सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

प्रारंभिक मंगलाचरण, जीवन-चरित्र एवं शुकदेव-चरनदास संवाद

श्रीस्वामी चरणदासजी रचित
श्री भक्तिसागर ग्रन्थ
(परिशिष्ट भाग सहित)
स्व. विनोद चन्द्र पाण्डे सा
की स्मृति में उत्तराधिकारी से
प्राकृत भारती अकादमी जयपुर
सन्दर्भ पुस्तकालय को भेंट स्वरूप प्राप्त।
प्रकाशक
(राजा) रामकुमार-प्रेस, बुकडिपो,
लखनऊ.
उत्तराधिकारी—नवलकिशोर-प्रेस, लखनऊ.
छठीवार ]

ॐ
श्रीयुग्मनिकुंजविहारिणे नम
श्रीस्वामी चरणदासजी रचित
श्रीभक्तिसागर ग्रन्थ
परिशिष्ट भाग सहित
अर्थात्
सर्व वाणा का समुच्चय जो कि आज तक भारतवर्ष के
किसी यंत्रालय मे भी नही छपा है
जिसको
श्रीमान् सर्व गुण निधान श्रीमत शुकसम्प्रदाय सेवक प्रधान पंडित
शिवदयालु गौड़ हरि सम्बंधी नाम सरसमाधुरीशरण
जयपुर निवासी ने शुद्ध किया
पंचम बार
लखनऊ
मेनेजर राजा रामकुमार प्रेस द्वारा मुद्रित और प्रकाशित
सन् १९५१ ई०

श्रीस्वामी चरणदासजी रचित भक्तिसागर का
✤ सूचीपत्र ✤
विषय पृष्ठसे पृष्ठतक विषय पृष्ठसे पृष्ठतक
प्रस्तावना १ २ मूर्च्छा कुम्भक ७९ ७९
सूचनां दोहावली ३ ४ केवल कुम्भक ७९ ८०
भक्तिसागर का माहात्म्य ५ ८ प्रत्याहारवर्णन ८० ८१
श्रीमत्स्यामचरणदासाचार्य- धारणाअंगवर्णन ८१ ८३
चरितामृत ९ ११ सातवाँअंगवर्णन ... ८३ —
वृन्दावनगमनवर्णन ११ २२ पदस्थ ध्यान ८४ ८४
श्रीमत्स्यामचरणदासाचार्य- पिंडस्थ ध्यान ८४ ८४
महिमा ॰ २२ २४ रूपस्थ ध्यान ८५ ८५
मङ्गलाचरणम् ॰ १ १ रूपातीत ध्यान ८५ ८६
ब्रजचरितवर्णन २ १४ समाधिअंगवर्णन — ८६ ८८
अमरलोकअखण्डधामवर्णन १५ २४ भक्तिसमाधि - ... ८८ ८८
धर्मजहाजवर्णन —— २५ ५३ योगसमाधि —— ८९ ८९
अष्टाङ्गयोगवर्णन ज्ञानसमाधि —— ८९ ८९
गुरुशिष्यसंवाद —— ५३ ५६ छहौकर्महठयोगवर्णन ८६ —
यमअंगवर्णन ५६ ५९ नेतीकर्म ॰ ९० ९०
नियमअंगवर्णन —— ५९ ६१ धोतीकर्म ९० ९०
आसनवर्णन ॰ ६१ ६२ वस्तीकर्म ९१ ९१
पद्मासनवर्णन ॰ ६२ ६२ गजकर्म ९१ ९१
सिद्धासनवर्णन ॰ ६२ ६२ न्योलीकर्म ९१ ९१
प्राणायामअंगवर्णन ६२ ६३ त्राटककर्म ९१ ९२
चक्रवर्णन ६४ ७२ खेचरी मुद्रा ९२ ९४
अष्टप्रकार के कुम्भक ७२ — भूचरी मुद्रा ९४ ९५
सूर्यभेदन कुम्भक —— ७३ ७४ चांचरी मुद्रा ९५ ९५
ऊजाई कुम्भक ७४ ७४ अगोचरी मुद्रा .. ९५ ९५
शीतकार कुम्भक — ७४ ७४ उनमनी मुद्रा ... ९५ ९६
शीतली कुम्भक — ७४ ७५ महाबन्धनसाधनविधि .. ९६ ९६
भस्त्रिका कुम्भक ॰॰ ७५ ७८ मूलबन्ध .. ९७ ९७
भ्रामरी कुम्भक ७८ ७८ जलन्धरबन्ध .. ९७ ९८

