१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
द्वितीयः खण्डः
नीलरुद्रोपनिषत् ] [ ४२७
द्वितीयः खण्डः
अपश्यं त्वावरोहन्तं नीलग्रीवं विलोहितम्।
उत त्वा गोपा अदृशन्नुत त्वोदहार्यः॥
उत त्वा विश्वा भूतानि तस्मै दृष्टाय ते नमः।
नमो अस्तु नीलशिखण्डाय सहस्राक्षाय वाजिने ॥
अथो ये अस्य सत्त्वानस्तेभ्योऽहमकरं नमः।
नमांसि त आयुधायानातताय धृष्णवे ॥
उभाभ्यामकरं नमो बाहुभ्यां तव धन्वने।
प्रमुञ्च धन्वनस्त्वमुभयोरार्त्रियोर्ज्याम् ॥
या श्च ते हस्त इषवः परा ता भगवो वप।
अवतत्य धनुस्त्वँ सहस्राक्ष शतेषुधे ॥
निशीर्य शल्यानां मुखा शिवो नः शंभुराभर।
विजय धनुः शिखण्डिनो विशल्यो बाणबाँ उत ॥
अनेशन्नस्येषव आभुरस्य निषङ्गथिः।
परि ते धन्वनो हेतिरस्मान्वृणक्तु विश्वतः॥
अथो य इषुधिस्तवारे अस्मिन्निधेहि तम्।
या ते हेतिर्मीढुष्टम् हस्ते बभूव ते धनुः॥
तया त्वं विश्वतो अस्मानयक्ष्मया परिब्भुज।
नमो अस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु ॥
ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः।
ये वाभिरोचने दिवि ये च सूर्यस्य रश्मिषु ॥
येषामप्सु सदस्कृतं तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः।
या इषवो यातुधानानां ये वा वनस्पतीनाम्।
ये वाऽवटेषु शेरते तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः ॥२
४२८ ] [ नीलरुद्रोपनिषद्
हे अधिक लाल वर्ण वाले नीलकण्ठेश्वर ! हमने आपको पृथिवी
पर अवतीर्ण होते हुए देखा है। आपकी उस अवतार रूप अवस्था के
देखने वाले गोप और गोपियां हैं। आपका स्वरूप गोपियों के लिए भी
दिखाई देना कठिन है, परन्तु उसके अवतीर्ण होने पर विश्व के सभी
प्राणियों ने दर्शन किये। आपके उस कृष्णस्वरूप को हमारा नमस्कार।
हे मोरमुकुट धारी प्रभो ! हम आपको नमस्कार करते हैं। आप ही
महान् शक्ति वाले इन्द्र हैं। अपने भक्तों के समक्ष आप सहस्राक्ष विराट्
रूप में भी दर्शन देते हैं। आपके इस रूप के जो सहचर, बाल-गोपाल
गोपिकाएं आदि हैं, वे भी हमारे नमस्कार के पात्र हैं।
हे प्रभो ! आपके अत्यन्त शक्तिशाली उन आयुधों को भी अने-
कानेक नमस्कार हैं, जो इस समय शान्त रूप में स्थित हैं। मैं आपके
धनुष को करबद्ध प्रणाम करता हूँ। अब आप अपने धनुष की प्रत्यंचा
को शत्रु के लिए भी प्रयुक्त मत कीजिये। आप अपने बाण को हाथ से
उतार कर तूणीरस्थ करके अपने परम कल्याणमय एवं सौम्य शिव रूप
का मुझे दर्शन करावें।
हे सहस्राक्ष ! आप सौ-सौ बाणों का एक साथ संधान करने वाले
हैं। आप अपने बाणों के मुखों को तीक्ष्ण कर हमारे कल्याणार्थ उन्हें
धनुष पर चढ़ावें। शत्रु-नाश के पश्चात् आपके धनुष से प्रत्यंचार उतर
जाय और आपके बाण संताप देना त्याग कर शान्तिपूर्वक तूणीर में
निवास करें। वे पर्वतों को चूर्ण कर देने वाले बाण कल्याणकारी हो
जांय। आपका शर-संधान हमारी चारों ओर से रक्षा करें। रक्षा करने
के पश्चात् उस बाण को आप तूणीर में स्थित कर दें। हे कृपा-वर्षक
प्रभो ! आप अपने अमोघ बाण और धनुष के द्वारा चारों ओर से
हमारे रक्षक हों।
जो सर्प पृथिवी पर वास करते हैं, उन्हें हमारा नमस्कार। आकाश
और स्वर्ग में रहने वाले सर्पों को भी नमस्कार सूर्य की रश्मियों, प्रकाश-