विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
दाम्पत्य प्रेम और स्वर्ग १५
तथा धर्म्मार्थ कामानां त्रिवर्ग फलमश्नुते ।
पत्नी ही गृहस्थाश्रम की जड है। यदि स्त्री पति की इच्छा-
नुगामिनी हो तो गृहस्थाश्रम की तुलना ( बराबरी ) किसी से
भी नहीं हो सकती और स्त्री के सहित पति धर्म, अर्थ, काम, इन
तीनों फलों को भोगता है ।
धर्म से शुभ कर्म, अर्थ से धन सम्पत्ति और काम से उत्तम
सन्तान की प्राप्ति होती है ।
अनुकूल कलत्रोयस्तस्य स्वर्ग इहैव हि ।
प्रतिकूल कलत्रस्य नरको नात्रसंशयः ॥
स्त्री के अनुकूल होने पर अर्थात् पति से पत्नी का सच्चा प्रेम
और सन्तुष्टता होने पर इसी लोक में स्वर्ग का भोग होता है
अर्थात् आनन्द और सुख मिलता है। यदि स्त्री प्रतिकूल हुई अर्थात्
स्त्री पति में प्रेम न हुआ सन्तुष्टता न हुई तो इस लोक में ही
नरक भोग होता है इसमे कुछ भी सन्देह नहीं है। इन दोनों बातों
का अनुभव बहुतेरे पति पत्नियों को होगा । वे ही दाम्पत्य प्रेम
और परस्पर की सन्तुष्टता का तथा असन्तुष्टता का सुख दुःख
समझते होंगे ।
शास्त्रकारों ने बतलाया है किः-
न कामेषु न भोगेषु नैश्वर्य्ये न सुखे तथा ।
स्पृहा यस्या यथा पत्यौ सा नारी धर्म्म भागिनी ॥
१६ भूमिका
जो स्त्री काम, भोग ऐश्वर्य और सुख किसी की भी अभि-
लाषा नहीं करती केवल स्वामी के प्रेम मे ही सन्तुष्ट है वही स्त्री
धर्मलाभ करती है।
यहां देखा जाता है कि शास्त्रकारो के इन वाक्यो से बिलकुल
विरुद्ध व्यवहार हो रहा है। सैकड़ा पीछे निन्यानवे पुरुष
अधिक विषय, अनियम रतिक्रिया के कारण प्रमेह सुस्ती स्वप्रदोष
शीघ्रपात और नपुसकता आदि रोगों मे घिर जाते है जिस के
कारण पत्नी को किसी प्रकार भी सन्तुष्ट नही कर सकते। वे पत्नी
को भी रोगी बना देते है इसलिये पति पत्नी रोगी सन्तान उत्पन्न
कर घर भर की चिकित्सा में धन की वरबादी करते हैं और सुख-
मय जीवन नष्ट कर देते हैं।
बहुतेरे पुरुष विवाह होने के पहिले ही अनेक प्रकार से वीर्य
का सत्यानाश मार बैठते है। जो विवाह होने के पहिले बचे भी रहे वे
विवाह होते ही अधिक और अनियम रतिक्रिया करके शक्ति हीन
रोगी निर्बल और दुर्बल होजाते हैं तथा स्त्रियो को भी रोगी बना
देते हैं इस प्रकार पति पत्नी रोगी हो दुःखमय जीवन व्यतीत
करते हैं।
आमदनी कम, खर्च ज्यादा होने के कारण ऐश्वर्य और सुख
भोग से भी स्त्रियों की अभिलाषा पूरी नही होती इसलिये सैकडा
पीछे निन्यानवे दम्पति ऐसे मिलेगे जिनमें उपयुक्त प्रेम नहीं होता
उसी कारण गृहस्थी का सुख जैसा चाहिये नहीं मिलता। बल्कि
दाम्पत्य जीवन दुखमय हो जाता है।
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श्री रामचन्द्रजी का आदर्श प्रेम १७
श्री रामचन्द्रजी का आदर्श प्रेम
पति पत्नी का प्रेम ही स्वर्ग है इस को सभी मनुष्यो ऋषि