( २ )
विषय पृष्ठसे पृष्ठतक | विषय पृष्ठसे पृष्ठतक
उड्यानबन्ध ... ९८ १०३ | दयाअंगवर्णन २०२ २०४
अष्टिसिद्धि के नाम . १०३ १०४ | मायाअंगवर्णन २०४ २२०
योगसन्देहसागरवर्णन .. १०५ १०९ | वेदस्तुति २२० २३१
ज्ञानस्वरोदयवर्णन . ११० १३० | चीरहरणलीला २३२ २३२
पंचउपनिषद् अथर्वणवेद भाषा | श्रीशुकमुनिराज अष्टक २३२ २३३
प्रथम हंसनाथ उपनिषद् | मोहछुटावनअंगवर्णन २३३ २५७
वर्णन .. १३१ १४१ | मनविकृतकरणगुटकासार
द्वितीय सर्वोपनिषद्वर्णन १४१ १४९ | वर्णन २५८ २९७
तृतीय तत्त्वयोग उपनिषद | ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन २९७ ३१६
वर्णन .. १४९ १५४ | शब्दवर्णन ३१७ ४६५
चतुर्थ योगशिक्षा उपनिषद् | भक्तिसागरवर्णन ४६७ ४७८
.वर्णन १५४ १५७ | जागरणमाहात्म्य ४७९ ४८५
पंचम तेजविन्द उपनिषद् | दानलीलावर्णन ४८६ ४८९
वर्णन १५७ १६२ | माखनचोरीलीलावर्णन ४९० ४९१
भक्तिपदार्थ वर्णन १६२ १८३ | कालीनाथनलीलावर्णन ४९२ ४९५
चारो युगवर्णन १८४ १८५ | मटकोलीलावर्णन ४९६ ५०२
नामअंगवर्णन १८५ १९३ | श्रीधरब्राह्मणलीला ५०३ ५०८
क्रोधअंगवर्णन १९३ १९४ | कवित्तवर्णन ५०८ ५१०
मोहअंगवर्णन १९५ १९६ | कुरुक्षेत्रलीलावर्णन ५११ ५५४
लोभअंगवर्णन १९६ १९७ | फुटकरपद ५५५ ५५६
अभिमानअंगवर्णन १९७ १९९ | श्रीशुकदेव अष्टक ५५६ ५५७
शीलअंगवर्णन १९९ २०१ | भक्तिसागरग्रन्थाशय ५५७ ५५७
| नासकेतलीलावर्णन ५५८ ६४६

भक्तिसागर
श्रीशुकदेव मुनि
श्रीश्यामचरणदासजी

श्रीरामकृष्णाय नमः ॥
( प्रस्तावना )
श्रीमत् परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्द परम
दयानिधान और करुणा कृपाकी खान हैं कि जो कोई सद्-
भक्ति भाव से जिस किसी लौकिक अलौकिक पदार्थ की
प्राप्ति होनेकी प्रार्थना किया करता है उसीको अपनी कृपादृष्टि से
अवश्यही पूर्ण करते हैं । हमारे श्री मुंशी नवलकिशोर प्रेसमें
सबसे प्रथम श्रीस्वामी श्यामचरणदास जी महाराज का रचित
ग्रन्थ भक्तिसागर छापा जाकर जगत्प्रसिद्ध किया गया जिसके
पश्चात् और २ प्रेसों में भी उक्त ग्रन्थके छापने के उद्योगी हुये
ग्रन्थके छप जाने के पश्चात् हमको विदित हुआ कि श्रीभक्ति-
सागरग्रन्थ के सिवाय श्रीस्वामीजी महाराज की रचित और
भी महाबानी सन्तनमनमानी श्यामचरणदासीय सन्तों के
खास २ स्थानों में मौजूद है वह किसी प्रकार से प्राप्त हो सके
तो ग्रन्थ भक्तिसागर के साथ ही परिशिष्टभाग के नामसे
छापकर लोकहित के लिये प्रकाशित करदी जाय इसही
विचार के अवसरपर सन् १६१६ ईसवी में श्रीमान् पण्डित
शिवदयालुजी गौड़ हरिसम्बन्धी नाम सरसमाधुरीशरणजी
जयपुर निवासी मुक्तिमार्ग ग्रन्थ स्वामी रामरूपजी रचित के
छपानेके निमित्त लखनऊ पधारे उन्हों से वार्तालाप होनेसे
मालूम हुआ कि भक्तिसागरग्रन्थ के अतिरिक्त और वाणी
श्रीस्वामी श्यामचरणदासजी की लिखित पुस्तक मौजूद है
हमने उस वाणी की १ प्रति लिखाकर प्रेसमें छपजानेके लिये

