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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 730, कुल 782 में से

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पृष्ठ 730

१०४ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
इति कात्यायनवचनविरोधः स्यात् (अपरार्कः)
श्लो० २१-प्रमाणान्तरदृष्टार्थविषया स्मृतिः अर्थशास्त्रम् ।
वेदैकसमधिगम्यार्थविषया तु धर्मशास्त्रम् ॥ (अपरार्कः)
दोनों के विरोध होने पर धर्मशास्त्र प्रबल माना जाता है—
यत्र विप्रतिपत्तिः स्याद् धर्मशास्त्रार्थशास्त्रयोः ।
अर्थशास्त्रोक्तमुत्सृज्य धर्मशास्त्रोक्तमाचरेत् ॥
श्लो० २४-धनस्य दशवार्षिकी-यहाँ विशेष द्रष्टव्य है :-
सम्प्रीत्या भुज्यमानानि न नश्यन्ति कदाचन ।
धेनुरुष्ट्रो वहन्नश्वो यश्च दम्यः प्रयुज्यते ॥ (मनुस्मृतिः)
श्लो० २५-इनसे अतिरिक्त पदार्थों का भी निर्देश बृहस्पति ने
किया है :-
विवाह्य श्रोत्रियैर्भुक्तं राजामात्यैस्तथैव च ।
सुदीर्घेणापि कालेन तेषां सिध्यति तत्त न ॥
असक्तालसरोगार्त्तबालभीतप्रवासिनाम् ।
शासनाढेन्येन भुक्तं भुक्त्वा न हीयते ॥
शासनाढम् = ताम्रपट्टादिलिखितम् ।
श्लो० २७-पूर्वक्रमागतम् = पूर्व शब्द का अर्थ है-पिता, पितामह
तथा प्रपितामह । इससे स्पष्ट है कि पूर्वक्रमागत भोग आगम से बलवत्तर
होता है । अत एव बृहस्पति का कथन है :-
अनुमानाद् गुरुः साक्षी साक्षिभ्यो लिखितं गुरु ।
अव्याहता त्रिपुरुषी भुक्तिरेभ्यो गरीयसी ॥
त्रिपुरुषी भुक्ति का अर्थ व्यास ने निम्नोक्त प्रकार से किया है :-
प्रपितामहेन यद्भुक्तं तत्पुत्रेण विना च तम् ।
तौ विना तस्य पित्रा च तस्य भोगस्त्रिपौरुषः ॥
तीनों पूर्वजों के जीवित रहने पर किया गया भोग त्रिपुरुषभोग नहीं
होता है । अत एव बृहस्पति का भी मत है :-
पिता पितामहो यस्य जीवेच्च प्रपितामहः ।
त्रयाणां जीवतां भोगो विज्ञेयस्त्वेकपौरुषः ॥
श्लो० ३४-विद्वानशेषमादद्यात्-परन्तु ब्राह्मण भी निधि को प्राप्त कर
पहले राजा को निवेदित करे, पश्चात् राजा की अनुमति पाकर उसका
उपभोग करे । अत एव नारद का कथन है :-