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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

श्लोक में किया गया है—

( ४ )
मनु ने शूद्र के धर्म का विवरण इस प्रकार किया है—
एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् ।
एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया ॥ (मनु० १।९१ )
वर्णसङ्कर के धर्म का संक्षिप्त रूप में सङ्कलन श्रीमद्भागवत के निम्नलिखित
श्लोक में किया गया है—
वृत्तिः सङ्करजातीनां तत्तत्कुल-कृता भवेत् ।
अ-चौराणामपापानामन्त्यजान्त्यावसायिनाम् ॥
(श्रीमद्भागवत ७।११।१७)
याज्ञवल्क्य-स्मृति में वर्ण-धर्म का निरूपण इस प्रकार किया गया है—
इज्याऽध्ययनदानानि वैश्यस्य क्षत्रियस्य च ।
प्रतिग्रहोऽधिको विप्रे याजनाध्यापने तथा ॥
प्रधानं क्षत्रिये कर्म प्रजानाम्परिपालनम् ।
कुसीद-कृषि-वाणिज्य-पाशुपाल्यं विशः स्मृतम् ॥
शूद्रस्य द्विज-शुश्रूषा तयाऽजीवन् वणिग्भवेत् ।
शिल्पैर्वा विविधैर्जीवेद्द्विजाति-हितमाचरन् ॥
(याज्ञ० स्मृ० १।११८-२०)
(२) आश्रम-धर्म का सम्बन्ध सभी आश्रमों से है। द्विजाति की जीवनावधि
को चार भागों में विभक्त किया जाता है। इन आश्रमों के यथाक्रम नाम हैं—ब्रह्म-
चर्य, गार्हस्थ्य, वान-प्रस्थ, संन्यास ।
ब्रह्मचर्याश्रम में वेदाध्ययनादि धर्म माने गये हैं। ब्रह्मचर्याश्रम की अवधि का
निरूपण मनु ने निम्न-लिखित पद्य में किया है—
षट्त्रिंशदाब्दिकं चर्यं गुरौ त्रैवेदिकं व्रतम् ।
तदार्धिकम्पादिकं वा ग्रहणान्तिकमेव वा ॥ (मनु० ३।१)
तीन वेद के अध्ययन के लिए ३६ वर्ष अर्थात् प्रतिवेद के अध्ययन के लिए
बारह-बारह वर्षों की अवधि अपेक्षित होती है। अथवा १८ वर्षों तक (प्रतिवेद
के अध्ययन के लिए छः-छः वर्षों की अवधि ), किं वा नौ वर्षों ( १ वेद के लिए तीन
वर्ष) तक अथवा वेदाध्ययनसमाप्ति-पर्यन्त ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करना चाहिए ।
याज्ञवल्क्य ने कुछ विशेष बतलाया है—
प्रतिवेदम्रह्मचर्यं द्वादशाब्दानि पञ्च वा ।
ग्रहणान्तिकमित्येके ................॥ (या० स्मृ० १।३६ )
ब्रह्म-चर्याश्रम के समापन के अनन्तर द्विजाति के कृत्य का वर्णन याज्ञवल्क्य
में निम्नलिखित रूप में पाया जाता है—
गुरवे तु वरन्दत्त्वा स्नायाद्वा तदनुज्ञया ।
वेदं व्रतानि वा पारं नीत्वा ह्युभयमेव वा ॥
अविप्लुत-ब्रह्म-चर्यो लक्षण्यां स्त्रियमुद्वहेत् ॥
(या० स्मृ० १।५१-५२ क ख )