( २ )
भेजदेने को कहा तो उन्हों ने हमारे मनोरथ की प्रशंसा कर
लिखित वाणीकी प्रति भेजदेना स्वीकार कर वाणीकी प्रति
को शुद्धकरके प्रेसमें मुद्रणार्थ भेज दिया अब हम अपने
मनोरथ सिद्धिकर्त्ता महाशय को परम धन्यवाद देतेहु ये ग्रन्थ
भक्तिसागर के परिशिष्टभाग के नाम से छापकर प्रकाशित
करते हैं—
सुपरिंटेंडेंट
राजाराम कुमार प्रेस लखनऊ

ॐ
श्रीराधाकृष्णाय नमः ॥
❃ श्री सरसमाधुरीजी रचित ❃
❃ सूचना दोहावली ❃
श्रीमत शुक मुनिराज वर, व्यास पुत्र भगवान ।
श्याम चरण के दासजी, जिनके शिष्य महान १
जिनकीवाणीविविधिविधि, अद्भुत अनुपम ग्रन्थ ।
नाम भक्तिसागर सरस, प्रेम परा को पन्थ २
ब्रजचरित्र तामें प्रथम, अमरलोक शुचिनाम ।
रासादिक लीला ललित, अरु महिमा निजधाम ३
कर्मकाण्ड शुभ अशुभ फल, कथन किये महाराज ।
नाम धरयो ताको प्रभू, अनुपम धर्म जहाज ४
योग युक्ति जामें भरी, सब विधि सांगोपांग ।
याहीतें याको धरयो, नाम योग अष्टांग ५
सागर योग सन्देह की, पुस्तक वरनी गूढ़ ।
गुरुमुख ज्ञानी जन बिना, अर्थ न समझें मूढ़ ६
योग स्वरोदय पुनि रच्यो, स्वर को भेद उचार ।
ताहि पढ़िकर प्रेम जो, पावे तत्व विचार ७
वेद अथर्वण की कही, पंच उपनिषद् सार ।
भाषा में वर्णन करी, योग ज्ञान निरधार ८
भक्ति पदारथ पुनि कथ्यो, श्रुति पुराण को सार ।
अगुन सगुन हरि रूपको, कियो तत्व निरधार ९
दत्तात्रेय मुनि ने किये, गुरु चौवीस उदार ।
ताकी कथा कथी भली, नाम सु गुटकासार १०

( ४ )
ब्रह्म जीव की एकता, कही खोल निरधार ।
ब्रह्मज्ञान सागर धरयो, ताको नाम बिचार ११
रची सरस शब्दावली, राग सहित रुचिकार ।
ज्ञान योग वैराग पुनि, प्रेम भक्ति भंडार १२
पुनि परिशिष्ट सुभाग में, दशम स्कन्धनुसार ।
श्रीकृष्ण लीला ललित, अनुपम युगल विहार १३
वानी श्रीमहाराज की, सद्ग्रन्थन को सार ।
सरस माधुरी जो पढ़ै, मिलैं पदारथ चार १४
इति ॥

