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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २६६
इस विषय मे मुझे इतना ही कहना है कि ऐसी पुस्तकों ने
और भी अधिक विषय की ओर स्त्री पुरुषों का ध्यान आकर्षित
किया है। अतएव हमारे देश के विषयी स्त्री पुरुषों की विषय
वासना और भी अधिक बढ़ती जाती है यह कारण भी देश के
बालको की रोगी तथा मृत्यु संख्या अन्य देशो के बालको की
रोगी तथा मृत्यु संख्या से अधिक होने का है।
सोलहवां कारण
जब स्त्री की इच्छा रतिक्रिया की नही है तब रतिक्रिया
करने से जो गर्भरहता है उससे गर्भस्राव व गर्भपात होजाता
है और यदि सन्तान हुई भी तो रोगी निर्बल दुर्बल होती है।
अधिक रतिक्रिया से स्त्री का रज क्षीण तथा निर्बल पड़जाता है।
तथा गर्भाशय के बधन ढीले पड़जाते हैं ऐसी दशा मे यदि गर्भ-
स्राव व गर्भपात हो गया और यदि सन्तान हुई तो रोगी
निर्बल तथा अल्पायु होती है। यह भी कारण हमारे देश की
बालकों की रोगी तथा मृत्यु सख्या की अधिकता का है।
सत्तरहवां कारण
उत्तम सन्तान उत्पन्न होने की इच्छा से पुरुष रतिक्रिया
करते ही नही, केवल इन्द्रियो की वासना की पूर्ति के लिये रति
क्रिया करते हैं, इसी कारण विधि का विचार भी नही करते
अतएव सन्तान रोगी और अल्पायु होती है।

३०० आनन्द मन्दिर
अठारहवां कारण
गर्भ रहजाने पर गर्भवती नियम पूर्वक नहीं रहती। आहार
विहार का नियम ठीक नही रखती इस कारण सन्तान होते
समय कष्ट भी अधिक होता है और सन्तान भी रोगी होती है तथा
कम अवस्था मे ही मरजाती है।
उन्नीसवां कारण
बालक होते समय मूर्खा दाइयों की असावधानी से बालक
की ठीक सम्हाल नहीं होतो इस कारण बहुधा जच्चा और बच्चा
दोनों के प्राण संकट मे पड जाते हैं। बहुततेरे बालक सोवर मे ही
काल का कलेवा बनजाते हैं और जच्चा को भी बडा कष्ट होता है
दाई की असावधानी और मूर्खता से प्राय जच्चा को प्रसूत रोग
होजाता है और भी अनेक प्रकार के गर्भाशय के रोग उत्पन्न
होजाते हैं। प्रसूत रोगवाली स्त्री के सन्तान तो बराबर होती
जाती है परन्तु वह रोगी और निर्बल दुर्बल होती है।
प्रसूत रोग अधिक दिन का होजाने से तपेदिक का रूपधा-
रण करती है और ठीक इलाज न होने से वह स्त्री जीवन लीला
समाप्त करजाती है। तपेदिक वाली रोगी स्त्री के भी सन्तान
होती है परन्तु वह भी इसी प्रकार के रोगों से ग्रसित रहती है।
और अन्त को तपेदिक के रोग से ही मरती है। विषयी पुरुष
इस बातकी कुछ भी परवाह नही करते। स्त्री को कुछ भी रोग हो
वे अपनी विषय वासना की तृप्ति करने में मस्त रहते हैं।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३०१
बीसवां कारण
पति पत्नी मे सच्चा प्रेम नही होता। मेरे पास जितनी स्त्रियां
इलाज के लिये अब तक आईं और आया करती हैं सब की ही
प्रायः यह शिकायत रहती है। सैकड़ा पीछे पांच ही ऐसी मिलेंगी
जिनमे इस विषय की शिकायत न हो कि हमारे पति जैसा
चाहिये मुझसे वैसा स्नेह रखते हैं। हमारी इच्छा हो या न हो इसकी
कुछ परवाह नहीं। हमारी बीमारी की कुछ भी परवाह नही। केवल
विषय ही करना जानते हैं, सो भी शीघ्रपात के कारण इच्छा
पूरी नही हो पाती। पुरुषों के शीघ्रपात के कारण स्त्रियों को हिस्ट्रिया,
रज विकार, प्रदर आदि अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं इसी कारण
सैकड़ा पीछे निन्यानवे स्त्रियां रोगी पाई जाती हैं ।
इसी प्रकार के और भी कारण बालकों की अधिक रोगी
तथा मृत्यु संख्या के है क्योकि माता पिता दोनो का रजवीर्य
दूषित होने के कारण सन्तान रोगी होती है, जो स्त्री पुरुष अपनी
आरोग्यता का नियम ठीक रखते हैं और अहार विहार का नियम
ठीक तरह से पालन करते हैं उनकी सन्तान आरोग्य हृष्ट पुष्ट
और दीर्घ जीवी होती है ।
इक्कीसवां मुख्य कारण
स्त्री पुरुषों की अधिक रोगी संख्या तथा रोगी माता पिता से
रोगी सन्तान उत्पन्न होने का विशेष और मुख्य कारण यह है कि

