विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
This image appears to be completely blank, containing no visible text to transcribe.
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४१९
अनियम आहार विहार से स्त्रियों के
अन्य रोग
भोग और संभोग अर्थात् आहार विहार और संभोग
आदि के अनियम से स्त्री पुरुषों मे जो रोगों की उत्पत्ति होती है
उन रोगों से सैकड़ा पीछे निन्यानवे स्त्रियां रोगी देखी जाती हैं
इसी कारण पुरुषों की भी रोगी संख्या स्त्रियों की रोगी संख्या
से कम नहीं है ।
वातज योनि रोग
वातलाहार चेष्टाया वातलाया समीरणः ।
विवृद्धो योनिमाश्रित्य योनेस्तोदं सवेदनम् ॥
स्तम्भ पिपीलिकास्तृसिमिव कर्कशतां तथा ।
करोति सुप्तिमायां वातजांश्चापरान् गदान् ॥
सा स्यात् सशब्दरुत्फेनं तनुरुक्तार्तवानिलात् ।
अर्थात्—वात प्रकृति वाली स्त्री यदि वात को बढ़ाने वाले
आहार विहार और चेष्टा करे तो वायु अत्यन्त कुपित होकर
योनि का आश्रय लेकर योनि रोगों को उत्पन्न करती है। इस दशा
मे योनि मे सुई चुभने की समान पीड़ा होती है और चींटी चलने
४१२ आनन्द मन्दिर
उत्पन्न होते है। वात के कारण उस स्त्री को योनि से पतला
रूखा झागदार रक्त निकलता है रक्त निकलते समय कुछ शब्द
भी होता है ।
आहार—खाने पीने के पदार्थों को आहार कहते है। विहार
आमोद प्रमोद स्नान चलना फिरना सोना घूमना और स्त्री प्रसंग
करना इत्यादि सब विहार कहलाता है ।
आहार और विहार मे मनुष्य के सभी कार्य समझने चाहिये
इनको नियम पूर्वक न करने से अनियम आहार विहार कहे जाते
है । अनियम आहार विहार से रोगो की उत्पत्ति होती है और
नियम पूर्वक आहार विहार करने से शरीर आरोग्य और हृष्ट पुष्ट
रहता है ।
पित्तज योनि रोग
व्यायत्तथास्लवणात्क्षारैः पित्तजा भवेत् ।
दाह पाकज्वरोष्णार्त्ता नीलपीतासितार्त्तवा ॥
भृशोष्णकुणपस्त्रावा योनिः स्यात् पित्तदूषिता ।
अर्थात्—खट्टे पदार्थों का अधिक सेवन करने से तथा नम-
कीन और क्षारवाले पदार्थों के अधिक सेवन करने से पित्त कुपित
होकर योनि रोगो को उत्पन्न करता है जिसे पित्तज योनि रोग
कहा है। पित्त के कुपित होने से जो रोग उत्पन्न होते है उनमे
स्त्री की योनि मे दाह जलन योनिपाक और योनि मे पीड़ा
उत्पन्न होती है ।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४१३
इस कारण योनि मे से नीला पीला और काला आर्तव
(ऋतु का रक्त) निकला करता है। यह रक्त गरम गरम जलन
के साथ निकलता है इसमे मुर्दे की सी गन्ध आती है।
कफज योनि रोग
कफोऽभिष्यन्दिभिर्वृद्धो योनिंचेद् दूषयते स्त्रियः ।
सशीतां पिच्छिलां कुर्यात् कण्डुग्रस्तां सवेदनाम् ॥
पाण्डुवर्णां तथा पाण्डुपिच्छलार्त्तव वाहिनीम् ।
अर्थात्—अभिष्यन्दी कफकारक अर्थात् कफ को बढ़ाने वाले
पदार्थों के अधिक सेवन करने से कफ बढ़कर स्त्री की योनि मे
