विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
राजा अज और रानी इन्दुमती का दाम्पत्य प्रेम
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दांपत्य प्रेम की अद्भुत कथा २५
कथमेकपदे निरागसं,
जनमाभाष्यमिमं न मन्यसे॥
राजा अज पागल की समान उस मरी हुई अपनी प्राण
प्यारी से कहने लगा—मेरे बहुत अपराध करने पर भी जब तूने
मेरा तिरस्कार नहीं किया फिर अब एकाएकी अपराध रहित
अर्थात् बिना अपराध किये ही इस जन (मुझ) को बोलने के
योग्य क्यों नहीं समझती कि मुझसे बोले। इस प्रकार राजा
अज अपनी प्राण प्यारी स्त्री के वियोग में नाना प्रकार से विलाप
करते हुए कहता है:—
ध्रुवमस्मि शठः शुचिस्मिते,
विदितः कैतववत्सलस्तव ।
परलोकमसंनिवृत्तये,
यदनापृच्छ्य गतासि मामितः ॥
हे उज्ज्वल हसने वाली ! तूने निश्चय ही मुझे कपट से प्यार
करने वाला शठ जाना इसी कारण मुझसे बिना पूछे ही तू
फिर न आने के लिये मुझे छोड़कर परलोक को चली गई।
दयितां यदि तावदन्वगा-
द्विनिवृत्तं किमिदं तया विना ।
३६ भूमिका
सहतां हतजीवितं मम,
प्रबलामात्मकृतेन वेदनाम् ॥
यह मेरा नष्ट जीवन यदि प्यारी के पीछे चला गया था तो
फिर किस निमित्त लौट आया अब अपने कर्मों का प्रबल दुःख सहे।
इन्दुमती के मरते ही राजा अज भी मूर्छित हो गया था
परन्तु सेवकों ने पंखा आदि उपायो से उसे सचेत किया इसी
लिये वह कह रहा है कि मैं तो प्यारी के साथ ही चला गया
था फिर क्यों लौट आया ।
मनसापि न विप्रियं मया,
कृतपूर्वं तव किं जहासि माम् ।
ननु शब्दपतिः क्षितेरहं,
त्वयि मे भावनिबन्धना रतिः ॥
राजा अज फिर कहता है—मैंने पहिले कभी मन से भी तेरा
अप्रिय कार्य नहीं किया फिर तू मुझे क्यो त्यागती है, पृथ्वीपति
तो मै नाममात्र से हूँ मनकी प्रीति तो तुझ मे ही है ।
हे प्राण प्यारी ! फूलो से गुथी टेढी काली अलको को कंपा-
कर वायु मेरे मनको तेरे लौट आने को आशावान बनाती है ।
हे प्राणेश्वरी ! मेरी बात सुन, रात्रि चन्द्रमा को फिर भी
मिलती है, चकवे को चकवी फिर मिलती है इस कारण वह दोनो
दाम्पत्य प्रेम की अद्भुत कथा २७
वियोग का दुख सहने में समर्थ हैं, सदा के निमित्त गई तू मुझे
क्यों न भस्म करेगी । मैं यह दुख किस प्रकार सहूं ।
हे हृदयेश्वरी ! बोलती क्यों नहीं, इतनी अधिक मुझसे क्यो
रूठगई है। तुझे दया नहीं आती, मैं कवसे तुझे बुला रहा हूँ तेरा
कोमल शरीर फूलों की शैया पर भी दुखता था । अव बता वह
चिता का चढ़ना कैसे सहेगा ?
हे प्रिये ! तूने आमको और प्रयगुलता को जोड़ माना
था । उन दोनों के विवाह मगल को विना किये तेरा जाना
उचित नहीं है ।
तेरा प्रफुल्लित किया अशोक जिस पुष्प को उत्पन्न करेगा
उस तेरे अलकों के भूषणरूप को मैं तेरी दाह की अजली मे
कैसे लगाऊंगा ?
