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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

टिप्पणी (नोट्स) ६५५
नोद्वहेत् कपिलां कन्यां नाधिकाङ्गीं न रोगिणीम् ।
नालोमिकां नातिलोमां न वाचालां न पिङ्गलाम् ॥
नर्क्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम् ।
न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम् ॥
एष च प्रतिषेधः न भार्यास्वाभावफलकः किन्तु शास्त्रातिक्रमप्रायश्चित्त-
मात्रम् - ऐसा कुल्लूक भट्ट का मत है । भ्रातृमतीम्-इसकी व्याख्या
मनुस्मृति में ही मिलती है:-
यस्यास्तु न भवेद्भ्राता न विज्ञायेत वा पिता ।
नोपयच्छेत तां प्राज्ञः पुत्रिकाधर्मशङ्कया ॥
वह कन्या जिसके भावी पुत्र को उस कन्या का पिता स्व-पुत्राभाव होने
के कारण अपने श्राद्धाधिकारी के रूप में मनोनीत कर लेता है-पुत्रिका
कहलाती है:-
अपुत्रोऽनेन विधिना सुतां कुर्वीत पुत्रिकाम् ।
यदपत्यं भवेदस्यां तन्मम स्यात्स्वधाकरम् ॥
असमानार्षगोत्रजाम् - यहां कुछ विशेष विवरण शूलपाणि ने दिया है-
पितुः पितुः स्वसुः पुत्राः पितुर्मातुः स्वसुः सुताः ।
पितुर्मातुलपुत्राश्च विज्ञेयाः पितृबान्धवाः ॥
मातुः मातुः स्वसुः पुत्रा मातृ मातुः स्वसुः (पितृष्वसुः) सुताः ॥
मातुर्मातुल-पुत्राश्च विज्ञेया मातृ-बान्धवाः ।
श्लो० ५५-परीक्षितः पुंस्त्वे - इस विषय में शूलपाणि ने देवल के दो
वचन उद्धृत किए हैं :-
रेतोऽस्य प्लवते नाप्सु ह्लादि मूत्रं च फेनिलम् ।
पुमान् स्याल्लक्षणैरेतैर्विपरीतं नपुंसकम् ॥
न मूत्रं फेनिलं यस्य विष्ठा चाप्सु निमज्जति ।
मेढ्रोन्मादशुक्राभ्यां हीनः क्लीबः स उच्यते ॥
परन्तु प्रथम श्लोक के प्रथम पाद में जो वर्णन है वह निम्नलिखित नारद-
वचन से विपरीत है-
"यस्याप्सु प्लवते वीर्यं ह्लादि मूत्रं च फेनिलम् ।
पुमान् स्याल्लक्षणैरेतै र्विपरीतस्तु षण्ढकः ॥
श्लो० ५८-एकविंशतिम्-इस प्रसङ्ग में मनु का वचन यह है :-
दश पूर्वांन्परान् वंश्यान् आत्मानं चैकविंशतिम् ॥

६५६ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
ब्राह्मविवाह का परिष्कृत लक्षण वीरमित्रोदय में इस प्रकार दिया गया है—
“निरुपाधिककन्यादानपूर्वकः सवर्णपरिणयो ब्राह्मो विवाहः । उपाध्ययश्च-
ऋत्विक्स्वद्रव्यग्रहणसमयबन्धादयः” ।
श्लो० ५९—ऋत्विजे—दक्षिणासु दीयमानासु कन्यादानम्—ऐसा शूल-
पाणि का परिष्कार है । गोद्वयम्—यह उपलक्षण है । अत एव मनु ने
कहा है:—
एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः ।
कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्मः स उच्यते ॥
श्लो० ६०—धर्ममिति—अत्र धर्मशब्दः अर्थकामयोरप्युपलक्षणम् स्मृ-
त्यन्तरानुरोधात्—यह बालम्भट्टीकार का मत है ।
श्लो० ६१—युद्धहरणात्—अत एव मनु का कथन है—
हत्वा छित्त्वा च भित्त्वा च क्रोशन्तीं रुदतीं गृहात् ।
प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यते ॥
कन्यकाच्छलात्—इसका स्पष्टीकरण मनु में हुआ है :—
सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा रहो यत्रोपगच्छति ।
स पापिष्ठो विवाहानां पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥
इन अष्टविध विवाहों के विषय में जात्यनुकूल व्यवस्था का निर्देश
मनु ने इस प्रकार किया है :—
षडानुपूर्व्या विप्रस्य क्षत्रस्य चतुरोऽवरान् ।
विट्शूद्रयोस्तु तानेव विद्याद्धर्म्यानराक्षसान् ॥
ब्राह्मण के लिए ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर एवं गान्धर्व; क्षत्रिय के
लिए, आसुर, गान्धर्व, राक्षस तथा पैशाच; वैश्य एवं शूद्र के लिए आसुर,
गान्धर्व और पैशाच विवाह धर्म्य हैं । विशेष विवरण के लिए निम्न-लिखित
मनु-वचन द्रष्टव्य है :—
चतुरो ब्राह्मणस्याद्यान् प्रशस्तान् कवयो विदुः ।
राक्षसं क्षत्रियस्यैकमासुरं वैश्यशूद्रयोः ॥ इत्यादि ॥
श्लो० ६२—क्षत्रिया शरम् = ब्राह्मणवरहस्तधृत शर । प्रतोद = वर-
हस्तस्थ यष्टि । शूद्रा के विषय में मनु का कथन है—
वसनस्य दशा ग्राह्या शूद्रयोत्कृष्ट-वेदने ॥
किन्तु स्वयं याज्ञवल्क्य ने शूद्रा के विषय में कुछ नहीं कहा है, कारण
शूद्रा-ग्रहण ब्राह्मण के लिए याज्ञवल्क्य का कथमपि सम्मत नहीं है—
यदुच्यते द्विजातीनां शूद्राद्दारोपसंग्रहः ।
नैतन्मम मतं यस्मात्तत्रायं जायते स्वयम् ॥ या० स्मृ० १।५६॥