·· श्रीमन्निकुञ्जविहारिणे नमः ॥
श्रीमद्भक्तिसागरग्रन्थ की महिमा तथा
माहात्म्य के वर्णन में ॥
श्रीसरसमाधुरीजी रचित
:- कवित्त :-
ग्रन्थ भक्तिसागर उजागर सब विश्वबीच बांचत हैं जाको
कविकोविद अरु ज्ञानी हैं। साधु सन्त बुद्धिमन्त विद्वज्जन
विविधि भाँति मनन करत हिये धरत योगी यती ध्यानी हैं ॥
त्यागी वैरागी जन-पढ़त ताय चितलगाय चतुर्वर्गदायक यह
निश्चय कर जानी हैं। कहे सरसमाधुरी सुनाय सव सन्तन
को याके अर्थ समझे होत जीवनमुक्त प्रानी हैं ॥ १ ॥
अष्टादश षटरु चार चौदह अरु नव की सार ऐसी यह
अनूप श्याम चरणदास बानी हैं। भारत अरु गीता पुनि
भागवत भरी है यामें रामायण सार रसिकजननने पिछानी
हैं॥ संस्कृत भाषादिक पुस्तक बहु विश्वविदित उक्ति जुक्ति
सारी याके बीच में समानी हैं। कहे सरसमाधुरी सुनाय सव
सन्तन को एक एक बात याकी अनुभव कर प्रमानी हैं ॥ २ ॥
नाम रूप लीला धाम सेवा श्री श्यामा श्याम सवही की
सुलभरीति बानी में बखानी हैं। सन्त अरु महन्त गुणवन्त
बुद्धिवन्त सकल सर्वोपरि रहस्य रीत मानी रससानी हैं ॥
याही को गावें अरु सुनावें सव शिष्यन को या समान सुलभ
सरल और न जगजानी हैं। कहे सरसमाधुरी यह सवकी
मन हरनहार महिमा अपार अरु भक्ति मुक्ति दानी हैं ॥ ३ ॥
जलाली जमाली जिक्र सुल्तानुल अजकार फ़ना बक्रा
सिफ़्त सब ग्रन्थ में बखानी हैं। जात अरु सिफ़ात की प्रकाश

( ६ )
करी सर्वबात नूर अरु जहूर सब बरनें रहमानी हैं ॥ फ़ना
फिल्लाबाद में बक़ा की बुनियाद कही आबिद मक़बूल खुदा
उनहीने जानी हैं। कहे सरसमाधुरी सुनाय सब फुकरन को
इश्क़ है हक़ीक़ी यामें शगल सुब्हानी हैं ॥ ४ ॥
सम्प्रदाय सर्वधर्म आश्रम अरु वर्णकर्म वैष्णवता मुख्य
मर्मया में जनाये हैं। कर्मयोग ज्ञानयोग सांख्ययोग राजयोग
अष्टांगयोग भक्तियोग दरसाये हैं॥ मायाजीव ईश्वर ये तीन
तत्त्व कहे अनादि ईश के अधीन माया जीव कहि गाये हैं।
कहे सरसमाधुरी कृपाल श्याम चरणदास शुक मुनि प्रसाद
गुप्तभेद प्रगटाये हैं ॥ ५ ॥
खण्डन अरु मण्डनकी उक्ति युक्ति कथी नाहिं श्रुति पुराण
सारधर्म सबही कहि गायो है। जितने मत पंथ प्रगट देखियत
जगत माहिं ग्रन्थ भक्तिसागर यह सबके मन भायो है ॥
बाँचैं कर मन विचार रहस्यरीति हृदयधार परमानँद सुख प्रतक्ष
उनहीने पायो है। कहे सरसमाधुरी सुनाय सब भक्तन को
भारत भूमि में प्रताप अतिशय कर छायो है ॥ ६ ॥
ज्ञानिनने पर्मज्ञान ध्यानिनने पर्मध्यान योगिनने पर्मयोग
याहि पढ़े पायो है। परम बैराग प्राप्त भयो है बिरागिन को
अनुरागी भक्तन के प्रेम हाथ आयो है ॥ आरत जिज्ञासू अरु
मुमुक्षु अधिकारिन के इच्छा अनुसार समाधान उर छायो
है। कहे सरसमाधुरी यह अतिही उपयोगी ग्रन्थ सबही मत
पंथ याकी बानी सुन लुभायो है ॥ ७ ॥
निर्गुन अरु सगुन पुनि सर्वोपरि रहनि यामें निराकार
अरु साकार सुलभ कहि सुनायो है। ओत प्रोत अगुन
सगुन सूरज अरु धूप सदृश भिन्नभेद भावरूप एक कर
दिखायो है ॥ जैसी जाके चाह ताहि तैसीही प्राप्तिहोत यामें