ये सखी जन सब दुःख सुख की साथी हैं। द्वितीया के
चन्द्रमा की समान तेरा पुत्र है, एक तेरा ही प्रेमी मै हूँ फिर
भी तू मुझ पर दया नही करती, तेरा यह कर्त्तव्य कठोर है।
आज मेरा धीरज नष्ट हुआ, रतिक्रीड़ा मिट गई, गाना गया,
ऋतुए उत्सवहीन हुई , गहनो का प्रयोजन समाप्त हुआ. शय्या
सूनी हुई ।
तू मेरी भार्या, बुद्धि देने मे अर्थात् सलाह् देने मे सहायक,
एकान्त की सखी, गान आदि विद्याओ की अच्छी प्यारी शिष्या
थी । तुझे कठोर मृत्यु ने हर कर बता मेरा क्या नही विगाडा
अर्थात् सब कुछ हर लिया ।
सब प्रकार का ऐश्वर्य (सुख) होने पर भी तेरे बिना अज
का सुख यहीं पर आज समाप्त हो गया क्योंकि मेरे सब सुख
तेरे ही साथ थे ।
इस प्रकार शोक मे ग्रसित कोशलपति अज ने प्यारी स्त्री के
निमित्त शोक करके वृक्षो की शाखाओं को उनसे चूते हुए रस
के आंसुओ से रुदन कराया अर्थात् अज के विलाप को सुनकर
वृक्षो की शाखाओ से भी आसू टपकने लगे ।
वड़ी कठिनाई से, अनेक उपायों से राजा अज ने गोद से
इन्दुमती को छुडाया और उसी माला से उसका श्रृंगार कर
अगर चन्दन आदि की चिता बनाकर उसकी मृतक्रिया की ।
राजा अज को अपनी पत्नी इन्दुमती इतनी प्यारी थी कि
वह उसके साथ ही मरने को तैय्यार था परन्तु यह विचार कर
कि ससार कहेगा राजा अज विद्वान होकर भी स्त्री के पीछे मर-
गया इस कलक के भय से उसने अपने शरीर को अग्नि में न
जलाया, कुछ जीने की इच्छा या प्राणो के मोह से नही ।
राजा अज को इस प्रकार स्त्री के प्रेम में व्याकुल सुनकर
महर्षि वशिष्ठ जी ने अपने शिष्य को राजा अज को समझाने के
लिये भेजा क्योंकि वशिष्ठ जी यज्ञ कर रहे थे इसलिये स्वयं न
जासके । वशिष्ठ जी के शिष्य ने आकर राजा अज को बहुत
समझाया परन्तु उसके शोक को दूर न कर सका । बहुत समझाने
पर राजा अज ने कह दिया कि ऐसा ही करू गा । यह कह कर
अज ने वशिष्ठ के शिष्य को बिदा किया ।
दाम्पत्य प्रेम की अद्भुत कथा २६
राजा अज पत्नी वियोग में चिन्तित रहने लगे और अपने पुत्र
दशरथ को बालक समझकर उन्होंने शरीर को रखना (जीवित
रहना) उचित समझा। प्यारी सी इन्दुमती का चित्र देखने और
उसे स्वप्न में देखकर क्षणमात्र संयोग के आनन्द से जैसे तैसे
अज ने आठ वर्ष व्यतीत किये।
राजा अज ने अच्छी प्रकार सिखाये, धनुर्धारी कुमार
दशरथ को प्रजा की रक्षण विधि में शास्त्रानुसार उपदेश करके
स्वयं अपने शरीर को त्यागने की इच्छा से अन्नखाना छोड़ दिया।
राजा अज गगा और सरयू के जलों के सगम तीर्थ में
शरीर त्याग कर शीघ्र देवलोक मे जा, पहिले शरीर से अधिक
शोभायमान सुन्दरी भार्या के साथ फिर नन्दन वन के क्रीडा
मन्दिरों मे विलास करने लगे।
पिता के स्वर्गवास होने पर दशरथ ने राज्य किया। राजा
दशरथ महापराक्रमी यशस्वी धर्मिक उदार और सत्यवादी न्यायी
प्रजा पालक राजा हुए।
ऊपर के वर्णनों से इस बात का पता अच्छी तरह चलता है
कि वास्तव में दाम्पत्य प्रेम क्या है और उसका कितना महत्व है।
साथ ही यह पता चलता है कि दाम्पत्य प्रेम का असर सन्तान