३०२ आनन्द मन्दिर
स्त्री पुरुषों को विषय की ओर अधिकता से लेजाने वाले अनेक
उपन्यास और कामशास्त्र की पुस्तकें अनेक चटपटे नामों से बड़ी
तेजी के साथ तय्यार हो रही हैं उनमें विषय वासना की ओर
स्त्री पुरुषों को ले जाने के अनेक मनगढत उपाय बतलाये गये हैं।
शास्त्रों का उदाहरण देकर लोगों को विश्वास दिलाया गया है कि
यह शास्त्रकारो ने आज्ञा दी है।
शास्त्रकार कभी इस प्रकार का उपदेश कर ही नही सकते
कि जिससे व्यभिचार का प्रचार हो और स्त्री पुरुष अधिक विषय
वासना में पड़कर रोगी हो रोगी सन्तान उत्पन्न करे। इसप्रकार
के शास्त्रकारों के उपदेश परमात्मा की सृष्टि में बाधा पहुँ-
चाते हैं। अतएव शास्त्रकारों का नाम लेकर ऐसी विषय की पुस्तकों
को लिखने वाले केवल अपने स्वार्थ के लिये ऐसा कर रहे हैं, मनुष्यों
का उनसे कुछ लाभ नही बल्कि हानि हो रही है। अज्ञानी विषयी
लोग उन पुस्तको से उपदेश ग्रहण कर अपने पैरों मे आपही
कुल्हाड़ा मार रहे हैं और अपने जीवन को मृत्यु के मुह में लिये
जारहे हैं। मान लीजिये किसी विषयी पुरुष ने कोई ऐसा विषय
लिख भी दिया तो बुद्धिमान विद्वान लोगो को उससे बचना ही
चाहिये, प्रचार करके जीवन शक्ति को नष्ट न करना चाहिये।
पाश्चात्य देशों मे पर स्त्रीगमन मादक द्रव्यों का अधिक
सेवन सब प्रकार के जीवो का मांस आदि खाना हितकारी और
उचित समझा गया है। वहा तो चित्त को प्रसन्न रखना स्त्री पुरुष
दोनों की स्वास्थ्य रक्षा का पहिला नियम है।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३०३
पाश्चात्य देशो मे कोई पुरुष बिना स्त्री की इच्छा के सभोग
सम्बन्धी कोई बात तक नही कर सकता । यदि स्त्री की इच्छा के
विरुद्ध कोई काम पति करता है तो वह पति को तलाक दे देती
है । इसीप्रकार के केस योरुप मे प्रति दिन बीसों हुआ करते
हैं । बीबी तलाक देकर दूसरी जगह चैन करती है । मियां मुंह
ताकते रहजाते हैं। बहुत छोटी छोटी बातों मे योरुप की स्त्रियां पति
को तलाक दे देती हैं। योरुप मे विवाह का कोई महत्व नही है, वहाँ
स्त्रियो या पुरुषों को सन्तान होने की भी अधिक लालसा यहां
की भांति नही रहती । वहां का विवाह बन्धन, बन्धन नही समझा
जाता, जब चाहे स्त्री पति को छोड़ सकती है ।
योरुप की स्त्रियो के विषय मे कुछ लिखना व्यर्थ है । सभी
भारतवासी जानते हैं उनका उदाहरण यहां की स्त्रियों से नहीं
दिया जासकता । रतिक्रिया के विषय मे योरुप की स्त्रियों का
उद्धारण देना तथा योरुप के विद्वानो के मत का उदाहरण देना
बड़ी भारी भूल है । वहां के स्त्री पुरुषो का खान पान रहन सहन
आचार विचार सामाजिक रीति व्यवहार वहां के जल वायु और
प्रकृति तथा रीति रिवाज पर निर्भर है । अतएव जितनी पुस्तके
रतिक्रिया विषय की अबतक बनी हैं, प्रायः योरुप की ही स्त्रियो
और पुरुषो के ग्रन्थो के आधार पर लिखी गई हैं । इसीलिये ऐसी
पुस्तको से हमारे देश के स्त्री पुरुषो को हानि के सिवाय लाभ
कभी नही हो सकता ।
इस विषय की पुस्तको मे जो विषय होना चाहिये जिसके