नहिं संशय यह भेद समझायो है। कहे सरसमाधुरी सुनाय
सब भक्तनको रस समुद्र सगुन ब्रह्म पुरुषोत्तम बतायो है ॥ ८ ॥
छहों मुक्तिमारग की रहस्य कही याके बीच प्रेम को परतत्त्व
सर्व उत्तम दृढ़ायो है। प्रेम के समान नहीं और कुछ वतायो
आन ज्ञान ध्यान योगादिक तुच्छ दरसायो है ॥ आदि मध्य
अन्त भक्तिसागर में भलीभाँति सबको सरताज प्रभु प्रेम को
जनायो है। कहे सरसमाधुरी सुनाय सब रसिकनको जिनने
कुछ पायो एक प्रेमही से पायो है ॥ ९ ॥
बिना पढ़े वेदनके वेदतत्त्व जानपरे बिना शास्त्र श्रवण किये
समझे बात सारी है। विना कियेजोगके जुगती सब जानलेव।
बिन बिराग त्याग भेद पावत नर नारी है॥ बिना किये तीरथ के
तीरथफल प्राप्तहोत बिना जाप अजपा की उक्ति उर बिचारी है।
कहे सरसमाधुरी सुनाय सब सन्तनको बांचे भक्तिसागर होत
भवसागर पारी है ॥ १० ॥
श्रीहरिके सुमिरनमें सुरति निरति लगे जाय नैनन में बसे
आय ध्यान प्रिया श्यामको। अमरलोक लीला को अनुभव
हियमाहिं फुरे दरसन लगजाय तात्काल रूप धामको ॥
रासादिक लीलाकी ललित रीति जानपरे हिये माहिं भरे
आय प्रेम अष्ट जामको। कहे सरसमाधुरी सुनाय सब भक्तन
को ग्रन्थ भक्तिसागर है रसिकन के कामको ॥ ११ ॥
सरल और सुगम देश भाषा सो भूपित है अतिही निर-
दूषित यह बानी परम पावनी । पढ़ते ही अक्षर के अर्थ ज्ञान
परेजान धर्मभूल सबही संदेह की नशावनी ॥ प्रेम प्रगटावनी
रंगभक्ति की बढ़ावनी है अतिही सुहावनी सन्त भक्तन मन-
भावनी । हरि रस सरसावनी छवि दम्पति छकावनी सरस-

( ८ )
माधुरी रसामृत को रसिकन को प्यावनी ॥ १२ ॥
गृहस्थ अरु विरक्त वानप्रस्थ संन्यस्तहू की जुदी जुदी
रहनि गहनि जुक्ति कर जनाई है । आश्रम अरु वर्ण धर्म
शास्त्रनमें सकल कहे उनहूकी करनरीति उत्तम बताई है ॥
ऊँच नीच कर्मनके फलन की अनेकगति जैसी प्राप्तहोत तैसी
खोलकर दिखाई है । कहे सरसमाधुरी रहस्यभरी बानी यह वांचें
जो ग्रन्थ तिन्ह सुगम जानपाई है ॥ १३ ॥
ज्ञाताज्ञेय ज्ञानअरु ध्याता ध्येय ध्यानहू की त्रिपुटी के मिटे
शुद्ध आत्माबताई है । क्षर और अक्षर निहअक्षर बखान किये अक्ष-
रातीतरीत बानीमें गाई है॥ पदस्थ पिंडस्थ रूपस्थ रूपातीत ध्यान
शून्य में समावन की बात समझाई है । परमहै प्रकाशमान पटतर
नहि होत भान परमतत्त्वकी पिछान सरस कहिसुनाई है ॥१४॥
सतयुग अरु त्रेता पुनि द्वापर कलियुग कराल तिनहूं की
रहनि गहनि रीति सर्व गाई है । जैसी करे करनी ताहि तैसीही
भरनी है टरनी है नाहिं यही दृढ़कर दरसाई है ॥ जीतन जम-
राज काल काटन को गाया जाल श्रीहरिगुन गान रीति ग्रन्थमें
बताई है । कहे सरसमाधुरी सुसाज बाज सहित भजन करे
ताहि मिलें आय राधिका कन्हाई है ॥ १५ ॥
सर्व से सुलभ कलिबीच सार कीरतन है याहीको करके
कह्यो हरिको रिझावना । जोग जग्य ज्ञान ध्यान तीरथ के
न्हानहूते उत्तम है यही सही केवल गुण गावना ॥ भजन के
कियेते भवसागर तरजात तुरत निश्चय कर याहीतें परम धाम
पावना । कहे सरसमाधुरी सु सेवाकर दम्पति की छवि में नित
छके छुटे आवन अरु जावना ॥ १६ ॥
इति ॥