( ५ )
इसी द्वितीय आश्रम को गृहस्थाश्रम कहा जाता है। इसे गृहस्थाश्रम कहने का
कारण मनु के व्याख्याकार कुल्लूकभट्ट ने बतलाया है—
“कृतदारपरिग्रहो गृहस्थः, गृहशब्दस्य दारवचनत्वात्” (मन्वर्थमुक्तावली-३।२)
इस आश्रम का मुख्य धर्म है—पञ्च-महायज्ञ¹। इस प्रसङ्ग में मनु का निम्न-
लिखित पद्य स्मरणीय है –
वैवाहिकेऽग्नौ कुर्वीत गृह्यं कर्म यथा-विधि ।
पञ्च-यज्ञ-विधानञ्च पक्तिं चान्वाहिकीं गृही ॥ ( मनु० ३।६७ )
पञ्च-महा-यज्ञ तथा अन्यान्य गृहस्थ-धर्म के विषय में मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य-
स्मृति आदि का अवलोकन करना चाहिए।
गृहस्थ तथा गार्हस्थ्य का महत्त्व सभी आश्रमियों तथा आश्रमों से अधिक है,
जैसा मनु ने कहा है—
यथा वायुं समाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्व-जन्तवः ।
तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्व आश्रमाः ॥
यस्मात्त्रयोऽप्याश्रमिणो ज्ञानेनान्नेन चान्वहम् ।
गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही ॥
( मनु० ३।७७-७८ ) इत्यादि ।
इस आश्रम की अवधि ²आत्म-वार्धक्य-सम्प्राप्ति तथा पौत्रोत्पत्ति आदि मानी
जाती है। यद्यपि साधारणतः यह प्रतीत होता है कि पूरी जीवनावधि को समान-
समान चार भागों में विभक्त कर प्रथम-भाग को ब्रह्मचर्य में तथा द्वितीय-भाग को
गार्हस्थ्य में पर्यवसन्न करना³ चाहिए, तथापि आयु की अवधि के दुर्ज्ञेय होने के
कारण ब्रह्मचर्य की पूर्व-प्रतिपादित षट्त्रिंशद् वर्ष आदि एवं गृहस्थाश्रम की आत्म-
वार्धक्य आदि अवधि ही शास्त्र-सिद्ध होती है। अत एव कुल्लूकभट्ट का भी
कथन है—
“आद्यमित्युक्तम्ब्रह्म-चर्य-कालोपलक्षणार्थम् , अनियत-परिमाणत्वादायुषः चतुर्थ-
भागस्य दुर्ज्ञानत्वात् । ...........'गृहस्थस्तु यदा पश्येत् ( मनु० ६।२ ) इत्य-
नियतत्वात् द्वितीयमायुषो भागमित्यपि गार्हस्थ्य-कालमेव ॥”
( मन्वर्थ-मुक्तावली-४।१ )
इस प्रसङ्ग में एक बात पर ध्यान देना चाहिए कि कुल्लूक-भट्ट आदि ने मनु के
श्लोक ( ६।२ ) में 'अपत्यस्यैव चापत्यम्' पाठ मान कर आत्म-वार्धक्य तथा पौत्रो-
१. गृहस्थधर्मत्वेऽपि पञ्चयज्ञानामप्रकृष्ट-धर्म-ख्यापनार्थम्पृथङ्निर्देशः ।
—मन्वर्थ-मुक्तावली ५।१६९
२. गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वली-पलितमात्मनः ।
अपत्यस्यैव चापत्यं तदाऽरण्यं समाश्रयेत् ॥ —मनु. ६।२
३. चतुर्थमायुषो भागमुषित्वाऽऽद्यं गुरौ द्विजः ।
द्वितीयमायुषो भागं कृत-दारो गृहे वसेत् ॥ —मनु. ४।१

( ६ )
त्पत्ति में समुच्चय सा प्रस्तुत किया है परन्तु यह उचित नहीं, क्योंकि पौत्रोत्पत्ति
अनिश्चित है, अतः विकल्प ही मानना चाहिए। मनु के 'अपत्यस्यैव चापत्यम्'
में च के स्थान में 'वा' पढ़ना चाहिए, यही मत मिताक्षराकार का भी है—
“अयं च वन-प्रवेशो जराजर्जर कलेवरस्य जात-पौत्रस्य वा।
यथाऽऽह मनुः ( ६।२ )—
गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वली-पलितमात्मनः।
अपत्यस्यैव वाऽपत्यं तदाऽरण्यं समाश्रयेत् ॥”
( मिताक्षरा-३।४५ )
गृहस्थाश्रम के अनन्तर की अवस्था का नाम १वान-प्रस्थ है। वन-प्रवेश
करने का प्रकार निम्नलिखित मनु तथा याज्ञवल्क्य के एकवाक्यत्व से स्पष्ट हो
जाता है—
सन्त्यज्य ग्राम्यमाहारं सर्वं चैव परिच्छदम् ॥
( मनु० ६।३ क ख )
सुत-विन्यस्त-पत्नीकस्तया वानुगतो वनम् ।
वान-प्रस्थो २ब्रह्मचारी साग्निः सोपासनो व्रजेत् ॥
( या० स्मृति० ३।४५ )
इस आश्रम के धर्म मिताक्षरा ( ३।४५ ) में उद्धृत वसिष्ठ-स्मृति में इस
प्रकार वर्णित किए गये हैं—
“वानप्रस्थो जटिलः चीराजिन-वासा न फाल-कृष्टमधितिष्ठेत् (कृष्ट-क्षेत्रस्योपरि
न निवसेत्—मिताक्षरा ); अकृष्टं मूल-फलं सञ्चिन्वीत, ऊर्ध्व-रेताः दमाशयो दद्यादेव
न प्रतिगृह्णीयात् ऊर्ध्वं पञ्चभ्यो मासेभ्यः श्रावाणकेन (वैदिकेन मार्गेण न लौकिके-
नेत्यर्थः-मिताक्षरा ) अग्निमाधाय आहिताग्निः वृक्ष-मूलको दद्यात् देव-पितृ-
मनुष्येभ्यः स गच्छेत् स्वर्गमानन्त्यम् ।”
इस आश्रम के धर्म का विशद वर्णन तो मनुस्मृति आदि में देखना चाहिए।
वान-प्रस्थ आश्रम की अवधि राग-क्षय है। इस विषय में मनु का कथन
निम्न-निर्दिष्ट है—
वनेषु च विहृत्यैवं तृतीयं भागमायुषः ॥ ( मनु० ६।३३ )
इसकी व्याख्या में कुल्लूक-भट्ट ने स्पष्ट किया है—“अनियतपरिमाणत्वा-
दायुषस्तृतीयभागस्य दुर्विज्ञानात् तृतीयमायुषो भागमिति रागक्षयावधि
वान-प्रस्थकालोपलक्षणार्थम् । अत एव शङ्खलिखितौ—वन-वासादूर्ध्वं
शान्तस्य परिगतवयसः पारिव्राज्यम्—इत्याचख्यतुः ।” अतएव विज्ञानेश्वर ने
भी कहा है :—“यावता कालेन तीव्र-तपः-शोषित-वपुषो विषय-कषाय-परिपाको
१. वने प्रकर्षेण नियमेन च तिष्ठति चरति इति वन-प्रस्थः, वन-प्रस्थ एव वान-प्रस्थः ।
संज्ञायां दैर्घ्यम्-मिताक्षरा ३।४५
२. ब्रह्म-चारी = ऊर्ध्वरेताः, साग्निः = वैतानाग्नि-सहितः । —मिताक्षरा