पर कितना सुखकर पड़ता है। दाम्पत्य प्रेम में बधने वालों की
ही सन्तान हृष्ट पुष्ट सुन्दर स्वरूपवान और निरोग रहती है।
इसलिये नारी जाति के महत्व को समझते हुये प्रत्येक गृहस्थ को
सुदृढ़ दाम्पत्य प्रेम रखकर गृहस्थाश्रम का आनन्द लूटना चाहिये।
३० भूमिका
दाम्पत्य प्रेम का प्रभाव
यह दाम्पत्य प्रेम का ही प्रभाव था कि राजा दशरथ के ही
समान उनके पुत्र श्री रामचन्द्र भी हुए और उन के पुत्र लव और
कुश भी वैसे ही पराक्रमी तेजवान और कीर्तिवान हुए।
उत्तम सन्तान उत्पन्न करने के लिये पति पत्नी में गाढ़ प्रेम
रहना सबसे जरूरी है दाम्पत्य प्रेम स्वर्ग का भी दुर्लभ पदार्थ है।
उत्तम सन्तान की प्राप्ति की इच्छा रखने वाले पति पत्नी दोनो
को प्रेम से रहना चाहिये। जिस प्रकार पत्नी के लिये शास्त्रकारों
ने पातिव्रत धर्म्म का पालन करना आवश्यक बतलाया है उसी
प्रकार पति को भी पत्नीव्रत करना बतलाया है।
दोनो को अपने अपने व्रत पालने से ही उत्तम सन्तान उत्पन्न
होती है। जहां पति पत्नी में प्रेम नहीं होता और पत्नीव्रत तथा
पतिव्रत का पालन नहीं होता वहां सन्तान भी ठीक नहीं होती।
व्यभिचारी तथा विषयी पति की सन्तान भी वैसी ही दुर्गुणों वाली
होती है। पर स्त्री गमन करने वाले व्यभिचारी कहे जाते हैं और
अपनी स्त्री से नियम विरुद्ध रात दिन विषय करने वाले विषयी
कहे जाते हैं। वीर्य को नष्ट करने में दोनों एक ही समान हैं। इस
लिये उत्तम सन्तान की इच्छा रखने वाले को नियम पूर्वक केवल
अपनी ही स्त्री से प्रेम रखकर रतिक्रिया करनी चाहिये। जिससे
सन्तान आरोग्य और दीर्घजीवी हो। दाम्पत्य प्रेम का जो बड़ा
भारी प्रभाव सन्तान पर पडता है वह प्रभाव कई पुश्तों तक वैसा
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दाम्पत्य प्रेम का प्रभाव ३१
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ही बना रहता है। जो अज्ञानी पुरुष स्त्री को विषय वासना की तृप्ति
का खिलौना समझते हैं वे बड़ी भारी भूल करते हैं। वे परमात्मा
के बनाये नियमों के विरोधी हैं और अपने इस अमूल्य मनुष्य
जीवन के शत्रु हैं।
इस समय देश में बहुतेरे लोग ऐसे वर्त्तमान हैं जो स्त्री को
केवल विषय वासना की तृप्ति के लिये ही समझकर उसका उचित
सत्कार नहीं करते, पैर की जूती समझकर उसका आदर नहीं
करते। परमात्मा ने स्त्री को पुरुषों के जीवन की रक्षा के लिये
उत्पन्न किया है। यदि स्त्रियां न होतीं तो यह ससार कुछ भी न
था। स्त्री बिना ससार के सभी सुख और ऐश्वर्य निरस और
फीके हैं। बल्कि यो कहना चाहिए कि सृष्टि का कारण स्त्री
जाति ही है।
स्त्री सृष्टि रूपी वाटिका की सर्वश्रेष्ठ फुलवाड़ी है, फुलवाड़ी
ही नहीं सुन्दर सुगन्धित फूल है। स्त्री से ही परमात्मा के
रचे हुए इस संसार की शोभा है। जिस घर में सुशीला स्त्री नहीं
है वह घर नरक यातना की समान दुःखदाई है और जिस घरमे
स्त्री नहीं है स्त्री से शून्य वह घर स्मशान से भी भयानक है। स्त्री