श्रीमन्निकुंजविहारिणे नमः॥
श्रीमत् श्यामचरणदासाचार्यचरितामृत ॥
ॐ श्री सरसमाधुरीजी रचित ॐ
(दोहावली)
श्रीसतगुरु बलदेव प्रभु, चरणन शीश नवाय।
श्यामचरण के दास को, चरितामृत कहों गाय १
बैठि हिये मम श्रीगुरु, करि हैं आय सहाय।
सरस माधुरी गुरु कृपा, सबही विधि बनजाय २
सम्बत सत्रहसौ गिनो, ऊपर साठ पिछान।
प्रगटे भार्गववंश में, कृष्ण अंश प्रभु आन ३
शोभनजी के कुल विषै, अष्टम पीढ़ी अन्त।
मुरलीधर घर प्रगट भे, श्यामरूप धर सन्त ४
स्वप्न माहिं दर्शन दिये, कुंजो कों श्री श्याम।
तुमरे प्रगटूं पुत्र हो, सुनहु मातु सुखधाम ५
भादो शुक्ला तीज को, कुंजो कूख मझार।
बालनाम रणजीत धर, प्रगटे कृष्ण मुरार ६
जन्म समय अस्थान में, भयो अधिक उजियार।
अनहद धुनि बाजे बजे, छई सुगन्धि अपार ७
नाम ग्राम डहरे विषै, घर घर मंगल चार।
विविधि बधाई गुनिनमिल, गाई भली प्रकार ८
पंच वर्ष की वैसमें, सरिता तट शुकदेव।
गोदलिये रणजीत को, प्यार कियो गुरुदेव ६
गये वर्ष उन्नीस में, गंगातट शुकतार।
साक्षात् दर्शन दिये, शुक मुनि व्यास कुमार १०

१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरुदीक्षा दी विधि सहित, मंत्र सुनायो कान ।
योग ज्ञान वैराग दे, किये शिष्य हित मान ११
श्री तिलक मस्तक रचो, श्रीतुलसी शुचि माल ।
गल में बांधी प्रेमसों, कीन्हें शिष्य निहाल १२
नौधा प्रेमा अरु परा, त्रिविधि भक्तिदइ दान ।
तारण तरण बनायके, कीने आप समान १३
आज्ञा दी श्री शुकमुनी, जगमें भक्ति प्रचार ।
विमुखन हरि सन्मुख करो, निस्तारो संसार १४
सतगुरु आज्ञा शीशधर, आ दिल्ली अस्थान ।
रचि मन्दिर राजे जहां, कियो मानसी ध्यान १५
योग युक्ति चौदह वरष, करी समाधि लगाय ।
रूप अनेकन धार प्रभु, भारत दियो चिताय १६
राजा रानी छत्रपति, तिनकी करी न चाह ।
चरणदास हरि रंग रंगे, सबसों बे परवाह १७
ईश्वरीय परिचय अमित, दिये भक्ति हरि हेत ।
किये मनोरथ सबन के, पूरण प्रेम समेत १८
बादशाह दिल्ली तखत, ठाड़े रहे हुजूर ।
चरणदास के चरण की, मस्तक धारी धूर १६
अष्टसिद्धि नवनिद्धि सब, खड़ी रही कर जोर ।
श्यामचरणके दास प्रभु, लखें न तिनकी ओर २०
शिष्य अनेकन कर प्रभो, तारन तरन बनाय ।
चार धाम सातो पुरी, तीरथ दिये पठाय २१
श्री भगवत की भक्ति को, भानु दियो प्रगटाय ।
भर्म निशा सोते हुए, दीने जीव जगाय २२
नर नारी संसार के, करन लगे हरि भक्त ।

श्रीवृन्दावनगमनवर्णन । ११
पगे प्रेम प्रीतम प्रिया, नशी बासना जक्त २३
कलियुगके कलभप सकल, दीने सबहि मिटाय ।
चरणदास प्रभु कृपाकर, बिगरी दई बनाय २४
कलियुग छायो जक्त में, मिटी वेद मरयाद ।
उबरे अनगिन जीव जग, श्री चरणदास प्रसोद २५
कलियुग सतयुग समकियो, दियो नाम हरि दान ।
चरणदास जग जियको, प्रेम करायो पान २६
कलियुग में सत कर्मको, कियो बहुत बिस्तार ।
चरणदास गुरु भक्ति दे, निस्तारो संसार २७
श्रीवृन्दावनगमनवर्णन ॥
सगुण ब्रह्म सर्वज्ञ प्रभु, सर्व व्यापी श्याम ।
पुरुषोत्तम परमात्मा, श्रीवन जिनको धाम २८
सतचिदघन आनन्दमय, जिनको अद्भुत रूप ।
ध्यानधरत विधि शिवसदा, तिन पद पद्म अनूप २६
श्याम चरण के दास प्रभु, आचारज अवतार ।
दिल्ली से चलकर गये, वृन्दा विपिन मझार ३०
दृगन चटपटी दरस की, निरखन नन्दकुमार
विरह विथा व्याकुल महा, तनकी सुधिन सँभार ३१
पहुंचे सेवा कुंज मैं, निरखी अनुपम ठौर ।
सब कुंजनतें अति सरस, तेहि समान नहिं और ३२
सेव्य जहाँ श्रीराधिका, सेवक श्रीनँदलाल ।
याते नाम प्रसिद्ध जग, सेवा कुंज रसाल ३३
लता ललित छाई जहाँ, छवि को नाहिं न पार ।
कुसुमित तरु वेली छईं, भृंग करत गुंजार ३४