( ७ )
भवति पुनश्च मदोद्भवाऽऽशङ्का नोद्भाव्यते तावत्कालं वन-वासं कृत्वा······"
( मिताक्षरा ३।५६-५७ )
इस तृतीय आश्रम के अनन्तर काल में—
‘चतुर्थमायुषो भागं त्यक्त्वा सङ्गान्परिव्रजेत् ।’
मनु० ६।३३
इस परिव्राजकाश्रम में केवल ब्राह्मण का अधिकार है। दूसरे मत के अनुसार
सभी द्विजातियों का अधिकार माना जाता है (मिताक्षरा ३।५६-५७)। प्रव्रजन
के बिना मोक्ष के अभाव को मानने वाले मिताक्षराकार (३।५५) द्वितीय मत
को ही अच्छा समझते हैं—ऐसा प्रतीत होता है।
इस आश्रम के धर्मों का दिग्दर्शन याज्ञवल्क्य के अधोलिखित पद्य में
होता है—
सर्व-भूत-हितः शान्तस्त्रिदण्डी सकमण्डलुः ।
एकारामः परिव्रज्य भिक्षार्थी ग्राममाश्रयेत् ॥ या० स्मृ० ३।५८
इस आश्रम-धर्म का सम्बन्ध केवल द्विजातियों से है। साथ ही सभी
आश्रमों में व्युत्क्रम नहीं होता है; हाँ, उल्लङ्घन हो सकता¹ है। इस विषय में
भागवत के विशिष्ट विचार का अवलोकन डा० सिद्धेश्वर भट्टाचार्यकृत ‘The
Philosophy of the श्रीमद्भागवत’ (पृ० ३४) में करना चाहिए। श्रीमद्भाग-
वत के विचार का मूल तो मनुस्मृति में ही है, जिसका अन्वेषण मनीषियों के
लिए असाध्य नहीं है।
(३) वर्णाश्रम-धर्म का अर्थ है वर्ण-विशेष के आश्रम-विशेष से सम्बद्ध धर्म।
उदाहरणार्थ—
ब्राह्मणो बैल्व-पालाशौ क्षत्रियो वाट-खादिरौ ।
पैलवौदुम्बरौ वैश्यो दण्डानर्हन्ति धर्मतः ॥ ( मनु० २।४५ )
आदि को लिया जा सकता है।
(४) गुण-धर्म का अर्थ विज्ञानेश्वर के शब्दों में इस प्रकार किया गया है—
“शास्त्रीयाभिषेकादिगुण-युक्तस्य राज्ञः प्रजा-परिपालनादिः” ( मिताक्षरा १।१ )
(५) निमित्त-धर्म का अर्थ प्रायश्चित्त होता है।
(६) साधारण-धर्म का वर्णन मनु ने इस प्रकार किया है—
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय-निग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म-लक्षणम् ॥ ( मनु० ६।९२ )


१. ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत् , गृही भूत्वा वनी भवेत् , वनी भूत्वा प्रव्रजेत, यदि
वेतरथा ब्रह्म-चर्यादेव प्रव्रजेत् गृहाद्वा वनाद्वा । जाबाल उपनिषत्-४;
और भी देखिए—मन्वर्थ-मुक्तावली ६।३८; तथा मिताक्षरा ३।५६-५७ ।