कफज रोगो को उत्पन्न करता है, इन रोगो के कारण योनि मे
शीतलता, लिवलिवापन और खुजली उत्पन्न होती है। योनि मे
पीड़ा और पीलापन होता है इसलिये योनि से पीला गिलगिला
आर्तव निकलता है।
सन्निपातक योनि रोग
समशक्त्या रसान् सर्वान् दूषयित्वा त्र
५१४ आनन्द मन्दिर
पदार्थ वात पित्त कफ तीनों को बढ़ाने वाले हैं उनका अधिक
सेवन करने से सब रस दूषित होकर योनि गर्भाशय का
आश्रय लेकर अपने अपने लक्षणों को प्रकट करते हैं। तीनों दोषों
के कारण जो योनि रोग उत्पन्न होते हैं उनसे योनि में जलन
पीडा, आदि से कष्ट अधिक होता है तथा योनि से सफेद और
गिलगिला आर्तव निकलता है। इस प्रकार की दूषित योनि में
कभी २ बडी खराबी हो जाती है ।
रक्त पित्तज योनि रोग
रक्तपित्तकरैर्नार्या रक्त पित्तेन दूषितम् ।
अति प्रवर्त्तते योन्या लब्धे बीजेऽपि साप्रजा ॥
रक्त पित्तोत्पादक आहारादि सेवन करने से रक्त पित्त के
कारण दूषित होकर योनि मे से रक्त निकलने लगता है इस दशा
मे स्त्री गर्भधारण नही कर सकती इसे रक्त पित्तज कहते हैं।
अरजस्का योनि
योनिगर्भाशयस्थं चेत् पित्तं संदूषयेदसृक् ।
सारजस्का मता कार्श्यवैवर्ण्य जननी भृशम् ॥
अर्थात्—योनि और गर्भाशय मे रहने वाला पित्त जब रक्त
को दूषित कर देता है तब रजोधर्म होना वन्द होजाता है और
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४१५
स्त्री अत्यन्त दुर्बल और विवर्ण होजाती है ऐसी योनि को
"अरजस्का योनि कहते हैं ।
अचरणा योनि
योन्यामधावनात् कण्डूं जाताः कुर्वन्ति जन्तवः ।
सा स्यादचरणा कण्ड्वा तयातिनरकांक्षिणी ॥
अर्थात्—योनि को न धोने से उसमें एक प्रकार के अदृश्य
छोटे छोटे कीडे पड़कर योनि में खुजली उत्पन्न करते हैं इस
खुजली के कारण वह स्त्री पुरुष समागम की अत्यन्त इच्छा करती
है ऐसी योनि को अचरणा कहते हैं ।
इसके विषय में पीछे भी लिखा जा चुका है और उपाय भी
बतलाया गया है। जो स्त्रियाँ सफ़ाई से नहीं रहती योनि को
कभी कभी धोती नहीं हैं उन्हीं में यह रोग पैदा होता है तब वे
दु.खी होती हैं ।
अतिचरणा योनि
पवनोऽति व्यवायेन शोफसुप्तिरुजः स्त्रियाः ।
करोति कुपितो योनौ सा चातिचरणा मता ॥
अर्थात्—अत्यन्त मैथुन करने के कारण वायु कुपित होकर
योनि में सूजन सुप्ति और पीड़ा उत्पन्न कर देती है ऐसी यानि
को अतिचरणा कहते हैं ।
४१६ आनन्द मन्दिर
प्राक्चरणा योनि
मैथुनादति बालायाः पृष्ठजंघोरुवंच्क्षणम् ।
रुजयन् दूषियेयोनिं वायुः प्राक्चरणा तु सा ॥
अत्यन्त वाला स्त्री के साथ मैथुन करने से उसकी पीठ जांघ
ऊरु और वक्षण मे वेदना उत्पन्न करके वायु योनि को दूषित
कर देती है ऐसी योनि को प्राकचरणा कहते हैं । प्राकचरणा उसे
कहते है जो स्त्री पुरुष सहवास के योग्य अवस्था वाली न होवे
किन्तु छोटी आयु में मूर्खतावश कामान्ध पुरुष से सहवास करे