३०४ आनन्द मन्दिर

न जानने से रतिक्रिया सम्बन्धी बड़ा भारी अज्ञान फैला हुआ है
सैकड़ा पीछे निन्यानवे स्त्रियां रोगी होरही हैं और पुरुषों की भी
रोगी संख्या कम नहीं है। इसी कारण हमारे देशके बालकों की
रोगी तथा मृत्यु संख्या अधिक है। इसलिये रतिक्रिया और गर्भा-
धानक्रिया की विधि धर्म शास्त्र और वैद्यक शास्त्र तथा काम
शास्त्र के अनुसार विस्तार पूर्वक लिखी जाती है। आशा है पाठक
इसी के अनुसार गर्भाधान क्रिया कर आरोग्य, और हृष्ट पुष्ट तथा
मनमानी सुन्दर सन्तान उत्पन्न करेंगे और पति पत्नी स्वयं
आरोग्यता प्राप्त करेंगे।
माता पिता के व्यभिचार और अधिक विषय तथा अनियम
रतिक्रिया का प्रभाव जो सन्तान की आत्मा और शरीर पर पड़ता
है और उसका जो भयंकर परिणाम समाज को भी भोगना पड़ता
है वह बड़ा दुखदाई होता है। बेचारे अनाथ बेकसूर बालक माता
पित के अपराधों के शिकार होकर जन्म भर दुख भोगते हैं और
माता पिता की अच्छी याद करते हैं। इसका विशेष वर्णन आगे
किया जावेगा।

स्त्री बाये पैर से पलंग पर चढ़े। पृ० ३५२ (सर्वाधिकार सुरक्षित)

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आनन्द
मन्दिर
बारहवां अध्याय
—:०:—
२०

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३०७
आरोग्यता
शास्त्रकारों ने बतलाया है:—
शरीरे सर्वधातूनां सारं वीर्य प्रकीर्तितम् ।
तदेव चौजस्तेजश्च बलं कांतिःपराक्रमः ॥
यस्मिञ्छुद्धे शरीरस्य गतिः शुद्धा भवेत्तदा ।
ब्रह्मचर्यदशायां हि क्षीणे क्षीण पराक्रमः ॥
धैर्य तेजो विरहितः रोगग्रस्त कलेवरः ।
सारहीनं यथा वस्तु तथैव स नरः स्मृतः ॥
ऊपर लिखे श्लोको का अर्थ यह है कि मनुष्य के शरीर में सब
धातुओ का सार वीर्य ही माना जाता है। वही वीर्य तेज, वल,
कान्ति, पराक्रम और पुरुषत्व रूप से शरीर में विराजमान रहता
है, जिसके शुद्ध रहने से शरीर की सब प्रकार से शुद्धि रहती है,
ब्रह्मचर्य अवस्था में वीर्य के क्षीण होने से मनुष्य का शरीर परा-
क्रम, तेज, बल, धैर्य और पुरुषार्थ से हीन होकर अनेक रोगों
का घर बन जाता है, जैसे सारहीन पदार्थ रद्दी ( बेकाम ) हो
जाता है वैसे ही वीर्य से हीन पुरुष का पुरुषार्थ है। इसीलिये
महात्माओं ने मनुष्य के हित के लिये कहा है कि:—
आहारस्य परं धाम वीर्य तद्रक्ष्यमात्मनः ।
क्षयोयस्य बहून् रोगान्मरणं च नियच्छति ॥