से ही घर इन्द्रपुरी का सा आनन्द और सुख देने वाला है। इसलिये
पुरुषों को यदि दाम्पत्य प्रेम का प्रभाव देखना है। उससे पूरा
आनन्द भोगना है तो स्त्री को विषय वासना की तृप्ति की ही
मशीन न समझें बल्कि जीवन यात्रा के लिये सर्वश्रेष्ठ सुख देने
वाली समझकर वेद शास्त्रो की आज्ञानुसार नियमानुकूल वर्त्तें।
३२ भूमिका
विवाह का उद्देश्य
स्त्रिया भी कई प्रकार की होती हैं उन स्त्रियों के योग्य पुरुष
भी कई प्रकार के होते हैं। किस स्त्री का किस प्रकार का पुरुष होना
चाहिये वैसे ही पुरुष से विवाह होने पर दाम्पत्य जीवन का सच्चा
आनन्द मिलता है।
यही मिलान विवाह के पहिले देखा जाता है परन्तु जब से
इस बात का विशेष ध्यान देना लोगों ने कम करदिया है तब से
ही स्त्री पुरुषो मे विषय शक्ति अधिक बढ़गई है। वेमेल विवाह
होने से पत्नी पति को प्रसन्न नहींकर सकती न पति पत्नी को ही
सन्तुष्ट कर सकता है इसी कारण सैकडा पीछे पचानवे घरों में
अनबन रहती है और पति पत्नी मे कलह मची रहती है।
जिन देशो मे स्त्री पुरुष स्वयं अपनी अपनी पसन्द ( मेल )
की स्त्री और स्त्री अपने मेल का पुरुष देखकर विवाह करते हैं
वहा भी भूल होजाने से पति पत्नी में अनबन रहती है और वह
अनबन पति पत्नी को अलग करदेती है, पत्नी तलाक देकर पति से
अलग हो जाती है। उन देशों मे यह खिलवाड़ सा प्रति दिन
हुआ ही करता है।
न निष्क्रयविस
दाम्पत्य प्रेम का कैसा मजा अज और रानी इन्दमती ( सवा आ' बयानन
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विवाह का उद्देश्य ३३
ने बनाया है। मनुसंहिता के अनुसार पति पत्नी का सम्बन्ध जीवन
भर का संग है। पति से पत्नी किसी दशा मे अलग नहीं हो सकती
न त्याग देने से, न बेच देने से, न दान मे देने से। इसलिये विवाह का
नियम हमारे शास्त्रकारो ने बडे विचार के साथ रक्खा है परन्तु इस
समय इतना विचार किया नहीं जाता। नाई बारी और पुरोहितो
की रायपर विवाह होता है, वे इधर की उधर मिलाकर मेल मिला
देते हैं परन्तु वह मेल शास्त्रोक्त नहीं होता।
शास्त्रकारो ने बतलाया है:—
सम्यग्धर्म्मार्थकामेषु दम्पतिभ्यामहर्निशम् ।
एकचित्ततया भाव्यं समानव्रतवृत्तितः॥ मनु०
धर्म, अर्थ और काम विषय मे पति को पत्नी सर्वदा एक
मन होना चाहिये। एक मन होने से ही गृहस्थी रूपी गाड़ी
ठीक चलती है क्योकि पति पत्नी उस गाड़ी के दो समान
पहिया हैं।
अनृतावृतुकाले च मंत्र संस्कार कृत्पतिः।
सुखस्य नित्यं दातेह परकाले च योषितः॥
मन्त्रादि द्वारा विवाह कर्त्ता स्वामी सब समय मे स्त्री को
सुखदाता, आनन्द देने वाला होता है केवल इसी काल मे नहीं
परकाल मे भी वह पत्नी को सुखदेने वाला होता है। पढिये
विवाह सम्बन्ध मे:—
३
३४ भूमिका
वेद शास्त्रों की आज्ञा
ओं गृभ्णामि ते सौभगत्वाय,
हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः ।
भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं,
त्वादुर्गाहपत्याय देवाः ॥
अर्थात् विवाह के समय वर दुलहिन से कहता है—हे वरानने !