तो ऊपर लिखा रोग उत्पन्न होता है उसे ही प्राक्चरणा कहते है ।
अतिबाला स्त्री उसे कहते है जिसकी अवस्था १६ वर्ष से कम
हो, आयुर्वेद के सुश्रुत ग्रन्थ मे बतलाया हैः—
ऊनषोडशवर्षायामप्राप्तः पंचविंशतिम् ।
यद्याधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विपद्यते ॥
जातो वा न चिरंजीवेज्जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः ।
तस्मादत्यन्त बालायां गर्भाधानं न कारयेत् ॥
अर्थात्—सोलह वर्ष से कम अवस्था वाली स्त्री मे पचीस
वर्ष से कम अवस्थावाला पुरुष जो गर्भ को स्थापन करे तो वह
नष्ट हो जाता है यदि नष्ट न भी हो तो निर्बल और रोगी रहकर
शीघ्र ही यम का ग्रास बन जाता है ।
पर स्त्री गमन का फल । पृ० ५०८ (सर्वाधिकार सुरक्षित )
The provided image is completely blank and contains no text to transcribe.
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४१७
इस कारण सोलह वर्ष से कम अवस्थावाली स्त्री मे गर्भ-
स्थापन करना वर्जित है इससे उस स्त्री के अनेक प्रकार के
योनि रोग उत्पन्न होजाते हैं।
उपप्लुता योनि
गर्भिण्याः श्लेष्मलाभ्यासाच्छर्दिःश्वासविनिग्रहात्।
वायुः क्रुद्धःकफं योनिसुपनीय प्रदूषयेत् ॥
पाण्डुं सतोदमास्रावं श्वेतं स्रवति वा कफम्।
कफवाताभयव्याप्ता सा स्याद्योनिरुपप्लुता ॥
अर्थात्—कफ को बढाने वाले पदार्थों के अत्यन्त सेवन
करने से तथा उलटी रोकने से और वायु सम्बन्धी वेगो को
रोकने से, गर्भिणी स्त्री की वायु कुपित होकर कफ को योनि मे
लाकर दूषित कर देती है तब योनि में सुई छिदने के समान
पीड़ा होकर पीले रग का कफ के समान स्राव होता है अथवा
सफेद सफेद कफ की समान निकलता है। कफ वात रोगो से
युक्त ऐसी योनि को उपप्लुता कहते हैं।
परिप्लुता योनि
पित्तलाया नृसंवासे क्षवथूद्गार धारणात् ।
पित्तं संमूर्च्छितो वायुर्योनिं दूषयति स्त्रियाः ॥
२७
stroke with a flat bottom, and a right vertical line.
Wait, what if it IS a misprint of साह्यर्त्ता?
Wait, could it be साहगर्त्ता?
Let's search Google mentally:
Does any book have "साहगर्त्ता रजःकृच्छ्रेणोदावृत्ता विमुञ्चति"?
Wait! "साहगर्त्ता रजः" - no, why would it be "साहगर्त्ता"? In Sanskrit, that's meaningless.
Could it be "सा च गर्त्ता"? No.
Could it be "सा ह्यर्त्ता"?
Wait, let's look at the ligature ह्य:
In some fonts, ह्य has ह and य.
Wait, what if the typesetter actually composed: सा, ह, ग, र्त्ता?
Wait, look at the image:
Is it साहगर्त्ता?
Let's look at the characters:
स + ा = सा
ह = ह
Then there is a character that looks like ग?
Wait, look at कृच्छ्रेणोदावृत्ता:
Under कृ: it's क with ृ.
च्छ्रे: च + छ with े and ्र.