टिप्पणी (नोट्स) ६५७
श्लो० ६४—कन्या कुर्यात् स्वयंवरम्—यह अधिकार तीन ऋतुकाल के
अतिक्रमण के बाद ही होता, ऐसा विष्णु का कथन है—
ऋतुत्रयमतीत्यैव कन्या कुर्यात् स्वयंवरम् ।
ऋतुत्रये व्यतीते तु प्रभुः कन्या स्वयंवरे ॥
परन्तु यदि पिता आदि के जीवित रहने पर भी कन्या का अभिभावक
प्रमादादि के कारण उचित समय पर कन्यादान नहीं करे, वैसी स्थिति में
बौधायन का सिद्धान्त निम्न-लिखित है—
त्रीणि वर्षाण्यृतुमती कांक्षेत पितृशासनम् ।
ततश्चतुर्थे वर्षे तु विन्देत सदृशं पतिम् ॥
अविद्यमाने सदृशे गुणहीनमपि श्रयेत् ॥
इस प्रसङ्ग में नारद का निम्न-निर्दिष्ट वचन भी ध्येय है—
यदा तु नैव कश्चित् स्यात् कन्या राजानमाव्रजेत् ।
अनुज्ञया वरं तस्य परीक्ष्य वरयेत् स्वयम् ॥
श्लो० ६५—सकृत्प्रदीयते कन्या—यही मनु का भी मत है—
सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते ।
सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सतां सकृत् ॥
श्लो० ६६—यदि वर भी अपना दोष पहले स्पष्ट नहीं कर देता है
तो उसे भी दण्ड मिलना चाहिए । वर-दण्ड की व्यवस्था नारद के अनुसार
निम्न-लिखित है—
गूह्यित्वाऽऽत्मनो दोषान् विन्दन्नन्ययमर्हति ।
वरस्य दत्त-नाशश्च भवेत् स्त्री च निवर्त्तते ॥
अन्यय = दण्ड । कहीं-कहीं द्वितीय पाद में “विन्दते द्विगुणो दमः”
पाठान्तर है ।
श्लो० ६८-६९—यहाँ मनुस्मृति में विधवा के लिए विशेष बतलाया
गया है—
विधवायां नियुक्तस्तु घृताक्तो वाग्यतो निशि ।
एकमुत्पादयेत्पुत्रं न द्वितीयं कथञ्चन ॥
श्लो० ७०--याज्ञवल्क्य का यह कथन सवर्ण-व्यभिचारिणी के लिए है ।
हीनवर्ण-व्यभिचारिणी के लिए बृहस्पति ने निम्नलिखित व्यवस्था की है—
हीनवर्णोपभुक्ता या त्याज्या वध्या च सा भवेत् ॥

६५८ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
श्लो० ७१—इस प्रसंग में बृहस्पति का वचन अवधेय है—
रोमोद्गवे शशी भुङ्क्ते गन्धर्वः कुचदर्शने ।
अनलस्तु रजोयोगे स्त्रियो भुङ्क्ते तु नान्यथा ॥
श्लो० ७३—यहाँ द्वितीय विवाह की अवधि का निरूपण मनु ने इस
प्रकार किया है—
बन्ध्याऽष्टमेऽधिवेद्याब्दे दशमे तु मृत-प्रजा ।
एकादशे स्त्रीजननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी ॥
अप्रियवादिनी के साथ अपुत्रा का अध्याहार करना आवश्यक है ।
श्लो० ७९—युग्मासु संविशेत्—युग्मरात्रिगमन से पुत्र होता है—ऐसा
मनु का कथन है :—
युग्मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु ।
तस्माद् युग्मासु पुत्रार्थी संविशेदार्त्तवे स्त्रियम् ॥
आद्याश्चतस्रस्तु वर्जयेत्—यद्यपि शंख ने पति के लिए चतुर्थ दिन में ही
पत्नी की शुद्धि मानी है—
शुद्धा भर्तुश्चतुर्थेऽह्नि अशुद्धा दैवपित्र्ययोः ।
तथापि यह शुद्धि सेवा के लिए न कि सम्भोग के लिए भी । अतएव मनु
का भी कथन है—
“तासामाद्याश्चतस्रस्तु निन्दिताः” ।
श्लो० ८९—यह नियम सवर्णा स्त्री के विषय में है । अत एव मनु का
कथन है—
एवं वृत्तां सवर्णां स्त्रीं द्विजातिः पूर्वमारिणीम् ।
दाहयेदग्निहोत्रेण यज्ञपात्रैश्च धर्मवित् ।
अत एव निम्नलिखित वचन को असवर्णा स्त्री के विषय में समझना
चाहिए—
यो दहेदग्निहोत्रेण स्वेन भार्यां कथञ्चन ।
स स्त्री सम्पद्यते तेन भार्या चास्य पुमान् भवेत् ॥
श्लो० ९१—पारशवोऽपि वा—पारशव की व्युत्पत्ति मनु ने निम्न निर्दिष्ट
पद्य में की है—
यं ब्राह्मणस्तु शूद्रायां कामादुत्पादयेत् सुतम् ।
स पारयन्नेव शवस्तस्मात् पारशवः स्मृतः ॥

टिप्पणी (नोट्स) ६५६
धारयन् = जीवन् । यद्यप्ययं पितृपकारार्थं श्राद्धादि करोत्येव तथाप्य-
सम्पूर्णोपकारकत्वात् 'शव' व्यपदेशः- कुल्लूक भट्ट ।
इन सबों की जीविका का निर्देश मनु ने दशवें अध्याय में विशदरूप में
किया है ।
श्लो० ९५-रथकारः प्रजायते - बौधायन के कथनानुसार वैश्य से शूद्रा
में उत्पन्न सुत रथकार कहलाता है - "वैश्याच्छूद्रायां रथकारः" । अतः रथ-
कार शब्द को अनेकार्थक मानना चाहिए - ऐसा शूलपाणि का मत है ।
श्लो० ९८-इस कार्य के समय के विषय में दक्ष का कथन है -
उषः काले तु सम्प्राप्ते शौचं कृत्वा यथार्थवत्
ततः स्नानं प्रकुर्वीत दन्तधावन-पूर्वकम् ।
श्लो० १०१ - विद्यां चाध्यात्मिकीम् = उपनिषदम् ।
श्लो० १०२-पञ्चमहायज्ञ के अनुष्ठान का फल भी मनु ने बत-
लाया है -
पञ्च सूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्युपस्करः ।
कण्डनी चोदकुम्भश्च बध्यते यास्तु वाहयन् ॥
तासां क्रमेण सर्वासां निष्कृत्यर्थं महर्षिभिः ।
पञ्च क्लृप्ता महायज्ञाः प्रत्यहं गृहमेधिनाम् ॥
यहाँ कुल्लूकभट्ट की टिप्पणी है- प्रत्यहमित्यभिधानात् प्रतिदिनं तत्पा-
पक्षयस्यापेक्षितत्वात् सन्ध्यावन्दनादिवन्नित्यत्वमपि न विरुध्यते ।
पञ्च महायज्ञों के नामान्तर भी मनुस्मृति में दिये गये हैं-
अहुतं च हुतं चैव तथा प्रहुतमेव च ।
ब्राह्मं हुतं प्राशितं च पञ्चयज्ञान् प्रचक्षते ॥
जपोऽहुतो हुतो होमः प्रहुतो भौतिको बलिः ।
ब्राह्मं हुतं द्विजाग्र्यार्चा प्राशितं पितृतर्पणम् ॥
श्लो० १०५-सम्भोज्य - इससे बाल आदि का भोजन अतिथि से पूर्व
ही कराना चाहिए- ऐसा सिद्ध होता है । अत एव मनु ने कहा है :-
सुवासिनीः कुमारीश्च रोगिणो गर्भिणीः स्त्रियः ।
अतिथिभ्योऽग्र एवैतान् भोजयेदविचारयन् ॥
श्लो० १०६ - उपरिष्टात् = पूर्वम् , अधस्तात् = पश्चात् ।
श्लो० १०७ - अतिथि की परिभाषा मनु ने की है-
एकरात्रं तु निवसन्नतिथिर्ब्राह्मणः स्मृतः ।
अनित्यं हि स्थितो यस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥
४२ या०

