विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३१५
उसी तरह महाराज युधिष्ठिर और अर्जुनादि जैसे महापराक्रमी
पांडवों को भी पितामह ने कितना कंपायमान कर दिया था और
अन्त मे कुरुक्षेत्र के युद्ध मे शरीर के रग २ से बांधे जाने पर
भी उनको कुछ कष्ट नहीं हुआ था, भीष्म पितामह की इस असा-
धारण शक्ति का कारण यही था कि उन्होने जीवन भर ब्रह्मचर्य
का पालन किया था । उनकी मृत्यु उनकी इच्छा से हुई थी । यह
सब ब्रह्मचर्य का ही प्रताप था ।
प्राचीन काल मे केवल पुरुष ही ब्रह्मचर्य का पालन नही
करते थे स्त्रियां भी ब्रह्मचर्य का पालन करती थी । अब तो
ब्रह्मचर्य की ओर किसी का ध्यान ही नही है ।
ब्रह्मचर्य के अभाव से हानि
आजकल के समय में पुरुष का वीर्य जल्दी पकता है इस के
अनेक कारण हैं । इसीसे बहुत समय तक अर्थात् ऊपर कहे हुये
समय तक पुरुष अपने वीर्य को नहीं रोक सकता है । इसका
कारण केवल इतना ही है कि ब्रह्मचर्य का पालन ठीक २ नहीं
हो सकता । यदि इन दिनो अष्टविधि ब्रह्मचर्य का यथार्थ पालन
करने में आवे तो पुरुष के वीर्य की पुष्टि भी बड़ी उमर मे ही
होगी यह बात हर कोई समझ सकता है ।
ब्रह्मचर्य के नियमो पर चलने वाले मनुष्य अपनी शारीरिक
सम्पत्ति की रक्षा कर सकते हैं । आरोग्यता और दीर्घ जीवन
प्राप्त कर सकते हैं इतना ही नही वरन नियमों के अनुसार
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चलने वाले अपनी भविष्य सन्तान को भी उन्नति पर पहुंचा सकते
हैं क्योंकि ब्रह्मचर्य पालन करने वाले की सन्तान पूरे २ अंगवाली,
निरोगी, हृष्ट पुष्ट, बलवान, बुद्धिमान, पराक्रमी, भाग्यशाली, और
बढ़ी उमरवाली होती है । इससे उलटी रीति मे ब्रह्मचर्य को
व्यर्थ समझ विषय व्यापार मे लगजाने वाले की सन्तान अधूरे
अङ्ग वाली, हीन वीर्य, मूर्ख, रोगी, कृश, निर्बल, पराक्रम रहित,
और कम आयु वाली होती है ।
ब्रह्मचर्य के न पालने के दो मुख्य कारण हैं एक तो आज
कल के विद्याभ्यास के ढंग की अयोग्यता और दूसरा आजकल
के विवाह आदि की बुरी प्रथा । आजकल यदि विद्याभ्यास तथा
विवाहादिक क्रम उचित रीति पर हो तो ब्रह्मचर्य का पालन
कुछ भी कठिन मालूम नही होगा । प्राचीन काल में विद्याभ्यास
तथा विवाह आदि का ऐसा अच्छा क्रम था कि बालकों
को कुछ भी कष्ट उठाये विना विद्याभ्यास, ब्रह्मचर्य पालने तथा
बहुत दिन तक वीर्य को रोक रखने का मौका सहज ही मिल
जाता था ।
इस जगह प्राचीन विद्याभ्यास का ढग और प्राचीन विवाह
क्रम पद्धति की उत्तमता दिखलाये विना हाल के विद्याभ्यास और
विवाह क्रम की अहीनता अनुभव में कदापि नही आसकती ।
अतएव संक्षेप मे यहां पर इस विषय पर प्रकाश डालना अनु-
चित न होगा और पाठक भी प्राचीन तथा नवीन शिक्षा प्रणाली
का ढंग समझ लेंगे ।