३०८ आनन्द मन्दिर
इसका अर्थ यह होता है कि संसार में इस लोक और पर-
लोक का सुख चाहने वाले बुद्धिमान पुरुषो को आहार के उत्तम
प्रभाव भूत अपने वीर्य की सब तरह से रक्षा करनी चाहिये
क्योकि वीर्य का क्षय होने से अनेक रोग पैदा होते हैं और अन्त
मे कम अवस्था मे ही मृत्यु हो जाती.है।
इसलिये मनुष्य मात्र को अपने जीवन सुधार और मनुष्य
जीवन का सच्चा सुख प्राप्त करने के लिये ध्यान रखना चाहिये।
आरोग्यता के लक्षण
आरोग्यता के लक्षण आयुर्वेदाचार्य धन्वन्तरी के शिष्य
सुश्रुत जी ने इस प्रकार लिखे हैं “जिस मनुष्य का दोष वात,
पित्त, कफ, अग्नि, जठराग्नि, धातु, रस, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा,
शुक्र, मल विष्टा, मूत्र, पसीना आदि की क्रिया सम अर्थात्
यथार्थ भाव पर हो, और जिसकी आत्मा तथा मन प्रसन्न हो उसको
आरोग्य कहते हैं। यदि उपरोक्त वात, पित्त आदि दोषो की
असमानता और आत्मादि की अप्रसन्नता हो तो रोग कहते हैं।
एक जगह लिखा है कि “रोगस्तु दोष्यम्” दोष यद्यपि ऋतुओ के
परिवर्तन और हीन मिथ्या अति योग से जैसे कि वर्षा ऋतु मे
जल का न पड़ना यह हीन योग कहा जाता है, उसी ऋतु मे
शीत का होना यह मिथ्या योग और वर्षा का अधिक होना यह
अतियोग कहा जाता है। ऐसे योग असमान होकर रोगोत्पत्ति करते
हैं। तथापि जैसा बिगाड़ हम लोगो के मिथ्या आहार बिहार द्वारा

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३०६
होता है, वैसा ऋतुओं के परिवर्तन से नहीं होता है और उपरोक्त
दोष आदिको मे परस्पर ऐसा दृढ़ संबन्ध है कि दोष के बिगड़ने
से अग्नि आदि भी बिगड़ जाती हैं और मनुष्य नाना प्रकार के
रोगों से ग्रसित हो जाता है इसलिये इनको आरोग्य शास्त्र के
अनुसार समभाव पर रखने का निरंतर यत्न करना चाहिये,
तभी मनुष्य आरोग्य रह् सकता है ।
मिथ्या आहार विहार
मिथ्या आहार विहार के विषय मे संक्षेप से वर्णन किया
जाता है जिससे मनुष्य मात्र मे रोग फैले हुए हैं। बात यह है कि
स्नान, कसरत, स्त्री संग आदि यावत् विहार लोग अपनी शक्ति
से अधिक करते हैं अथवा शक्तिमान होकर भी जो नही करते
उसी को मिथ्या विहार कहना चाहिये ।
उदाहरणार्थ.—घण्टों तक स्नान करना या परिश्रम करने
के पश्चात् तत्काल ही स्नान करना अथवा दिन मे कई बार स्नान
करना, जैसा कि कोई कोई मल मूत्रोत्सर्ग के पश्चात् भी किया
करते हैं। यह शक्ति से अधिक स्नान हुआ और स्नान करना ही
नहीं यह शक्तिमान होकर भी न करना है। इसी प्रकार कसरत
आदि में भी जानना चाहिये । सम्प्रति संपूर्णा प्रकार के मिथ्या
विहारों मे अनैसर्गिक उपायो से शुक्र ( जो शरीर का राजा है।
जैसे प्रान्तिक राजाओं के विनाश से अनेक शत्रु उस प्रान्त
में अशान्ति फैला देते है उसी प्रकार वीर्य नाश से इस शरीर

