विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदाम्पत्य प्रेम की अद्भुत कथा २७
वियोग का दुख सहने में समर्थ हैं, सदा के निमित्त गई तू मुझे
क्यों न भस्म करेगी । मैं यह दुख किस प्रकार सहूं ।
हे हृदयेश्वरी ! बोलती क्यों नहीं, इतनी अधिक मुझसे क्यो
रूठगई है। तुझे दया नहीं आती, मैं कवसे तुझे बुला रहा हूँ तेरा
कोमल शरीर फूलों की शैया पर भी दुखता था । अव बता वह
चिता का चढ़ना कैसे सहेगा ?
हे प्रिये ! तूने आमको और प्रयगुलता को जोड़ माना
था । उन दोनों के विवाह मगल को विना किये तेरा जाना
उचित नहीं है ।
तेरा प्रफुल्लित किया अशोक जिस पुष्प को उत्पन्न करेगा
उस तेरे अलकों के भूषणरूप को मैं तेरी दाह की अजली मे
कैसे लगाऊंगा ?
ये सखी जन सब दुःख सुख की साथी हैं। द्वितीया के
चन्द्रमा की समान तेरा पुत्र है, एक तेरा ही प्रेमी मै हूँ फिर
भी तू मुझ पर दया नही करती, तेरा यह कर्त्तव्य कठोर है।
आज मेरा धीरज नष्ट हुआ, रतिक्रीड़ा मिट गई, गाना गया,
ऋतुए उत्सवहीन हुई , गहनो का प्रयोजन समाप्त हुआ. शय्या
सूनी हुई ।
तू मेरी भार्या, बुद्धि देने मे अर्थात् सलाह् देने मे सहायक,
एकान्त की सखी, गान आदि विद्याओ की अच्छी प्यारी शिष्या
थी । तुझे कठोर मृत्यु ने हर कर बता मेरा क्या नही विगाडा
अर्थात् सब कुछ हर लिया ।