६६० याज्ञवल्क्यस्मृतिः
सायमपि—अतिथि को सायंकाल में भोजन नहीं देने पर पाप का
निदर्शन विष्णुपुराण में किया गया है—
दिवाऽतिथौ तु विमुखे गते यत्पातकं नृप ।
तदेवाष्ट-गुणं प्रोक्तं सूर्योढे विमुखे गते ॥
यदि ब्राह्मण के गृह में क्षत्रिय आदि उपस्थित हों तो उनके विषय में मनु
के निम्नलिखित वचन ध्येय हैं :—
न ब्राह्मणस्य त्वतिथिर्गृहे राजन्य उच्यते ।
वैश्यशूद्रौ सखा चैव ज्ञातयो गुरुरेव च ॥
यदि त्वतिथिधर्मेण क्षत्रियो गृहमाव्रजेत् ।
भुक्तवत्सु च विप्रेषु कामं तमपि भोजयेत् ॥
वैश्यशूद्रावपि प्राप्तौ कुटुम्बेऽतिथिधर्मिणौ ।
भोजयेत्सह भृत्यैस्तानानुशंस्यं प्रयोजयन् ॥
इतरानपि सख्यादीन् सम्प्रीत्या गृहमागतान् ।
प्रकुर्यान्नं यथाशक्ति भोजयेत्सह भार्यया ॥
श्लो० ११०—अर्ध्याः—अर्घ्यपद मधुपर्क का उपलक्षक है । अत एव
मनु का कथन है—
राजर्त्विक्-स्नातक-गुरून् प्रियश्वशुरमातुलान् ।
अर्हयेन्मधुपर्केण परिसम्वत्सरात्पुनः ॥
परिसम्वत्सरात् = सम्वत्सर बीतने के बाद । ऋत्विजः—यह पद पूज्यमात्र
का उपलक्षण है। एवञ्च तात्पर्य यह है कि एक वर्ष के बीतने के बाद स्ना-
तक आदि का मधुपर्क से पूजन करना चाहिये । यदि सम्वत्सर-मध्य में ही
यज्ञ उपस्थित हो तो सम्वत्सर-मध्य में भी वे सम्मानाहं हैं । परन्तु यदि
सम्वत्सर के बीच कोई यज्ञ नहीं उपस्थित हो तो सम्वत्सर के बीत जाने के
बाद यज्ञ उपस्थित हो या नहीं हो, उनका सम्मान अवश्य हीं करना
चाहिये । यहाँ मनु ने राजा तथा स्नातक के पूजन में विशेष बतलाया है कि
यदि सम्वत्सर-मध्य में यज्ञ की उपस्थिति नहीं होती है, तो सम्वत्सर के
बीत जाने पर भी राजा तथा स्नातक की पूजा यज्ञ में ही करनी चाहिए न
कि केवल सम्वत्सर के अतिक्रमण से ही—
राजा च श्रोत्रियश्चैव यज्ञकर्मण्युपस्थितौ ।
मधुपर्केण सम्पूज्यौ न त्वयज्ञ इति स्थितिः ॥
अतः राजा तथा स्नातक का यज्ञ में और शेष का सम्वत्सर-मध्य में यज्ञ-
काल में, सम्वत्सर के बीतने पर यज्ञाऽयज्ञा-साधारण पूजन करना चाहिए ।

टिप्पणी (नोट्स) ६६१
श्लो० ११२—अति-भोजनम्—अत एव मनु ने कहा है—
अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चाति-भोजनम् ।
अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात् तत्परिवर्जयेत् ॥
श्लो० ११३—आसीमान्तम्—यहाँ अपरार्कव्याख्या में तीन प्रकार की
सीमा बतलाई गई है—सीमा त्रिविधा—वास्तु-सीमा, ग्राम-सीमा, क्षेत्र-सीमा
च; सा चानुवजनीयगुणापेक्षया व्यवस्थापनीया।
श्लो० ११६—वार्धके—मनु का कथन है—शूद्रोपि दशमीं गतः । ९०
वर्ष की अवस्था के बाद शूद्र भी प्रतिष्ठित होता है। परन्तु गौतम ने ८० वर्ष
को ही परमावधि मानी है ।
श्लो० १२७—कुशूलेति—द्वादशदिनोचित-धान्याधारा कोषी कुशूलः,
षडिनोचित-धान्याधारा कुम्भी—शूलपाणिः ।
श्लो० १३९—प्रेतधूमम्—बालम्भट्टीकार ने प्रेतधूम का अर्थ बालातप
किया है। इन्होंने अपने मत के समर्थन में निम्न लिखित मनु के वचन को
ध्यान में रक्खा था—ऐसा प्रतीत होता है—
बालातपः प्रेतधूमो वर्ज्यं भिन्नं तथाऽऽसनम् ।
परन्तु यहाँ बालातप एवम् प्रेतधूम मे उद्देश्य-विधेय-भाव की कल्पना
करना अमूलक है। यहाँ तो बालातप एवं प्रेतधूम दोनो हीं स्वतन्त्र पदार्थ
हैं जिनको मनु ने वर्ज्य माना है। अतः प्रेतधूम का अर्थ दह्यमान-शव-धूम
हीं करना चाहिए ।
श्लो० १४०—न राज्ञः प्रतिगृह्णीयात्—इस प्रसङ्ग में मनु के निम्न-
लिखित वचनों को देखना चाहिए—
यो राज्ञः प्रतिगृह्णाति लुब्धस्योच्छास्त्रवर्त्तिनः ।
स पर्यायेण यातीमान् नरकानेक-विंशतिम् ॥
तामिस्रमन्धतामिस्रं महारौरवरौरवौ ।
नरकं कालसूत्रं च महानरकमेव च ॥
सञ्जीवनं महावीचिं तपनं संप्रतापनम् ।
संघातं च सकाकोलं कुड्मलं प्रतिमूर्तकम् ॥
लोहशङ्कुमृषीजं च पन्थानं शाल्मलिंनदीम् ।
असिपत्रवनं चैव लोहदारकमेव च ॥
एतद्विदन्तो विद्वांसो ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः ।
न राज्ञः प्रतिगृह्णन्ति प्रेत्य श्रेयोऽभिकांक्षिणः ॥