णो: ण with
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४१६
उदावर्तिनी योनि
आर्तवे या विमुक्ते तु तत्क्षणं लभते सुखम् ।
रजसो गमनादूर्ध्वंज्ञेयोदावर्तिनी बुधैः ॥
अर्थात्—आर्त्तव के निकलने से जिसमे तत्काल चैन पड़
जाता है जब तक ऋतु आरम्भ होता है तब तक बड़ा कष्ट होता
है। ऋतुधर्म होजाने पर कष्ट दूर होजाता है। रज के ऊपर जाने
के कारण इसको उदावर्तिनी कहते हैं।
कर्णिनी योनि
अकाले वाहमानाया गर्भेणापिहितोऽनिलः ।
कर्णिकां जनयेद्योनौ श्लेष्मरक्तेन मूर्छितः ॥
रक्तमार्गावरोधिन्या सातया कर्णिनी मता ।
अर्थात्—छोटी अवस्थावाली स्त्री में गर्भधारण करने से
गर्भ के कारण आच्छादित वायु कफ और रक्त से मिली हुई एक
प्रकार की गांठ योनि के मुख पर उत्पन्न कर देती है। यह गांठ
रक्त के मार्ग को रोकदेती है इसलिये इसे कर्णिनी कहते हैं।
पुत्रघ्नी योनि
रौक्ष्याद्वायुर्यदा गर्भं जातं जातं विनाशयेत् ।
दुष्ट शोणितजं नार्या पुत्रघ्नी नाम सा मता ॥
४२० आनन्द मन्दिर
अर्थात्—जो गर्भ स्त्री के दूषित रक्त से उत्पन्न होता है ऐसी
स्त्री को जब जब गर्भ उत्पन्न होता है तब तब ही वायु रूक्षता के
कारण उसे नष्ट करदेती है। ऐसी योनि को पुत्रघ्नी कहते हैं।
अन्तर्मुखी योनि
व्यवायमतितृप्ताया भजन्त्यास्त्वन्न पीडितः ।
वायुर्मिथ्यास्थिताङ्गाया योनिस्रोतसि संस्थितः ॥
वक्रयत्याननं योन्यामस्थिमांसानिलार्तिभिः ।
भृशार्तिं मैथुनासक्ता योनिरन्तर्मुखी मता ॥
अर्थात्— स्त्री को भोजन करके थोड़ा ही समय व्यतीत
हुआ हो अर्थात् पेट भरा हो उस समय विपरीत आसन से रति
क्रिया करे तो वायु उस स्त्री की योनि के स्रोत में रुक कर
अर्थात् टकरा कर गर्भाशय के मुख को टेढ़ा कर देती है। उसकी
हड्डियों और मांस मे अत्यन्त पीड़ा होती है और फिर वह स्त्री
सम्भोग के समय सदैव कष्ट पाती है। इसलिये पति पत्नी किसी
को भी सम्भोग सुख नही मिलता और उस स्त्री के गर्भ भी नहीं
रहता, क्योकि गर्भाशय का मुख टेढ़ा होने से पुरुष की इन्द्री
संभोग के समय गर्भाशय की गर्दन से जाकर टकराती है और तब
गर्भाशय की गर्दन पर दबाव पड़कर स्त्री की योनि मे पीड़ा होती
है इस लिये सभोग ठीक नही होता बल्कि दुखदाई होता है ।
यो तो विपरीत आसन से सभोग करने से गर्भाशय को
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४२१
अनेक प्रकार से हानि पहुँचती है परन्तु भोजन कर थोड़ी ही
देर मे अर्थात् पेट भरे रहने पर विपरीत आसन से रति करने से
ऊपर लिखे अनुसार गर्भाशय को अधिक हानि पहुंचती है,
जिससे फिर वह स्त्री सभोग का सुख नही पाती ।
मेरे पास इस रोगवाली महीने मे पचासो स्त्रियां आया
करती है ।
सूचीमुखी योनि
गर्भस्थायाः स्त्रिया रौद्ध्याद्वायुर्योनि प्रदूषयन् ।
