए इन्होंने अत्यन्त गम्भीर तत्वोंका अनुभव
किया था। ये लोग ऐसे थे, इसीलिये ये एक महान् और स्थायी
संस्कृतिकी नींव डालनेमें समर्थ हो सके। अपने और पड़ोसियों-
से, खासकर ईरानियोंसे, जिस समय इनका सम्बन्ध टूट चुका
था, उस समयतक ये सातों सिन्धु—सप्तसिन्धुमें फैल चुके थे;
और इनमें राष्ट्रीयताकी भावना केवल विकसित हीं नहीं हुई
थी, प्रत्युत उन्होंने उसका स्थान और नाम भी निर्दिष्ट कर दिया
था। नदियोंसे घिरे और सींचे जानेवाले इस देशमें रहते हुए