याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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श्लो० ७१—इस प्रसंग में बृहस्पति का वचन अवधेय है—
रोमोद्गवे शशी भुङ्क्ते गन्धर्वः कुचदर्शने ।
अनलस्तु रजोयोगे स्त्रियो भुङ्क्ते तु नान्यथा ॥
श्लो० ७३—यहाँ द्वितीय विवाह की अवधि का निरूपण मनु ने इस
प्रकार किया है—
बन्ध्याऽष्टमेऽधिवेद्याब्दे दशमे तु मृत-प्रजा ।
एकादशे स्त्रीजननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी ॥
अप्रियवादिनी के साथ अपुत्रा का अध्याहार करना आवश्यक है ।
श्लो० ७९—युग्मासु संविशेत्—युग्मरात्रिगमन से पुत्र होता है—ऐसा
मनु का कथन है :—
युग्मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु ।
तस्माद् युग्मासु पुत्रार्थी संविशेदार्त्तवे स्त्रियम् ॥
आद्याश्चतस्रस्तु वर्जयेत्—यद्यपि शंख ने पति के लिए चतुर्थ दिन में ही
पत्नी की शुद्धि मानी है—
शुद्धा भर्तुश्चतुर्थेऽह्नि अशुद्धा दैवपित्र्ययोः ।
तथापि यह शुद्धि सेवा के लिए न कि सम्भोग के लिए भी । अतएव मनु
का भी कथन है—
“तासामाद्याश्चतस्रस्तु निन्दिताः” ।
श्लो० ८९—यह नियम सवर्णा स्त्री के विषय में है । अत एव मनु का
कथन है—
एवं वृत्तां सवर्णां स्त्रीं द्विजातिः पूर्वमारिणीम् ।
दाहयेदग्निहोत्रेण यज्ञपात्रैश्च धर्मवित् ।
अत एव निम्नलिखित वचन को असवर्णा स्त्री के विषय में समझना
चाहिए—
यो दहेदग्निहोत्रेण स्वेन भार्यां कथञ्चन ।
स स्त्री सम्पद्यते तेन भार्या चास्य पुमान् भवेत् ॥
श्लो० ९१—पारशवोऽपि वा—पारशव की व्युत्पत्ति मनु ने निम्न निर्दिष्ट
पद्य में की है—
यं ब्राह्मणस्तु शूद्रायां कामादुत्पादयेत् सुतम् ।
स पारयन्नेव शवस्तस्मात् पारशवः स्मृतः ॥