मुनियो और देवताओं तक ने माना है। सीता और रामचन्द्रजी
का दाम्पत्य प्रेम विख्यात है। सीता का प्रेम तो सभी जानते हैं।
यहां हम रामचन्द्रजी का प्रेम सचित्र दिखलाते हैं। जब सीता जी
को रावण हर कर लंका को ले गया और रामचन्द्र जी मृग का
बध करके लौटे तो सीता को कुटी में नहीं पाया। वे व्याकुल हो
वहीं बैठकर इसभांति विलाप करने लगे ।
ऐ मेरे दिल व जानकी प्यारी कहां है तू ।
राजा जनक की राजकुमारी कहा है तू ॥
तेरे लिये हूं वन में दुखारी कहा है तू ।
दुख मुझपै है वियोग का भारी कहा है तू ॥
हैं तेरे देखने की जो आशा लगी हुई ।
आंखों में जानेजार है प्यारी रुकी हुई ॥
जङ्गल मुझे उजाड है रौनक थी वन की तू ।
कांटों में बनके भी थी कली या चमन की तू ॥
हरदेश में रफ़ीक थी मुझ
१८ भूमिका
सुरखी ग़ज़ब की कैसी थी इक इक अनार पर ।
जोबन बरस रहा था हर एक आवशार पर ।
आलम था चांदनी का ग़जब सब्जाजार पर ॥
भौंरे कमल पै मस्त ममोले थे वनमें खुश ।
तती मगन हवा में तो बुलबुल चमन में खुश ॥
आवाज प्यारी प्यारी ग़जब कोकिला की थी ।
छवि आह चांदनी में किसी मह्लक़ा की थी ॥
हसो की चाल इक बुते नाजुक अदा की थी ।
अठ खेलियां थीं शोखी की वह भी वला की थीं
हर शै को नाज हुस्न पै तेरे करम से था ।
फूलों पै आब तुझ गुलेराना के दम से था ॥
वन वासियों को तेरे ही दम से कदर था ।
एक एक हंस चाल पै तेरे निसार था ॥
मुखडे से तेरे शब में चांद शर्मसार था ।
हाला गले का उतरा हुआ तेरा हार था ॥
भौंरे थे शर्मगीं तेरी जुल्फे सियाह से ।
घायल हिरन भी थे तेरी तीरे निगाह से ॥
जङ्गल में हम सरूद तेरे को
श्री रामचन्द्रजी का आदर्श प्रेम १६
चाहस थी तू ही एक मेरे दिल के सरूर की ॥
सम्बुल में शय है जुल्फे चलापा की बू नहीं ।
शमशाद में भी कामते जेवा की बू नहीं ॥
फूलों में वनके तुझ गुलेराना की बू नहीं ।
कलियां महक रही हैं पै सीता की बू नहीं ।
उजड़ा हुया पड़ा हे मेरा आश्रम दरेग ।
किससे कहूं मैं जाके हाय अपना गम दरेग ॥
थी जिसके मुह की चांद सी शोभा किधर गई ।
प्यारी थी जिसकी जुल्फे चलीपा किधर गई ॥
ऐ काश सारे वनके पखेरु पनाय दो ।
देखा हो तुमने जाते तो आहू जवाब दो ॥
पत्ता भी बन का आह कोई डोलता नहीं ।
भौंरा समेग फूल पै है बोलता नहीं ॥
तूती भी मुंह में कन्द जरा बोलता नहीं ।
कोई भी मेरे दिल की गिरह खोलता नहीं ॥
सीता का किससे जाके में पूछू निशान हैफ ।
कांटों की हाय भरकी भी चुप है जवान हैफ ॥
जङ्गल की चलने वाली हवाओ जवाब दो ।
सीता को जल्द ढूंढ के आयो जवाब दो ॥
मेरे जिगर की आग बुझाओ जवाब दो ।
तुमही तो तर्स खाओ लताओ जवाब दो ॥
बोलो तुम्हीं तुम्हें तो है पत्तो जया मिली ।
२०. भूमिका
कुछ तुमको बू ये जानकी ये रास्ते जा मिली ॥
छाई हुई है वन में उदासी शिताव था ।
प्यारी है मेरे प्राणों की त ला जवाब था ॥
खूनी जिगर है शाहिदे गुलगू निकाव था !