१६२ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
श्लो० १४१—इस प्रसङ्ग में मनु का कथन अधिक स्पष्ट है :—
न राज्ञः प्रतिगृह्णीयात् अराजन्यप्रसूतितः ।
सूनाचक्रध्वजवतां वेशेनेव च जीवताम् ॥
दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः ।
दशध्वजसमो वेशो दशवेशसमो नृपः ॥
दशसूनासहस्राणि यो वाहयति सौनिकः ।
तेन तुल्यः स्मृतो राजा घोरस्तस्य प्रतिग्रहः ॥
श्लो० १४६—अमावाश्या आदि में अध्ययन के दुष्परिणाम का वर्णन
मनुस्मृति में इस प्रकार किया गया है :
अमावास्या गुरुं हन्ति शिष्यं हन्ति चतुर्दशी ।
ब्रह्माष्टकापौर्णमास्यौ तस्मात्ताः परिवर्जयेत् ॥
ब्रह्म = वेद को ।
श्लो० १५४—आचारमाचरेत्—इस प्रसङ्ग में मनु के वचन को ध्यान
में रखना चाहिए—
आचाराल्लभतेह्यायुः आचारादीप्सिताः प्रजाः ।
आचाराद्धनमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षणम् ॥
दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः ।
दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ॥
सर्वलक्षणहीनोऽपि यः सदाचारवान्नरः ।
श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥
श्लो० १५५—पुत्रं शिष्यं च ताडयेत्—यह ताडन केवल अनुशासन
के लिए करना चाहिए । अत एव मनु ने कहा हैः—
शिक्षार्थं ताडयेत्तु तौ ॥
ब्राह्मण की निन्दा का फल मनुस्मृति में बतलाया गया है—
ब्राह्मणायावगूर्येव द्विजातिर्वधकाम्यया ।
शतं वर्षाणि तामिस्रे नरके परिवर्तते ॥
ताडयित्वा तृणेनापि संरम्भान्मतिपूर्वकम् ।
एकविंशतिमाजातीः पापयोनिषु जायते ॥ इत्यादि !
श्लो० १५७-५८—इन लोगों से विवाद नहीं करने पर इन लोगों के
अधीनस्थ लोकों पर विजय मिलती है । इन लोगों के वशीभूत लोकों का
विवरण मनु मे निम्नलिखित प्रकार से पाया जाता हैः—
आचार्यो ब्रह्मलोकेशः प्राजापत्ये पिता प्रभुः ।

टिप्पणी (नोट्स) ६६३
अतिथिस्त्विन्द्रलोकेशो देवलोकस्य चर्त्विजः ॥
जामयोऽप्सरसां लोके वैश्वदेवस्य बान्धवाः ।
सम्बन्धिनो ह्यपां लोके पृथिव्यां मातृमातुलौ ॥
आकाशेशास्तुविज्ञेयाः बालवृद्धकृशातुराः ।
भ्राता ज्येष्ठः समः पित्रा भार्या पुत्रः स्वका तनुः ॥
छाया स्वो दासवर्गश्च दुहिता कृपणं परम् ।
तस्मादेतैरधिक्षिप्तः सहेताऽसञ्ज्वरः सदा ॥
जामयः = विद्यमानभर्तृकाः भगिनीस्नुषाद्याः; बान्धवाः = पितृमातृपक्षाः
जनाः; सम्बन्धिनः = जामातृश्यालकादयः; कृशः = कृशधनः; संभ्रितः = भाभितः
इत्यर्थः ।
श्लो० १५९—मुनि ने परकीय जलाशय आदि में स्नान का प्रतिषेध
किया है—
परकीय-निपानेषु न स्नायाच्च कदाचन ।
निपान-कर्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते ॥
अंशेन = चतुर्थांशेन । इसका प्रायश्चित्त भी व्यासने बतलाया है—
अन्यैः खानिताः कूपाः तड़ागा वाप्य एव च ।
एषु स्नात्वा च पीत्वा च प्राजापत्येन शुध्यति ॥
इसी मे विशेष व्यवस्था बतलाने के लिए याज्ञवल्क्य ने—पञ्च पिण्डान-
नुद्धृत्य न स्नायात् पर वारिणि—कहा है । इसका तात्पर्य यह है कि यदि
स्नानार्थ अकृत्रिम नदी आदि की उपलब्धि नहीं होती हो तो परकीय निपान
में भी पाँच पिण्ड का उद्धरण कर स्नान करना चाहिए । अत एव विष्णु का
वचन है—"पर-निपानेषु न स्नानमाचरेत् आचरेद्वा पञ्च पिण्डानुद्धृत्य
आपदि" इति । सर्वार्थमुत्सृष्टेषु परकीयस्वाभावादनुद्धरणेऽपि न दोषः—ऐसा
हेमाद्रि का मत है । स्नायानन्दी-देव०—अत एव मनु का भी मत है—
नदीषु देवखातेषु तड़ागेषु सरःसु च ।
स्नानं समाचरेन्नित्यं गर्त-प्रस्रवणेषु च ॥
श्लो० १६०—इस विषय में मनु ने पाप का निर्देश किया है—
यानशय्यासनमभ्यस्य कूपोद्यान-गृहाणि च ।
अदत्तान्युपभुञ्जान एनसः स्यात्तुरीयभाक् ॥
अदत्तानीति स्वाम्यभावः अनुमत्यभावश्च विवक्षितः—ऐसा शूलपाणि का
मत है ।

६६४ | याज्ञवल्क्यस्मृतिः
अग्निहीनस्य-श्रौत-स्मार्त्ताग्न्यधिकारहीनस्य शूद्रस्य अविधिनोत्सृष्टा-
न्नेद्विजस्यापि ।
श्लो० १६१-कदर्य्यति-कदर्य की परिभाषा नारद ने इस तरह
की है-
आत्मानं धर्मकृत्यञ्च पुत्रदारांश्च पीडयन् ।
लोभाद्यः प्रचिनोत्यर्थान् स कदर्य इति स्मृतः ॥
बद्धः-निगडबद्धः । अत एव मनु का कथन है-बद्धस्य निगडस्य
च । निगडस्येति तृतीयार्थे षष्ठी-कुल्लूकभट्ट । रङ्गावतारी-नटगायकव्यति-
रिक्तस्य रङ्गावतरणजीविनः-कुल्लूकभट्ट, मेधातिथि ।
वार्धुष्यः-यस्तु निन्देत परं जीवं प्रशंसत्यात्मनो गुणान् ।
स वै वार्धुषिको नामः-विष्णुः
समर्घ पण्यमुद्धृत्य महार्घ यः प्रयच्छति ।
स वै वार्धुषिको नाम यश्च वृद्धया प्रयोजयेत्-यम ।
श्लो० १६२-एषामन्नं न भोक्तव्यम्-इन सबों के अन्न-भक्षण मे दोष
मनुस्मृति मे बतलाया गया है-
य एतेऽन्ये त्वभोज्यान्नाः क्रमशः परिकीर्त्तिताः ।
तेषां त्वगस्थिरोमाणि वदन्त्यन्नं मनीषिणः ॥
तेषां त्वगस्थि-रोम्णां भक्षणेन यः दोषःएव तेषामन्नभक्षणेऽपि-कुल्लूकभट्ट ।
श्लो० १६६-अर्धसीरिणः-कार्षिकाः । ये शब्द सापेक्ष शब्द हैं । अत
एव जो जिसकी कृषि करता हो उसी का अन्न उस व्यक्ति मात्र के लिए भोज्य
है। इसी तरह दास गोपाल आदि के विषय मे भी समझना चाहिए ।
यश्चात्मानं निवेदयेत्-निवेदन का प्रकार मनु ने बतलाया है-
यादृशोऽस्य भवेदात्मा यादृशं च चिकीर्षितम् ।
यथा चोपचरेदेनं तथाऽऽत्मानं निवेदयेत् ॥
श्लो० १७०-सन्धिनी-ऋतुमती वृषमिच्छती गौः । या गर्भिणी सति
दुग्धे सा सन्धिनी-हरदत्त । अनिर्दशा-यह अजा तथा महिषी का भी
उपलक्षण है । अत एव यम का कथन है-
अनिर्दशाहं गोक्षीरमाजं माहिषमेव च ॥
श्लो० १७५-मत्स्यांश्च कामतः-मत्स्य-भक्षण की निन्दा मनुस्मृति में
की गई है :-
यो यस्य मांसमश्नाति स तन्मांसाद उच्यते ।
मत्स्यादः सर्वमांसादः तस्मान्मत्स्यान् विवर्जयेत् ॥

