विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२० आनन्द मन्दिर
अर्थात्—जो गर्भ स्त्री के दूषित रक्त से उत्पन्न होता है ऐसी
स्त्री को जब जब गर्भ उत्पन्न होता है तब तब ही वायु रूक्षता के
कारण उसे नष्ट करदेती है। ऐसी योनि को पुत्रघ्नी कहते हैं।
अन्तर्मुखी योनि
व्यवायमतितृप्ताया भजन्त्यास्त्वन्न पीडितः ।
वायुर्मिथ्यास्थिताङ्गाया योनिस्रोतसि संस्थितः ॥
वक्रयत्याननं योन्यामस्थिमांसानिलार्तिभिः ।
भृशार्तिं मैथुनासक्ता योनिरन्तर्मुखी मता ॥
अर्थात्— स्त्री को भोजन करके थोड़ा ही समय व्यतीत
हुआ हो अर्थात् पेट भरा हो उस समय विपरीत आसन से रति
क्रिया करे तो वायु उस स्त्री की योनि के स्रोत में रुक कर
अर्थात् टकरा कर गर्भाशय के मुख को टेढ़ा कर देती है। उसकी
हड्डियों और मांस मे अत्यन्त पीड़ा होती है और फिर वह स्त्री
सम्भोग के समय सदैव कष्ट पाती है। इसलिये पति पत्नी किसी
को भी सम्भोग सुख नही मिलता और उस स्त्री के गर्भ भी नहीं
रहता, क्योकि गर्भाशय का मुख टेढ़ा होने से पुरुष की इन्द्री
संभोग के समय गर्भाशय की गर्दन से जाकर टकराती है और तब
गर्भाशय की गर्दन पर दबाव पड़कर स्त्री की योनि मे पीड़ा होती
है इस लिये सभोग ठीक नही होता बल्कि दुखदाई होता है ।
यो तो विपरीत आसन से सभोग करने से गर्भाशय को