दिलमें निशात शाखो में बनकर हिजाब था ॥
व्याकुल हूं मैं रमेश तेरे इस्तियाक में ।
जङ्गल की ख़ाक छानूगा तेरे फिराक में ॥
प्राचीन समय मे पति पत्नी में अत्यन्त गाढ प्रेम रहता था ।
धनी निर्धन राजा महाराजा सभी स्त्रियों के महत्व को समझते
थे । जब से लोग अज्ञानता वश विषयांध हो पत्नी के महत्व को
भूलकर स्त्री को केवल विषय भोग की मशीन समझकर विपरीत
रति करने लगे और विषय की लोलुपता मे अपने शरीर-स्वास्थ्य
को भूल गये तो उसका वही निश्चित परिणाम होने लगा कि
पति पत्नी दोनों रोगी होने लगे, शक्तिहीन हो रोगी और निर्बल
सन्तान उत्पन्न करने लगे इसका परिणाम यह हुआ कि
दाम्पत्य जीवन का सच्चा आनन्द और सुख जाता रहा । क्योंकि
जब स्त्री पुरुष दोनो रोगी रहते हैं और सन्तान भी रोगी तथा
दुर्बल होती है तो हृदय की प्रसन्नता जाती रहती है । प्रसन्नता
के नाश हो जाने से दाम्पत्य प्रेम का जो आकर्षण पति पत्नी
मे होना चाहिए वह नही रहता, उसका नाश होजाता है। पति
पत्नी प्रेम बन्धन से एक दूसरे से अन्य मनस्क हो जाते हैं ।
म की अद्भुत कथा २१
दाम्पत्य प्रेम की अद्भुत कथा
महाराजा रामचन्द्र के बाबा (दशरथ के पिता राजा अज) का
विवाह अत्यन्त सुन्दरी राजकन्या इन्दुमती से हुआ था। राजकुमार
अज का विवाह कर और उन्हें राजगद्दी देकर राजा अज के
पिता रघु ने-संन्यास ले लिया परन्तु पुत्र के अत्यन्त विनय और
आग्रह करने पर वन को न जाकर वे वहीं एकान्त में कुटी बनाकर
रहने लगे और कुछ दिनो मे योग समाधि से शरीर त्याग दिया।
राजा अज ने बड़ी योग्यता से राज्य किया उनके न्याय और
प्रजा प्रेम के कारण प्रजा राजा रघु के मृत्यु शोक को भूल गई।
राजा अज के रानी इन्दुमती के गर्भ से दशरथ नामक पुत्र
उत्पन्न हुआ। एक दिन इन्दुमती सहित राजा अज वन विहार
करने गया, उसी समय गोकरणनाथ जी को बीना सुनाने के
लिये नारद जी आकाश मार्ग से जा रहे थे, पवन के लगने
से उनकी वीणा के ऊपर से फूलो की माला उड़कर इन्दुमती के
हृदय पर गिरी। रानी उसके लगते ही मर गई।
अभिभूय विभूतिमार्तवीं,
मधु गन्धातिशयेन वीरुधाम्।
नृपतेरमरलगाप सा,
दयितोरुस्तनकोटि सुस्थितिम् ॥
वह दिव्य माला मधु और गन्ध की अधिकता से लताओं
२२ भूमिका
के ऋतु वैभव का पराभव करके सती इन्दुमती के स्तनों के अग्र-
भाग पर गिरी ।
क्षणमात्र सखीं सुजातयोः,
स्तनयोस्तामवलोक्य विह्वला ।
निमिमील नरोत्तमप्रिया,
हतचन्द्रा तमसेव कौमुदी ॥
सुन्दर स्तनो वाली उस क्षणमात्र सखी को देखते ही राजा
अज की प्रिया राहु ग्रसे चन्द्रमा की चांदनी के सामन व्याकुल
होकर मर गई ।
वपुषा करणोज्झितेन सा,
निपतन्ती पतिमप्यपातयत् ।
ननु तैलनिषेक बिन्दुना,
सहदीपार्चिरुपैति मेदिनीम् ॥
इन्द्रियो के छोडे हुए शरीर से गिरती हुई उसने पति को भी
गिराया, जैसे टपकते हुए तेल की बूंद के सग दीपक की लव भी
धरती पर गिर पड़ती है ।
अपनी प्राणप्यारी पत्नी इन्दुमती के गिरते ही राजा अज
भी मूर्छित हो पृथ्वीपर गिर पडा। राजा की मूर्छा तो सेवको के अनेक