श्लो० १७६—इस श्लोक में कथित लशुन तथा गृञ्जन पलाण्डु के

टिप्पणी (नोट्स) ६६५
मत्स्य के सर्वमांसभक्षक होने के कारण मत्स्यादः सर्वमांसादः कहा
गया है ।
श्लो० १७६—इस श्लोक में कथित लशुन तथा गृञ्जन पलाण्डु के
ही भेद हैं—
लशुनो दीर्घपत्रश्च पिच्छगन्धो महौषधम् ।
तरुण्डश्च पलाण्डुश्च नरलङ्कः पराकिका ।
गृञ्जनो यवनेष्टश्च पलाण्डोर्दश जातयः ॥
श्लो० १७७–भक्ष्याः पञ्चनखाः—यहाँ मनु ने यद्यपि खड्ग का भी
निर्देश किया है तथापि वह श्राद्धविषयक है—ऐसा शूलपाणि का मत है ।
सेधा = स च श्वभक्षको व्याघ्रविशेषः—अपरार्क । गोधा = बल्लीसद्मः
प्राणि-विशेषः—अपरार्क ।
श्लो० २१२—सर्वधर्ममयं ब्रह्म—अतएव मनु का भी मत है—
सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते ।
श्लो० २१५—अयाचिताहृतम्—मनु का भी निर्देश है—
आहृतामभ्युद्यताम् भिक्षाम् पुरस्तादप्रचोदिताम् ।
मेने प्रजापतिर्ग्राह्याम् अपि दुष्कृतकर्मणः ॥
श्लो० २१६—सर्वतः—देव आदि के अर्चन के लिए ही न कि आत्म-
पालन के निमित्त भी । अतएव मनुस्मृति में कहा गया है :—
गुरून् भृत्यांश्चोज्जिहीर्षन् अर्चिष्यन्देवतातिथीन् ।
सर्वतः प्रतिगृह्णीयात् न तु तृप्येत् स्वयं ततः ।
आत्मवृत्त्यर्थमेव च—मनुस्मृति में आत्मवृत्ति के लिए केवल साधुजन के
अन्न का ही प्रतिग्रह विहित माना गया है—
गुरुषु त्वभ्यतीतेषु विना वा तैर्गृहे वसन् ।
आत्मनो वृत्तिमन्विच्छन् गृह्णीयात्साधुतः सदा ॥
श्लो० २१७–१८ = व्यतीपातः—
श्रवणाश्विधनिष्ठऽऽर्द्रानागदैवतमस्तके ।
यद्यमा रविबारेण व्यतीपातः स उच्यते ॥
गजच्छाया—
योगो मघात्रयोदश्यां कुञ्जरच्छायसंज्ञितः ।
भवेन्मघायां संस्थे च शशिन्यर्के करे स्थिते ॥ ( ब्रह्मपुराण )
करे = हस्तनक्षत्र मे । श्राद्धम्—“अथैतन्मनुः श्राद्धं कर्म प्रोवाच प्रजा निः-
श्रेयसार्थं तत्र पितरो देवता ब्राह्मणाश्चाहवनीयार्थे” इस आपस्तम्ब के वचन के

६६६ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
अनुसार पितृगण के उद्देश्य से द्रव्य के उत्सर्ग से ब्राह्मण के द्वारा उस
द्रव्य के स्वीकार तक का कर्म श्राद्ध-पद-वाच्य है । देवश्राद्ध आदि पदों में
श्राद्ध शब्द गौण है—यह कल्पतरु का मत है ।
श्लो० २२१—पञ्चाग्निः—पाँच अग्नियों के नाम ये हैं :—
पवनः पावनश्चैता यस्य पञ्चाग्नयो गृहे ।
सायं प्रातः प्रदीव्यन्ते स विप्रः पंक्ति-पावनः ॥ ( हारीत )
पवनः = आवसथ्याग्निः; पावनः = सभ्याग्निः । त्रेता = आहवनीय
गार्हपत्य तथा दक्षिणाग्नि ।
श्लो० २२२—रोगी = दीर्घरोगी—अपराकं ।
श्लो० २२४—इससे अतिरिक्त निन्द्य पुरुषों का विवरण मनुस्मृति के
तृतीयाध्याय में देखना चाहिए ।
श्लो० २२५—निमन्त्रणम् = अप्रत्याख्येयो नियोगः निमन्त्रणम्—
अपरार्कं । संयतैर्भाव्यम्—इस विषय में मनु का कथन यह है—
निमन्त्रितो द्विजः पित्र्ये नियतात्मा भवेत्सदा ।
न च छन्दांस्यधीयीत यस्य श्राद्धं च तद्भवेत् ॥
निमन्त्रितान्हि पितरः उपतिष्ठन्ति तान्द्विजान् ।
वायुवच्चानुगच्छन्ति तथासीनानुपासते ॥ इत्यादि ।
श्लो० २३६—अभ्यनुज्ञातः—ब्राह्मणों के द्वारा अभ्यनुज्ञात । अतएव
मनु का कथन है—
अग्नौ कुर्यादनुज्ञातो ब्राह्मणो ब्राह्मणैः सह ।
अनुज्ञासामर्थ्याच्च प्रार्थनाऽपि पूर्वं कर्त्तव्या, सा च स्वगृह्यानुसारेण
करवाणि, करिष्ये इत्यादिका । अनुज्ञा अपि ‘ओम्’ इत्येवं रूपा ‘कुरुष्व’
इति वा—( कुल्लूक भट्ट ) ।
यदि अग्नि का अभाव हो ( अग्न्याभावश्च अनुपनीतस्य सम्भवति, उप-
नीतस्य समावृत्तस्य च पाणिग्रहणात्पूर्वम् , मृतभार्यस्य वा ) तो ब्राह्मण के
हाथ में ही समर्पण करना चाहिए—
अग्न्याभावे तु विप्रस्य पाणावेवोपपादयेत् ।
यो ह्यग्निः स द्विजो विप्रैर्मन्त्रदर्शिभिरुच्यते ॥ ( मनु )
तथा कात्यायन का भी कथन है :—
पित्र्ये यः पंक्तिमूर्द्धन्यः तस्य पाणावनग्निकः ।
हुत्वा मन्त्रवदन्येषां तूष्णीं मन्त्रेषुनिः क्षिपेत् ॥