मातृ दोषादणुद्वारात् कुर्यात् सूचीमुखीन्तुसा ॥
अर्थात्—गर्भ मे कन्या हो उस समय यदि गर्भवती रतिक्रिया
करे तो वायु रुद्ध होकर गर्भवाली कन्या की योनि को दूषित
करके उसके योनि द्वार को छोटा करदेती है ऐसी योनि को
सूचीमुखी कहते हैं। पाठक पाठिकाओ ! विचार कीजिये, कितना
बड़ा अनर्थ है। गर्भवती के साथ रतिक्रिया करने से सन्तान पर
कैसा बुरा प्रभाव पड़ता है, वह जन्म भर के लिये कष्ट भोगती है।
इस रोग वाली अनेक स्त्रियां मेरे देखने मे आईं। किसी
किसी की योनि इतनी छोटी देखी गई जो पुरुष समागम के
योग्य ही नही। कोई कोई ऐसी देखी गईं कि सम्भोग के
समय उन स्त्रियो को बड़ा कष्ट होता है, यदि गर्भ रहगया
तो ऐसी स्त्रियों का गर्भ प्रसव के समय योनि के बाहर नहीं
४२२ आनन्द मन्दिर
निकल सकता तब काटकर निकाला जाता है। यदि काटकर निका-
लने का मौका न मिला या उस समय कोई योग्य चिकित्सक न मिला
तो वह स्त्री मरजाती है। बालक योनि मे आकर फंस जाता है।
इसी कारण गर्भवती के साथ मैथुन करना ऋषियों ने मना
किया है। इससे गर्भ और गर्भवती दोनो को शारीरिक हानि
पहुँचती है। अनेक स्त्रियो की यह दशा होते लोगो ने देखी होगी
परन्तु फिर भी वाज नही आते ।
मेरे पास गर्भस्राव व गर्भपात और अन्य शिकायतो वाली
सैकड़ों स्त्रियां आया करती हैं। इन सबका कारण गर्भवती के
साथ रतिक्रिया करना पाया गया और अधिक प्रसंग करना
तथा विपरीत आसन से सभोग करना यह तो बहुत अधिक
स्त्रियो मे पाया जाता है, क्योकि जितनी स्त्रिया मेरे पास इलाज
के लिये आया करती हैं वे अपने पति का कुल हाल, अधिक
विषय तथा अनियम और विपरीत विषय का ही कहा करती हैं।
पुरुषों की इस अज्ञानता और कामान्धता ने स्त्रियो का
जीवन दुःखमय बना दिया है। पुरुष रोगी पत्नी पर भी दया
नही करते यह कितनी बड़ी अज्ञानता है।
शुष्का योनि
व्यवायकाले रुन्धन्त्या वेगात् प्रकुपितोऽनिलः ।
कुर्याद्विरामूत्रसङ्गार्त्तिं शोषं योनि मुखस्यतु ॥
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४२३
अर्थात्—मैथुन के समय जब स्त्री मल मूत्रों के वेगों को रोक
लेती है तब वायु कुपित होकर विष्टा और मूत्र को रोक कर योनि
को खुश्क कर देती है अर्थात् दिशा और पेशाब की गरमी जो
रोकने से पैदा होती है उस गरमी से योनि में खुश्की पैदा होती
है, इसलिये ऐसी योनि को शुष्का कहते हैं।
यह रोग एक ही बार ऐसी मूर्खता करने से उत्पन्न होजाता
है, जिसके कारण उस स्त्री की योनि में अनेक प्रकार की व्याधियां
उत्पन्न होजाती है। ऐसी रोगों वाली जितनी स्त्रियां मेरे पास आईं
उन सब से जब मैंने पूछा कि कभी ऐसा तो नहीं हुआ कि तुम
को दिशा पेशाब लगी हो, ऐसी दशा में प्रसंग किया हो, तब उन
सब ने यह स्वीकार किया और अपने पति की कामान्धता की