१२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
द्रुम बहु नाना भांतिके, छाई बेलि वितान ।
तिनमें पक्षी विविधविधि, करत युगल गुणगान ३५
सीतलमन्द सुगन्ध मय, रोचक बहत समीर ।
ऋतुबसन्त सन्तत रहत, बोलत कोयल कीर ३६
रैनि माहिं तहाँ छिपिरहै, श्याम चरण के दास ।
निज मन्दिर बारहदरी, जा बैठे जेहि पास ३७
करनलगे तहां भावना, मूंदलिये निज नैन ।
रोमांचितहो पुलक तन, कहे विरह मुख बैन ३८
हा राधे मम स्वामिनी, हे प्रीतम घनश्याम ।
वेगि दरश दे युगल वर, पूरणकर मन काम ३६
हा हा छबि दीजै दिखा, दास मोहिं निज मान ।
नाहीं तन तज जायगो, तात्काल यह प्रान ४०
विरह हूक हिय में उठी, भये महा बेहाल ।
दृगन अश्रुधारा बही, तनकी सुधि न सँभाल ४१
अन्तरयामी युगलवर, रसिकन के प्रिय प्रान ।
विरह विथा निज दासकी,अतिशय निज मनमान४२
चरणदास आये यहां, हमरे घर महमान ।
प्रगट होय दे निज दरस, करें सन्त सन्मान ४३
रसिक हमारे प्राण-धन, हम रसिकन के प्रान ।
प्रेमिन के समतुल हमें, और प्रिय जग आन ४४
अर्धनिशा बीती तबहि, प्रगटे प्यारी लाल ।
भक्तन के मन भावने, करुणासिन्धु कृपाल ४५
गौरश्याम अभिराम दोउ, अनुपम नवलकिशोर ।
ललितादिक अनगिनअली, संगलिये सिरमौर ४६
नील पीत पट सोहने, नखशिख सजि श्रृंगार ।

श्रीवृन्दावनगमनवर्णन । १३
मुकुट चन्द्रिका शीशपर, छविको नाहीं पार ४७
युगल चन्द्रमुख चन्द्रिका, छाई मध्य निकुंज ।
दमकत चमकत अंगदुति, अनुपम छविकी पुंज ४८
चंचल वितवनि रसभरी, मन्द मधुर मुसकान ।
अलक कपोलन छुटरही, अधर ललाई पान ४६
बेसर और बुलाक शुचि, नासा शोभा देत ।
निरखतही निजजननको, मनमानिक हरि लेत ५०
गल बैयां दीने दोऊ, मदन मनोहर लाल ।
प्रीतम कर वंशी लसी, प्रिय कर कमल रसाल ५१
युगलचरण वारिजबरण, छवि कुछ कही न जाय ।
पायल घुँघरू सजि रहे, छुम छुम शब्द सुनाय ५२
उठ आतुर चरणन परे, चरणदास तेहि वार ।
कृष्ण भुजनभर हियलगा, कियो प्रेम अति प्यार ५३
कुँवरि किशोरी करि कृपा, प्रेम मंजरी जान ।
हस्तकमल मस्तक धरो, दियो प्रेम वरदान ५४
पुनि दोऊ प्रीतम प्रिया, चरणदास लै संग ।
जाय विराजे कुंज में, हिलमिल हर्ष उमंग ५५
हँसिहँसि रसबतियांकरन, लागे श्याम सुजान ।
चतुर शिरोमणि लाड़िली, नागरि नेह निधान ५६
कहनलगे मुख मृदुवचन, आये प्रीति पिछान ।
कहा करें तुम पहुनई, अरु सेवा सन्मान ५७
चरणदास दोउ जोरकर, या विधि बोले बैन ।
सेवादे निज पद कमल, निकट रखो दिन रैन ५८
हँसि बोले तब श्रीहरि, मधुर वचन अभिराम ।
जगमें भेजे जिस लिये, सो न किये कुछ काम ५६