जैसे मैं ऐश्वर्य सुसन्तानादि सौभाग्य की बढ़ती के लिये तेरे हाथ
को ग्रहण करता हू वैसे तू मुझ पति के साथ जरा अवस्था
( वृद्धावस्था ) को सुख पूर्वक प्राप्त हो। पत्नी कहती है—हे वीर ! मैं
वृद्धि के लिये आपका हाथ ग्रहण करती हूं, आप मुझ पत्नी के
सौभाग्य के साथ वृद्धावस्था पर्यन्त प्रसन्न और अनुकूल रहिये ।
आपको मै और मुझको आप आज से पति पत्नी भाव करके
प्राप्त हुए हैं। पति कहता है, सकल ऐश्वर्य युक्त न्यायकारी सब
जगत् की उत्पत्ति का कर्त्ता, बहुत प्रकार के जगत् का धर्त्ता
परमात्मा और ये सब सभा मण्डप में बैठे हुए विद्वान लोग
गृहस्थाश्रम कर्म के अनुष्ठान के लिये तुमको मुझे देते हैं। आज
से मैं तुम्हारे हाथ और तुम मेरे हाथ बिक चुके। अब कभी एक
दूसरे के प्रति अप्रियाचरण न करेंगे।
ओं भगस्ते हस्तमग्रभीत् सविता हस्तमग्रभीत् ।
पत्नी त्वमसि धर्मणाहं गृहपतिस्तव ॥
वेद शास्त्रों की आज्ञा ३५
हे प्रिये । ऐश्वर्य युक्त मैं तेरे हाथ को ग्रहण करता हूं तथा
धर्म्म युक्त मार्ग में प्रेरक मै, तेरे हाथ को ग्रहण कर चुका हूं । तू
धर्म से मेरी पत्नी भार्या है और मैं धर्म्म से तेरा गृहपति हूं । हम
तुम दोनों मिलकर घरके कामो की सिद्धि करे और जो दोनो का
अप्रियाचरण व्यभिचार है उसको कभी न करें जिससे घरके
सब काम सिद्ध हों, उत्तम सन्तान, ऐश्वर्य और सुख की सदा वृद्धि
होती रहे ।
ममेयमस्तु पोष्यामह्यं त्वादाद् बृहस्पतिः ।
मया पत्या प्रजावति शं जीव शरदः शतम् ॥
हे अनघे ! सब जगत् के पालन करने वाले परमात्मा ने जिस
तुमको मुझे दिया है वही तू जगत भर में मेरी पोषण करने योग्य
पत्नी हो । तू मुझ पति के साथ सौ शरद ऋतु अर्थात् सौ वर्ष
पर्यन्त सुख पूर्वक जीवन धारण कर ।
इसी प्रकार वधू भी वर से प्रतिज्ञा कराती है ।
हे भद्र वीर ! परमेश्वर की कृपा से आप मुझे प्राप्त हुए ।
मेरे लिये आपके विना इस जगत् में दूसरा पति अर्थात् स्वामी
पालन करने वाला और सेव्य इष्टदेव कोई नहीं है, न मैं आपसे
अन्य दूसरे किसी को मानूंगी । जैसे आप मेरे सिवाय दूसरी
किसी स्त्री से प्रीति न करेंगे वैसे मै भी किसी दूसरे पुरुष के साथ
(कुटिल ) प्रीति भाव से बर्त्ताव न करूंगी । आप मेरे साथ सौ
वर्ष पर्यन्त आनन्द से जीवन व्यतीत कीजिये ।
३६ भूमिका
त्वष्टा वासो व्यदधाच्छुभे कं,
बृहस्पतेः प्रशिषा कवीनाम्।
तेनेमां नारीं सविता भगश्च,
सूर्यामिव परिधत्तां प्रजया ॥
हे शुभानने ! जैसे इस परमात्मा की सृष्टि में उसकी तथा
आप्त विद्वानों की शिक्षा से दम्पती होते हैं, जैसे बिजली सबको
व्याप्त हो रही है वैसे तू मेरी प्रसन्नता के लिये सुन्दर वस्त्र और
आभूषण तथा मुझसे सुख को प्राप्त हो। इस मेरी और तेरी इच्छा
को परमात्मा सिद्ध करे। जैसे सकल जगत् की उत्पत्ति करने वाला
परमात्मा, पूर्ण ऐश्वर्य युक्त उत्तम प्रजा (सन्तान) से इस
