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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

कण्डिका ११ ॥ छन्दों के साथ प्रणव का सम्बन्ध और व्याख्यान ॥

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गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ११ ३८३
मकारान्तोऽवसानार्थै । प्रतिष्ठा वा अवसानं, प्रतिष्ठित्या एव । अथोभयोः कामयोराप्त्या
एतौ वै छन्दः प्रवाहावरं छन्दः परञ्छन्दोऽतिप्रवहतः, तस्यायुर्न हिनस्ति, छन्दसां
छन्दोऽतिप्रौढं स्यात्, यत्रैव यं द्विष्यातं मनसा प्रैव विध्येन्छन्दसां क्रन्दत्रे द्रवति वाचं वा
शीर्य्यत इति । त्रिः प्रथमां त्रिरुत्तमामन्वाह, यज्ञस्यैव तद्बर्हिषौ नह्यति, स्थेम्ने बलाया-
विस्रंसाय । यद्यपि छन्दः प्रातःसवने युज्येतार्द्धर्चश एव तस्य शंस्यं गायत्र्या रूपेण ।
अथो प्रातःसवनरूपेणेति, न त्रिष्टुब्जगत्यावेत्तस्मिन् स्थानेऽर्द्धर्चशस्ये यत् किञ्चिच्छन्दः
प्रातःसवने युज्येतां पच्छ एवैनयोः शस्यमिति सा स्थितिः ॥ ११ ॥
कण्डिका ११ ॥ छन्दों के साथ प्रणव का सम्बन्ध और व्याख्यान ॥
(अथ एतत् नाना च्छन्दांसि अन्तरेण गर्ताः इव) फिर यह अनेक छन्द [पूर्व
कण्डिका में कहे हुये] एक दूसरे के बीच गर्तों [गड्ढों] के समान हैं। (अथ एते अविष्ठे
बलिष्ठे) फिर यह दोनों [दो प्रकार के छन्द पूर्व कण्डिका में कहे हुये] अति विख्यात और
अति बलवान् हैं। ('नान्तरे देवते ताभ्यां प्रतिपद्यते) अभिन्न देवता हैं, उन दोनों [दो प्रकार
के छन्दों] से समझा जाता है। (तत् गर्तस्कन्दं रोहस्य रूपं स्वर्ग्यं तदनवानं सङ्क्रामेत्)
उससे गर्त [गड्ढा वा भूमिच्छिद्र] को प्राप्त होके अङ्कुर के रूप स्वर्ग को उसके अनुकूल
निश्चय करके अब वह [पुरुष] अच्छे प्रकार प्राप्त करे। (अमृतं वै प्रणवः, अमृतेन एव
तत् मृत्युं तरति) अमृत [अविनाशी] ही प्रणव [स्तुति योग्य ओम्] है, अमृत
[अविनाशी ओम्] के साथ ही तब वह मृत्यु को पार करता है। (तत् यथा मन्त्रेण वा
वंशेन वा गर्तं सङ्क्रामेत्, एवं तत् प्रणवेन उपसन्तनोति) सो जैसे मन्त्र [विचार] द्वारा
अथवा बांस द्वारा गड्ढे को अच्छे प्रकार प्राप्त करे, वैसे ही तत्त्व को प्रणव द्वारा वह अच्छे
प्रकार फैलाता है। (ब्रह्म ह वै प्रणवः, ब्रह्मणा एव अस्मै तत् ब्रह्म उपसन्तनोति) ब्रह्म
[सब से बड़ा] ही निश्चय करके प्रणव है, ब्रह्म के द्वारा ही इस [संसार] के लिये उस
ब्रह्मज्ञान को मनुष्य अच्छे प्रकार फैलाता है। (प्रजाकामानां प्रणवः शुद्धः मकारान्तः
स्यात्, प्रतिष्ठाकामानां प्रणवः मकारान्तः स्यात् इति ह एके आहुः) प्रजा चाहने वालों
११-(अन्तरेण) परस्परमध्ये (गर्ताः) हसृमृग्रिण्वमि० (उ० ३।८६) गॄ
निगरणे-तन्। भूमिच्छिद्राणि (अविष्ठे) श्रु श्रवणे-अप्, श्रवः-मतुप्, इष्ठन्,
मतुपो लुक्। अतिशयेन प्रसिद्धे (नान्तरे) अनन्तरे। अभेदे (ताभ्याम्) द्विप्रकाराभ्यां
छन्दोभ्याम् (गर्तस्कन्दम्) गर्त+स्कन्दिङ्गतिशोषणयोः-णमुल्। गर्तं स्कत्त्वा
प्राप्य (रोहस्य) अङ्कुरस्य (न) सम्प्रति (सङ्क्रामेत्) सम्यक् प्राप्नुयात् (अमृतम्)
१. नान्तरे देवते से लेकर तदनवानम् तक पूर्व संस्करण का मूल कण्डिका का
पाठ अत्यन्त भ्रष्ट होने के कारण भाष्य भी असङ्गत हो गया है। पाठ हमने शोधा है।
वाक्य का भाव इस प्रकार है-"जो गायत्री एवं जगती छन्दों के पादों में ४-४ अक्षरों का
भेद है मानों गायत्री छन्द का पाद गड्ढे का किनारा है और जगती में ४ अक्षरों की अधिकता
मानों (रोहस्य रूपम् स्वर्ग्यम्) चढ़ाई का स्वर्ग का रूप है ! (तत् अनवानम्) उस पाद
को बिना श्वास तोड़े एक साथ बोलना चाहिये ॥ पहिले दशम कण्डिका में गाय.ो एवं
जगती छन्दों का प्रकरण आया था, उसी का यहाँ पुनः वर्णन है ॥ सम्पा० ॥