उपायो, पखे की वायु आदि से दूर होगई परन्तु रानी इन्दुमती
सदैव के लिये मूर्छित हो सोगई ।
दाम्पत्य प्रेम की अद्भुत कथा २३
प्रतियोजयितव्य वल्लकी,
समवस्थामथ सत्व विप्लवात् ।
स निनाय नितान्तवत्सलः,
परिगृह्योचितमंकमङ्गनाम् ॥
तब चेतना दूर होजाने से बिना तार चढ़ी वीणा के समान
उस प्रिया को पति प्रेमी ने उठाकर अत्यन्त प्यार से गोदी
मे रखा ।
पतिरङ्क निषण्णया तया,
करणापायविभिन्न वर्णया ।
समलक्ष्यत विप्रदाविलां,
मृगलेखामुषसीव चन्द्रमाः ॥
पति की गोद मे रक्खी हुई, इन्द्रियो के अभाव से विपरीत
रंगवाली (प्यारी) से वह (अज) प्रात'काल मे मलिन मृगचिन्ह लिये
चन्द्रमा के समान दिखाई दिया ।
कुसुमान्यपि गात्रसंगमा-
त्प्रभवन्त्यायुरपोहितुं यदि ।
न भविष्यति हन्त साधनं,
किमिवान्यत्प्रहरिष्यतो विधेः ॥
२४ भूमिका
जब फूल भी शरीर के संग से आयु का नाश करने को
समर्थ है तो खेद है कि मारने वाले दैव का साधन और कौन सी
वस्तु न होगी।
स्रगियं यदि जीवितापहा,
हृदये किं निहिता न हन्ति माम्
विषमप्यमृतं क्वचिद्भवे-
दमृतं वा विषमीश्वरेच्छया ॥
राजा अज बोला यदि यह माला ही जीवन को नष्ट करनेवाली
है तो हृदय पर रक्खी हुई मुझे क्यो नही मारती, कही विष भी
अमृत होजाता है और कही अमृत भी विष होजाता है।
अथवा मम भाग्यविप्लवा-
दशनिः कल्पित एष वेधसा ।
यदनेन तरुर्न पातितः,
क्षपिता तद्विटपाश्रिता लता ॥
राजा अज फिर कहने लगा, क्या मेरे खोटे भाग्य से विधाता
ने इस माला को वज्र कर दिया है जिसने वृक्ष को न मारकर वृक्ष
के आश्रित लता का नाश किया।
कृतवत्यपि नावधीरणा-
मपराद्धेऽपि यदा चिरं मयि ।
राजा अज और रानी इन्दुमती का दाम्पत्य प्रेम
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दांपत्य प्रेम की अद्भुत कथा २५
कथमेकपदे निरागसं,
जनमाभाष्यमिमं न मन्यसे॥
राजा अज पागल की समान उस मरी हुई अपनी प्राण
प्यारी से कहने लगा—मेरे बहुत अपराध करने पर भी जब तूने
मेरा तिरस्कार नहीं किया फिर अब एकाएकी अपराध रहित
अर्थात् बिना अपराध किये ही इस जन (मुझ) को बोलने के
योग्य क्यों नहीं समझती कि मुझसे बोले। इस प्रकार राजा
अज अपनी प्राण प्यारी स्त्री के वियोग में नाना प्रकार से विलाप
करते हुए कहता है:—
ध्रुवमस्मि शठः शुचिस्मिते,
विदितः कैतववत्सलस्तव ।
परलोकमसंनिवृत्तये,
यदनापृच्छ्य गतासि मामितः ॥
हे उज्ज्वल हसने वाली ! तूने निश्चय ही मुझे कपट से प्यार
करने वाला शठ जाना इसी कारण मुझसे बिना पूछे ही तू
फिर न आने के लिये मुझे छोड़कर परलोक को चली गई।
दयितां यदि तावदन्वगा-
द्विनिवृत्तं किमिदं तया विना ।
३६ भूमिका
सहतां हतजीवितं मम,
प्रबलामात्मकृतेन वेदनाम् ॥
यह मेरा नष्ट जीवन यदि प्यारी के पीछे चला गया था तो
फिर किस निमित्त लौट आया अब अपने कर्मों का प्रबल दुःख सहे।
इन्दुमती के मरते ही राजा अज भी मूर्छित हो गया था
परन्तु सेवकों ने पंखा आदि उपायो से उसे सचेत किया इसी
लिये वह कह रहा है कि मैं तो प्यारी के साथ ही चला गया
था फिर क्यों लौट आया ।