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प्राचीन विद्याभ्यास का ढंग
प्राचीन काल मे चौवीस वर्ष की आयु तक अच्छे २ शिक्षको
की देख रेख तथा निगहवानी से विद्याभ्यास कराया जाता था
और दुनियादारी के व्यवहार की वासना वालको के ऊपर असर
न करे इस निमित्त वालकों के पढ़ने के स्थान शहर या गाव से
थोडी दूर साफ हवा और पानी की जगह मे वनाये जाते
थे । जव वालक विद्याभ्यास कराने योग्य होता था तव उसके
मां वाप अथवा अन्य रक्षक उस वालक को शिक्षक की रक्षा मे
करदेते थे । उस समय मे वालक की शारीरिक सपत्ति का नाश
न हो इस वात का ध्यान रख विद्याभ्यास शुरू कराया जाता
था। विद्याभ्यास के लिये वालकों को शिक्षको के सुपुर्द कर देने
पर वहुत जरूरी कारण होने पर भी उनके मा वाप से वालको
की भेट नही होती थी कि जिनके समागम से उनके मन में
ससार की वासनाओ का अंकुर पैदा हो, ऐसे दुष्ट और दुराचारी
मनुष्यों की सोहवत मे बैठने का मौका उन वालको को कहां
मिलता था । उन विद्यालयो मे केवल नीति और धर्म सम्वन्धी ही
पुस्तके पढ़ाई जाती थी, नीति ज्ञान और धर्म सम्वधी उत्तमोत्तम
पुस्तको के सिवाय जिससे अनीत और इश्कवाजी की तरफ
उनका मन जाय अन्य पुस्तको की ओर उनकी दृष्टि भी नहीं
जाती थी । इसतरह से वालक थोड़े समय मे वहुत कुछ
अभ्यास कर लेते थे क्योकि दूसरी वातों मे वे अपना मन लगा
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न पाते थे । ब्रह्मचर्य पूर्वक केवल विद्याभ्यास में ही लवलीन रहने
वाला बालक बहुत दिन का काम थोड़े दिन में कर सकता है।
इस तरह से दी हुई शिक्षा का प्रभाव बहुत अच्छा होता
था इतना ही नही किन्तु विद्यार्थी के अन्तःकरण से जन्म
भर विद्या के संस्कार नही भूलते थे और विद्यार्थी की शारी-
रिक तथा मानसिक संपत्ति ऐसी अच्छी तरह से दृढ़ हो जाती
थी कि विद्याभ्यास के पीछे वह जो २ काम करता था उसमे
साधारणतः ही सफलता पाता था । कठिन से कठिन कार्य उसके
मार्ग में रोड़े न अटका पाते थे ।
आज कल का विद्याभ्यास
वर्त्तमान काल मे विद्याभ्यास का ढंग बड़ा ही उलटा देखने
में आता है । आजकल एक तो बालकों की शारीरिक दशा पर
बिलकुल ध्यान न देते हुये जल्दी पढ़ाने के लोभ से धैर्य न रखने
वाले माता पिता अपने बालको को आवश्यकीय खेल कूद के
आनन्द से या जिससे बालको की शारीरिक संपत्ति स्थिर होती
है ऐसे कामों से अलग रख उन्हे छोटी ही उमर में पाठशाला में
ढकेल देते हैं । ऐसा बहुधा देखा जाता है कि छोटे २ बालको
को उनकी इच्छा के विरुद्ध पाठशाला मे भेजने के कारण
पढ़ने के नाम से उनको डर लगने लगता है, और विद्या तथा
गुरु की ओर वास्तविक में जो बालकों को पूज्य दृष्टि से बर्ताव
रखना चाहिये सो उसके बदले उनकी ओर अरुचि उत्पन्न होजाती
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३१६