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३८४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ११
का प्रणव [ओम्] शुद्ध मकारान्त है, और प्रतिष्ठा चाहने वालों का प्रणव मकारान्त है—ऐसा
कोई कोई कहते हैं । ( शुद्धः प्रणवः इति तु एव स्थितः मीमांसितः ) प्रणव शुद्ध है—यह
जो स्थिर तत्त्व से निर्णय किया हुआ [ सिद्धान्त ] है । ( अथ अतः इह शुद्धः इह पूर्णः
इति शुद्धः प्रणवः शस्त्रानुवचनयोः मध्ये स्यात् इति ह स्म कौषीतकिः आह ) फिर इस
कारण से कि—वह यहाँ शुद्ध है, वह यहाँ पूर्ण है—वह शुद्ध प्रणव दोनों स्तोत्र और व्याख्यान
के बीच में है—ऐसा कौषीतकि [ तत्त्व परीक्षक का पुत्र ऋषि ] कहता है । ( तथा संहितं
भवति मकारान्तः अवसानार्थे ) इस प्रकार से यह संगत होता है—मकारान्त [ ओम् ]
सीमा वा ठहराव के लिये है। ( प्रतिष्ठा वै अवसानं प्रतिष्ठित्थै एव ) प्रतिष्ठा [ठहराव]
ही सीमा है, वह [ ओम् ] प्रतिष्ठा के लिये ही है । ( अथ उभयोः कामयोः आप्त्यै एतौ
वै छन्दःप्रवाहौ अरं छन्दः परं छन्दः अतिप्रवहतः ) फिर [ प्रजा और प्रतिष्ठा की ] दोनों
कामनाओं की प्राप्ति के लिये यह दोनों छन्द प्रवाह अरं छन्द और परं छन्द [ अर्थात्
पर्याप्त छन्द और श्रेष्ठ छन्द ] अत्यन्त करके बहते रहते हैं । ( तस्य आयुः न हिनस्ति,
छन्दसां छन्दः अतिप्रौढं स्यात् ) उस के आयु को वह नहीं नाश करता [ जिसका ]
छन्द [ वेद ज्ञान ] छन्दों के बीच अति पुष्ट होवे । ( यत्र एव यं द्विष्यात् तं मनसा एव
प्र विध्येत् ) जहां पर ही जिससे द्वेष करे, उसको मनन से ही छेद डाले । ( छन्दसां
क्रन्दत्रे वाचं द्रवति वा शीर्यते इति ) छन्दों के बोलने वाले के लिये वह [ शत्रु अपनी ]
वाणी पिघला देता है वा [ आप ] नष्ट हो जाता है । ( त्रिः प्रथमां त्रिः उत्तमाम्
अन्वाह तत् बर्हिसो यज्ञस्य एव स्थेम्ने बलाय अविस्त्रंसाय नह्यति ) वह तीन बार
पहिली [ ऋचा ] और तीन बार सबसे पिछली [ ऋचा ] पढ़ता है और उससे दो वृद्धि-
कारक व्यवहारों [ प्रजा कामना और प्रतिष्ठा कामना, अथवा दो कुशाओं ] को यज्ञ की
स्थिरता के लिये, बल के लिये और अविनाश के लिए नियत करता है । ( यद्यपि प्रात -
सवने अर्धर्चशः एव तस्य शंस्यं छन्दः गायत्र्याः रूपेण युज्येत, अथो प्रातःपवन-
रूपेण इति ) यद्यपि प्रातःसवन में आधी आधी ऋचाओं से ही उस का बोलने योग्य छन्द
गायत्री के रूप से बोला जावे और प्रातःसवन के रूप से भी । ( त्रिष्टुब्जगत्यौ एतस्मिन्
स्थाने अर्धर्चशस्ये न युज्येताम् यत् किञ्चित् छन्दः प्रातःसवने ) त्रिष्टुप् और जगती
छन्द इस स्थान पर आधी आधी ऋचाओं के बोलने में न बोले जावें, जो कुछ छन्द प्रातः-
सवन में [ होवे वह ही बोला जावे ] । ( पच्छः एव एनयोः शस्यम् इति सा


अविनाशि ब्रह्म ( मन्त्रेण ) विचारेण ( वंशेन ) तृणजातिभेदेन ( मीमांसितः ) तत्त्वेन
निर्णीतः ( शस्त्रानुवचनयोः ) स्तोत्रव्याख्यानयोः ( कौषीतकिः ) कुसेरुन्मोमेदेताः ( उ०
४ । १०६ ) कुष निष्कर्षे—इतः, स्वार्थे—कन् दीर्घश्च । कुषीतक—इञ् अपत्यार्थे ।
कुषीतकस्य तत्त्वनिष्कर्षकस्य पुत्रः । ऋषिविशेषः ( संहितम् ) संगतम् ( अवसानम् )
विरामः । सीमा ( अरम् ) अलम् । पर्याप्तम् ( परम् ) श्रेष्ठम् ( अतिप्रौढम् ) अति
प्रवृद्धम् ( क्रन्दत्रे ) कथयित्रे ( द्रवति ) रसीभूतां नग्ना करोति ( बर्हिसो ) वृद्धिभ्य-
हारौ । कुशौ ( स्थेम्ने ) स्थिर—इमनिच् । स्थिरतायै ( अविस्त्रंसाय ) अविध्वं-
साय .( अर्धर्चशः ) अर्धर्चप्रयोगेण ( शंस्यं, शस्यम् ) शंसु कथने—क्यप् ।