तुच्छ मुझ नर की स्त्री को आच्छादित शोभा युक्त करे वैसे मैं
इन सबसे सूर्य की किरण के समान तुझको वस्त्र और भूषणादि
से सदा सुशोभित रक्खूंगा ।
इन्द्राग्नी द्यावापृथिवी मातरिश्वा,
मित्रावरुणौ भगो अश्विनोभा ।
बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम,
इमां नारीं प्रजया वर्धयन्तु ॥
हे मेरे सम्बन्धी लोगो ! जैसे बिजली और प्रसिद्ध अग्नि सूर्य
और भूमि अन्तरिक्षस्थ वायु प्राण और उदान तथा ऐश्वर्य, सद्वैद्य
वेद शास्त्रों की आज्ञा ३७
और मनोरञ्जन दोनों श्रेष्ठ, न्यायकारी यती प्रजा का पालन
करने वाला राजा, सभ्य मनुष्य, सर्वेश्वर परमात्मा और चन्द्रमा
तथा सोमलतादि औषधि गण सब प्रजा की वृद्धि और पालन
करते हैं वैसे ही इस मेरी स्त्री को तुम भी बढ़ाया करो। जैसे मैं इस
स्त्री को प्रजा आदि अर्थात् सन्तान से सदा बढ़ाया करूंगा। इसी
प्रकार स्त्री भी प्रतिज्ञा करती है कि मैं भी अपने पति को सदा
आनन्द ऐश्वर्य और सन्तान से बढ़ाया करूंगी। जैसे ये दोनों
मिलके प्रजा को बढ़ाया करते हैं वैसे हम दोनों मिलके गृहस्था-
श्रम के अभ्युदय को बढ़ाया करें।
अहं विष्यामि मयि रूपमस्या,
वेददित्पश्यन्मनसा कुलायम् ।
न स्तेयमद्म्यभि मनसोदमुच्ये.
स्वयं श्रन्थानो वरुणस्य पाशान् ॥
हे कल्याणी ! जैसे मनसे कुलकी वृद्धि को देखता हुआ मैं
इस तेरे रूप को प्रीति से प्राप्त और उसमें प्रेम द्वारा व्याप्त होता हूं
वैसे ही तू मेरी पत्नी मुझ में प्रेम से व्याप्त होकर अनुकूल
व्यवहार को प्राप्त हो। जैसे मैं मन से भी तुझ भार्या के साथ
चोरी को छोड़ देता हूं अर्थात् तुझसे छिपाकर और तेरी इच्छा
के विरुद्ध किसी उत्तम पदार्थ का चोरी से भोग न करूंगा,
कोई कार्य न करूंगा। मैं पुरुषार्थ से शिथिल होकर भी उत्कृष्ट
व्यवहार में विघ्नरूप दुर्व्यसनी पुरुषो के बन्धनों को दूर करता
३६ भूमिका
रहूंगा वैसे ही तू मेरी भार्या भी करती रहे। इसी प्रकार वधू भी
कहती है कि मैं भी आपको इच्छा के विरुद्ध आपका कोई अप्रिय
कार्य न करूंगी।
पाठक पाठिकाओ ! हमारे देश मे विवाह का लक्ष्य स्त्री
पुरुष का प्रेम से रहकर उत्तम सन्तान उत्पन्न करने का है। यही
वेद और शास्त्रो में बतलाया है क्योंकि स्त्री पुरुष को परमात्मा
ने सृष्टि की उन्नति के ही लिये उत्पन्न किया है।
भारतवर्ष मे विवाह बन्धन पति पत्नी का एक बड़ा भारी
बन्धन समझा जाता है और इस बन्धन मे बधे रहकर पति
पत्नी प्रेम पूर्वक उत्तम सन्तान उत्पन्न कर मनुष्य जीवन का
आनन्द भोगे यही विवाह का लक्ष्य है। जिन देशो मे विवाह
बन्धन नही समझा जाता वहा विवाह केवल मन बहलाव के
लिये ही किया जाता है और जब पति पत्नी मे कुछ भी अनबन
हो जाती है तो पत्नी पति से अपना सम्बन्ध तोड़ देती है। पति का
कुछ अधिकार नही रहता। पाश्चात्य देशो मे इस प्रकार की अनेक
घटनाये नित्यप्रति हुआ करती हैं।
हमारे देश में पति पत्नी का सम्बन्ध किसी समय किसी