है, और ऐसी रीति से किया हुआ विद्याभ्यास कैसा फल देगा
इसका ध्यान हमारे प्रिय पाठक पाठिकाएं ही सोच सकती हैं।
पढ़ाने वाला कैसा चाहिये
जिनके हाथो मे अपने बालक को सौंप रहे हैं उनके सम्बन्ध
मे भी कुछ सोच लेना ज़रूरी है। जब बालक को विद्याभ्यास
कराना हो तब कुलीन नीतिवान धार्मिक विचार वाले और
विद्याभ्यास के उत्तम फल को अनुभव कर विद्यार्थी को अनु-
भव कराने वाले धर्मज्ञ शिक्षको के हाथ में पढ़ने के लिये
बालको को सौंपना चाहिये। शिक्षक (पढ़ाने वाला) केवल
अच्छा पढ़ा लिखा हो उसी पर बस नही परन्तु उसके साथ २
वह शिक्षक लोकप्रिय और सद्गुणी भी होना चाहिये क्योकि
बालक मे शिक्षक के पास बहुत दिन तक बैठने से उसके गुण
अथवा अवगुण का अनुभव बराबर देखते रहने से शिक्षक की
अच्छी या बुरी बातो का असर उसके कोमल अन्तःकरण पर
हुए बिना रहता ही नही, दुर्गुणी शिक्षक को सुपुर्द किये हुए
बालक की जिन्दगी बिल्कुल बरबाद हो जाती है इसलिये विद्या
देने वाले शिक्षक के गुण दोष की परीक्षा किये विना बालक को
उसके हाथ मे सौंपना न चाहिये।
आज कल विद्या पढ़ने वाले बालक की शारीरिक संपत्ति का
नाश करना केवल दुराचारी गुरुओ से विद्या पढ़ाना आरभ कर
देना ही नही बल्कि छोटी उमर मे ब्याह देना भी है। इस कम
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उसर के ब्याह से भविष्य मे सन्तान को क्या नुकसान होता है
इसका विचार न कर कितने ही अनसमझ माता पिता अपनी
सन्तान को बहुत ही छोटी उम्र मे अर्थात् जो समय विद्याभ्यास
का होता है उस समय उनको विवाह जंजाल मे फंसा देते हैं।
कितनी ही जातियो मे तो यह बाल विवाह की चाल इतनी
ज्यादा चलगई है कि बहुत ही छोटी अवस्था मे अर्थात् पांच
सात वर्ष के भीतर अपने बच्चो का कि जिन्हे विवाह किसे
कहते है यह भी नहीं मालूम ऐसे अज्ञान वालको का आप
माता पिता विवाह के चाव के मारे विवाह कर उनका भविष्य
बिगाड़ते है। ऐसे वालको को दोनो तरह से नुकसान पहुँचता.है
उस अवस्था मे विवाह के फंदे मे फसाया हुआ वालक केवल
विद्या ही नही पढ़ सकता किन्तु उसकी शारीरिक संपत्ति को
इतना धक्का लगता है कि जो एक योग्य वैद्य के इलाज से कही
वडी मेहनत के साथ भी अपनी असली दशा मे नही आता। आज
कल के समय को आप लोग यदि विचार करके देखे तो पहिले
के समय को देखते हुए अब मनुष्यो की मृत्यु बहुत ही छोटी
अवस्था मे होती है, इसका मुख्य कारण बाल विवाह है। इस
प्रसग पर हर एक का ध्यान पहुँचे इसलिये मैं यहां अच्छी तरह
खुलासा करके सब लिख रही हूं। ।आज कल सन्तान की
शारीरिक तथा मानसिक संपत्ति का नाश होने का कारण
खास करके वालविवाह है। इस बाल विवाह ने हिन्दू समाज का
बहुत नुकसान किया है और उसे गड्ढे मे गिराया है।
पतिध्यान मग्ना ऋतुस्नाता का पति-चित्र-दर्शन । पृ० ३९१ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३२१