१४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
आचारज बपु दे तुम्हें, भक्ति प्रचारन काज ।
भेजा है संसार में, सुनहु भक्त महराज ६०
योगध्यान तज कीजिये, नौधा भक्ति प्रचार ।
प्रेमपरायण जीव हो, उतरे भवनिधि पार ६१
प्रेमभक्ति प्रगटाय जग, जीवन को दे दान ।
करो कृतारथ जक्त को, मेरे जीवन प्रान ६२
कछु इक दिन बीते तुम्हें, ले निजधाम बुलाय ।
रखें निरन्तर निकट नित, सुन प्यारे चितलाय ६३
वचन कहे श्रीकृष्ण ने, सुने श्याम चरनदास ।
बिछुरन बिरह वियोगलखि, अतिशय भये उदास ६४
गदगद बानी होगई, नैन बही जलधार ।
सुबकीले रोवन लगे, सन्मुख कृष्ण मुरार ६५
हाय हरी कैसी करी, धीर धरी नहिं जाय ।
तुम सब समझत लाड़िले, बिछुरन दुख अधिकाय ६६
तुमरो श्रीमुख चन्द्रमा, मेरे नयन चकोर ।
बिनदरशन जीवन नहीं, सुनिये नवलकिशोर ६७
सघन सजल गिरि आपहो, मैं हों तुम्हूरा मोर ।
सुखी होंहु सुन साँवरे, बंशीधुनि घन घोर ६८
चरण कमलवत आप के, मधुकर है मन मोर ।
तहां बसनको चित चहै, अन्त नहीं कहिं ठौर ६६
स्वामी मेरे आप हो, मैं सेवक निज दास ।
उत्कंठा अति रहन की, सदा तुम्हारे पास ७०
स्वाति बूंद तुम हो हरी, चातक मोहिं पिछान ।
रूप सुधारस पान बिन, तलफत मेरे प्रान ७१
आप पारधी प्रांण धन, मोहिं मृगा लो मान ।

श्रीवृन्दावनगमनवर्णन । १५
मारो निस्तारो तुमहि, मोको गति नहिं आन ७२
गंगाजल सम श्याम तुम, मैं हों तुम्हरा मीन ।
तुम माता मैं पुत्रवत, समझो सत्य प्रवीन ७३
तुम गैया मैं बत्स सम, मैं पतंग तुम दीप ।
यही चाह चित में बसे, निशिदिन रहों समीप ७४
कहनलगे श्रीकृष्ण तब, सुनहु श्याम चरनदास ।
तुमरे हिय माहीं रहै, हमरो सदा निवास ७५
सन्त हमारी आतमा, यामें नहिं संदेह ।
रोम रोम में रमि रहै, ज्यों बादर में मेह ७६
आज्ञा जो हमने दई, लीजे प्यारे मान ।
भक्ति प्रचारो भक्त में, करो जियन कल्यान ७७
जो आज्ञा करिहों यही, कही चरणही दास ।
देखो चाहूँ सांवरे, सुन्दर रास बिलास ७८
ह्वै प्रसन्न बोले लला, मूंदो अपने नैन ।
आज्ञा दूँ तब खोलियो, हे प्रीतम सुख दैन ७६
मूंदे तबहीं नैन निज, चरणदास तेहि बार ।
बोले पुनि श्रीश्यामघन, देखो पलक उघार ८०
दृगन खोल देखन लगे, तेजोमय उजियार ।
रत्न जटिल अवनी लखी, जगमग जोति अपार ८१
ऋतु बसंत संतत तहाँ, अनगिन बाग बहार ।
फूले फूल अनेक जहाँ, लहरत लता अपार ८२
फुलवारी क्यारी बनी, न्यारी नाना रंग ।
तरुन माहिं बहु वरन के, बोलत विविधि विहंग ८३
बीच विविधि कुंजस्थली, छाई बेलि वितान ।
तिन में सेवा हित रहें, सहचरि सखी सुजान ८४