मनसापि न विप्रियं मया,
कृतपूर्वं तव किं जहासि माम् ।
ननु शब्दपतिः क्षितेरहं,
त्वयि मे भावनिबन्धना रतिः ॥
राजा अज फिर कहता है—मैंने पहिले कभी मन से भी तेरा
अप्रिय कार्य नहीं किया फिर तू मुझे क्यो त्यागती है, पृथ्वीपति
तो मै नाममात्र से हूँ मनकी प्रीति तो तुझ मे ही है ।
हे प्राण प्यारी ! फूलो से गुथी टेढी काली अलको को कंपा-
कर वायु मेरे मनको तेरे लौट आने को आशावान बनाती है ।
हे प्राणेश्वरी ! मेरी बात सुन, रात्रि चन्द्रमा को फिर भी
मिलती है, चकवे को चकवी फिर मिलती है इस कारण वह दोनो
दाम्पत्य प्रेम की अद्भुत कथा २७
वियोग का दुख सहने में समर्थ हैं, सदा के निमित्त गई तू मुझे
क्यों न भस्म करेगी । मैं यह दुख किस प्रकार सहूं ।
हे हृदयेश्वरी ! बोलती क्यों नहीं, इतनी अधिक मुझसे क्यो
रूठगई है। तुझे दया नहीं आती, मैं कवसे तुझे बुला रहा हूँ तेरा
कोमल शरीर फूलों की शैया पर भी दुखता था । अव बता वह
चिता का चढ़ना कैसे सहेगा ?
हे प्रिये ! तूने आमको और प्रयगुलता को जोड़ माना
था । उन दोनों के विवाह मगल को विना किये तेरा जाना
उचित नहीं है ।
तेरा प्रफुल्लित किया अशोक जिस पुष्प को उत्पन्न करेगा
उस तेरे अलकों के भूषणरूप को मैं तेरी दाह की अजली मे
कैसे लगाऊंगा ?
ये सखी जन सब दुःख सुख की साथी हैं। द्वितीया के
चन्द्रमा की समान तेरा पुत्र है, एक तेरा ही प्रेमी मै हूँ फिर
भी तू मुझ पर दया नही करती, तेरा यह कर्त्तव्य कठोर है।
आज मेरा धीरज नष्ट हुआ, रतिक्रीड़ा मिट गई, गाना गया,
ऋतुए उत्सवहीन हुई , गहनो का प्रयोजन समाप्त हुआ. शय्या
सूनी हुई ।
तू मेरी भार्या, बुद्धि देने मे अर्थात् सलाह् देने मे सहायक,
एकान्त की सखी, गान आदि विद्याओ की अच्छी प्यारी शिष्या
थी । तुझे कठोर मृत्यु ने हर कर बता मेरा क्या नही विगाडा
अर्थात् सब कुछ हर लिया ।
सब प्रकार का ऐश्वर्य (सुख) होने पर भी तेरे बिना अज
का सुख यहीं पर आज समाप्त हो गया क्योंकि मेरे सब सुख
तेरे ही साथ थे ।
इस प्रकार शोक मे ग्रसित कोशलपति अज ने प्यारी स्त्री के
निमित्त शोक करके वृक्षो की शाखाओं को उनसे चूते हुए रस
के आंसुओ से रुदन कराया अर्थात् अज के विलाप को सुनकर
वृक्षो की शाखाओ से भी आसू टपकने लगे ।
वड़ी कठिनाई से, अनेक उपायों से राजा अज ने गोद से
इन्दुमती को छुडाया और उसी माला से उसका श्रृंगार कर
अगर चन्दन आदि की चिता बनाकर उसकी मृतक्रिया की ।
राजा अज को अपनी पत्नी इन्दुमती इतनी प्यारी थी कि
वह उसके साथ ही मरने को तैय्यार था परन्तु यह विचार कर
कि ससार कहेगा राजा अज विद्वान होकर भी स्त्री के पीछे मर-
गया इस कलक के भय से उसने अपने शरीर को अग्नि में न
जलाया, कुछ जीने की इच्छा या प्राणो के मोह से नही ।
राजा अज को इस प्रकार स्त्री के प्रेम में व्याकुल सुनकर
महर्षि वशिष्ठ जी ने अपने शिष्य को राजा अज को समझाने के
लिये भेजा क्योंकि वशिष्ठ जी यज्ञ कर रहे थे इसलिये स्वयं न
जासके । वशिष्ठ जी के शिष्य ने आकर राजा अज को बहुत