आजकल की सरकारी रिपोर्टों मे मृत्यु सख्या देखने मे
बहुत से मनुष्यों की अकाल मृत्यु देखने में आती है उनके कारणों
पर विचार करके देखने से बालकपन का विवाह ही पहला कारण
मुख्य रूप से दृष्टि में आवेगा। जब से मैने औषधालय खोला है
इन २५ वर्षों मे लाखों चिट्टियां कालेज में पढने वाले विद्यार्थियो
की मेरे पास आईं और प्रति दिन आया करती हैं जो बाल्यावस्था
मे ही कुसगति मे पड़कर बालविवाह के कारण अनेक रोगों के
रोगी बन बैठे हैं।
बालविवाह के कारण पुरुष केवल अपने तन की ही खराबी
करते हैं ऐसा नहीं किन्तु उनकी सन्तान तक की बरबादी होती
है। आजकल जो हीन वीर्य्य, निर्बल, पराक्रम रहिन, शरीर से
बालक पैदा होते हैं वे ऊपर बताये हुए कारणों के पंजे मे फंसे
हुए मनुष्यों के वीर्य से उत्पन्न हुए हैं। यह २५ पच्चीस वर्ष तक
लाखो स्त्री पुरुषों की चिकित्सा करने से मालूम हुआ है।
प्रचीन विवाह क्रम
पुराने समय मे वीर्य रोककर ब्रह्मचर्य पालने के साथ शुरू
किया हुआ विद्या
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को रोककर उत्तम रीति से शरीर-सम्पत्ति की जिस तरह
हो रक्षा करते थे, इस रीति से रक्षा किए हुए वीर्य से पक्की
अवस्था मे पैदा हुई सन्तान सब अंगो से पूर्ण, निरोगी, बुद्धिमान
पराक्रमी, और बड़ी आयुवाली होती थी ।
कई एक ऐतिहासिक पुस्तके देखने से मालूम होता है कि
हमारे भारतवर्ष मे जो जो पराक्रमी और प्रसिद्ध नामांकित पुरुष
हुए हैं वे सब तरुण अवस्था में विवाहे हुए वीर्य से उत्पन्न
हुए हैं। पता लगाने से यह निश्चय मालूम होगा । इस विषय
के प्रमाण देने से एक ऐतिहासिक बडा भारी ग्रन्थ बन जावेगा
हम इधर उधर की बाते न लिखकर जिस उपयोगी विषय को
आरम्भ किया है उसी से पुस्तक पूरी करनी है । किसी ने ब्रह्म-
चर्य के विषय मे ठीक कहा है:—
सब आश्रमो से परम पावन, ब्रह्मचर्य प्रधान है ।
नर का कहो इस व्रत बिना, होता कहा कल्यान है ॥
बल, बुद्धि, विद्या और वैभव, आदि का दाता यही ।
इसके गुणों के गीत अब भी, गा रही सारी मही ॥१॥
अब ब्रह्मचर्य विहीन भारत, दीन है इस काल में ।
निर्वीर्य निर्बल हो फसा है, व्याधियो के जाल मे ॥
चिर आयु अब होती नहीं, स्वल्पायु का ही राज है ।
देखो जहां तहा सज रहा, अब बाल व्याह कुमाज है ॥२॥
जो आज कहलाते युवा वे, वृद्ध से भी वृद्ध हैं ।
हा, काम के किंकर रसीले, और रसिक प्रसिद्ध हैं ॥
मंदाग्नि और प्रमेह तरुणों, के सखे सच्चे बने ।
श्रीहीन मुरझाए हुए जन, देख पड़ते हैं घने ॥३॥
जब नीव ही दृढ़ है नहीं, कैसे बनें मन्दिर भले ।
जब खोखली जड़ हो गई, कैसे विटप फूलें फलें ॥
फैला हुआ चहुँ ओर देखो, व्याधियों का जाल है ।
जिसको लखो अब तो वही, चलता कटीली चाल है ॥४॥
हा ! भीष्म से योधा भला, अब देश में होते कहां ?