टिप्पणी (नोट्स) ६६७
श्लो० २३९—वाग्यतः—मनु का कथन निम्न-लिखित है—
अण्युष्णं सर्वमन्नं स्यात् भुंजीरंस्ते च वाग्यतः ।
न च द्विजातयो ब्रूयुः दात्रा पृष्टा हविर्गुणान् ॥
दात्रा अन्नादिगुणान् पृष्टा वक्त्राद्यभिनयेनाऽपि न ब्रूयुः, वाग्यतत्वस्य
अत्रैव विधानात्—कुल्लूक भट्ट।
श्लो० २४५—इदं जपेत्—यह पितृ प्रार्थना है। अतएव मनु का
कथन हैः—
दक्षिणां दिशमाकांक्षन् याचेतेमान् वरान् पितॄन् ॥
दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः सन्ततिरेव च ।
श्रद्धा च नो मा व्यगमत् बहुदेयं च नोऽस्त्विति ॥
अतः दातारो नोऽभि० आदि की भूमिका में "ब्राह्मणप्रार्थना”—का
विज्ञानेश्वरकृत निर्देश उचित नहीं प्रतीत होता है ।
श्लो० २५४—स्त्रिया अपि—स्त्री के सपिण्डीकरण के विषय में हारीत
का कथन निम्नलिखित हैः—
स्वेन भर्त्रा सहैवास्याः सपिण्डीकरणं स्त्रियाः ।
एकत्वं सा गता यस्मात् चह्ममन्त्राहूतिम्रतैः ॥
तस्मिन् सति सुताः कुर्युः पितामह्या सहैव तु ।
तस्यां चैव तु जीवन्त्यां तस्याः श्वश्रवेति निर्णयः ॥
तस्याः श्वश्र्वाः = प्रपितामही के साथ ।
श्लो० २५५—वृद्ध्याद्यपकर्षनिमित्तं सपिण्डनं मध्येऽपि कर्त्तव्यम् । कृते
तस्मिन् अभ्युघटश्राद्धं वर्षपर्यन्तं कर्त्तव्यमेव । किन्तु प्रेतपदोल्लेखो न कार्यः—
शूलपाणि ।
श्लो० २५६—प्रतिसम्वत्सरम्—एतच्च निरग्निविषयम्—ऐसा शूल-
पाणि का मत है।
श्लो० २६७—पिण्ड-प्रक्षेप के विषय में मनु का मत निम्नलिखित है—
एवं निर्वपणं कृत्वा पिण्डांस्तांस्तदनन्तरम् ।
गां विप्रमजमग्निं च प्राशयेदप्सु वा क्षिपेत् ॥
पिण्डनिर्वपणं केचित्पुरस्तादेव कुर्वते ।
वयोभिः खादयन्त्यन्ये प्रक्षिपन्त्यनलेऽप्सु वा ॥
पतिव्रता धर्मपत्नी पितृपूजनतत्परा ।
मध्यमन्तु ततः पिण्डमद्यात्सम्यक् सुतार्थिनी ॥
आयुष्यमन्तं सुतं सूते यशोमेधासमन्वितम् ।
धनवन्तं प्रजावन्तं सात्त्विकं धार्मिकं तथा ॥

६६८ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
मध्यमं पिण्डम् = पितामहपिण्डम् । सत्सु विप्रेषु०— मनु का भी
वही मत है—उच्छेषणं तु तत्तिष्ठेद् यावद् विप्राः विसर्जिताः ॥
परन्तु वशिष्ठ ने दिनपर्यन्त रखने को कहा है—
श्राद्धे नोद्वासनीयानि उच्छिष्टान्यादिनक्षयात् ।
द्योतन्ति हि स्वधाहाराः ताः पिवन् सकृतोदकाः ॥
श्लो० २५९—वाराहपद माहिष का भी उपलक्षण है । अत एव मनु
का कथन है:—
दशमासांस्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः ॥
इसी प्रकार शश पद भी कौर्ममांस का उपलक्षक है ।
श्लो० २६०—महाशल्कः = शल्यकः—मेधातिथि । महाशल्कः = मत्स्य-
विशेषाः इति युज्यन्ते, महाशल्कलिन्नो मत्स्याः इति वचनात्—विज्ञानेश्वर-
प्रभृति । मनु ने महाशल्क प्रभृति के मांस को अक्षय तथा वार्ध्रीणस के
मांस को द्वादशवार्षिक तृप्ति का सम्पादक माना है:—
वार्ध्रीणसस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी ॥
कालशाकं महाशल्काः खड्गलोहामिषं मधु ।
आनन्त्यायैव कल्पन्ते मुन्यन्नानि च सर्वशः ॥
श्लो० २६१—तथा वर्षात्रयोदश्याम्—अत्र च प्रोष्ठपद्यपरपक्षे या
त्रयोदशी याश्च मघाः ता एव गृह्यन्ते—अपरार्क । प्रोष्ठपद्याः श्रावणपूर्णिमाथाः
अपरे भाद्रकृष्णे—ऐसा अर्थ करना चाहिए । अत एव शंख का वचन है:—
प्रोष्ठपदामतीतायां मघायुक्तां त्रयोदशीम् ।
प्राप्य श्राद्धं हि कर्त्तव्यं मधुना पायसेन च ॥
श्लो० २६४—शस्त्रेण—यहाँ शस्त्र पद उपलक्षण है । अत एव मरीचि
का कथन है:—
विषसर्पश्वापदाहितिर्यग्ब्राह्मणघातिनाम् ।
चतुर्दश्यां क्रियाः कार्याः अन्येषान्तु विगर्हिताः ॥
श्लो० २६९—वसुरुद्रादितिसुताः—अत एव पैठीनसि का वचन है:—
य एवं विद्वान् पितॄन् यजते वसवो रुद्रा आदित्याश्चास्य प्रीताः भवन्ति ।
श्लो० २७८—सर्वौषधैः—
मुरामांसीवचाकुष्ठं शैलेयं रजनीद्वयम् ।
शुण्ठचम्पकमुस्तं च सर्वौषधिगणः स्मृतः ॥