३१० आनन्द मन्दिर

में दुख रूपी शत्रु अशान्ति फैला देते हैं) का अपरिमित व्यय
पाया जाता है।
यह प्रथम ही लिखा गया है कि दोष अग्नि आदि मे दृढ
संबन्ध होने के कारण एक के न्यूनाधिक होने से प्रायः सब ही
असमान हो जाते हैं और इनकी असमानता ही को रोग कहा
जाता है। बहुत दुःख के साथ लिखना पडता है कि ऐसे अमूल्य
पदार्थ का जो सम्पूर्ण पुरुषार्थों का देने वाला है, उसको क्षणिक
सुख (जिसका परिणाम दुःख ही दुख है) के लिये हमारी
धर्म माता व वहिने व पुरुष आदि स्वभाव विरुद्ध कर्मों मे व्यय
करते हैं। हाय, हाय वे लोग नहीं जानते कि किया हुआ
आहार क्रिया विशेष द्वारा परिपक होकर रस से रक्त, रक्त से
मास, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा होता है और
पुनः पचकर ४० दिनो मे शुक्र (वीर्य) रूप धारण करता है।
इसलिये मनुष्य मात्र को वीर्य की रक्षा करनी चाहिये। देखो पशु
पक्षी भी नियमित काल मे शुक्र का पतन करते हैं। क्या आप उन
से भी अज्ञान हैं जो अपने आपही अपने पैर में कुल्हाड़ी मार
कर जीवन नष्ट करते हैं।
यही शुक्र अन्य छहों धातुओं का अन्तिम परिणाम है और
इसी के अधिक व्यय से शरीर नाना प्रकार के रोगो से रुग्ण
रहता है और मनुष्य पुरुषार्थहीन हो जीवन पर्यन्त रोगी रह
कर तथा रोगी निर्बल दुर्बल सन्तान उत्पन्न कर दुःखमय जीवन
व्यतीत करता है।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३११
शरीर रक्षा
इस जगत में अपने शरीर की रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का
पहिला काम है क्योंकि शरीर की रक्षा से मनुष्य जो जो काम
करना चाहता है वह कर सकता है। शरीर की रक्षा के लिये
आयुर्वेद मे कहे हुए नियमो के ज्ञान की और उन नियमो के
अनुसार बरतने की बहुत आवश्यकता है। कारण कि वैद्यक शास्त्रो
में कहे हुए नियमों के जानने के सिवाय और उनके बरतने के
सिवाय और किसी तरह से शरीर की रक्षा नही हो सकती।
आयुर्वेद में शरीर की रक्षा के निमित्त बहुत से नियम देखने
में आते हैं परन्तु उन सब मे ब्रह्मचर्य हो मुख्य होने से उसका
वर्णन इस पुस्तक मे भी कुछ किया गया है। ब्रह्मचर्य का
ठीक ठीक पालन करने से वीर्य की रक्षा होती है और वीर्य की
रक्षा से शरीर की रक्षा होती है इसलिये पहिले ब्रह्मचर्य के
सामान्य स्वरूप और उसके प्रकार जानने की जरुरत है।
ब्रह्मचर्य का सामान्य स्वरूप
मन को स्त्री के ख्यालात से दूर रखना, स्त्रियों के साथ बात-
चीत न करना, काम विकार के नेत्रों से उनकी ओर न देखना,
और शरीर से उनका स्पर्शमात्र भी न करना यह ब्रह्मचर्य का
साधारण स्वरूप है।
यह ब्रह्मचर्य आठ तरह का है। जो पुराने समय में लगभग
आठ वर्ष से चौबीस वर्ष की आयु तक विद्याभ्यास के साथ ही

३१२ आनन्द मन्दिर
साथ पालन किया जाता था। जब अच्छी तरह से आठों प्रकार का
ब्रह्मचर्य पालने मे आता था तब चौबीस वर्ष की उमर तक पुरुष
अपने वीर्य को रोक लेते थे और किसी तरह की काम वासना के
अभाव से उन दिनों पुरुषो का वीर्य उस बड़ी उमर में जाकर
पकता था, परन्तु आज काल के समय मे प्रथम कहे हुए ब्रह्मचर्य
का यथार्थ पालन नहीं होने से पुरुष के वीर्य का नाश लगभग
१०-१२ वर्ष की उमर से ही शुरू हो जाता है।
बिना पके हुए कुछ वीर्य के निकलन से ही मनुष्य के वल
बुद्धि, पराक्रम, उत्साह, तेज, स्मरण शक्ति ( याददास्त ) इत्यादि
नाश होते है और दूसरे कितने ही भयकर रोग लगजाते हैं।
इसीलिये ससार सुख, आरोग्यता और बड़ी आयु चाहने वाले
पुरुषों को ब्रह्मचर्य अवश्य ही पालन करना चाहिये।
ब्रह्मचर्य के आठ प्रकार
ब्रह्मचर्य के आठ भेद हैं जिसका वर्णन मैं नीचे लिखती हूँ।
( १ ) स्त्रियो की याद न करना, ( २ ) स्त्रियों के गुण का
वर्णन न करना, ( ३ ) स्त्रियों के साथ रमण न करना, ( ४ )
स्त्रियो को काम की दृष्टि से न देखना, ( ५ ) स्त्रियों के साथ
अकेले में चुप चाप बात न करना, ( ६ ) स्त्री सम्बन्धी कल्पना
मन मे न लाना, ( ७ ) स्त्रियों के सम्बन्ध मे किसी प्रकार का
मिलने वगैरह का निश्चय न करना और ( ८ ) स्त्रियों से शारीरिक
संग न करना।