समझाया परन्तु उसके शोक को दूर न कर सका । बहुत समझाने
पर राजा अज ने कह दिया कि ऐसा ही करू गा । यह कह कर
अज ने वशिष्ठ के शिष्य को बिदा किया ।
दाम्पत्य प्रेम की अद्भुत कथा २६
राजा अज पत्नी वियोग में चिन्तित रहने लगे और अपने पुत्र
दशरथ को बालक समझकर उन्होंने शरीर को रखना (जीवित
रहना) उचित समझा। प्यारी सी इन्दुमती का चित्र देखने और
उसे स्वप्न में देखकर क्षणमात्र संयोग के आनन्द से जैसे तैसे
अज ने आठ वर्ष व्यतीत किये।
राजा अज ने अच्छी प्रकार सिखाये, धनुर्धारी कुमार
दशरथ को प्रजा की रक्षण विधि में शास्त्रानुसार उपदेश करके
स्वयं अपने शरीर को त्यागने की इच्छा से अन्नखाना छोड़ दिया।
राजा अज गगा और सरयू के जलों के सगम तीर्थ में
शरीर त्याग कर शीघ्र देवलोक मे जा, पहिले शरीर से अधिक
शोभायमान सुन्दरी भार्या के साथ फिर नन्दन वन के क्रीडा
मन्दिरों मे विलास करने लगे।
पिता के स्वर्गवास होने पर दशरथ ने राज्य किया। राजा
दशरथ महापराक्रमी यशस्वी धर्मिक उदार और सत्यवादी न्यायी
प्रजा पालक राजा हुए।
ऊपर के वर्णनों से इस बात का पता अच्छी तरह चलता है
कि वास्तव में दाम्पत्य प्रेम क्या है और उसका कितना महत्व है।
साथ ही यह पता चलता है कि दाम्पत्य प्रेम का असर सन्तान
पर कितना सुखकर पड़ता है। दाम्पत्य प्रेम में बधने वालों की
ही सन्तान हृष्ट पुष्ट सुन्दर स्वरूपवान और निरोग रहती है।
इसलिये नारी जाति के महत्व को समझते हुये प्रत्येक गृहस्थ को
सुदृढ़ दाम्पत्य प्रेम रखकर गृहस्थाश्रम का आनन्द लूटना चाहिये।
३० भूमिका
दाम्पत्य प्रेम का प्रभाव
यह दाम्पत्य प्रेम का ही प्रभाव था कि राजा दशरथ के ही
समान उनके पुत्र श्री रामचन्द्र भी हुए और उन के पुत्र लव और
कुश भी वैसे ही पराक्रमी तेजवान और कीर्तिवान हुए।
उत्तम सन्तान उत्पन्न करने के लिये पति पत्नी में गाढ़ प्रेम
रहना सबसे जरूरी है दाम्पत्य प्रेम स्वर्ग का भी दुर्लभ पदार्थ है।
उत्तम सन्तान की प्राप्ति की इच्छा रखने वाले पति पत्नी दोनो
को प्रेम से रहना चाहिये। जिस प्रकार पत्नी के लिये शास्त्रकारों
ने पातिव्रत धर्म्म का पालन करना आवश्यक बतलाया है उसी
प्रकार पति को भी पत्नीव्रत करना बतलाया है।
दोनो को अपने अपने व्रत पालने से ही उत्तम सन्तान उत्पन्न
होती है। जहां पति पत्नी में प्रेम नहीं होता और पत्नीव्रत तथा
पतिव्रत का पालन नहीं होता वहां सन्तान भी ठीक नहीं होती।
व्यभिचारी तथा विषयी पति की सन्तान भी वैसी ही दुर्गुणों वाली
होती है। पर स्त्री गमन करने वाले व्यभिचारी कहे जाते हैं और
अपनी स्त्री से नियम विरुद्ध रात दिन विषय करने वाले विषयी
कहे जाते हैं। वीर्य को नष्ट करने में दोनों एक ही समान हैं। इस
लिये उत्तम सन्तान की इच्छा रखने वाले को नियम पूर्वक केवल
अपनी ही स्त्री से प्रेम रखकर रतिक्रिया करनी चाहिये। जिससे
सन्तान आरोग्य और दीर्घजीवी हो। दाम्पत्य प्रेम का जो बड़ा
भारी प्रभाव सन्तान पर पडता है वह प्रभाव कई पुश्तों तक वैसा