प्रकार टूट नही सकता क्योकि वेद की आज्ञानुसार विवाह के
समय पति पत्नी दोनो परस्पर प्रतिज्ञा करते हैं।
ओं मम व्रते ते हृदयं दधामि।
मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु ॥
वेद शास्त्रों की आज्ञा ३६
मम वाचमेकमना जुषस्व ।
प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम् ॥
अर्थात् पति पत्नी से कहता है—हे वधू ! तेरे अन्तःकरण
और आत्मा को मैं अपने कर्म के अनुकूल धारण करता हूँ, मेरे चित्त
के अनुकूल तेरा चित्त सदा रहे। मेरी वाणी को तू एकाग्र चित्त
से सेवन किया कर। प्रजा का पालन करने वाला परमात्मा तुझको
मेरे लिये नियुक्त करे ।
इसी प्रकार पत्नी कहती है—हे प्रिय वीर स्वामिन् ! आपका
हृदय और आत्मा अपने प्रियाचरण कर्म के अनुकूल धारण
करती हूँ। मेरे चित्त के अनुकूल आपका चित्त सदा रहे । आप
एकाग्र चित्त होकर मेरी वाणी का, जो कुछ मै आपसे कहूँ
उसका सेवन सदा किया करे क्योकि आज से प्रजापति परमात्मा
ने आपको मेरे आधीन किया है जैसे मुझको आपके आधीन
किया है अर्थात् इस परमात्मा की बताई हुई प्रतिज्ञा के अनुसार
दोनो व्यवहार करे जिससे सर्वदा आनन्दित और कीर्तिमान
होके सब प्रकार के व्यभिचार अप्रियभाषणादि को छोड़कर
परस्पर प्रीतियुक्त रहे ।
वेद में परमात्मा की इस आज्ञानुसार प्राचीन समय मे
सभी भारतवासी चलते रहे हैं तभी आरोग्य और दीर्घजीवी होते
थे । सन्तान भी आरोग्य और दीर्घजीवी होती थी । जबसे इन
आज्ञाओं का उल्लंघन किया गया तब से दाम्पत्य प्रेम का अभाव
४० भूमिका
हो गया और पति पत्नी दोनों रोगी हो रोगी और अल्पायु
सन्तान उत्पन्न करने लगे। वेद मे आज्ञा हैः—
ओं इमां त्वमिन्द्रमीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु ।
दशास्यां पुत्रानाधेहि पतिमेकादशं कृधि ॥
ईश्वर पुरुष और स्त्री को आज्ञा देता है कि हे ( मीढ्व )
वीर्य संचय करने वाले परमऐश्वर्ययुक्त इस वधू के स्वामिन् ! तू
इस वधू को उत्तम पुत्र युक्त सुन्दर सौभाग्य भोगवाली कर । इस
वधू मे दश पुत्रों को उत्पन्न कर अधिक नहीं । और हे स्त्री !
तू भी अधिक कामना मत कर किन्तु दश पुत्र और ग्यारहवां
पति को प्राप्त होकर सन्तोष कर । यदि इससे आगे सन्तान की
इच्छा करोगे तो तुम्हारे दुष्ट अल्पायु निर्बुद्धि सन्तान होगी
और तुम भी अल्पायु और नाना प्रकार के रोगों से ग्रसित हो
जाओगे इसलिये अधिक सन्तान उत्पन्न करने की इच्छा न
करना इत्यादि ।
इससे तात्पर्य यही है कि सन्तान के ही लिये संभोग किया
जाना चाहिये और अधिक सन्तान उत्पन्न करने वाले माता
पिता और सन्तान दोनों निर्बल दुर्बल और रोगी कम आयु
वाले होंगे । इस नियम के अनुसार स्त्री पुरुष तथा सन्तान की
भी आयु सौ वर्ष से कम न होगी । इसके विषय में भी वेद में
परमात्मा की आज्ञा है ।
आरोग्यता और दीर्घ जीवन ( १०० वर्ष आयु ) प्राप्त कर,