विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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श्री रामचन्द्रजी का आदर्श प्रेम १६
चाहस थी तू ही एक मेरे दिल के सरूर की ॥
सम्बुल में शय है जुल्फे चलापा की बू नहीं ।
शमशाद में भी कामते जेवा की बू नहीं ॥
फूलों में वनके तुझ गुलेराना की बू नहीं ।
कलियां महक रही हैं पै सीता की बू नहीं ।
उजड़ा हुया पड़ा हे मेरा आश्रम दरेग ।
किससे कहूं मैं जाके हाय अपना गम दरेग ॥
थी जिसके मुह की चांद सी शोभा किधर गई ।
प्यारी थी जिसकी जुल्फे चलीपा किधर गई ॥
ऐ काश सारे वनके पखेरु पनाय दो ।
देखा हो तुमने जाते तो आहू जवाब दो ॥
पत्ता भी बन का आह कोई डोलता नहीं ।
भौंरा समेग फूल पै है बोलता नहीं ॥
तूती भी मुंह में कन्द जरा बोलता नहीं ।
कोई भी मेरे दिल की गिरह खोलता नहीं ॥
सीता का किससे जाके में पूछू निशान हैफ ।
कांटों की हाय भरकी भी चुप है जवान हैफ ॥
जङ्गल की चलने वाली हवाओ जवाब दो ।
सीता को जल्द ढूंढ के आयो जवाब दो ॥
मेरे जिगर की आग बुझाओ जवाब दो ।
तुमही तो तर्स खाओ लताओ जवाब दो ॥
बोलो तुम्हीं तुम्हें तो है पत्तो जया मिली ।