टिप्पणी ( नोट्स ) ६६६
अथवा—ब्रीहयः शालयो मुद्गाः गोधूमाः सर्षपास्तिलाः ।
यवाश्चोषधयः सप्त विपदो घ्नन्ति धारिताः ॥
श्लो० २९५—गृहयज्ञं समाचरेत्—इस यज्ञ के लिए उत्तरायण आदि
कालनियम अनपेक्षित है । अत एव दक्ष का वचन है :—
नैमित्तिकानि काम्यानि निपतन्ति यथा यथा ।
तथा तथैव कार्याणि न कालस्तु विधीयते ॥
श्लो० ३१८—निबन्धम्—आयस्थाने प्रतिनियतवस्तुदानम्—शूल-
पाणि । अस्मिन् ग्रामे प्रतिक्षेत्रं क्षेत्रस्वामिना एतद्धनमस्मै प्रत्यब्दं प्रतिमासं
वा देयम् इत्यादिनियमः—अपरार्कं ।
श्लो० ३२४—अकूटैः—
न कूटैरायुधैर्हन्यात् युध्यमानो रणे रिपून् ।
न कर्णिभिर्नापि दिग्धैः नाग्निज्वलिततेजनैः ॥
श्लो० ३२७—स्नात्वा—स्नानग्रहणं सकलमाध्याहिकोपलक्षणम्—
ऐसा अपरार्क का मत है ।
श्लो० ३४४—सुरक्षितम्—अत एव मनु का वचन है—
यस्य मन्त्रं न जानन्ति समागम्य पृथग्जनाः ।
स कृत्स्नां पृथिवीम् भुंक्ते कोशहीनोऽपि पार्थिवः ॥
श्लो० ३४९—दैवे पुरुषकारे च—दैव = पूर्वजन्मकृत-कर्म-फल, पुरुष-
कार = ऐहिकपुरुष प्रयत्न । अत एव व्यासने कहा है—
दैवमात्मकृतं विद्यात् कर्म यत्पौर्वदेहिकम् ।
स्मृतः पुरुषकारश्च क्रियते यदिहापरम् ॥
श्लो० ३५०—संयोगे = साहित्ये । अत एव मत्स्यपुराण में कहा
गया है :—
दैवं पुरुषकारश्च कालश्च पुरुषोत्तम ।
त्रयमेतन्मनुष्यस्य पिण्डितं स्यात् फलाय वै ॥
श्लो० ३५२—मित्रलब्धिः—मित्र का लक्षण निम्नलिखित है :—
धर्मज्ञं च कृतज्ञं च तुष्टप्रकृतिमेव च ।
अनुरक्तं स्थिरारम्भं लघु मित्रं प्रशस्यते ॥
श्लो० ३५८—धर्माद्विचलितः—अत एव दक्ष का कथन है :—
पारिव्राज्यं गृहीत्वा तु यः स्वधर्मे न तिष्ठति ।
श्वपादेनाङ्कयित्वा तं राजा शीघ्रं विवासयेत् ॥

उपस्थमुदरं जिह्वा हस्तौ पादौ च पञ्चमम् ।

६७० याज्ञवल्क्यस्मृतिः
श्लो० ३६७—दण्ड-स्थान का निर्देश मनुस्मृति में मिलता है:—
दश स्थानानि दण्डस्य मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ।
त्रिषु वर्णेषु यानि स्युरक्षतो ब्राह्मणो व्रजेत् ॥
उपस्थमुदरं जिह्वा हस्तौ पादौ च पञ्चमम् ।
चक्षुर्नासा च कर्णौ च धनं देहस्तथैव च ॥
श्लो० ३६८— कालम् = दिवारात्रिसन्ध्यात्मकम्—शूलपाणि ।
कालम् = सुभिक्षदुर्भिक्षादियुक्तम्—वीरमित्रोदय ।
कर्म = अग्निहोत्रादि तथा सूनाधिष्ठानादि ॥
यथाचार्यमथाचारे याज्ञवल्क्यनिरूपिते ।
नारायणेन मिश्रेण टिप्पणीयं समापिता ॥

व्यवहाराध्याय
श्लो० १—व्यवहारपदार्थस्वरूपनिरूपण के लिए अपरार्कमे कात्यायन का
वचन है :—
प्रयत्न-साध्ये विच्छिन्ने धर्माख्ये न्याय-विस्तरे ।
साध्य-मूलोऽत्र यो वादः व्यवहारः स उच्यते ॥
न्यायविस्तरे = न्यायप्रपञ्च मे ।
ऋणादानादिनानाविवादपद-विषय-संशयः निराक्रियते अनेनेति नाना
संशयहारी विचारो व्यवहारः यह शूलपाणि का मत है ।
“लोभश्च उत्कोचादिरूपेण परवित्तलिप्सा लोभः। अज्ञान-प्रमादावप्यत्र
वर्जनीयतया द्रष्टव्यौ” ( अपरार्क )
व्यवहार-काल के विषय में पराशर-माधवीय में बृहस्पति का
वचन है :—
दिवसस्याष्टमं भागं मुक्त्वा कालं सुसंविशेत् ।
स कालो व्यवहाराणां शास्त्र-दृष्टः परः स्मृतः ॥
अपरार्क में उद्धृत कात्यायन का मत है :—
आद्यादह्नोऽष्टभागाद्यत् ऊर्ध्वम्भागत्रयं भवेत् ।
स कालो व्यवहारस्य शास्त्रे दृष्टो मनीषिभिः ॥
व्यवहार-दर्शन की विधि मनु में कही गई है :—
तत्रासीनः स्थितो वापि पाणिमुद्यम्य दक्षिणम् ।
विनीत-वेषाभरणः पश्येत् कार्याणि कार्यिणाम् ॥
श्लो० २—सभासदाश्च बहु-शास्त्रज्ञाः ब्राह्मणाः तदलाभे क्षत्रियाः तदलाभे
तादृशा एव वैश्याः शूद्रंस्तु न कथमपीति कात्यायनमनुप्रामाण्यात्—(अपरार्क)
लो० ३—कार्यवशात् = व्यवहारदर्शनादधिकगुरुतरकार्यवशात् रोगादि-
वशाद्वा—( अपरार्क )
श्लो० ४—स्मृत्यपेतादीत्यत्रादिपदात् व्यवहारापेतस्य ग्रहणम्—शूलपाणि
एतच्च दण्डविधानं धन-विषय-विवादे, वादान्तरे तु पारुष्यादिविषये
दण्डान्तरं वेदितव्यम्” ( अपरार्क )
श्लो० ६—जात्यादि—यहाँ आदि पद से कात्यायनोक्त द्रव्यसंख्या आदि
परिग्राह्य हैं।

६७२ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
अपरार्क में कात्यायन के वचन ये हैं :—
साध्यं प्रमाणं द्रव्यं च संख्या नाम तथात्मनः ।
राज्ञां च क्रमशॊ नाम निवासं साध्यनाम च ॥
क्ष्माऽऽपितॄणां नामानि पीडामाहर्तृणदायकौ ।
क्षमालिङ्गानि चान्यानि पक्षे संकीर्त्य कल्पयेत् ॥
देशादि के अनुल्लेख होने पर पक्ष-स्वीकार नहीं होता है । अत एव जी-
मूत-वाहनकृत व्यवहार-मातृका बृहस्पति का वचन है :—
देश-काल-विहीनश्च द्रव्य-संख्या-विवर्जितः ।
साध्य-प्रमाण-हीनश्च पक्षोऽनादेय इष्यते ॥
( अनादेयः = अग्राह्यः राज्ञा इत्यर्थः ) ॥
श्लो० ७–( पूर्वार्ध ) उत्तर-लेख से पूर्वकालिक कृत्य के विषय में
पराशर-माधवीय में बृहस्पति का वचन है :—
विनिश्चिते पूर्वपक्षे ग्राह्याग्राह्य-विशेषिते ।
प्रतिज्ञाते स्थिरीभूते लेखयेदुत्तरन्ततः ॥
उत्तरदान में अवधि का परिमाण स्मृति-कल्पतरु में बृहस्पति ने
बतलाया है :—
शालीनत्वाद्भयात्तद्वत् प्रत्यर्थी स्मृति-विभ्रमात् ।
कालम्प्रार्थयते यत्र तत्रेमं लब्धुमर्हति ॥
एकाहन्द्र्यहपञ्चाहसप्ताहं पक्षमेव वा ।
मासं ऋतुत्रयं वर्षं लभते शक्त्यपेक्षया ॥
कात्यायनीय मे तो कुछ विशेष बतलाया गया है :—
सद्यो वैकाह-पञ्चाहौ त्र्यहं वा गुरुलाघवात् ।
लभेतासौ त्रिपक्षम्वा सप्ताहम्ववा ऋणादिषु ॥
कालं शक्तिं विदित्वा तु कार्याणां च बलाबलाम्
अल्पं वा बहु वा कालं दद्यात्प्रत्यर्थिने प्रभुः ॥
उभयोर्लिखिते वाक्ये प्रारब्धे कार्यनिर्णये ।
अनुक्तं तन्न यो ब्रूयात् तस्मादर्थात्स हीयते ॥
श्लो० ७–( उत्तरार्ध ) सद्य इति । यहाँ कात्यायन का निम्न-लिखित
वचन द्रष्टव्य है :—
सद्यः कृतेषु कार्येषु सद्य एव विधीयते ।
कालातीतेषु वा कालं दद्यात्प्रत्यर्थिने प्रभुः ॥