मजनू बने लाखों पड़े है, देख लो अब तो यहां ॥
दाव मार की मारें मिरोरा, दे रही इस काल हैं ।
देखो हजारो छोकरे अब, प्रेम में बेहाल हैं ॥५॥
हा ! ब्रह्मचर्य्याभाव से, इस देश का जो हाल है ।
यदि आंख है तो देख लो, कैसा गिरा इस काल है ॥
बल, बुद्धि, विद्या अर्थ मे, ससार से पीछे पड़ा ।
हां, रूढ़ि भक्ती मूर्खता में, समझ लो सबसे बढ़ा ॥६॥
आर्य्यत्व का अस्तित्व यदि, रखना चहो संसार मे ।
फिर एक बार सुसभ्य हो, रहना चहो ससार में ॥
तो ब्रह्मचर्य पवित्र व्रत, धारण करो अति प्रेम से ।
भोगो सुखों का सार जो, जीवन निभाहो नेम से ॥७॥
अब आप लोग समझ गये होगे कि ब्रह्मचर्य का प्रभाव
कैसा अद्भुत है और ब्रह्मचर्य न रखकर वीर्य को व्यर्थ नष्ट करने
से कितनी हानियां दुःख और अन्त मे जीवन नष्ट करना पड़ता है।
३२४ आनन्द मन्दिर
अब बाल्यावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक किये हुये वीर्य नाश से उत्पन्न हुये रोगों के विषय के कुछ स्वानुभव लिखती हूं ।
बाल्यावस्था में किये हुए आहार विहार के अनियमों तथा कुटेवो हस्तक्रिया आदि से उस समय तो कुछ समझ में नहीं आता क्योंकि बाल्यावस्था में तो कुछ ज्ञान नहीं होता न कुछ हानि ही मालूम होती है किन्तु कुछ दिनों बाद उसके बुरे फल मालूम होने लगते हैं । इसलिये उन रोगों का बुरा परिणाम समझकर स्त्री पुरुष सब को ही सदैव पूरी तरह से उससे सावधान रहना चाहिए ।
मेरा तजुरबा
मुझे २५ पच्चीस वर्षे स्त्रियो की चिकित्सा करते व्यतीत हुईं । इस बीच मे मेरे पास लाखो ही स्त्रियां इलाज के लिये आईं और उनके पतियों की चिट्ठियां भी आईं । स्त्रियों की जबानी पतियो के शीघ्रपात सुस्ती प्रमेह सिथिलता और नपुंसकता का हाल मालूम हुआ तथा पुरुषो के पत्रो से मालूम हुआ और होरहा है कि बाल्यावस्था मे हस्तक्रिया अप्राकृतिक व्यभिचार आदि और अन्य प्रकार के कुकर्मों से प्रायः पुरुषों में अनेक खराबियां आगई हैं ।
जो कुछ कमी रहगई वह विवाह होते ही अधिक विषय के कारण पूरी होगई और होजाती है । पुरुष इसप्रकार जब बिलकुल शक्तिहीन होजाते हैं तब इलाज करने की , सूझती है परन्तु
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३२५
डाक्टर वैद्य हकीम आदि कोई चिकित्सक पुरुष रोगियों को यह
नहीं वतलाता कि तुम्हारे ही कुकर्मो का यह फल है । सम्भव है
चिकित्सक उन रोगियो से पूरा हाल पूछने की परवाह ही न
करता हो, उसे जरूरत ही क्या है, जो रोग समझ मे आया
औषधि दे दी । रोग की जड़ खोजने की परवाह ही क्या है, रोगी
भी नहीं समझता कि मुझे यह रोग किस कारण से है ।
मेरे पास जव रोगी स्त्रियां आती हैं तव मैं सबसे पहिले
उनके पति का हाल पूछती हूँ, वे सकोच न करके मुझसे
अपने पति का कुल हाल उस समय का जव से वह स्त्री विवाह
कर पति के घर आती है जितना हाल पति के शीघ्रपात प्रमेह
सुस्ती नपुंसकता आदि का होता है कह देती है। तव मैं उसके
पति से पत्र लिखकर सच्चा हाल पूछती हूं और अपने यहां
का रोगी फार्म भेजकर लिख देती हूं कि "आप सकोच न कर
अपनी कुल हालत लिखे जो जो आपने अज्ञानता अथवा वीर्य