कहानी सुनाई। किसी ने कहा कि प्रातःकाल जब दिशा जाने का
समय होता है, प्रायः अनेक बार ऐसा हुआ और होता है कि
पति जाने नहीं देते और प्रसंग करते हैं। जिसके कारण कभी कभी
पेड़ू में पीड़ा होती है और दिशा पेशाब का रोकना कठिन होता
है। इस प्रकार का हाल ऐसे रोग वाली सभी स्त्रियां बतलाया
करती हैं।
इस कारण शास्त्रकारों ने प्रातः काल का मैथुन अत्यन्त
हानिकारक बतलाया है। स्त्री को ही नहीं, पुरुष भी यदि दिशा
पेशाब के वेगों को रोक कर प्रसंग करे तो उन्हें भी अनेक प्रकार
के रोग उत्पन्न होते हैं, जिनका वर्णन इस पुस्तक के दूसरे भाग में
विस्तार पूर्वक लिखूंगी।
४२४ आनन्द मन्दिर
वामिनी योनि
षड्रात्रात् सप्तरात्राद्वा शुक्रं गर्भाशयं गतम् ।
रुजं नीरुजं वापि या लवेत् साच वामिनी ॥
अर्थात्—जिस स्त्री की योनि से गर्भाशय में पहुंचा हुआ
वीर्य पीडा करके अथवा बिना पीडा के ही छै सात दिन के
भीतर ही गर्भाशय से निकल पडता है, उसे वामिनी योनि कहते
है । इस मे कभी गर्भ नही ठहरता । यह रोग भी विवाह होते ही
अधिक प्रसंग से तथा विपरीत आसन से प्रसंग करने से गर्भाशय
खराब होजाने के कारण होता है ।
बन्ध्या योनि
बीज दोषात्तु गर्भस्था मारुतोपहताशयः ।
नृद्वेषिण्यस्तनी चैव षण्ढी स्यादनुपक्रमा ॥
अर्थात्—माता पिता के बीज दोष के कारण जिस कन्या
का गर्भाशय नष्ट हो जाता है । वह पुरुष समागम की कभी
इच्छा नही करती है और उसके स्तन भी नही होते । ऐसी स्त्री
षण्ढी या हिजड़ी कहलाती है । इसका इलाज धन्वन्तरी भी नहीं
कर सकते ।
क्योकि जिसके गर्भाशय ही न होगा उसके गर्भ ठहरेगा
कहा ? इसीलिये बन्ध्या का इलाज भी नही हो सकता ।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४२५
महायोनि
विषमं दुःख शय्यायां मैथुनात् कुपितोऽनिलः ।
गर्भाशयस्य योन्यश्च मुखं विष्टम्भयेत् स्त्रियः ॥
असंवृतमुखा सार्तिरुच्छफेनास्रवाहिनी ।
मांसोत्सन्ना महायोनिः पर्य्यं वंक्षण शूलिनी ॥
इत्येतै लक्षणैः प्रोक्ता विंशतियोनिजा गदाः ॥
अर्थात्—विपरीत दुखदाई शय्या पर, विपरीत आसन से जो
स्त्री प्रसग किया जाता है उस से उस स्त्री की वायु कुपित होकर
गर्भाशय और योनि मुख को बिगाड़ देती है दूषित करके फैला
देती है । उसके गर्भाशय तथा योनि का मुख अधिक खुल जाता
है इसलिये योनि बड़ी हो जाती है, उससे झागदार रूखा पीड़ा
करता हुआ आर्त्तव निकला करता है। इस स्त्री के हड्डियों की सन्धि
अर्थात् जोड़ों मे और गर्भाशय तथा योनि मे प्राय. पीड़ा हुआ
करती है। यह महायोनि अर्थात् बड़ी योनि कहलाती है। जो
स्त्री के लिए अतिशय दुखदाई होती है।
ये ऊपर लिखे, अनेक प्रकार के योनि रोग स्त्रियो की अज्ञा-
नता और उनके पति की मदान्धता के कारण, अनियम आहार
विहार स्त्री प्रसंग आदि से उत्पन्न होते हैं, ऐसा आयुर्वेद मे ऋषियो