टिप्पणी ( नोट्स ) ६७३
श्लो० १०—कलहो वाक्पारुष्यम् , साहसो दण्डपारुष्यम्—( अपरार्कः )
श्लो० ११—प्रत्यर्थी के द्वारा निह्नव करने पर अर्थी के कृत्य के विषय में
मनु का कथन है :—
अपह्नवेऽधमर्णस्य देहीत्युक्तस्य संसदि ।
अभियोक्ता विशेद् देश्यं करणं वान्यदुद्दिशेत् ॥
( देश्यम् = धनप्रयोगदेशवर्त्तिसाक्षिणम् , अन्यद्वा करणं पत्रादि इति ।
एवं निह्नवे प्रत्यर्थिना कृते यदि साक्ष्यादि-प्रमाणेन अर्थी प्रत्यर्थिनोऽपराधं
भावयति तदा प्रत्यर्थी भावित इत्युच्यते, स च अर्थिना अभियुक्तं धनं दत्त्वा
राज्ञे च स्वापह्नव-भाषणजन्य-दोषप्रयुक्तदण्डरूपेण तत्समन्धनन्दापयेदिति
तात्पर्यम् ।)
श्लो० १२—सहसा हठेन जनसमक्षं यत्परहिंसादि क्रियते तत्साहसम्—
( अपरार्कः )
श्लो० १३-१५—अत एव मनु ने भी कहा है :—
बाह्यैः विभावयेल्लिङ्गैः भावमन्तर्गतं नृणाम् ।
स्वर-वर्णैङ्गिताकारैश्चक्षुषा चेष्टितेन च ॥
आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च ।
नेत्र-वक्त्र-विकारैश्च गृह्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ (८।२५-२६ )
श्लो० १३-१५—आकृति से मनोभाव का अभिव्यञ्जन रामायण में भी
बतलाया गया है :—
आकारश्छाद्यमानोऽपि निग्रहीतुं न शक्यते ।
बलाद्धि विवृणोत्येव भावमन्तर्गतं नृणाम् ॥
श्लो० १६—नारद ने पाँच प्रकार के हीन का निर्देश किया है :—
अन्यवादी क्रियाद्वेषी नोपस्थायी निरुत्तरः ।
आहूतप्रपलायी च हीनः पञ्चविधः स्मृतः ॥
श्लो० १८—सपणः—जितेन मया एतावद्देयम् इत्यभ्युपेतं धनं पणः
( अपरार्कः )
श्लो० २०—एतत्तु वचनमपह्नववादिनः सावष्टम्भे प्रतिवचने द्रष्टव्यम् ।
यथा—एतेषामर्थानां मध्ये यद्येकमप्यर्थमर्थी साधयति तदा सर्वानेतानहं ददा-
मीति । कुत एतत् ? छलोदाहरणपरत्वादस्य वाक्यस्य । अन्यथा—
अनेकार्थाभियोगेऽपि यावत्संसाधयेद्धनी ।
साक्षिभिस्तावदेवासौ लभते साधितं धनम् ॥

१०४ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
इति कात्यायनवचनविरोधः स्यात् (अपरार्कः)
श्लो० २१-प्रमाणान्तरदृष्टार्थविषया स्मृतिः अर्थशास्त्रम् ।
वेदैकसमधिगम्यार्थविषया तु धर्मशास्त्रम् ॥ (अपरार्कः)
दोनों के विरोध होने पर धर्मशास्त्र प्रबल माना जाता है—
यत्र विप्रतिपत्तिः स्याद् धर्मशास्त्रार्थशास्त्रयोः ।
अर्थशास्त्रोक्तमुत्सृज्य धर्मशास्त्रोक्तमाचरेत् ॥
श्लो० २४-धनस्य दशवार्षिकी-यहाँ विशेष द्रष्टव्य है :-
सम्प्रीत्या भुज्यमानानि न नश्यन्ति कदाचन ।
धेनुरुष्ट्रो वहन्नश्वो यश्च दम्यः प्रयुज्यते ॥ (मनुस्मृतिः)
श्लो० २५-इनसे अतिरिक्त पदार्थों का भी निर्देश बृहस्पति ने
किया है :-
विवाह्य श्रोत्रियैर्भुक्तं राजामात्यैस्तथैव च ।
सुदीर्घेणापि कालेन तेषां सिध्यति तत्त न ॥
असक्तालसरोगार्त्तबालभीतप्रवासिनाम् ।
शासनाढेन्येन भुक्तं भुक्त्वा न हीयते ॥
शासनाढम् = ताम्रपट्टादिलिखितम् ।
श्लो० २७-पूर्वक्रमागतम् = पूर्व शब्द का अर्थ है-पिता, पितामह
तथा प्रपितामह । इससे स्पष्ट है कि पूर्वक्रमागत भोग आगम से बलवत्तर
होता है । अत एव बृहस्पति का कथन है :-
अनुमानाद् गुरुः साक्षी साक्षिभ्यो लिखितं गुरु ।
अव्याहता त्रिपुरुषी भुक्तिरेभ्यो गरीयसी ॥
त्रिपुरुषी भुक्ति का अर्थ व्यास ने निम्नोक्त प्रकार से किया है :-
प्रपितामहेन यद्भुक्तं तत्पुत्रेण विना च तम् ।
तौ विना तस्य पित्रा च तस्य भोगस्त्रिपौरुषः ॥
तीनों पूर्वजों के जीवित रहने पर किया गया भोग त्रिपुरुषभोग नहीं
होता है । अत एव बृहस्पति का भी मत है :-
पिता पितामहो यस्य जीवेच्च प्रपितामहः ।
त्रयाणां जीवतां भोगो विज्ञेयस्त्वेकपौरुषः ॥
श्लो० ३४-विद्वानशेषमादद्यात्-परन्तु ब्राह्मण भी निधि को प्राप्त कर
पहले राजा को निवेदित करे, पश्चात् राजा की अनुमति पाकर उसका
उपभोग करे । अत एव नारद का कथन है :-