सम्वन्धी भूल की हो । अगर आप कुछ वात छिपावेगे तो मेरी
कुछ हानि न होगी आपकी स्त्री का रोग दूर न होगा आपही को
फायदा न होगा"।
तव वे पुरुष अपना पूरा हाल बाल्यावस्था से हाल तक का
सच्चा लिखदेते हैं। मैं सव हाल मालूम कर उनकी वाल्यावस्था
की अज्ञानता से उत्पन्न हुई खराबियों का और पति की खराबियों
से स्त्री के उत्पन्न हुये रोगों का इलाज करती हूं। इस प्रकार स्त्री
पुरुष दोनो के रोग सदैव के लिये दूर होजाते हैं ।
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सन्तान हीन स्त्रियों का इलाज
स्त्री पुरुष दोनो का हाल ऊपर लिखे अनुसार स्त्री को देख-
कर और पुरुष का हाल फार्म भराकर रोग का हाल, रोगो के
उत्पन्न होने का कारण समझ कर जिसमे खराबी होती है उसका
इलाज करदेती हू, उसकी सब शिकायते दूर होकर सन्तान होने
लगती है। इस प्रकार हजारों सन्तान हीन स्त्रियो के सन्तान
उत्पन्न हो चुकी है और लाखो शक्तिहीन पति पत्नियो के रोग दूर
होगये हैं।
अब मैं इस विषय को अधिक न बढ़ाकर आयुर्वेद के अनु-
सार स्त्रियो के गर्भाशय के सम्बन्ध मे लिखती हू जो रोगी
निरोगी सबके लिये हितकारी है जिनको समझ कर स्त्री अपना
जीवन सुखमय बना सकती है।
गर्भाशय के बिगड़ने से रोगो की उत्पत्ति होती है जिसके
कारण सैकड़ा पीछे निन्यानवे स्त्री रोगी पायी जाती हैं और सन्तान
भी निर्वल दुर्बल और कम आयुवाली उत्पन्न होती है। यदि
गर्भाशय ठीक हो तो रोग उत्पन्न न हो।
आनन्द
मन्दिर
तेरहवां अध्याय
—:०:—
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पिता के व्यभिचार का सन्तान पर दुखद परिणाम । पृ० ३९९
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३२६
स्त्री की जननेन्द्री
चित्र नं० १ मे नं० १—२—३— गर्भाशय और ४—५—६
गर्भाशय का मुख इसके बाद नीचे को योनि मार्ग उसके नीचे
प्रवेशद्वार अर्थात् योनि मुख और इसके इधर उधर गुदाद्वार और
मूत्र मार्ग है ऊपर मलाशय और मूत्राशय है जैसा चित्र मे दिख-
लाया गया है ।
इस बात को सभी स्त्री पुरुष जानते हैं कि योनि मार्ग से
सभोग के समय पुरुष की जननेन्द्री स्त्री की जननेन्द्री मे प्रवेश
करती है तब सभोग होता है । स्त्री की जननेन्द्री ऊपर से ढकी
रहती है जिससे उसे किसी प्रकार की हानि न पहुंचे । ऊपर से
देखने से केवल एक दरार सी मालूम देती है। उस दरार को हाथ
की उंगलियो से इधर उधर हटा देने से उसके भीतरी अवयव
दिखलाई देते हैं ।
स्त्री की जननेन्द्री को खोलकर देखने से योनि मार्ग दिखलाई
देता है। योनि मुख से लेकर गर्भाशय के मुख के पास तक अर्थात्
चित्र एक मे नं० ६ के पास तक योनि मार्ग कहलाता है। गर्भाशय
की चौड़ाई आगे की ओर अर्थात् मुख के पास कम और पीछे
की ओर अधिक है। गर्भाशय का मुख रोहू मछली की समान है
गर्भाशय का मुख योनि मार्ग से लगा हुआ है । योनि मार्ग का
विशेष काम है पुरुष की जननेन्द्री द्वारा निकला हुआ वीर्य
गर्भाशय के मुख तक पहुँचा देना ।
गर्भाशय
१ २
३
मलाशय
मूत्राशय
योनि मार्ग
गुदा द्वार
योनि मुख
मूत्र मार्ग
चित्र नं० १