ने बतलाया है।
४३६ आनन्द मन्दिर
स्त्रियों की योनि के ये रोग सुश्रुत मे बतलाये हैं। सुश्रुत
आयुर्वेद का बड़ा भारी प्राचीन ग्रन्थ है। स्त्रियो के इन योनि
रोगो से और भी अनेक प्रकार के भयकर रोग उत्पन्न होजाते हैं
जिससे स्त्रियो का जीवन दुखमय बनजाता है और वे रोरोकर
जीवन व्यतीत कर कुसमय मे ही काल का कलेवा बनजाती हैं।
यदि स्त्रियो के पति अपनी पत्नियो पर दया दृष्टि दिखावे और
अधिक प्रसग से उन्हे बचाते रहे तथा स्वय बचते रहे तो स्त्रियों
की रोगी सख्या सैकड़ा पीछे निन्यानवे की जगह जो इस समय
देखी जाती है बहुत कम होजावे और भारत के बालक जो कुस-
मय मे ही काल का कलेवा बनजाते हैं जिसके कारण हमारे देश
के बालको की रोगी तथा मृत्यु सख्या अधिक सुनी जाती है
बहुत कम हो जावे।
योनि संकोचन
आयुर्वेद मे योनि संकोचन की अनेक औषधियां बतलाई हैं
वे औषधियां केवल ऊपर कहे गये महायोनि नामक रोग के लिये
हैं परन्तु मूर्ख अज्ञानी विषयी लोग प्राय उन औषधियो को विना
रोग के ही आरोग्य स्त्री की योनि सकोचन के काम मे केवल इस
लिये लाते हैं कि उन्होंने यह समझ रक्खा है कि जितनी ही
संकुचित योनि हो उतना ही आनन्द मिलेगा। इसलिये मूर्ख
विषयी पुरुष ऐसी औषधियो वाली पुस्तको की खोज मे रहा
करते हैं, यह देखकर पुस्तक बनाने वाले भी अपनी मूर्खता, पुस्तक
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४२७
बनाने में खर्च कर डालते हैं और इधर उधर से मनगढ़ंत प्रयोग
योनि संकोचन के अपनी पुस्तकों में लिखदेते हैं जिससे ऐसे
प्रयोगों से पुस्तक की बिक्री अधिक हो ।
वे पुस्तक बनाने वाले यह तो समझते ही नहीं कि किस
लिये यह प्रयोग काम में लाया जाना चाहिये। पुस्तक बनाने वालों
को स्वयं इस बात का ज्ञान नहीं है क्योंकि वे तो वैद्यक विषय में
बिल्कुल अज्ञान हैं। वे तो संग्रह करना जानते हैं, हानि लाभ का
उन्हें कुछ ज्ञान नहीं होता। किसी प्रकार पुस्तक बिके, यही ध्यान
रहता है।
उन पुस्तक बनाने वालों से अधिक अज्ञान वे हैं जो बिना
सोचे समझे ऐसे प्रयोगों को क्षणिक आनन्द के लिये काम में
लाकर अपना तथा अपनी प्यारी पत्नी का जीवन नष्ट करते हैं
क्योंकि बिना रोग के औषधियां काम में लाने से वे हानिकारक
होती हैं।
योनि संकोचन और पुरुष इन्द्री को बढ़ाने तथा स्थूल करने
वाली औषधियां बड़ी हानिकारक होती हैं। बिना रोग के भूल
कर भी काम में नहीं लानी चाहिये। जो पुरुष मूर्खता वश बिना
रोग के ही इन्द्री को बढ़ाने तथा स्थूल करने की औषधियां काम
में लाते हैं उनकी इन्द्री कुछ दिनों में बेकाम हो जाती है और
वे नपुंसक होजाते हैं।
जो पुरुष बिना जरूरत के ही स्तम्भन की औषधियों का
सेवन करते हैं उन्हें भी कुछ दिन बाद नपुंसकता आघेरती है फिर