प्रेमालिङ्गन । पृ० ३५३ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३१३
ब्रह्मचर्य के अमूल्य गुण
ऊपर कहे हुए आठ प्रकार के ब्रह्मचर्य का यथार्थ पालन करने
मे पुरुष के पके हुए वीर्य का ठीक उमर मे व्यय होता है केवल
ऐसाही नहीं, परन्तु बहुत दिन तक रोका हुआ वीर्य पुरुष के बल,
बुद्धि, वर्ण, कांति को बढ़ाकर शरीर के अंगों को मजबूत करता
है और आत्मा को आनन्द का अनुभव कराते हुए दुनियादारी के
कामों में उत्साह देकर लम्बी आयुष्य देता है। इससे उलटी रीति
से यदि मनुष्य अपने वीर्य को बिना पके हुए उसका खर्च करने
लग जाता है तो उस दशा मे शरीर की नसे शिथिल होजाती
हैं, मन बेचैनी मे रहता है, कामकाज मे नहीं लगता है और अन्त
में जिन्दगी के बिगड़ने से मनुष्य मौत के पंजे मे फंस जाता है।
प्राचीन काल में ब्रह्मचर्य
प्राचीन काल मे ब्रह्मचर्य पालन के साथ विद्याभ्यास होता था
और यह रिवाज जितना फैला हुआ था उतनी ही देश की स्थिति
उन्नत थी परन्तु समय के फेर मे जैसे जैसे ब्रह्मचर्य का लोप
होता गया वैसे वैसे देश की बहुत ही हीन अवस्था होने लगी।
प्रचीन काल मे स्त्रियां १६ वर्ष तक और पुरुष २४ वर्ष तक अष्ट-
विध ब्रह्मचर्य का पालन करते थे और कितने ही के ४८ वर्ष
तक ब्रह्मचर्य पालने के उदाहरण मिलते हैं। इसका इतिहास से
पता चलता है। परन्तु दुःख है वह समय चला गया, अब तो
आठ या दस वर्ष की उमर के बालक बालिकाओं का विवाह

३१४ आनन्द मन्दिर
देखने में आता है। प्रथम तो आठ वर्ष की उमर में अपनी
जाति की रीति के अनुसार उपनयनादि सस्कार होता था फिर
विद्याभ्यास आरभ होता था। भारत वर्ष के अधिकांश नर नारी
इसप्रकार कम से कम १६ और २४ वर्ष ब्रह्मचर्य का पालन तो
किया ही करते थे ।
आदि कवि वाल्मीकि कृत रामायण तथा महात्मा व्यास
कृत महाभारत को देखने से मालूम होता है कि हनुमान और
भीष्म पितामह जीवन पर्यंत ब्रह्मचारी रहे थे। उन्होने असाधारण
और मनुष्य की कल्पना मे न आने योग्य जो २ पराक्रम किये थे
सब केवल उनके ब्रह्मचर्य का ही प्रभाव था । श्री हनुमान जी
का जीवन चरित्र तो सब जानते ही होंगे कि जो अपने स्वामी
श्रीरामचन्द्र की आज्ञा मानकर ब्रह्मचर्य के प्रभाव से मनुष्यों को
अचम्भे मे डालने वाले सौ योजन लम्बे समुद्र को तैर कर
पार कर गये थे और जिन्होने असख्य बलवान राक्षसो के बीच
में अपनी अलौकिक शक्ति दिखाकर रावण जैसे महावीर योद्धाओ
को जीतकर ऐसा काम कर दिखाया था कि जिससे सारी पृथ्वी
में उनका नाम आज तक शूरवीरो की गणना मे पहिले आता है।
और सब जिसके ब्रह्मचर्य की धाक मानते हैं ।
उसी तरह भीष्म पितामह का वृत्तान्त भी सब लोगों को
मालूम होगा कि जिन्होने महाभारत के युद्ध में कौरवो की रक्षा
के लिये उनका पक्ष स्वीकार कर श्रीकृष्ण जैसे रणवीर योद्धा की
प्रतिज्ञा भंग करवाकर अपनी प्रतिज्ञा अखंड कर दिखाई थी